Monday, 30 June 2014

वो लड़की और मैं और हमारे आयाम...


कुछ कच्चे, कुछ पक्के..कुछ मीठे, कुछ खट्टे.., थोड़े से छोटे अनुभव और कुछ पतंग की डोर सी बारीक और लम्बी यादें... कुछ पुरानी स्कर्ट पर बिखरी ताज़ी बनी सब्जी की खुश्बू और कुछ स्वेटर के नीचे दबाकर रखे बेरों की स्वेटर पर पड़ी छाप...कुछ पक्की सहेली से पहली बार मन की बात साझा करने की खुशी और ज़रा से हाथ से बनाए गए कार्डो पर पड़ें अंगुलियों के निशान... दोस्ती की पहली कविता, रात का पहला जागरण और कहीं जल्दी पहुंचने की ढेर सारी बेचैनी.... लगा जैसे ज़िदंगी पिक्चर की रील की तरह रिवाइन्ड हो रही है और पर्दे पर वहीं पुरानी तस्वीरें और उनमें मौजूद पात्र घूम रहे हैं...। या कहीं पहाड़ सी जिंदगी से थोड़ा-थोड़ा करके भूतकाल रिस रहा है और हर पुरानी चीज़ धीरे-धीरे सामने आ रही है।

किसने कहा कि जिंदगी बदलती है...  यह तो पीरियोडिक टेबल की तरह है। थोड़े अंतराल के बाद हर तत्व और उसके गुण-धर्मों की आवृत्ति होती है, बस उसके गुण या तो एक क्रम में बढ़ते जाते हैं या फिर घटते जाते हैं...।

वैसे तो उससे केवल एक छोटा सा पर अहम सा रिश्ता है... मैं बहुत बड़ी हूं और वो बहुत छोटी। मैं समझदार हूं और वो नासमझ, नादान और जिंदगी का खुले हाथों से स्वागत करती छोटी सी लड़की जो धीरे-धीरे 'बड़े होने' की दहलीज पर पहुंच रही है। जब यूंही उसे परेशान होते, मुस्कुराते, बेफिक्र जिंदगी जीते और फिर रोते देखा तो लगा जैसे 25 साल पुरानी कहानी फिर दोहराई जा रही है... वो लम्हें वो यादें सब यहीं फिज़ा में घुल से गए थे जो एक निश्चित समय पर एकसार होकर फिर से वहीं पुरानी तस्वीर बना रहे हैं... और उन सबमें मेरी पुरानी बेफिक्र जिंदगी फिर से साकार हो रही है। मैं फिर पॉइन्ट ज़ीरो पहुंच गई हूं... और मैं गोलार्ध के बीच में अपने आज के समय के बिन्दु पर भी हूं.... धीरे-धीरे शून्य से निकलकर मेरा भूतकाल वर्तमान में बदल रहा है, मुझ तक आ रहा, आज मैं जहां हूं शायद वो कल फिर उसी बिन्दू पर पहुंचेगा....तब तक मैं और आगे बढ़ चुकी होऊंगी और इस तरह  मैं एक ही समय में दो आयामों में जी रही हूं...।

जो बातें भूल गई थी, समय के उस पार रह गईं थी, आज यह लड़की उन्हें फिर इस पार ले आई है बिल्कुल मेरे सामने। और मैं इन्हें देखकर हैरान हूं, खुश भी हूं...। क्योंकि आज मैं नहीं मेरी नादानियां मुझ पर हंस रही है। कैसे गुमान से यह लड़की आश्वस्त है कि मैं कुछ नहीं समझी बस वैसे ही जैसे कल इसी मोड़ पर मुझे कुछ ऐसा ही विश्वास था...। मुझे खुशी हो रही है। सबको एक सी जिंदगी मिलती है। वहीं कुछ, वैसा ही देता है भगवान अगर मन के भावों और जिंदगी के मोड़ो से तोलो तो...शायद इसलिए आज इससे बहुत लगाव और जुड़ाव हो गया है। अब तक समाज का रिश्ता था अब दिल का रिश्ता बन गया है। बेटी सी, बहन सी, सहेली सी दिखती है वो मुझे..

ऐसे में कभी यह भी सोचती हूं कि जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण है गोल आकृति... जिस वक्त इस गोल गोल शेप के बारे में पढ़ा था नहीं सोचा था कि जीवन की सबसे अहम सच्चाई के बारे में पढ़ रहे हैं..., पर अब जाकर इस वृत्त का अर्थ समझ आता हैं। कहीं कोई ठहराव नहीं.. कहीं ना शुरूआत और ना ही अन्त...बस अनन्त चलनशीलता.....कितना भी दूर निकल जाओ लौटकर वहीं आना है...