Wednesday, 4 February 2026

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं, सोच, संसंकृति, जीवविज्ञान और भूगोल तक बदल देती है। स्मार्टफोन टैक्नोलॉजी आने के बाद हम टैक्स्टिंग और छोटे कान्टेन्ट के इतने आदी हो चुके हैं कि हम लिखना भूलते जा रहे हैं। खासकर लम्बे जवाब। हमने संक्षिप्त उत्तर लिखना सीख लिया है और साथ ही स्पेलिंग्स की भी शॉर्ट फॉर्म्स लिखने लगे हैं। भाषा का सरलीकरण और आइकॉनीकरण हो रहा है, जिसमें कठिन बड़े शब्दों की बजाय सिम्पल, छोटे शब्द और आइकन्स हैं। भाषा का विकास इसी तरह होता है। 


हिन्दी में भी हम देखते हैं कि सरलीकरण के कारण बहुत से संयुक्ताक्षर, क्लिष्ट शब्द विलुप्त हो चुके हैं। हम बहुत सरल हिन्दी लिखते और बोलते हैं। लगभग सभी भाषाओं का यहीं हाल है। टैक्नोलॉजी आने के बाद हर भाषा एक सरलीकरण और सुगमीकरण से गुज़रती है जिससे उसका प्रयोग आसान हो जाए। लेकिन यह सरलीकरण धीरे धीरे भाषा का पूरा स्वरूप बदल कर रख देता है। कई नए शब्द जुड़ते हैं, पुराने गायब हो जाते हैं, और कईओं को लिखने का तरीका बदल जाता है। 


 कोई बड़ी बात नहीं की स्मार्ट और मास टैक्नोलॉजी के इस दौर में अंग्रेजी के बड़े स्पेलिंग्स वाले शब्द भी विलुप्त हो जाएं और उनकी जगह शॉर्ट फार्म वाले वर्ड्स जगह बना लें। टैक्नोलॉजी कॉम्पलेक्सिटी (जटिलता) से सिम्पलिसिटी (सुगमता) की तरफ ले जाती है। और इसके साथ इवॉल्व होते हुए हम भी कॉम्प्लेक्स आदतों और स्किल्स को भूलते जाते हैं और सिम्पल आदतों को अपनाते चलते हैं। जैसे कि कैलकुलेटर आने के बाद हम बड़ी मानसिक गणनाएं करना भूल गए। मोबाइल आने के बाद लोगों के नम्बर याद रखना कम हो गया। आर्टीफिशियल इन्टैलीजेन्स आने के बाद हमारी क्रिटिकल थिकिंग कम हो रही है...। 

 मतलब जब सर्वाइवल में हैल्प करने के लिए टैक्नोलॉजी आ रही है तो हम कॉम्प्लेक्स सर्वाइवल हैबिट्स को छोड़ रहे हैं और सिम्पल आदतों को अपना रहे हैं। दिमाग का प्रयोग कम करके, मोटर स्किल्स ज़्यादा डेवलप कर रहे हैं। यानि यह कहा जा सकता है कि विकास का मतलब कॉम्प्लेक्स से सिम्पल की तरफ जाना है, जहां जाने में टैक्नोलॉजी हमारी मदद कर रही है। 


 अन्त में एक वाइल्ड आइडिया- कहीं ऐसा तो नहीं कि असल में सबसे विकसित प्राणी सबसे सिम्पल एककोशिकीय प्राणी यानि अमीबा है, बहुकोशिकीय और का्म्प्लेक्स ह्यूमन्स नहीं।😌😃😊😇 और हम दरअसल विकास का अन्तिम चरण तब प्राप्त कर लेंगें जब हम भी विकसित होते होते एककोशिकीय हो जाएंगे। 😁😃 अमीबा एक्सट्रीमली एडाप्टेबल है-यह विभाजित हो सकता है, खा सकता है, बच सकता है। अगर "विकसित" का मतलब सर्वाइवल में सबसे एफिशिएंट है, तो अमीबा जैसा सिंपल जीव बेस्ट है- कोई सोच-विचार का बोझ नहीं, बस रिएक्शन और सर्वाइवल।

 हम इंसान अपनी कॉम्प्लेक्सिटी की वजह से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जबकि अमीबा चुपचाप अरबों साल से फल-फूल रहा है। शायद इवॉल्यूशन का असली "एंडगेम" सिंप्लिसिटी ही हो, जहाँ सब कुछ मिनिमल एफर्ट में हो जाए। टेक्नोलॉजी हमें उसी दिशा में ले जा रही है: कम सोचो, कम लिखो, कम याद रखो, बस एंजॉय करो। 😌

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