फोक आर्ट और कोरोना वायरस से लड़ाई का दस्तावेजीकरण

 संस्कृति और कला, प्रतीकों और संकेतों से बनती है। सिम्बल्स और साइन्स वो हैं जो किसी कालखण्ड की उन महत्वपूर्ण घटनाओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों अथवा परम्पराओं को बयान करते हैं जिसके कारण वो कालखण्ड विशिष्ट बनता है या जिससे उसकी पहचान होती हैं।

-इन सिम्बल्स के ज़रिए कथाएं, रीति रिवाज, रस्मों के साथ साथ नैतिकता के पाठ भी दे दिए जाते हैं। सभी संकेतों और प्रतीकों से अर्थ जुड़े होते हैं जो जगह, स्थान या संस्कृति के अनुरूप अलग अलग हो सकते हैं।
-गीतों में प्रयुक्त शाब्दिक संकेत हों, नृत्य की भाव भंगिमाएं या चित्रकारी में बनाए गए प्रतीक-यह सभी केवल कलाएं नहीं हैं बल्कि इनमें जुड़े अर्थ के कारण जीवंत इतिहास के दस्तावेज भी हैं। लिखे हुए इतिहास को शायद झुठलाया जा सकता है लेकिन कलाओं के माध्यम से व्यक्त होने वाले प्रतीकात्मक इतिहास को नकारना नामुमकिन है।
-इन्ट्रस्टिंग फैक्ट यह भी है कि जिस तरह से डीएनए मनुष्य के बायोलॉजिकल लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लेकर जाता है उसी तरह से कला और संस्कृति- विश्वास, परम्पराओं, रिवाज़ों और इतिहास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लेकर जाती हैं। कम्यूनिकेशन में इनका बड़ा महत्व है। सेमियोटिक्स पूरी तरह से प्रतीकों और उनके अर्थ पर ही आधारित है।
-दुष्ट कोरोना वायरस से हमारी लड़ाई अब कला के प्रतीकों में उतर चुकी है। मिथिला पेन्टिंग हो, उड़ीसा का पटचित्र, बिहार की मधुबनी, राजस्थान की फड़ पेन्टिंग, मिनिएचर आर्ट या फिर मॉडर्न पेन्टिंग- इन सबमें कोरोना और इससे लड़ाई, उठाए गए कदम, जीत और हार का बहीखाता दर्ज हो रहा है। इतिहास बन रहा है।
-सौ-दो सौ सालों बाद ऐसी कोई बीमारी अगर फिर से आएगी, तो म्यूज़ियम में टंगा हुआ ऐसा ही कोई चित्र शायद उस समय के मानवों को, इस समय के मानवों की कोरोना से लड़ाई के बारे में बताएगा, प्रेरित करेगा, हिम्मत देगा। इतिहास यहीं तो करता है...
पटचित्र पर कोविड का संदेश





राजस्थानी फड़ पेन्टिंग


मिथिला पेन्टिंग



मधुबनी 


राजस्थान की मिनिएचर आर्ट


फोक आर्ट के जरिए ताली और थाली का दस्तावेजीकरण















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