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Saturday, 3 August 2013

शरीर की दुर्गति, धार्मिक विश्वास और अंगो के दुरुपयोग का डर रोकता है अंगदान करने से


आजकल अंग दान को लेकर काफी प्रचार किया जा रहा है। लोगों को अंगदान के प्रति जागरूक किया जा रहा है कि मरने के बाद भी आपका शरीर औरो के काम आ सकता है, आप मर कर भी अमर हो सकते हैं.. वगैरह, वगैरह... लेकिन सच्चाई यही है कि अंग दान को लेकर अभी बहुत से डर और भ्रांतिया लोगों के दिमाग में है। नेत्रदान के लिए तो लोग फिर भी तैयार हो जाते हैं, लेकिन अंग दान को लेकर अभी भी लोगों में झिझक है, और यह झिझक सिर्फ पुरानी विचारधारा के लोगों में ही नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी में भी है। जहां पुरानी पीढ़ी के लोग इस बात में विश्वास करते हैं कि मरने के बाद पूरे शरीर का दाह संस्कार नहीं किए जाने पर आत्मा मुक्त नहीं होती, वहीं नई पीढ़ी के लोगों को यह डर सताता है कि उन्होंने अगर अपने अंग दान कर भी दिए तो कहीं ऐसा ना हो कि उनकी बिक्री की जाए। ऐसे बहुत से डर हैं जो लोगो को अंगदान करने से रोकते हैं।


मुक्ति ना मिलने का डर
बहुत से बुज़ुर्ग लोगों का कहना है कि अंगदान करना ग़लत है। हमारे धर्म में ऐसा नहीं होता। मरने के बाद अगर पूरे शरीर का दाह संस्कार ना हो तो, मनुष्य की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति के लिए ज़रूरी है कि पूरे शरीर को अग्नि के हवाले किया जाए ना कि उसमें से अंग निकाल लेने के बाद खोखले शरीर को। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अगर हम अंगदान के बाद बिना किसी अंग के जलाए जाएंगे तो अगले जनम में हमें वो अंग नहीं मिलेगा। आगरा की एक गृहणी साठ वर्षीया कान्ता गुप्ता साफ कहती हैं, कि भैया हमारे धर्म में यह सब नहीं चलता। हमारे यहां पूरा शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता। हम तो अपना अंगदान नहीं करेंगे। अगर और लोगों के अंग खराब हैं, या काम नहीं करते तो यह भगवान की मर्ज़ी है लेकिन मैं अपने धर्म के विरुद्ध जाकर मरने के बाद अपने शरीर के अंगो को दान नहीं करूंगी, मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।

शरीर की दुर्गति का डर
लोगों के मन में शरीर की दुर्गति का भी डर है। लोगों का मानना है कि एक बार मरने के बाद यदि शरीर तुरंत अंगदान के लिए चला गया तो उसके बाद पट्टियों से बंधा और खोखला शरीर वापस आता है। शरीर की यह दुर्गति मरने वाला भले ही ना देख पाएं लेकिन उसके रिश्तेदारों के लिए अपने मृत संबंधी को ऐसी हालत में देखना आसान नहीं होता। फिर जो मर चुका है वो शरीर पूज्यनीय हो जाता है जिसके सभी रिश्तेदार दर्शन करने आते हैं। अब अगर शरीर चीड़ फाड़ के बाद वापस आएगा तो लोग मृत शरीर का दर्शन करने में भी हिचकेंगे। आई टी कंपनी में इंजीनियर सौरभ सबरवाल कहते हैं कि मैं तो इस ख़याल से ही बुरा महसूस करता हूं कि मेरे किसी मृत रिश्तेदार के शरीर की ऐसी हालत हो कि उसके शरीर को काटा जाए और वो पूरा सफेद पट्टियों में बंधा हुआ घर आए, फिर मैं अपने शरीर की ऐसी हालत के बारे में तो सोच भी नहीं सकता।

अंगो के दुरुपयोग का डर
युवा पीढ़ी के वो लोग, जो अंगदान द्वारा बहुत से ज़रूरतमंद लोगों को ज़िंदगी दिए जाने और खुद के अमर हो जाने की भावना का सम्मान करते हैं, इस डर से अंगदान करने से हिचकते हैं कि कहीं उनके अंगों को निकालने
के बाद उनका दुरुपयोग ना किया जाए। जेएनयू में एमए की छात्रा सोनाक्षी गोयल का कहना है कि अगर हम अंगदान कर भी दें, तो इसकी क्या गारंटी है कि हमारे अंग ज़रूरतमंद लोगों को ही लगाए जाएंगे। यह तो सभी जानते हैं कि आजकल हर चीज़ का धंधा होता है चाहे वो दान किया गया खून हो, आंखे हो या फिर शरीर के अन्य अंग। हम तो अपने अंग दान कर दें और वो ज़रूरतमंद या किसी गरीब व्यक्ति को ना मिलें बल्कि डॉक्टर उन्हें बेचकर अपनी जेब गर्म करे तो हमारे अंगदान का क्या फायदा। इस तरह तो हम उसकी दुकान चलाने में मदद करेंगे ना कि किसी की जान बचाएंगे।

 

Wednesday, 31 July 2013

बेटा पैदा करो, तो एड्स होने के बावजूद स्वीकार्य हो...

  • एड्स होने पर पति और बेटी समेत बहू को घर से निकाला
  • बहू को बेटा होने के बाद ससुराल वाले खुद परिवार में वापस ले गए
भारतीय समाज चाहे कितना ही आगे क्यों ना बढ़ जाए, कितना ही आधुनिक क्यों ना बन जाए, लेकिन वंश चलाने वाले बेटे की चाह आज भी दहेज लेकर दूसरे घर जाने वाली बेटी की चाह से कहीं ज्यादा और प्रबल है। इसका बहुत बड़ा उदाहरण हैं देहली नेटवर्क ऑप पॉज़िटिव पीपल नामक समाज सेवी संस्था में अच्छे पद पर कार्यरत श्रीमती ममता गौड़ (बदला हुआ नाम)।
एचआईवी पॉज़िटिव ममता फिलहाल एक आत्मविश्वास और साहस से भरी हई महिला हैं, लेकिन उनके इस स्थिति में पहुंचने का सफर काफी दर्दभरा और कठिन है।
ममता ने अपने पति के साथ प्रेमविवाह किया था। शादी के बाद एक लड़की हुई और दो साल बाद ही ममता दोबारा गर्भवती हुई। इस बार तीन महीने में जब डॉक्टर ने ममता का टेस्ट किया तो पता चला कि वो एचआईवी पॉजिटिव हैँ। ममता बेहद डर गईं, क्योंकि इस बीमारी में सीधे लड़कियों के चरित्र पर बात आती है।
 ममता ने डर के कारण अपने पति को भी इस बारे में नहीं बताया। कुछ समय में जब उनके पति की तबीयत काफी खराब हो गई और उनके बचने की उम्मीद कम नज़र आने लगी तब ममता ने अपने पति के सामने यह राज़ खोला। बात गंभीर थी। पति बेहद नाराज़ हुए और तीन दिन तक ममता से बात नहीं की। इसके बाद ममता ने किसी तरह जब अपने पति को भी अस्पताल में दिखाने को तैयार किया तो पता चला कि पति भी एचआईवी ग्रस्त थे और उन्हीं से ममता को यह बीमारी हुई थी।
दोनों ने एक मशहूर सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पंजीकरण करवाया। ममता चूंकि गर्भवती थीं, उनका विशेष रूप से इलाज चला जिससे बच्चे को एचआईवी का संक्रमण ना हो।
इस दौरान ममता जो कि एक संयुक्त परिवार में रहती थी, को उनके पति के साथ परिवार से जाने के लिए कह दिया गया। पति-पत्नी, बेटी के साथ किसी तरह किराए के घर में बसर करने लगे। इस दौरान लगातार इलाज और सावधानी से ममता के पति की हालत भी सुधरने लगी थी। लेकिन आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण दोंनो की माली हालत खस्ता ही बनी हुई थी।ससुराल वालों में से कोई मदद करना तो दूर, हाल-चाल पूछने तक नहीं आया। पति को एड्स होने के कारण कोई नौकरी देने को भी तैयार नहीं था। मरता क्या ना करता ममता के पति को यह बात छुपानी पड़ी और तब जाकर उन्हें नौकरी मिली।
ममता को मालूम नहीं था कि उनके दिन भी फिरने वाले थे। और यह हुआ कुछ महीने बाद, जब ममता को बेटा हुआ। डॉक्टरों की देखरेख और सही दवा लेने के कारण बच्चा सामान्य हुआ था, मतलब बच्चा एचआईवी पॉजिटिव नहीं था। बेटा होने और उसके एचआईवी नेगेटिव होने की खबर सुनते ही, सास ससुर के सुर बदल गए, वो कुछ ही समय में ममता को पति समेत बड़े प्यार से घर ले गए। यानी बेटे की मां बनने के बाद उसी एड्स ग्रसित ममता को पति और बेटी समेत उसके परिवार ने दोबारा स्वीकार लिया जिसे खुद परिवार ने ही निकाला था। ममता आज भी कहती हैं, कि केवल मुझे बेटा होने के कारण ही परिवार ने मुझे वापस स्वीकारा वरना शायद हम आज भी अलग रह रहे होते।
आज ममता की बेटी 12 साल की और बेटा दस साल का है। ममता सुख से अपने संयुक्त परिवार के साथ रह रही है। साथ ही ममता ने अपने जैसे लोगों की मदद करने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। वो ए़ड्स के लिए लोगो को जागरूक, सलाह देने और सहायता करने वाली संस्था देहली नेटवर्क ऑफ पॉज़िटिव पीपल में उच्च पद पर कार्यरत है। ममता की बेटी यह बात जानती है कि मां और पिता को एड्स है और ममता का कहना है कि वह थोड़ा बड़ा होने पर अपने बेटे को भी इस बारे में बता देगी।
आज ममता के परिवार के साथ अच्छे संबंध है, पर यह दुख अब भी सालता है कि बेटा होने के बाद ही उन्हें ससुराल में स्वीकार किया गया वरना उनके दुखो की चिन्ता किसी को नहीं थी।
  

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...