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Monday, 3 July 2017

सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं, छिपा था क्या, कहां किसने ढका था....: ऋगवेद के सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है यह अमर गीत



वर्ष 1988 में दूरदर्शन पर हर रविवार की दोपहर श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक सीरियल प्रसारित हुआ करता था -'भारत एक खोज', जो कि पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा 1946 में लिखित किताब 'डिस्कवरी ऑव इंडिया' पर आधारित था। इसके 53 एपिसोड्स में भारत के 5000 सालों के इतिहास का फिल्मांकन किया गया था। लेकिन यहां हम सीरियल की बात नहीं करेंगे। बल्कि इस लेख का उद्देश्य इस सीरियल के शीर्षक गीत- "सृष्टि से पहले सत् नहीं था..." का महत्व सामने लाना है।

सनातन धर्म के सबसे आरम्भिक स्त्रोत, ऋगवेद के संस्कृतनिष्ठ सूक्तों से शुरू होने वाले, इस शीर्षक गीत में गूंजने वाली संस्कृत, बेहद क्लिष्ट होने के बावजूद कानों में रस घोलती है और सुनने वाले को एक अलग श्रव्य रस से परिचित कराती है।

लेखक व अनुवादक वसंत देव के बोल, संगीतकार वनराज भाटिया का संगीत और सुरीला समूह गायन वो विशेषताएं हैं जो इस गीत को समय और काल के परे लोकप्रिय बनाती हैं। पर ऐसा क्या खास है इसके बोलों में कि जब यह गीत कानों में गूंजता है तो सुनने वाले को एक अलग अनुभूति देता है?




क्या आप जानते हैं कि यह पूरा गीत दरअसल ऋगवेद के नासदीय और हिरण्यगर्भ सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है। जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति की शुरुआत का वर्णन है। जी हां, वो प्रश्न जिसका उत्तर विज्ञान आज तक ढूंढ रहा है।

हिन्दु धर्म में पूज्यनीय ऋगवेद को विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है। 5000 वर्ष पूर्व लिखे गए ऋगवेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की रचना से पहले का जो वर्णन है वो आज भी प्रासंगिक है। इसके रचयिता ऋषि प्रजापति परमेष्ठी माने जाते हैं। इस सूक्त के अनुसार सृष्टि की शुरूआत से पहले किसी तरह का कोई तत्व नहीं था, कोई अणु, परमाणु या पार्टिकल कुछ भी नहीं। आकाश, हवा, दिन, रात वगैरह भी नहीं थे। केवल अंधकार था, गहन अंधकार और शून्य, निर्वात, खालीपन। और तब, ब्रह्मतत्व या जिसे ईश्वर भी कहा जा सकता है, के मन में सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न हुई और 'कुछ नहीं' से 'कुछ' का निर्माण होने की नींव पड़ी।

जहां एक तरफ यह सूक्त ईश्वर के होने को स्थापित करता है और कहता है कि सृष्टि की शुरूआत को दरअसल ईश्वर के अलावा कोई नहीं जानता जो कि प्रकाशकणों के रूप में सब जगह उपस्थित हैं, वहीं उसके होने पर सवाल भी खड़ा करता है। यह भी पूछता है कि वाकई में ऐसा कोई करने वाला है भी या नहीं जिसके बल पर सूर्य, पृथ्वी या यह पूरा बृह्मांड स्थिर गति से चल रहे हैं।



इस गीत का दूसरा खंड जो कि सीरियल के अंत में गूंजता है, ऋगवेद के हिरण्यगर्भ सूक्त का हि्न्दी अनुवाद है। सूक्त का प्रथम श्लोक ज्यों का त्यों गीत में लिया गया है। हिरण्यगर्भ (golden womb) का अर्थ है उजला गर्भ या अंडा या उत्पत्ति स्थान। सनातन धर्म में इसे सृष्टि की शुरुआत का स्त्रोत माना जाता है। इसी के ज़रिए सूर्य, चन्द्रमा, देवताओं और जीवात्मा का जन्म हुआ है। हिरण्यगर्भ को सर्वाधिक पूज्यनीय बताया गया है। उगते सूर्य को भी हिरण्यगर्भ का रूप माना गया है जिसकी लालिमा उसकी पूर्ण शुद्धता से भरी उत्पत्ति का प्रतीक है , इसलिए यहां उसकी उपासना की भी बात कहीं गई है।

धारावाहिक की केवल अंतिम कड़ी में पूरा गीत लिया गया है। बाकि कड़ियों में शीर्षक गीत के कुछ ही अंतरे सुनाई पड़ते हैं ('अगम, अतल जल भी कहां था' के बाद सीधे 'सृष्टि का कौन है कर्ता' से लिया गया है।)

गीत के बोल इस तरह से हैं:

(शीर्षक गीत)

नासदासीनन्नोसदासीत्तानीम नासीद्रोजो नो व्योमा परो यत।
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गगहनं गभीरम्।।
(नासदीय सूक्त, ऋगवेद, दशम् मंडल, सूक्त- 129)

सृष्टि से पहले सत् नहीं था,
असत् भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं,
आकाश भी नहीं था।

छिपा था क्या, कहां,
किसने ढका था।
उस पल तो अगम, अतल
जल भी कहां था।

नहीं थी मृत्यु,
थी अमरता भी नहीं।
नहीं था दिन, रात भी नहीं
हवा भी नहीं।
सांस थी स्वयमेव फिर भी,
नहीं था कोई, कुछ भी।
परमतत्व से अलग, या परे भी।

अंधेरे में अंधेरा, मुंदा अंधेरा था,
जल भी केवल निराकार जल था।
परमतत्व था, सृजन कामना से भरा
ओछे जल से घिरा।
वही अपनी तपस्या की महिमा से उभरा।

परम मन में बीज पहला जो उगा,
काम बनकर वह जगा।
कवियों, ज्ञानियों ने जाना
असत् और सत् का, निकट सम्बन्ध पहचाना।

पहले सम्बन्ध के किरण धागे तिरछे।
परमतत्व उस पल ऊपर या नीचे।
वह था बटा हुआ,
पुरुष और स्त्री बना हुआ।

ऊपर दाता वही भोक्ता
नीचे वसुधा स्वधा
हो गया।।

सृष्टि ये बनी कैसे,
किससे
आई है कहां से।
कोई क्या जानता है,
बता सकता है?

देवताओं को नहीं ज्ञात
वे आए सृजन के बाद।

सृष्टि को रचा है जिसने,
उसको, जाना किसने।


सृष्टि का कौन है कर्ता,
कर्ता है व अकर्ता?
ऊंचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता।
वहीं सचमुच में जानता
या नहीं भी जानता।
है किसी को नहीं पता,
नहीं पता,
नहीं हैं पता,
नहीं हैं पता।


(उपसंहार अंतरा)
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेकासीत्।
स दाधारं पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्।।
(प्रथम श्लोक, हिरण्यगर्भ सूक्तम, ऋगवेद, दशम मण्डल, सूक्त -121)

वो था हिरण्यगर्भ, सृष्टि से पहले विद्यमान
वहीं तो सारे भूत जात का स्वामी महान

जो हैं अस्तित्वमान, धरती- आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

जिसके बल पर तेजोमय है अम्बर
पृथ्वी हरी-भरी, स्थापित, स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर।
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

गर्भ में अपने अग्रि धारण कर, पैदा कर,
व्यापा था जल इधर-उधर, नीचे ऊपर
जगा जोे देवों का एकमेव प्राण बनकर,
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

ऊं!!

सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता, पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक, अतुल जल नियामक रक्षा कर।
फैली है दिशाएं बाहु जैसी उसकी सब में, सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर।
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर..।

( सत्- सत्य/तत्व, अगम- अथाह,  हवि -हवन)

















1

Saturday, 17 June 2017

लद्दाख.. यानि ठण्डे मरुस्थल का सफर...

"


इस आठ जून की सुबह को जब हमारे कदम लद्दाख के रिनपोछे हवाई अड्डे पर पड़े तो हम दिल्ली के साथ-साथ उसकी गर्मी को भी पीछे छोड़ ही चुके थे। यहीं नहीं, राजधानी की चौड़ी सपाट सड़को को, दोनों तरफ दिखती सीमेंट की इमारतों को और सड़को पर दौड़ते वाहनों से उठते धुंए को भी बहुत पीछे छोड़ आए थ। सामने थे कत्थई पहाड़ और उन पर अठखेलियां करते बादल, बलखाती पगडंडीनुमा सड़कें और शांत, सुरम्य वातावरण।  


जैसा कि निर्देशित था, पहले दिन होटल में आराम करने और स्थानीय बाज़ार की सैर करने के बाद दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो हमारा पहला पड़ाव था लामायुरू मॉनेस्ट्री। जो लेह से लगभग 120 किमी दूरी पर, लेह-श्रीनगर हाइवे पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग एक (NH-1) है। बलखाती सड़क के एक तरफ सुनहरे, पीले और भूरे पहाड़ों के दर्शन हो रहे थे तो दूसरी तरफ थी बलखाती सिन्धु (Indus) नदी। जहां सूरज की रौशनी पड़ रही थी वहां से उजले, जहां छाया थी वहां से धुंधले और चोटियों पर धवल छटा.. पहाड़ों के इतने रंग थे मानों किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर हो।

सिन्धु और झंस्कार नदी का संगम
हम दोनों तरफ के सुंदर नज़ारों का आनंद लेते हुए सफर कर रहे थे कि ड्राइवर ने लेह से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर गाड़ी रोककर हमें उतरने को कहा। गाड़ी से उतरकर नीचे घाटी की तरफ झांका तो नज़ारा दर्शनीय था। दो अलग-अलग नदियों का संगम। नीचे सिन्धु नदी और झंस्कार (Zanskar) नदी मिलते हुए साफ दिख रहीं थीं।  इन दोनों नदियों के जल का रंग भी बिल्कुल अलग था और फ़ितरत भी। एक नदीं बिल्कुल शांत थी तो दूसरी अविकल बहती.. वाचाल, चंचल...। 

मूनलैंड पहाडियां
लेह से लगभग 100 किमी पहले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर एक छोटा सा गांव पड़ता है लामायुरू। यहीं पर स्थित हैं मूनलैंड पहाड़ियां। इन पहाड़ियों की विशेषता यह हैं कि इनकी संरचना बिल्कुल चांद पर पाई जाने वाली पहाड़ियों जैसी हैं। यहां का तापमान भी काफी कम रहता है। 



यहीं मूनलैंड पहाड़ियों से कुछ किलोमीटर आगे लेह की सबसे पुरानी मॉनेस्ट्री है- लामायुरू मॉनेस्ट्री। पहाड़ी पर बसी यह गोम्पा मॉनेस्ट्री बेहद शांत, सादगीपूर्ण और खूबसूरत हैं जहां से पूरे गांव का नज़ारा लिया जा सकता है। लामायुरू में हर साल दो बार लेह के प्रसिद्ध मास्क फेस्टिवल्स आयोजित किए जाते हैं। कहते हैं कि यह मॉनेस्ट्री लगभग 400  बुद्ध सन्यासियों का घर रही है। 


इस मॉनेस्ट्री में शाक्यमुनि बुद्ध की वृहद् मूर्ति हैं। दोनों तरफ की दीवारों में छत तक ऊंची लकड़ी और शीशे की अल्मारियों में लाल और सुनहरे कपड़ों में लिपटे धार्मिक ग्रंथ रखे हुए हैं। 


यहां आने के लिए 15 साल से ऊपर के लोगों का 50 रुपए का टिकिट तो लगता है लेकिन परेशानी यह हैं कि  यहां आपको इस मॉनेस्ट्री, यहां की संस्कृति और तमाम धार्मिक दस्तावेज़ो वगैरह के बारे में विस्तार से बताने वाला कोई गाइड उपलब्ध नहीं है। जानकारी के नाम पर केवल एक साइन बोर्ड इस मॉनेस्ट्री के दरवाज़े पर लगा हुआ है। अगर आप बुद्ध धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते तो आपको इस प्राचीन मॉनेस्ट्री की विशेषता या धार्मिक महत्व का अंदाज़ा शायद ना हो पाए लेकिन फ़िर भी एक पर्यटक के तौर पर आप यहां की दीवारों पर की गई रंग-बिरंगी खूबसरत चित्रकारी और चटकीली साज सज्जा का आनंद उठा सकते हैं। यहां के माहौल में बसी शांति और पवित्रता को महसूस कर सकते हैं जो आपको किसी दूसरी ही दुनिया में आने का अहसास कराती है। यहां की अलीची मॉनेस्ट्री भी काफी प्रसिद्ध है। 

खरदूंगला के रास्ते पर
 लद्दाख शब्द में ला (La) का मतलब होता है पास यानि रास्ता और दाख (Dakh) का मतलब होता है भूमि। लद्दाख, ऊंचे पासेज यानि ऊंचे रास्तों की भूमि को कहा जाता है। तो 10 जून को हमारा पड़ाव था, लेह से चालीस किलोमीटर सड़क दूरी पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल पास- 'खरदूंगला'। समुद्र तल से 18,380 किमी ऊंचाई पर स्थित इस पास पर पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। लगभग 15,000 फीट तक बंजर पहाड़ मिलते हैं और फ़िर शुरू होती हैं कहीं-कहीं सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियां। 17.00 फीट की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते आपको हर तरफ हिमआच्छादित, शुभ्र वर्ण के पर्वत दिखने लगते हैं। हिमपात यहां आम है। बर्फीला तूफान या भूस्खलन कभी भी हो सकता है। सड़के संकरी तो हैं ही साथ ही फिसलन भरी हुई भी। यहां पर ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम है। लेकिन अगर आप अपने साथ एक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर चले हैं और जोखिम उठाने को तैयार होकर आए हैं तो इस रास्ते और मंज़िल का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। 




खरदूंगला शिखर पर पहुंचना एक अलग आनंद का अहसास कराता है। हर तरफ बर्फ की सफेद चादर, अगर रंग हैं तो बस, आपके कपड़ों, गाडियों, साइन बोर्ड्स और यहां जगह-जगह पर लगे पवित्र रंगीन बंदनवारों का रंग। किसी की तबीयत खराब होने की स्थिति में आप यहां स्थित आर्मी की डिस्पेन्सरी में जा कर चिकित्सकीय सहायता ले सकते हैं। यहां विश्व का सबसे ऊंचा कैफेटेरिया भी है जहां हमने चाय, मैगी और मोमोज़ का स्वाद लिया। खरदूंगला के माइनस 10 डिग्री तापमान में चौबीसों घंटे यहां रहने वाले फौजियों के आराध्य हैं भगवान शिव, जिनका यहां एक छोटा सा मंदिर भी है। 


पैंगगॉन्ग झील
लद्दाख का सबसे मनोरम स्थल है समुद्र तल से 14,270 फीट की ऊंचाई पर स्थित पैन्गॉन्ग सो (Pangong Tso) झील। तिब्बती भाषा के इस नाम का मतलब होता है "हाई ग्रासलैंड झील"। लेह से डेढ़ सौ किमी दूर स्थित इस सुंदर झील तक पहुंचने के लिए लगभग 5 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ता है लद्दाख का तीसरा सबसे ऊंचा पास 'चांगला'। चांगला तक ऊपर बर्फीले पहाड़ चढ़ने के बाद जब हम नीचे उतरते हैं तो रास्ता बंजर पहाड़ों और पथरीली भूमि से भरा हुआ है। यहां आर्मी का बेस कैम्प भी है। जगह-जगह आर्मी के बकंर्स नज़र आते हैं। चूंकि यह झील भारत-चीन की एक्चुअल लाइन ऑफ कंट्रोल पर है, यहां तक पहुंचने के लिए आपको इनर लाइन परमिट (ILP) लेने की ज़रूरत होती है। 140 किमी लम्बी इस झील का 40 किमी हिस्सा भारत में पड़ता है और बाकी 100 किमी चीन में। रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। शे और ग्या जैसे गांवो से गुज़रकर और पागल नाला पार करके जब हम इस झील तक पहुंचते हैं, तो यकीन मानिए सारी थकान इसकी एक झलक से ही मिट जाती है। इस झील पर प्रकृति ने जमकर खूबसूरती लुटाई है। पानी का रंग नीला है, बिल्कुल फिल्मों में दिखने वाली झीलों की तरह; वातावरण नि:शब्द है और सुंदरता, बेदाग।  



मैंने अभी कहा था ना कि पैन्गॉन्ग लेक का रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। लम्बे सफर की उदासीनता को मिटाने का काम प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं करती बल्कि रास्ते पर जगह-जगह लगे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के रोड साइन्स की भी इसमें अहम् भूमिका है। लद्दाख, मिलिट्री के हिसाब से काफी संवेदनशीन इलाका है क्योंकि यह सियाचिन, कारगिल और द्रास इलाकों को जोड़ता हैं। यहां ठंडे, सख्त, फौलादी पहाड़ों को काटकर उसमें से सड़के निकालने का काम करती है बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ)। बर्फीली, बलखाती सड़कों पर यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनज़र बीआरओ के चेतावनी बोर्ड लगे हैं जिनको पढ़ने का अपना अलग मज़ा हैं। इनमें फनी वनलाइनर्स लिखे गए हैं जो आपको सुरक्षित चलने का अहसास दिलाने के साथ-साथ आपके होंठों पर मुस्कुराट भी लाते हैं।


शांति स्तूप
प्राकृतिक दर्शनीय स्थानों और प्राचीन मॉनेस्ट्रीज़ के अलावा लद्दाख में कुछ कदरन आधुनिक मानव निर्मित स्थल भी हैं, जिनमें प्रमुख हैं पूरे विश्व को शांति का संदेश देता शांति स्तूप और मिलिट्री द्वारा बनाया गया सेना प्रदर्शनी स्थल, हॉल ऑफ फेम। 

हॉल ऑफ फेम
  यहां सेना के उपकरणों, परिधानों और विभिन्न सैन्य अभियानों की ऐतिहासिक तस्वीरों को लोगों के लिए प्रदर्शित किया गया है। यहां आकर आपको अपनी सेना के कठिन परिश्रम और अदम्य साहस के बारे में पता चलता है, गर्व का अहसास होता हैं। 


यहां की सबसे अमूल्य धरोहर है राजपूताना राइफल्स के युवा कैप्टन विजयंत थापर द्वारा कारगिल युद्ध में शहीद होने से पूर्व अपने पिता को लिखा गया पत्र। कैप्टन विजयंत केवल 22 साल की छोटी सी उम्र में शहीद हो गए थे। उनके इस पत्र के साथ ही उनके पिता का जवाब भी संलग्न है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसे पढ़कर ही आप इसके भावों के महसूस कर सकते हैं। यहां कुछ पाकिस्तानी सैनिकों से मिले पत्र भी हैं जो उन्होंने अपने परिवारजनों को लिखे थे। अगर यहां जाएं तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें।



बाकी अगर आप लद्दाख जा रहे हैं तो लेह पैलेस देखें, मैग्नेटिक हिल देखें, ड्रुक पद्मा स्कूल या रैंचो स्कूल देखें जहां थ्री इडियट्स फिल्म की शूटिंग हुई थी। यहां का वुड अवन पिट्ज़ा और स्थानीय पकवान थुप्का ज़रूर खाएं। ढेर सारे गर्म कपड़े, खूब सारा समय और बहुत सारा साहस लेकर जाईए। मिलिट्री के लोगों से मिलिए, हिमआच्छादित शैलमालाओं को निहारिए...। 

लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का सफर आपको प्रकृति की ताकत का भी अहसास दिलाएगा, विविधता का भी और प्रकृति द्वारा निर्मित मानवों की इच्छा शक्ति का भी जो इन बंजर पहाड़ों को छूने और महसूस करने की तमन्ना में यहां तक आते हैं और बहुत सी अच्छी यादें साथ ले जाते हैं। 
'जुले'

Friday, 11 November 2016

तस्वीरों में : स्वीमिंग पूल पर छिटकी छठ पर्व की छठा



मन चंगा तो स्वीमिंग पूल में गंगा...। मेट्रो शहरों की आधुनिक सोसाइटियों  के आस-पास ना तो नदियां हैं, ना तालाब और ना ही पोखर... लेकिन अपने राज्य और गांव को छोड़कर यहां बस चुके पूरबनिवासी ज़रूर हैं। यह शायद उनका अपने राज्य, संस्कृति और त्यौहारों से प्यार ही हैं, कि सुविधाओं के अभाव में भी लोग छठ पर्व मनाने और सूर्य भगवान को अर्घ्य देने का साधन ढूंढ ही लेते हैं। कहते हैं ना, जहां चाह, वहां राह...। यह बिहार के रहवासियों का छठ पर्व के प्रति उत्साह ही है कि सोसाइटी के स्वीमिंग पूल को ही पवित्र पोखर का रूप दे दिया गया । छठ पर्व मनाते लोग यहां स्वीमिंग पूल में खड़े होकर अस्ताचलगामी और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते नज़र आए। आप भी इन रंगीन तस्वीरों के ज़रिए स्वीमिंग पूल में मनते छठ उत्सव का नज़ारा लीजिए...  


और स्वीमिंग पूल पर लग गया छठ का मेला

नहाय खाय और खरना के बाद अस्ताचलगामी सूर्य भगवान को अर्घ्य देने पहुंचे भक्त
ढोल-नगाड़े का इंतज़ाम, ताकि पूजा में कोई कमी ना रह जाए


घर के बढ़े-बूढ़ों की कुशल देखरेख में सम्पन्न होती छठ पूजा



मौसमी फलों, केले, दीपक, नारियल, ठेकुएं और अन्य पूजा के सामानों से सजे सूपा


कुछ लोग इस तरह भी सूप सजा कर लाए 

स्वीमिंग पूल के किनारे पूजा की तैयारी पूरी


पूरी श्रद्धा के साथ अर्ध्य देती व्रती महिला





और यहीं गाए गए छठ मैया के गीत 



 बच्चे भी खुश और बड़े भी

अर्ध्य सम्पन्न




 सूपा वापस ले जाते पुरुष सदस्य







Monday, 23 November 2015

ग़र बर्रुअत जमीं अस्त, हमीअस्त हमीअस्त हमीअस्त...


कौन कहता है जीत-ए-जी जन्नत मयस्सर नहीं होती... बस एक बार नज़ारा-ए-कश्मीर हो जाए ..

धरती पर जन्नत है कश्मीर.. और इस जन्नत का सबसे खूबसूरत हिस्सा है गुलमर्ग

चिनारों के दरख्त, देवदारों के विटप... जिधर देखों उधर सब्ज़ रंग का नज़ारा... गुलमर्ग में पहुंचे तो आंखे गुलज़ार हो गईं थी... पहाड़ों पर बर्फ नहीं थी, मगर घाटी की खूबसूरती पर खुद कुदरत निसार हो गई थी...



धुंधले स्लेटी कोहरे से झांकते पहाड़, ज़मीन पर नज़र की सीमा तक बिछा हुआ हरा मखमली कालीन, बलखाती सड़क, नर्म ठंडी हवा और खुश होते हम...यह गुलमर्ग की सुबह थी। गुलमर्ग घाटी में बीचोबीच बने अपने होटल के कमरे की खिड़की से सुबह-सुबह जब पर्दा हटाया तो कुदरत की खूबसूरती का ऐसा खूबसूरत नज़ारा देखने को मिला जो अब से पहले कहीं नज़र नहीं आया था। 




 यूं तो पूरा कश्मीर ही खुद खुदा की बनाई खूबसूरत पेंटिंग लगता है लेकिन गुलमर्ग घाटी पर तो मानो भगवान ने बहुत जतन से ब्रश चलाए हैं।

अगस्त माह में सूरज सुबह सात बजे तक निकल आता है और फिर शुरु होता है बादल, पहाड़ों और सूरज के बीच छुपा-छिपी का खेल। कभी बादल छिप जाते हैं, कभी सूरज और कभी पहाड़। यहां पलक झपकते मौसम बदल जाता है...अभी धूप, अभी बूंदाबांदी, पल भर पहले गर्मी और पल भर बाद ठंड....
 बॉलीवुड और गुलमर्ग का भी बहुत गहरा याराना है। पूरे कश्मीर में और खासकर गुलमर्ग में जगह-जगह ऐसी जगहें हैं जहां बॉलीवुड फिल्म के लिए  शूटिंग हो चुकी है।


इन दोनों मंदिरों की तस्वीरें देखिए.. और पहचानने की कोशिश कीजिए। कुछ याद आया..
 पहाड़ों पर मस्ती में भांग घोटते लोग, ढोलक की थाप पर जय-जय शिव शंकर
 करती मुमताज और उनके साथ कदम से कदम मिलाते सुपरस्टार राजेश खन्ना। जी हां, सही पहचाना. यह दोनों वहीं मंदिर हैं जिनमें फिल्म 'आप की कसम' का सुपरहिट गाना 'जय-जय शिव शंकर' फिल्माया गया था। 

ऊपर वाला मंदिर गुलमर्ग की प्रवेश सीमा पर बने बस स्टेंड पर बना है। शांत और भीड़ से दूर इस मंदिर से पूरी गुलमर्ग घाटी का नज़ारा होता है। 

दूसरा मंदिर मशहूर शंकराचार्य मंदिर  है जो काफी प्रसिद्ध है। लोग दूर दूर से यहां के दर्शन करने आते हैं। 




यहां और भी ऐसे बहुत से प्वॉइंट्स हैं जहां फिल्मों की शूटिंग हुई है। यहां के लोगों से, घोड़ो वालों से आप बात करेंगे तो वो आपको बड़े जतन से बताते हैं कि वो कितने स्टार्स से मिल चुके हैं।


यहीं विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स भी हैं। गुलमर्ग की पूरी घाटी का नज़ारा एक बार में लेना चाहें तो गोंडोला यानि केबल कार से सबसे ऊंची पहाड़ी पर ज़रूर जाए जहां पूरे साल बर्फ रहती है और जहां से लगभग 15 किलोमीटर आगे पाकिस्तान की सीमा है। इस जन्नत की खूबसूरती के बारे में और क्या कहा जाए बस किसी मशहूर कवि की इन्हीं लाइनों से सबकुछ बयां हो जाता है कि..


पहाड़ों के जिस्मों पर बर्फों की चादर
चिनारों के पत्तों पर शबनम का बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के ज़ेवर
है कश्मीर दुनिया में जन्नत का मंज़र।


Monday, 8 June 2015

मुक्तेश्वर! चट्टानों, पानी, सूरज , हवा, मिट्टी और पहाड़ियों की जुगलबंदी...


और सहसा मैं ठिठक गई... दुर्गम पथरीली चढ़ाई और सीधी ढलान पर बैठ-बैठ कर चढ़-उतर कर यहां तक पहुंचे पैरों की थकावट जाने कहां गुम हो गई.. सामने थी नक्काशीदार चट्टाने, कहीं उभरी, कहीं ढलकी और कहीं लम्बवत रूप लेती.. एक के ऊपर एक, सब आगे निकलने की चाह में.. और उन पर ऊपर से गिर रही थी पानी की कल-कल धार...  सुरम्य छोटी घाटी में चट्टानों के बीच गहरे हरे रंग से नीबुंए रंग की छटा  बिखेरते पानी का रूप और पारदर्शी तले से झांकते चिकने, गोल पत्थर... स्वर्ग का अहसास करा रहे थे...। मुझे याद हो आया योग निद्रा में जाने के बाद सबसे खूबसूरत जगह की सैर करना... कुछ ऐसी ही तस्वीर बना करती थी...। और, आज मानों मेरी स्वप्नों से साकार होकर वो जगह सामने उतर आई थी। पैरों से चप्पलों का बोझ हटाकर जब इस झरने के पानी को छुआ तो शीतलता कब तलवों से दिमाग तक पहुंच कर इसे ठंडक दे आईं, पता ही नहीं चला... मैं तो प्रकृति के इस सौंदर्य में मगन थी...

भालगढ़ झरना

पानी तेरे रूप अनेक.. बह जाए तो नदी, गिर जाए झरना, ठहर जाए तो शांत झील और हिलोरें ले तो समुद्र...
पानी के इस झरनीय रूप का यह दर्शन मिला मुझे मिला भालगढ़ में।

वहीं भालगढ़ झरना जो नैनीताल से लगभग 60 किलोमीटर ऊपर मुक्तेश्वर पहुंचने के बाद देखने को मिलता है। अधिकतर पर्यटक बस मुक्तेश्वर महादेव मंदिर और चौथी जाली को अपनी घूमने की सूची में शामिल करते हैं...। लेकिन यहां आने के बाद अगर आपने भालगढ़ झरना नहीं घूमा तो आप प्रकृति के सौंदर्य को करीब से देखने का मौका गवां देंगे।

इसी जून की 3 तारीख को हम दिल्ली से लगभग 350 किमी की यात्रा लगभग 7 घंटे में तय करके हलद्वानी, काठगोदाम, नैनीताल, भीमताल और भुवाली होते हुए मुक्तेश्वर पहुंचे थे। शाम लगभग 5 बजे जब हम मुक्तेश्वर पहाड़ी पर बसे किसना ऑर्चर्ड रिज़ॉर्ट पहुंचे तो दिल्ली की भीषण गर्मी बहुत पीछे छूट चुकी थी। गाड़ी से उतरते ही सर्द हवा के झोंकों ने हमें मैदानी इलाकों के दिसंबर मौसम की याद दिला दी। हम सब अपनी अटैचियों में से गर्म कपड़े और शॉल निकाल ही रहे थे कि हमारे स्वागत के लिए लाल बुरास शर्बत पहुंच गया। किसना ऑर्चर्ड में आने वालों का स्वागत इसी बुरास शर्बत से किया जाता है। बुरास यहीं पहाड़ी में उगने वाला एक पौधा है जिसका शर्बत बेहद शीतल और तेज़ मिठास लिए होता है। बुरास शर्बत पीकर हम अपने कमरों की


और चले और यहीं कमरे की खिड़की से हमें सूर्यास्त के दर्शन हुए। बेहद खूबसूरत सूर्यास्त....। दिल्ली की ऊंची इमारतों और धूल भरे वातावरण के बीच सूर्योदय और सूर्यास्त का नज़ारा अगर कहीं से कभी दिखता भी है तो धुंधला दिखता है, लेकिन यहां हमारी आंखों और क्षितिज पर पहुंचे भास्कर के बीच थी केवल पारदर्शी, ठंडी हवा और मिट्टी की सौंधी महक..।

पहले दिन रिज़ॉर्ट में ही ब़ॉन फायर का मज़ा लेकर हम सोने चले गए। मैनेजर साहब हमें पहले ही आगाह कर चुके थे कि हम सुबह पांच बजे अपने कमरे की बालकनी से ही पहाड़ी सूर्योदय का नज़ारा ले सकते हैं, सो हम सब सुबह पांच बजे ही उठ गए थे।

बालकनी से सामने पूरब में धीरे-धीरे आगमन करते रविदेव का नज़ारा वाकई दर्शनीय था...,  मानों खुद हिमराज सूर्यदेव के रथ को धीरे-धीरे ठेलकर आकाश में पहुंचाने की चेष्टा कर रहे हों... दिवाकर की पहली मृदुल रश्मियां जब हम तक पहुंची तो मन प्रफुल्लित हो उठा। हम बुत बने प्रकृति की इस लीला का अवलोकन करते रहे। धीरे-धीरे सूरज ऊपर चढ़ा और हम भी तैयार होकर मुक्तेश्वर घूमने की तैयारी में लग गए। लगभग नौ बजे स्नानादि करके और नाश्ता ले चुकने के बाद हम अपने पहले पड़ाव मुक्तेश्वर महादेव मंदिर जाने के लिए निकल पड़े।

मुक्तेश्वर महादेव मंदिर
गाड़ी से यहां पहुंचने में लगभग 25 मिनट लगे। यूं तो यह ज्यादा दूर नहीं था लेकिन संकरी पहाड़ी सड़क, अंधे मोड़ और दोनों तरफ से आते वाहनों के कारण हमें इतना समय लग गया था। मुक्तेश्वर महादेव के बगल से ही एक रास्ता यहां के दूसरे दर्शनीय स्थल चौथी जाली के लिए कटता है, लेकिन हम उस रास्ते से नहीं गए। हम पहले मुक्तेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे। लगभग आधा किलोमीटर ऊंची चढ़ाई चढ़ने और 30 सीढ़ियां पार करने के बाद हमारे सामने मुक्तेश्वर महादेव मंदिर था। मंदिर के मुहाने पर लकड़ी की चौकोर मेहराब बनी थी और उस से बंधी थी बहुत सी घंटियां। यह दृश्य इतना सादा और सौम्य है कि भक्ति अपने आप ही मन में समाने लगती है। मुक्तेश्वर महादेव मंदिर की सादगी ही उसका सबसे बड़ा आकर्षण हैं। यहां और नामी पहाड़ी मंदिरों जैसी भीड़भाड़, दिखावा और साज सज्जा का पूरी तरह अभाव है... कुछ हैं तो बस अनअलंकृत  मंदिर और सहज आराधना की खुशी....।

 ऊपर चोटी पर बने मंदिर के दरवाज़े पर भी असंख्य घंटियां बंधी हैं। प्रत्येक श्रद्धालु जब इन घंटों को बजाता है तो आवाज़ पूरी घाटी में गूंजती सी लगती है। यहां मदिंर से घाटी का सुंदर नज़ारा भी होता है।

मंदिर के दर्शन करके प्रशाद लेने के बाद हम पीछे के रास्ते से ही जंगल होते हुए चौथी जाली के लिए निकल पड़े।दोनों तरफ ऊंचे लंबे पेड़ों के बीच जाती पगडंडी से होकर निकलना प्रकृति के और करीब पहुंचने का अहसास दिला रहा था। हवा इतनी शीतल थी कि रोम-रोम से ऊष्णता का अंतिम कण तक निकल गया। यहां भी लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद हम चौथी जाली पहुंचे।

चौथी जाली

चौथी जाली दरअसल चट्टान के मुहाने पर बना एक बड़ा छेद है। कहते हैं कि जो इस छेद से होकर गुज़रता है, चौथ माता उसकी हर मनोकामना पूरी करती है। हांलाकि यहां तक पहुंचना बिल्कुल आसान नहीं, रास्ता दुर्गम है और खतरनाक भी लेकिन फिर भी इच्छा पूर्ति की कामना और विश्वास को साथ लेकर लोग यहां तक आते हैं और पहाड़ के मुहाने पर बने इस छिद्र से गुज़रकर चौथ माता से आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।

यहीं पास में एडवेंचर स्पोर्ट्स भी कराए जाते हैं। रोप वे पर लटककर पहाड़ी पार करना उनमें से एक है। अगर आपको ऊंचाई से डर नहीं लगता, या अगर लगता भी है, तो भी इस स्पोर्ट को ज़रूर करें। पूरे सुरक्षा मानकों के साथ कराए जाने वाले इस खेल में जब आप रस्सी पर लटककर घाटी के बीचों-बींच पहुंचते हैं तो हवा में लटककर नीचे अंतहीन फैली सुरसा घाटी का जो नज़ारा होता है उसका शब्दों में वर्णन संभव ही नहीं है। आप अगर यह नहीं करते तो यकीन मानिए एक बेहतरीन अनुभव पाने का मौका गंवा देंगे। हम तो इस अनुभव को बड़े जतन से बांधकर ले आए हैं।


 यहीं वो पड़ाव था जहां से गुज़रने के बाद शायद हमारी भी मुक्तेश्वर यात्रा पूर्ण हो चुकी थी, लेकिन भला हो उस स्थानीय गरड़िये का जिसने हमें भालगढ़ झरने के बारे में बताया और हम वहां गए और एक अनुभव और लिया... चट्टानों, पानी, हवा और सूरज की किरणों की जुगलबंदी का अद्भुत यादगार अनुभव....।


शाम लगभग पांच बजे तक हमारी मुक्तेश्वर यात्रा पूरी हो चुकी थी। हम वापस रिज़ोर्ट पहुंच चुके थे।
केवल एक या दो दिन की योजना बनाकर आप भी यहां आ सकते हैं और यहां कदम-कदम पर प्रकृति से साक्षात्कार का मौका पा सकते हैं। यहां कोई बाज़ार नहीं जहां रुककर आप अपने खरीददारी की इच्छा को पूरी कर सकें, और ना ही कहीं भी दिखावट की ज़रा सी भी झलक...... मुक्तेश्वर में अगर कुछ है तो बस प्रकृति से समीपता... बेहद समीपता का अहसास और सादगी से भरी मनमोहक सुन्दरता...










Tuesday, 13 January 2015

जीवनदायी उपासना के तीन पर्व



भारत त्यौहारों का देश है, जहां हर मौसम खुशियों का त्यौहार लेकर आता है। यहां के अधिकांश पर्व ऋतुओं, धरती और सौर मंडल के परिवर्तन से जुड़े होते हैं- चाहे वो लोहड़ी हो, मकर संक्रांति हो या फिर पोंगल.. सबके पीछे छिपी है एक परंपरा, एक आस्था और खुशहाली, हरियाली, धन-धान्य, पूजा-पाठ और एक दूसरे से मिल कर खुशियां बांटने की चाह। नए वर्ष के आगमन के साथ ही चले आते हैं उत्तर भारत के मकर संक्रांति, पंजाब की लोहड़ी और दक्षिण भारत के पोंगल जैसे त्यौहार और इनके साथ ही गुजरात और राजस्थान का पूरा आसमान रंग जाता है रंग-बिंरगी, बलखाती, पेंच लड़ाती पतंगों से।

क्या आप जानते हैं इन त्यौहारों, इन परंपराओं की वजह और ज़रूरत...? हम अापको बताते हैं। दरअसल अलग अलग रूपों में, देश के अलग अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले ये जीवनदायी पंचतत्वों को पूजने के त्यौहार हैं।  लोहड़ी का त्यौहार जहां अग्नि तत्व की आराधना से जुड़ा है तो मकर संक्रांति पर सूर्य उत्तरायण होते हैं और उनकी उपासना की जाती है। वहीं पोंगल धरती मां की वंदना का पर्व है।

लोहड़ी का त्यौहार

लोहड़ी को आपसी भाईचारे और प्रेम की मिसाल कायम करने वाला त्यौहार भी माना जाता है। इस दिन उत्सव के समय जलाई जाने वाली लकड़ियों को इकट्ठा करने के लिए बच्चे बहुत पहले से जुट जाते हैं और मोहल्ले में घर घर जाकर लकड़ियां और उपले मांगकर लाते हैं। रात को अलाव जलाकर उसके चारों तरफ परिक्रमा करते हैं.. गिद्धा और भांगड़ा करते हैं और इसके बाद प्रसाद के रूप में बांटी जाती हैं मूंगफली, रेवड़ी और गजक।

मकर संक्रांति पर्व

14 जनवरी को अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है मकर संक्रांति। इस दिन से सूरत क्षितिज से ऊपर जाने लगता है यानि दक्षिण से उत्तर की तरफ जाने लगता है। सूर्य के उत्तरायण होने से सौर ऊर्जा ज्यादा मात्रा में धरती तक पहुंचती है। कहते हैं इस दिन स्वर्ग का द्वार खुलता है। इस दिन से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं।हेमन्त ऋतु  खत्म होती है और शिशिर ऋतु की शुरूआत हो जाती है। इस दिन श्राद्ध कर्म और तीर्थ स्थान जाना बेहद फलदायी माना जाता है।  इस दिन तिलकुट और खिचड़ी का भोग लगाकर बायना मिन्सा जाता है और संक्रांति के दिन दान-पुण्य का भी खासा महत्व है।

पोंगल उत्सव



पश्चिम बंगाल में वंदमाता और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से यह त्यौहार चार दिनों तक मनाया जाता है। यहां इन दिनों धरती माता के साथ शिव,गणेश, सूर्य व इन्द्र देवता की पूजा की जाती है। पहला दिन भोगी कहलाता है जिसमें लोग घर साफ करते हैं। दूसरे दिन महिलाएं चावल के आटे व फूलों से रंगोली बनाती हैं जिसे कोलम कहते हैं। कोलम के बीचों-बीच शुद्ध गाय का गोबर रखकर इस कद्दू के फूल की पांच पत्तियां रखी जाती हैं। इसे संस्कृति रथ कहते हैं। यह बेहतरीन उपज का परिचायक है। अदरक, हल्दी, चावल, गन्ना, दाल आदि से सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। इस प्रसाद के रूप में पायसम बनाया जाता है।

इन सभी त्यौहारों से जुड़ी है रोचक पौराणिक कथाएं

 सुंदर मंदरीए हो,
तेरा कौन विचारा हो, 
दुल्ला भट्टी वाला हो, 
दुल्ले घी ब्याही हो...
लोहड़ी के इस प्रमुख गीत से जुड़ी है संबंध सुंदरी नामक कन्या और दुल्ला भट्टी नामक डाकू की कथा। इस कथानुसार गंजीबार क्षेत्र में एक ब्राह्मण की खूबसूरत कन्या थी संबंध सुंदरी, जिसे वहां का राजा अपने हरम की शोभा बनाना चाहता था। तब संबंध सुंदरी की रक्षा जंगल के एक डाकू दुल्ला भट्टी ने की थी। उसने एक योग्य ब्राह्मण लड़के की तलाश करके उसी वक्त सुंदरी की शादी कर दी। यहीं नहीं, सुंदरी को अपनी बेटी मानकर दुल्ला भट्टी ने तिल व शक्कर  देकर उसका कन्यादान भी किया। जब राजा की सेना इसके विरोध में दुल्ला भट्टी से युद्ध करने पहुंची तो दुल्ला भट्टी और उसके साथियों ने बहादुरी से लड़ाई की और राजा की सेना को भगा दिया। तभी से लोग अलाव जलाकर और उसके इर्द गिर्द भंगड़ा पा के लोहड़ी मनाने लगे।

मकर संक्रांति पर्व को लेकर भी महाभारत काल की एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि अर्जुन के तीरों की शर-शैया पर लेटे भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु को 14 जनवरी तक रोके रखा। और इस दिन जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब उन्होंने अपने प्राण छोड़े।

इसी तरह पोंगल त्यौहार के लिए शिव और नंदी की कथा कही जाती है। एक दफा भगवान शिव ने नंदी को पृथ्वी के लोगों को यह कहने के लिए भेजा कि वे इस माह में एक बार भोजन करें और प्रतिदिन तेल से स्नान करें। नंदी भूल से उल्टा संदेश दे आए। तब भगवान शिव ने नंदी से कहा कि इस उल्टे संदेश के कारण  अब लोगों को अधिक अन्न की ज़रूरत पड़ेगी इसलिए अब से तुम्हें अनाज पैदा करने के लिए उनके खेतों में हल जोतना पड़ेगा। बस तभी से बैल खेत में हल जोतने लगे और पोंगल त्यौहार मनाने की प्रथा चल निकली।

पतंगोत्सव

इन सारी परंपराओं के अलावा पतंगोत्सव की परंपरा भी राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा आदि राज्यों में प्रचलित है। सुबह से शाम तक आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से ढका रहता है। खूब पतंग प्रतियोगिताएं आयोजिक की जाती है और पेंच ल़ड़ाए जाते हैं।

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...