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Monday, 24 April 2017

बिन दु:ख सब सून



आप मानें या ना मानें, एक समय ऐसा था जब इस धरती पर हर खास-ओ-आम को भगवान बनने का मौका मिलता था। यह वो समय था जब भगवान दूर स्वर्ग में नहीं रहते थे बल्कि यहीं ज़मीन पर विचरण करते थे। तब दरअसल देवलोक, धरतीलोक या पाताललोक जैसी अलग अलग जगहें थी ही नहीं। इसी धरती पर पाताल भी था और आकाश के बादल भी। सब एकसार था, एक साथ था। प्रभु हर इंसान से मिलते थे, उसके दुख-दर्द सुनते थे, तकलीफें दूर करते थे और खुशियों में शरीक होते थे, और साथ ही सबको भगवान बनने का अवसर भी देते थे।

आम लोगों में से ही कईं अपनी किसी खूबी के चलते भगवान बनना चुन लेते थे। जैसे अगर किसी के पास धन-दौलत बहुत ज़्यादा थी, तो वो मनी गॉड बन जाता था। किसी की दुआओं में असर रहा हो तो ब्लैसिंग गॉड, कोई लकी है तो वो गॉड ऑव लक। इसी तरह क्लोथ गॉड, फूड गॉड, वॉटर गॉड, एम्यूज़मेन्ट गॉड जैसे हर तरह के गॉड्स हुआ करते थे।

गॉड बनने का तरीका भी अलग था। साफ-सुथरा, नफासत भरा और पूरी तरह एपॉलिटिकल। दक्षिण दिशा में एक खूबसूरत बादलों का पहाड़ था। स्लेटी और नीले रंग का, जिस पर सूरज की शुभ्र और पावन छाया पड़ा करती थी। इस पहाड़ की चोटी पर था पैराडाइज़ टैम्पल, जिसमें सूरज खुद निवास करता था। जो कोई भी अपनी किसी खूबी के कारण गॉड बनना चाहता था उसे यहां तक पहुंच कर, सूरज की गर्म किरणों को हाथ में लेकर कसम उठानी पड़ती थी कि आज के बाद वो केवल लोगों की खुशी के लिए काम करेगा और जो उसके पास बहुतायत में हैं, उसे ज़रूरतमंदों के साथ बांटेगा।

जिन लोगों के मन सच्चे होते थे, वो बिना किसी बोझ के हवा से भी हल्के हो जाते थे और बहुत आसानी से बादलों का पहाड़ चढ़कर पैराडाइज़ टैम्पल पर पहुंच जाते थे। और क्योंकि उनमें ख्वाहिशों की गर्मी नहीं रह जाती थी बल्कि नेकियों की शीतलता रहती थी, सूरज की ऊष्ण किरणें उन्हें जला नहीं पाती थीं। और वो कसम उठाकर, भगवान बनकर वापस लौट आते थे। लोगों के साथ रहते थे, घूमते थे और उनकी सहायता किया करते थे। वहीं जो लोग गॉड बनना तो चाहते थे लेकिन सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते थे वो भारी होने के कारण या तो पहाड़ नहीं चढ़ पाते थे या फ़िर उनमें इतनी शीतलता नहीं रहती थी कि सूरज की किरणों का सामना कर सकें।

गॉड हो या सामान्य लोग सबकी औसत उम्र 400 बरस हुआ करती थी। तब लोग जन्म और मृत्यु के बंधनों से भी मुक्त थे। कोई मरता नहीं था और ना ही कोई जन्म लेता था। बस लोग अपनी उम्र पूरी करने पर स्वर्ग में भेज दिए जाते थे जो वहीं पैराडाइज़ टैम्पल वाले पहाड़ के पश्चिम में उसकी तलहटी में बसा था। यह खूबसूरत लाल, पीले,नीले, सफेद रंगों वाले फूलों की घाटी थी, जिसमें शीतल झरने बहते थे। मंद पवन बहा करती थी। यहां लोगों की सुख सुविधाओं का हर सामान मौजूद था। उम्र पूरी कर लेने पर लोगों को यहां लाया जाता था। यह काम हैवन गॉड के जिम्मे था। स्वर्ग में रहने का औसत समय 100 वर्ष था। हर इंसान स्वर्ग में ही आता था क्योंकि तब पनिशमेंट की अवधारणा नहीं थी। और इसलिए नर्क भी नहीं था। लोगों को जस की तस स्वर्ग में ले आया जाता था। और सौ बरस का स्वर्ग निवास पूरा होने के बाद उन्हें एक नए रूप में वापस धरती पर भेज दिया जाता था, फ़िर से 400 वर्ष का जीवन जीने के लिए। 

शायद आपको विश्वास ना हो लेकिन उस समय लोगों के लिए स्वर्ग का प्रवास ही सबसे दुखद अनुभव होता था। क्योंकि वो सशरीर और यादों के साथ स्वर्ग लाए जाते थे। ऐसे में चूंकि उनकी यादें मिटाई नहीं जाती थी, वो अपने परिवारजनों को बहुत मिस किया करते थे। अच्छी यादें उन्हें स्वर्ग में सभी सुख सुविधाओं के बीच भी चैन से नहीं रहने देती थीं और उन्हें हर समय अपनों की यादें और उनके साथ होने की इच्छाएं सताती थी। लेकिन फ़िर भी कई हज़ार वर्षों तक यहीं प्रबंध आराम से चला। लोग ना मरे, ना पैदा हुए, गॉड्स बनते रहे, स्वर्ग आते रहे, स्वर्ग से जाते रहे और यूहीं समय बीतता रहा।

धीरे-धीरे सारे निवासी खुश हो गए। क्योंकि यहां कहीं कोई  भेदभाव नहीं था। सबकी उम्र लगभग समान थी और सबके दुख दूर करने के लिए बहुत सारे गॉड्स थे और एक समय तो ऐसा आया जब कोई निवासी दुखी नहीं रहा। उस दिन किसी के पास करने को कोई काम नहीं बचा। बहुत सारे लोग गॉड बन चुके थे तो उनके पास केवल लोगों की विशेज पूरा करने का काम था लेकिन मज़ेदार बात यह कि विश मांगने के लिए कोई इंसान दुखी नहीं बचा था। मतलब अब गॉड्स भी बेगार हो गए थे। धरती के गॉड्स दुखों की डिमांड करने लगे थे जिन्हें  वो दूर कर सकें और उधर स्वर्ग में रहने वाले लोगों ने मांग उठाई थी कि उनकी यादों को मिटाया जाए जिससे वो स्वर्ग में खुश रह सके।

यहीं वो क्षण था, यहीं वो समय था जब सूरज की आंखे खुली और उसने जाना कि सबको गॉड बनने का समान अवसर देने से और सबका दुख दूर करने का इंतज़ाम करने से दुनिया नहीं चलने वाली। ऐसे तो ज़िंदगी मोनोटॉनस हो जाती है। हमेशा खुशियां मिलने से किसी को खुशी का अहसास नहीं होता। सूरज ने अहसास किया कि इंसान की मैमोरी सलामत रहे तो वो कभी अपने खुशी के क्षण भूल नहीं पाता और स्वर्ग में भी दुखी रहता है।

उसी दिन से एक कम्पलीट इन्फ्रास्ट्रक्टरल चेंज का फैसला लिया गया। दुखों को इन्ट्रोड्यूस किया गया। सबको गॉड बनने का अवसर देने की प्रक्रिया बंद कर दी गई। भूलने की क्वालिटी लोगों में डाली गई। यहीं नहीं देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक को भी अलग कर दिया गया। उस दिन सूरज ने जाना था कि दुनिया अगर चलानी है, और अच्छे से चलानी है तो हर फीलिंग का होना ज़रूरी है। केवल सुख, किसी को सुखी नहीं रख सकता। थोड़ी पार्शियेलिटी, थोड़ा करप्शन, थोड़ा दुख, थोड़ा अत्याचार लोगों में जीने की, लड़ने की और जीतने की ललक जगाएगा और लोगों के जीने को यादगार और फोकस्ड बनाएगा।

बस उस दिन का दिन है कि ब्रह्मांड बदल गया और उस रूप का बन गया जिसमें हम आज जी रहे हैं। हांलाकि लोग इस स्थिति से भी खुश नहीं हैं और फिर से भगवान से वैसी ही व्यवस्था करने की गुज़ारिश करते हैं लेकिन अब सूरज महाराज अनुभवी हो चुके हैं और शायद अब वो फ़िर से हमें वैसे जीने का मौका ना दें।





Tuesday, 10 January 2017

'मन की बात'... लेकिन मोदी जी की नहीं, फुटबॉल की :-)



बहुत दिनों से यह सवाल जीतू-मीतू के मन में था। जीतू-मीतू...अरे वो जुड़वा स्पोट्स जूते, जिन्हें पहनकर रोज़ अभिषेक अपने पांच दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलने जाता है। दोनों ही बहुत प्यारे हैं। भाई हैं, बिल्कुल एक जैसे, आईडेंटिकल ट्विन्स। एक दूसरे की मिरर इमेज। एक दायां और बायां...।

खैर यह कहानी जीतू-मीतू की नहीं हैं, यह कहानी है उस गोल, प्यारी सी बड़ी फुटबॉल की, जिसे लेकर इन जुड़वां जूतों के मन में सवाल उठा है। हां तो आज जीतू ने इस फुटबॉल से पूछ ही डाला- एक बात बताओ डीयर, रोज़ हम दोनों को अपने पैरों में डालकर अभिषेक तुम्हें किक मारता हुआ मैदान तक ले जाता है, वहां उसके सारे दोस्त भी तुमको इतना मारते हैं, ज़मीन पर पटकते हैं, लेकिन फिर भी तुम हमेशा खुश कैसे रहती हो, हमेशा उछलती कूदती रहती हो... कैसे?

फुटबॉल हंस पड़ी..। अरे भई खुश क्यों ना होऊं। मेरा तो काम ही पैरों में रहना है, मेरा नाम ही फुटबॉल है यानि पैर से खेले जाने वाली बॉल। तो अगर मुझे बच्चे पैरों से मारकर खेलते हैं तो इसमें खराब लगने जैसा क्या है...? बल्कि मैं तो अभिषेक की शुक्रगुज़ार हूं कि उसने स्पोर्ट्स शॉप में रखी इतनी सारी फुटबॉल्स के बीच मुझे चुना। अगर वो मुझे यहां नहीं लाता तो मैं वहीं, एक ही जगह, एक ही शैल्फ में अपने जैसी ही अन्य फुटबॉल्स के साथ रहती-रहती बोर हो जाती। मुझे तो कभी पता ही नहीं चलता कि इस बैट, बॉल, रैकेट, शटलकॉक जैसे खेल के सामानों के अलावा भी इस दुनिया में बहुत सारी चीज़े हैं। प्यारे- प्यारे बच्चे हैं। इसलिए जब-जब अभिषेक मुझे खेलने ले जाता है मुझे बड़ा मज़ा आता है, इस बहाने मैं थोड़ी बहार की ताज़ा हवा भी खा लेती हूं और बहुत से नए-नए लोगों से मिल भी लेती हूं, वरना घर में, टेबल के नीचे एक कोने में पड़े-पड़े तो मेरा मन भी नहीं लगता।

जीतू-और मीतू को तो ऐसे जवाब की आशा ही नहीं थी। वो तो उसे बेचारी फुटबॉल समझकर सहानुभूति जताने की सोच रहे थे। पर यहां तो मामला ही अलग निकला।

 "अच्छा यह बताओ तुम्हें अभिषेक के सारे दोस्तों में से सबसे ज़्यादा कौन पसंद है? " जीतू ने पूछा।

"हां इस बात का जवाब मैं दे सकती हूं.." फिर से एक बार हंसते हुए फुटबॉल बोली। फ़िर कुछ सोचते हुए फुटबॉल ने बताना शुरु किया। देखो, वो गगन है ना, अभिषेक का मोटू दोस्त, वो मुझे ज़्यादा पसंद नहीं, क्योंकि एक तो वो रोज़ रोज़ स्टड्स पहनकर आता है और उससे मुझे किक मारता है तो मुझे चोट लग जाती है। यहीं नहीं वो जानबूझ कर मुझे मैदान से बाहर भेजता है, हालांकि उसकी वजह से मेरी बाहर की सैर भी हो जाती है लेकिन परेशानी यह है कि वो अक्सर मुझे कूड़े की तरफ उछाल देता है, वहां बहुत बदबू आती है।



और वो जो अमन हैं ना, जो रोज़ पीली स्पोर्ट्स टीशर्ट पहनकर आता है और गोलकीपर बनता है, वो भी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। क्योंकि वो बड़ा गंदा रहता है। अक्सर अपनी नाक में हाथ डालता रहता है, और फ़िर उन्हीं गन्दे हाथों से मुझे पकड़ता है। उसके नाखून भी बहुत लम्बे हैं जो मुझे चुभ जाते हैं और दर्द होता है। उसके पास जाना भी मुझे अच्छा नहीं लगता। 

लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा नापसंद मुझे यश है। यश खुद को अभिषेक का बड़ा अच्छा दोस्त कहता है लेकिन दरअसल वो अभिषेक से जलता है। जब भी मेरे मैदान से बाहर जाने पर यश मुझे लेने जाता है, वो जानबूझ कर मुझे किक मारकर नाली में गिराता है या फिर कूड़े के बीच और फि़र पैरों से घसीटते हुए, फिर से किक मारकर वापस ले जाता है। वो जानबूझ कर मुझे गंदा करता है, एक बार तो उसने काटा घुसाकर मेरी हवा निकालने की भी कोशिश की थी। वो अच्छा बच्चा नहीं है। उसे इस बात की जलन है कि यहां सब उससे अच्छा खेलते हैं।

"तो तुम्हें कोई भी पसंद नहीं.." इस बार मीतू ने पूछ लिया।

"नहीं आदित्य और रोहित तो बहुत अच्छे हैं। दोनों बहुत अच्छे से मेरे साथ खेलते हैं। और आदित्य को तो खासकर मुझसे बहुत लगाव है। वो जब भी गोलकीपर बनता है और मैं उसके पास जाती हूं तो वो बहुत ज्यादा खुश होता है। वो मेरा ख़याल भी बहुत रखता है क्योंकि उसे बड़े होकर फुटबॉलर बनना है ना। वो अक्सर अभिषेक से मुझे मांगकर मुझे अपने साथ घर ले जाता है और देर तक मेरे साथ खेलता है। किक मारने की प्रैक्टिस करता है। वो अपने घर पर मुझे पलंग पर अपने तकिए के पास ही रखकर सोता है और सुबह उठते ही मुझसे खेलना शुरू कर देता है। इसलिए वो मेरा फेवरेट है।"

हालांकि जीतू और मीतू के दिमाग में अभी सवाल बाकी थे पर तभी फुटबॉल ने उन्हें चुप करा दिया.." वो देखो शाम हो चुकी है और अभिषेक भी आ रहा है। अब यह बातें छोड़ो, अब हम सबके बाहर घूमने जाने का वक्त है".. कहते हुए एक बार फिर फुटबॉल खिलखिलाने लगी, इस बार जीतू और मीतू भी मुस्कुरा दिए, उन्हें ना केवल अपने सवालों के जवाब मिल गए थे बल्कि कुछ गलतफहमियां भी दूर हो गईं थीं।




Saturday, 12 September 2015

रंग लाई फूयो, ऑल्टिया और मर्सिडीज़िया की दोस्ती



गाज़ियाबाद की एक आधुनिक सोसाइटी की बेसमेन्ट पार्किंग में एक ऑल्टो कार और एक हीरो हौन्डा बाइक रहा करते थे। दोनों में गहरी दोस्ती थी। कार का नाम था ऑल्टिया और बाइक थी फूयो। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि एक दिन भी अगर दोनों एक दूसरे से बात ना करें तो परेशान हो जाते थे। कभी ऑल्टिया गर्मी से परेशान फूयो को अपने ठंडे एसी की हवा दिया करती थी तो कभी फूयो, ऑल्टिया के थके हुए टायरों की अपने किक स्टार्टर से मालिश कर दिया करता था। सारे त्यौहार, छुट्टियां दोनों साथ मनाते थे। दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती किया करते थे।

फिर एक दिन अचानक ऑल्टिया गायब हो गई। फूयो ने उसका बहुत इंतज़ार किया। अन्य साथी कारों, स्कूटरों और बाइकों से भी पूछा पर किसी को मालूम नहीं था। हफ्ता गुज़र गया। फूयो बहुत उदास रहने लगा। उसकी दोस्त जाने कहां चली गई थी। .. और फिर एक दिन ऑल्टिया की जगह एक चमचमाती नई ग्रे रंग की बड़ी कार खड़ी होने लगी। 

फूयो को हैरानी हुई। उसने उस नई कार से बात करने की कोशिश की, उसका हाल-चाल पूछा, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। वो अपनी अकड़ में रहने वाली गुरूर से भरी हुई कार थी। जिसे फूयो से मामूली बाइक से दोस्ती करना पसंद नहीं था। जब फूयो ने  उससे एक बार और पूछा तो उस ग्रे कार ने अपनी हैडलाइट झटकते हुए गुस्से से कहा कि देखो- आय एम मर्सिडीज़ीया.., मैं अपने फ्रेंड्स बहुत सोच-समझ कर बनाती हूं, हर किसी से दोस्ती नहीं कर सकती। इसलिए आगे से मुझसे बात करने की कोशिश मत करना।

फूयो बेचारा दुखी हो गया। अब वो अकेला था। बात करने के लिए, खेलने के लिए कोई नहीं था। मर्सिडीज़िया तो उसकी तरफ देखती तक नहीं थी, खेलना तो दूर की बात रही। एक दिन वो ऐसे ही दुखी होकर ऑल्टिया को याद कर रहा था.. " ओ ऑल्टिया, मेरी दोस्त, तुम कहां चली गईं, तुम होती तो हम कितनी मस्ती करते।.. " वो बड़बड़ा ही रहा था कि मर्सिडीज़िया की हैरानी भरी आवाज़ आई- " तुम ऑल्टिया को कैसे जानते हो? " 

फूयो हैरान, उसने मर्सिडीज़िया को बोला कि तुमसे पहले यहां ऑल्टिया ही रहा करती थी। उससे मेरी गहरी दोस्ती थी, और फिर एक दिन वो गायब हो गई और तुम उसकी जगह आ गईं। मर्सिडीज़िया की आंखों में आंसू आ गए। वो बोली कि जानते हो मैं ऑल्टिया की बड़ी बहन हूं। वो एक कार कार्निवल में मुझसे बिछड़ गई थी। तब से उसे ढूंढ रही हूं। उसकी तलाश में दिल्ली, बम्बई, हैदराबाद.. और जाने कहां कहां गई पर वो मुझे नहीं मिली। आज पता चला कि वो यहां थी। क्या तुम उसे ढूंढने में मेरी मदद करोगे?

फूयो भी हैरान था। उसने प्रॉमिस किया कि वो ज़रूर मदद करेगा। उस दिन से मर्सिडीज़िया और फूयो दोस्त बन गए, दोनों साथ रहने लगे, घूमने लगे और एक साथ ऑल्टिया को ढूंढने की कोशिश करने लगे। 

एक दिन दोनों साथ पेट्रोल भरवाने पहुंचे थे कि अचानक फूयो को दूसरी तरफ बीमार, परेशान ऑल्टिया दिख गई। उसमें ड्राइविंग सीट पर एक गुंडा सवार था। फूयो चुपके से उसके पास पहुंचा और ऑल्टिया से पूछा कि वो वहां कैसे आई। 

ऑल्टिया, फूयो को देखकर खुश हो गई। उसने बताया कि यह आदमी उसे चुरा कर लाया है और अब वो उसे स्क्रैप यार्ड भेजने की तैयारी कर रहा है, जहां उसे मार दिया जाएगा। फूयो तुरंत मर्सिडीज़िया के पास पहुंचा और उसे सारी बात बताई। दोनों ने मिलकर ऑल्टिया को छुड़ाने की तरकीब सोच ली थी। 

जब ऑल्टिया को लेकर वो चोर पेट्रोल पंप से निकला, फूयो कार के सामने आकर लेट गया। उस चोर ने हड़बड़ी में ब्रेक लगाए और वो फूयो को रास्ते से हटाने के लिए कार से बाहर निकला। जैसे ही वो बाहर निकला, तैयार खड़ी मर्सिडीज़िया ने उसे टक्कर मार दी। चोर बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गया। 

फौरन फूयो उठा। वो, ऑल्टिया और मर्सिडीज़िया वहां से दौड़ पड़े। तीनों बहुत तेज़ भागे और एक नई जगह जाकर रुके। ऑल्टिया भी आज़ाद होकर और  बिछड़ी हुई बहन से मिलकर बहुत खुश थी। उस दिन से तीनों वहीं साथ-साथ रहेने लगे। वो हमेशा दोस्त रहे। उनकी दोस्ती के किस्से आज भी कार वर्ल्ड में किवदंती की तरह सुनाए और गुनगुनाए जाते हैं।




अब पढ़िए डस्टबिनाबाद और रीसाइक्लाबाद की अनोखी कहानी

पढ़ाकू हैं? तो पढ़ डालिए उस पढ़ाकू लड़के की कहानी जिसकी जान उसकी दोस्त किताबों ने बचाई

एक किस्सा उस दौर का जब फलों और सब्ज़ियों में दोस्ती नहीं थी


Tuesday, 8 September 2015

यह तब की बात है जब फलों और सब्ज़ियों के बीच दोस्ती नहीं थी...

एक समय था जब फल और सब्जियां अलग अलग रहते थे। दोनों में दोस्ती कायम करने में चेरी और शिमला मिर्च का बहुत बड़ा योगदान है। कैसे... जानने के लिए सुनते हैं यह कहानी..

 बहुत समय पहले धरती पर टमाटर के रस की नदी बहा करती थी। नदी के इस तरफ था फ्रूट किंगडम यानि फलों का साम्राज्य और दूसरी तरफ था वेजीटेबल किंगडम यानि सब्जि़यों का साम्राज्य।


फ्रूट किंगडम के राजा थे महामहिम आम और महारानी थी चेरी.. दोनों की जोड़ी एक और शून्य की जोड़ी थी, अलग किस्म की, अजीब जोड़ी लेकिन बेजोड़। फ्रूट किंगडम का शानदार क्यूकम्बर पैलेस, खीरे से बना था। उसमें केले के खम्बे थे और लाल बेर जड़ित खीरे की दीवारें।
महाराजा आम जब तरबूज़ की शानदार अंगूर जड़ी, लाल बग्घी में बैठकर प्रजा के बीच आते थे तो सेब, खुबानी, चीकू, केले और बाकी सारी फलों की प्रजा उनका शानदार स्वागत करती थीं।


नदी के दूसरी तरफ वेजीटेबल किंगडम के महाराजाधिराज थे बैंगन राजा और उनकी महारानी थीं, शिमला मिर्च। इनका महल भिंडी से निर्मित था जिसमें पत्ता गोभी के बड़े-बड़े पर्दे और फूलगोभी के झूमर लटका करते थे। महाराजा की शाही सवारी कद्दू में मटर की नक्काशी करके बनाई गई थी। महल के दोनों ओर गाजर सिपाही तैनात रहते थे।


दोनों अमीर राज्य थे, खुशहाल, खूबसूरत, सुखी और अपने में मगन। बस नदी की सीमा लांघकर कभी किसी ने दूसरे राज्य में जाने की कोशिश नहीं की।

पर नारी मन को क्या कहा जाए.. एक बार महारानी चेरी जब टमाटर नदी किनारे शहतूत के बागों में घुम रहीं थी अचानक उनकी नज़र नदी के पार सेम की बेलों पर पड़ गईं.. रानी का मन वेजीटेबल किंगडम की सैर को मचल गया। तुरंत खीरा महल पहुंची और महाराज आम से मन की बात बताई।

महाराजा आम ने उनसे कहा कि सदियां बीत गई, कभी भी हमारे पूर्वजों ने उस तरफ जाने की कोशिश नहीं की। हम अलग हैं और वो सब्जि़यां अलग, हम आपको वहां जाने की इजाज़त नहीं दे सकते। रानी चेरी नहीं मानी, रूठ कर बैठ गईं।
हारकर राजा आम ने उन्हें बुलाया और कहा कि अगर आप वहां जाना चाहती हैं तो जाएं, लेकिन हम कभी उस तरफ नहीं गए हैं और ना ही जानते हैं कि वहां के निवासी कैसे हैं। अगर आपको आते देख उन्होंने आप पर हमला कर दिया तो...

 इस पर रानी चेरी बोली कि हम वहां दोस्ती का पैगाम लेकर जाएंगे। उनको भी यहां आने के लिए आमंत्रित करेंगे और फलों और सब्जियों के बीच की यह दूरी हमेशा के लिए खत्म कर देंगे।

राजा आम को यह विचार पसंद आया, लेकिन फिर भी उन्होंने एहतियात बरतने को कहा। रानी से कहा कि हम आपको पूरी तैयारी के साथ वहां भेजेंगे, ताकि अगर वो आपसे मित्रवत् व्यवहार ना करें तो आप उन्हें जवाब दे सकें।

तैयारियां शुरू हुईं।

रानी के लिए अन्नानास का शानदार जहाज बनाया गया, जिसके चारों तरफ हरे कांटों का रक्षाकवच था। रानी को टमाटर नदी सुरक्षित पार कराकर वेजीटेबल किंगडम पहुंचाने की जिम्मेदारी सेनापति अमरूद को दी गईं।
सेनापति अमरूद ने अन्य सब्जियों के लिए खीरे की नावें बनवाईं। सबसे पहले इन नावों में नारियल सेना को उतारा गया। नारियल सेना के पीछे संतरों की सेना चली। इसके बाद बीच में रानी का अन्नानास जहाज और दोनों तरफ अखरोट और खुबानियों भरी नावें चली।

नारियल सेना सब्जि़यों की तरफ से किसी भी तरह के आक्रमण को झेलने में सक्षम थी। संतरे की सेना का हथियार था खट्टा रस और उसके बाद आ रहे आड़ू, खुबानी और अखरोट बम के गोलों की तरह दुश्मनों को मार गिराने में सक्षम थे।

 रानी का काफिला नदी पार करने चला। जैसे ही वेजीटेबल किंगडम की मिर्ची और नींबू सेना को गुप्तचर प्याज ने इसकी खबर दी कि दूसरी तरफ से दलबल के साथ महारानी चेरी इधर आ रही हैं, उन्होंने बैंगन राजा तक बात पहुंचाई। तुरंत बैंगन राजा ने आपात बैठक बुलाई। सारी सब्जियां चिंतिंत थी। जो आज तक नहीं हुआ, होने जा रहा था। फल राज्य से कोई उनके सब्जी राज्य आ रहा था। तब महारानी शिमला मिर्च ने सलाह दी कि महाराज चिंतित मत होईए। अपनी मिर्ची और नींबू सेना को तैयार रखिए। भुट्टे मिसाइल भी मंगवा लीजिए, लेकिन तुरंत हमला मत करिएगा। पहले उन्हें यहां आने दीजिए। क्या पता वो लड़ने के लिए नहीं बल्कि दोस्ती का पैगाम लेकर आईं हों।


बैंगन राजा को महारानी कैप्सिकम की बात जंच गई। तुरंत अपने सेनापति टिंडे को नदी किनारे भेजा। चेरी रानी का काफिला वहां पहुंच चुका था। सेनापति अमरूद आगे आए और उन्होंने वेजीटेबल किंगडम के सेनापति टिंडे से मुलाकात की। उन्हें बताया कि महारानी चेरी सब्जियों के राज्य में घूमना चाहती हैं।

सेनापति टिंडा यह पैगाम लेकर बैंगन राजा के पास गए।

बैंगन राजा ने रानी चेरी और उनके सारे लाव लश्कर को पहले दिन जिमीकंद के गैस्ट हाउस में रुकाया, जहां मटर के सीक्रेट कैमरे लगे थे।
एक दिन तक रानी चेरी और उनके सभी साथियों की सारी गतिविधियां देखने के बाद बैंगन राजा को यकीन हो गया कि महारानी चैरी वाकई दोस्ती का पैगाम लेकर आई हैं। उन्होंने तुरंत महारानी को कद्दू महल बुलाया और उनकी शानदार आवभगत की गई। महारानी कैप्सिकम भी महारानी चेरी से मिलकर बहुत खुश हुईं।

एक हफ्ते तक महारानी चेरी वहां रहीं और विदाई के समय उन्होंने महारानी केप्सिकम और महाराजा बैंगन को खूब सारे अखरोट, काजू, बादाम और अन्य फल उपहारस्वरूप दिए। बैंगन राजा ने भी महारानी चेरी को मटर, सेम, भिंडी आदि देकर विदा किया। चेरी महारानी ने उन्हें अपने फ्रूट किंगडम आने के न्यौता भी दिया।

खुशी-खुशी रानी विदा होकर वापस फ्रूट किंगडम पहुंची और राजा आम से सारी बात बताई। उस दिन से फलों और सब्जियों में दोस्ती हो गई। टमाटर की नदी पर अरबी का पुल बना दिया गया और दोनों राज्य के निवासी एक दूसरे से मिलने जुलने लगे, दोनों के बीच दोस्ती की गांठ जुड़ चुकी थी।


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तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...