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Monday, 27 April 2015

"ज़रा सी भी आहट होती है तो लगता है कि फिर से भूकंप आ गया" ... दिल में तबाही की तस्वीरें और जेब में पशुपतिनाथ का प्रसाद लेकर भारत लौटे मदन शर्मा की आपबीती

26 तारीख को रात नेपाल से वापस हिन्दुस्तान पहुंचे मदन शर्मा
25 तारीख की दोपहर लगभग 12 बजे का समय था। मैं और मेरे भाई साहब पशुपतिनाथ मंदिर और बागमती नदी के दर्शन करने के बाद पास की ही छोटी सी पहाड़ी के दूसरे तरफ बसे पार्वती मंदिर को देखने जाने के लिए पहाड़ी चढ़ रहे थे। मौसम गर्म था लेकिन तेज़ ठंडी हवाएं भी चल रही थीं। हम उस पहाड़ी के रास्ते में जगह जगह दिखने वाले बंदरों को देखते हुए धीरे-धीरे चल रहे थे कि अचानक धरती डोल उठी..। पहला झटका ज़बरदस्त था, हम पहाड़ी से गिरते-गिरते बचे। अभी संभल भी नहीं पाए थे कि दूसरा झटका लगा..। पहाड़ी अचानक से कांपने लगी, पहले तो समझ नहीं आया क्या हुआ, लेकिन फिर एक के बाद एक झटके खाने के बाद समझ आ गया कि भूकंप आया है...। कुछ देर पहले तक जहां शांति का आलम दिख रहा था अचानक दहशत फैल गई.। पहाड़ी का रास्ता चढ़ते लोग एक दूसरे का हाथ पकड़ कर डरे सहमे से खड़े हो गए थे। मैंने भी भाईसाहब को कस कर पकड़ लिया और धीरे-धीरे हम नीचे बैठ गए। आस-पास के बंदरों तक में डर का माहौल दिख रहा था, पहाड़ी के लगभग सारे बंदर एक जगह इकट्ठे हो गए थे। नीचे से शोर और दीवारें टूटने के धमाकों की आवाज़ें आ रही थीं। सब लोगों के बीच डर का माहौल था। पहाड़ीं पर जगह-जगह चाय नाश्ते और दूसरे सामानों की छोटी-छोटी दुकानें खोले बैठे दुकानदार, महिलाएं सभी डरकर दुकानों से बाहर आ गए थे और नीचे शहर में हर झटके के साथ आती बरबादी का मंज़र देख रहे थे...। लोगों की चीख-ओ-पुकार की आवाज़ें, रह-रह कर पहाड़ी का डोलना.., लगातार झटके आना..और खुद को बचाने की जद्दोजहद.. लगभग डेढ़ घंटे तक यहीं सब चलता रहा। हममें से कोई भी डर के मारे ना तो पहाड़ी से ऊपर जा रहा था और ना ही नीचे उतर रहा था। क्योंकि यहां से शहर में तबाही का आलम साफ नज़र आ रहा था, ताश के पत्तों की भांति इमारतें और मंदिर ढह रहे थे। अचानक से ही सामान्य सा माहौल मातम में बदल चुका था।

लगभग डेढ़ घंटे बाद भी पहाड़ी से उतरने की हिम्मत नहीं हुई। पास ही एक चाय-नाश्ते की छोटी सी दुकान थी। मुझे और भाईसाहब के साथ अन्य लोगों को भी बहुत भूख  लग रही थी, सो उस दुकान की मालकिन से पूछा कि क्या उसके पास मैगी है? ... उसने जवाब दिया कि साहब है तो लेकिन दुकान के अंदर जाकर उसे बनाएगा कौन। अगर कहीं फिर भूकम्प आ गया और दुकान गिर गई.. मरने का खतरा था। उसकी बात सही थी इसलिए हम कुछ नहीं बोले। फिर कुछ देर बाद वो महिला खुद ही बोली कि आप लोगों के लिए चाय बना देती हूं लेकिन आप सब लोग रास्ते से सामान हटा दीजिए जिससे अगर कोई झटका लगे तो मैं फौरन भागकर बाहर आ जाऊंगी। उस समय वो महिला चाय पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि हमारी परेशानी और भूख को देखते हुए बनाने के लिए तैयार हुई थी। चाय बनी, हम सबने पी.. और इस दौरान रह-रहकर भूकंप के झटके आते रहे।



शाम चार बजे के लगभग हम लोगों ने आखिरकार पहाड़ी से उतरकर अपने होटल में पहुंचने का मन बनाया। हिम्मत जवाब दे चुकी थी, लेकिन इसके अलावा और कोई चारा नहीं दिख रहा था। सामान लेने और वापस भारत लौटने की सूरत तलाशने के लिए होटल पहुंचना ज़रूरी था। हम लोग जब नीचे उतरे तो हर तरफ खौलनाक तबाही का मंजर था। सड़के फट गईं थीं, मकान, इमारतें और मंदिर मलबे में तब्दील हो गए थे और उस मलबे से लगातार चीख-पुकार की आवाज़े आ रही थीं। उनके नीचे लोग फंसे हुए थे और बहुत से स्थानीय निवासी उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे थे। किसी तरह होटल तक पहुंचे, तब तक बीच-बीच में भी भूकंप के झटके आते रहे थे। उस समय तो ऐसा लग रहा था कि कहीं अगला पल हमारा आखिरी पल ना हो। होटल को भी थोड़ा नुकसान पहुंचा था। जब हम वहां पहुंचे तो होटल मैनेजर हमें वहां से निकालकर दूसरे मज़बूत होटल में पहुंचाने का इंतज़ाम कर चुका था। हम लोगों को पास के ही दूसरे मज़बूत होटल ले जाया गया। वहां खाने का तो कोई इंतज़ाम नहीं था, अधिकतर बैरे, कुक वगैरह भूकंप आने की वजह से अपने घरवालों के पास गांवों में चले गए थे। जो घर से नाश्ता ले गए थे, उसी को खाकर किसी तरह भूख शांत की। लोग होटल की लॉबी में चल रहे टीवी पर खबरें सुन रहे थे। रात में हममें से कोई भी नहीं सो सका था, पूरी रात झटके आते रहे, हर झटके के बाद लोग भागकर सड़क पर आ जाते थे। वहां के स्थानीय लोग तो सड़कों पर ही चादर बिछाकर सो रहे थे।

किसी तरह राम-राम करके रात बीती। उस रात कोई भी नहीं सोया था। हमारी तरह और पर्यटकों को भी अब घर जाने की जल्दी थी। घर के फोन भी लगातार पहुंच रहे थे और मेरी पत्नी-बच्चे सभी जल्दी से जल्दी वापस भारत लौट आने को कह रहे थे। जल्दी हमें भी थी। लेकिन हमारी फ्लाइट दो दिन बाद की थी। और अब यहां रुकना हमारे मन में नहीं था। 26 तारीख की सुबह ही मैंने अपने एक रिश्तेदार से संपर्क किया जो काफी ऊंची पोस्ट पर थे और उन से बात करके उसी दिन दोपहर सवा दो बजे वाली एयर इंडिया की भारत वापसी की फ्लाइट में अपने लिए और अपने भाई साहब के लिए सीटें बुक कीं। हमें एक सीट 32,000 रुपए की पड़ी थी, लेकिन हमें इस बात का सुकून था, कि भारत वापसी की राह दिख रही थी। न्यूज़ चैनल्स पर खबरें सुनकर यह भी पता चल चुका था कि भारतीय रेस्क्यु विमान वहां दवाईयां, खाना और राहत सामग्री लेकर पहुंच चुके हैं। बस एयरपोर्ट जाने की तैयारी ही कर रहे थे कि हमें यह खबर मिली कि भूकंप के कारण रनवे पर भी क्रैक आ गया था जिसके कारण एयर इंडिया ने अपनी फ्लाइट कैंसिल कर दी थी।
नेपाल की धरती बार-बार डोल रही थी और साथ ही आई इस खबर ने मायूसी के बादल घने कर दिए थे। लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी। हमारी तरह और भी देशों के पर्यटक वापस पहुंचने का रास्ता तलाश रहे थे। हम लोगों ने योजना बनाई कि किसी तरह अगर हम सोनोली बॉर्डर तक पहुंच जाएं तो वहां से सड़क मार्ग द्वारा बस से हिन्दुस्तान पहुंचा जा सकता है। अपना सामान लेकर बाहर निकले.. टैक्सी वालों से बात की, लेकिन कोई भी टैक्सी वाला वहां जाने को तैयार नहीं था। बहुत लोगों से बात करने के बाद, आखिरकार एक टैक्सी वाला आठ हज़ार रुपए में हमें सोनोली बॉर्डर छोड़ने को तैयार हुआ। लेकिन इस शर्त पर कि हमें ले जाने से पहले वो अपने परिवार से जाकर मिलेगा और अगर परिवार की हामी होती है तभी वो हमें छोड़ने जाएगा। टैक्सी वाला अपने परिवार से मिलने गया और उसके परिवार ने उसे हमारे साथ जाने की इजाज़त नहीं दी।

हमारे सारे रास्ते फिर से बंद हो गए थे। हमने भारतीय दूतावास जाने की सोची, लेकिन काफी लोग बता रहे थए कि वहां से कोई मदद नहीं मिल पा रही है। अब केवल भारतीय सेना से ही मदद की उम्मीद बची थी। टीवी पर लगातार खबरें आ रही थीं कि भारतीय सेना के विमान लगातार नेपाल पहुंच रहे हैं। हमारे पास सुबह बुक कराई हुई एयर इंडिया की फ्लाइट के बोर्डिंग पास थे। तो बस उन्हें लेकर एयरपोर्ट के लिए निकल पड़े। पर मुश्किल अभी खत्म नहीं हुई थी। एयरपोर्ट जाने के लिए भी कोई भी टैक्सी वाला तैयार नहीं था। बहुत मुश्किल से 1000 रुपए में एक टैक्सी वाला जाने को तैयार हुआ। होटल से मात्र 20 मिनट की दूरी वाले त्रिभुवन एयरपोर्ट पर हम ढाई घंटे में पहुंचे। क्योंकि टैक्सी जिस भी रास्ते से निकलती, वो बंद मिलता, कहीं टूटी इमारतों का मलबा था, तो कहीं टैंट लगे थे और कहीं खुद स्थानीय लोग ने अपना अस्थायी निवास बनाया हुआ था, और कहीं रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा था। इसी दौरान एक बार और ज़बरदस्त झटका लग चुका था। धरती अब भी रह-रह कर डोल रही थी। कई जगह से घुमाने के बाद आखिरकार 3 बजे के लगभग टैक्सी वाले ने हमें एयरपोर्ट पहुंचाया।

त्रिभुवन एयरपोर्ट ठसाठस भरा हुआ था। इंच भर भी जगह नहीं दिख रही थी। एयरपोर्ट पर 15 से 20000 लोग मौजूद थे। किसी तरह से हम धक्का मुक्की करके अंदर पहुंचे तो जान में जान आई। सामने इंडियन एयरफोर्स ने टैंट लगा रखे थे। लगातार लोगों को दवाईयां, गर्म कपड़े, खाने के पैकेट वगैरह बांटे जा रहे थे। पता चला कि हर घंटे भारत का एक विमान वहां राहत सामग्री लेकर पहुंच रहा था और वापसी में भारतीयों को ले जा रहा था। हमारे एयरफोर्स के फौजी भाई सारे लोगों की हर संभव सहायता कर रहे थे। भारतीय विमानों के अलावा चीन के विमान भी लगातार आ रहे थे। दो दिन से भूखे लोग एयरफोर्स से मिला खाना खाकर बहुत सुकून में थे। एक बार तो खाने को लेकर भगदड़ भी मच गईं। लोगों ने अपने परिवार वालों के लिए खाने के पैकेट लूट लिए। लेकिन भीड़ और लोगों की परेशानी का मज़ंर देख कर एयरफोर्स के फौजी उनको बिना कुछ कहे उनकी मदद की कोशिश कर रहे थे।

बहुत सारे लोग रनवे के पास जमा थे और जैसे ही कोई प्लेन उड़ने के लिए तैयार होता, लोग दौड़कर रनवे पर पहुंच जाते कि पहले उन्हें चढ़ा लिया जाए।  बहुत से भारतीयों का वहां मौजूद दूतावास के लोगों से झगड़ा भी हुआ क्योंकि वो उन लोगों को अंदर नहीं जाने दे रहे थे जिनके पास बोर्डिंग पासेस नहीं थे। आखिरकार एक बुज़ुर्गवार ने पीएमओ फोन करने की धमकी दी और कहां कि अगर उन्हें अंदर नहीं घुसने दिया गया और उस प्लेन में नहीं चढ़ने दिया गया जो कि सरकार की तरफ से भारतीयों को बचाने के लिए भेजा गया है तो वो इसके खिलाफ शिकायत करेंगे। किसी तरह मामला सुलझा और फिर सभी भारतीयों के नाम लिख लिखकर उन्हें कतार में खड़ा किया जाने लगा।

मेरा नंबर लगभग ढाईसौवां रहा होगा और मेरे भाई साहब मुझसे और थोड़ा पीछे थे। इतवार की उस शाम उस कतार में लगने के बाद पहली बार मुझे दिल से सुकून का अहसास हुआ। एयरपोर्ट पर मुस्तैद भारतीय एयरफोर्स के जवानों को डटा देखकर, हर घंटे पहुंच रहे भारतीय विमान को देखने के बाद और मोदी जी के नाम का बोलबाला महसूस करने के बाद, दो दिन में पहली बार मुझे विश्वास हुआ कि मैं सलामत अपने घर पहुंच जाऊंगा।

6 बजे के लगभग एयरफोर्स का मालवाहक जहाज दवाईयां और खाद्य सामग्री लेकर रनवे पर आया। पहले उसे खाली किया गया और फिर हमें उसमें चढ़ाया गया। उस मालवाहक जहाज में एयरबस की तरह सीटें नहीं थीं। औरतों और बुज़ुर्गों को साइड में सामान रखने की सीटों पर बिठाया गया और बाकी लोगों को विमान में अंदर नीचे बिठा दिया गया। एयरफोर्स के जवान बार-बार आग्रह कर रहे थे कि जितने ज्यादा से ज्यादा लोग विमान में आ सकते हैं आ जाएं। बस किसी तरह विमान में बैठ जाएं तो हम आपको सकुशल भारत ले जाएंगे। लगभग साढ़े चार सौ भारतीय उस मालवाहक विमान में टिक गए और रात आठ बजे जब उस विमान ने उड़ान भरी, हमनें नेपाल की धरती से विदा ली और अपने देश लौट चले। इस वापसी की यात्रा के दौरान लोगों के चेहरों पर जो सुकून और खुशी का आलम था वो बयान से परे हैं। केवल हम बचने वाले ही नहीं, हमें बचाने वाले एयरफोर्स के जवानों के चेहरे भी खुशी और संतोष से दमक रहे थे। मैं तेईस तारीख की रात को यहां नेपाल घूमने के लिए भाई साहब के साथ पहुंचा था। दो दिन की भगदड़, बदहवासी के बाद अब जोड़ रहा था कि इस यात्रा के दौरान क्या खोया क्या पाया...। मोबाइल के कैमरे में तबाही के मंजर कैद थे, अटैजी में पशुपतिनाथ मंदिर का प्रसाद., .बगल में भाई साहब थे, दिमाग में प्रकृति के इस क्रोध की तस्वीरें और दिल में घर लौटने की खुशी...।  दस बजे हमारे विमान ने दिल्ली लैंड किया और हम उस जलजले से निकलकर सकुशल अपनी भारत की धरती पर लौट आए।
(नेपाल से बचा कर लाए गए गाज़ियाबाद निवासी श्री मदन शर्मा से बातचीत पर आधारित)


Wednesday, 19 November 2014

वो मास्टर स्प्रेयर बनना चाहता है ताकि एक दिन में पांच घरों में पेस्टिसाइड्स का छिड़काव कर सकें और उसकी तन्ख्वाह साढ़े पांच हज़ार से आठ हज़ार रुपए हो जाए... 'एक पेस्ट कंट्रोलर की कहानी'

कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्हें हम शायद लोगों में गिनते ही नहीं। वो भीड़ का हिस्सा भी नहीं होते, बल्कि शायद उनका किनारा होते हैं... भीड़ में सबसे पीछे खड़े लोग जिन्हें भीड़ में भी जगह नहीं मिलती... यह कहानी भी ऐसे ही इंसान प्रदीप की है.. जिनकी इस दुनिया में उपस्थिति को हमने कभी शायद एक सोच भी नहीं बख्शी होगी...


19 साल का प्रदीप, लक्ष्मी नगर दिल्ली की एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है- और एक महीने में लगभग 78 घरों में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स, इन्सेक्टिसाइड्स और अन्य दवाईयों का छिड़काव करता है, यानि रोज़ लगभग 2 से ज्यादा घरों में।

'पेस्टिसाइड स्प्रेयर' बनना प्रदीप का सपना कभी भी नहीं था। वो तो मधुूबनी, बिहार के अपने गांव से दिल्ली इसलिए आया था कि कहीं चपरासी या कोई और छोटी मोटी नौकरी करके अपनी गुजर कर सके और अपने मां-बाप के पास पैसा भेज सके। 17 साल का प्रदीप यहां अपने एक दूर के रिश्तेदार के भरोसे चला आया था जो कहीं चपरासी की ही नौकरी करता था। प्रदीप जब यहां आकर अपने उस रिश्तेदार से मिला तो हकीकत पता लगी। पता चला कि वो तो दरअसल पेस्ट कंट्रोल कंपनी में काम करता है और घरवालों को झूठ बता रखा है कि कहीं चपरासी का काम करता है। रिश्तेदार ने जब प्रदीप को जिंदगी की कड़वी सच्चाई का आईना दिखाया तो उसने जाना कि नौकरी मिलना कितना मुश्किल है। आखिरकार मिन्नतें करके उसी रिश्तेदार की मदद से  प्रदीप ने खुद को भी एक पेस्ट कंट्रोल कंपनी में लगवा लियां। 



अब यहां काम करते तीन साल होने को आए। एक हरे कपड़े के थैले में ज़हरीले पेस्टिसाइड्स और पीतल की स्प्रे कैन... अब यहीं प्रदीप के साथी हैं। अपने इन औजारों से प्रदीप को बड़ा प्यार है। रोज़ इन्हीं को लेकर प्रदीप आधुनिक, सजे-धजे, दिल्ली, नौएडा, गाज़ियाबाद और गुड़गांव के घरों में जाता है और वहां पेस्टिसाइड्स का छिड़काव करता है।

प्रदीप इन खतरनाक पेस्टिसाइड्स का छिड़काव बिना किसी मास्क या दस्तानों के करता है। प्रदीप का कहना है कि अब यह ज़हरीली दवाईयां मेरी दोस्त बन गई हैं। मुझे इनमें सांस लेने की और मेरे हाथों को इन्हें छूते रहने की इतनी आदत पड़ गई है कि अगर मैं मास्क और दस्तानों का इस्तमाल करूंगा तो शायद मुझे बीमारी हो जाए, वरना तो होने से रही। शुरूआत में एक आध बार बेहोशी जैसा लगता था तो मालिक डॉक्टर को तुरंत बुला देता था। पर अब तो आदत पड़ गई है। 

 वो बताता है कि पैसा ज़रूर कम है लेकिन इस काम में कोई टैंशन नहीं है। महीने में तीन दिन की छुट्टी मिलती है और साढ़े पांच हज़ार की तन्ख्वाह, अगर छिड़काव करवाने वाले घरों से दोबारा कीड़े, दीमक, खटमल आदि पैदा होने की कोई कम्प्लेन्ट महीने भर तक ना आए तो मालिक पांच सौ रुपए ऊपर से ईनाम बतौर देता है। 

अपने रिश्तेदार की तरह अपने घरवालों को अपने काम की सच्चाई प्रदीप ने भी नहीं बताई है, कहता है कि उन्हें पता चलेगा तो बड़ा दुख होगा। गांव में उसके माता-पिता, एक बड़ा भाई हैं। भाई वहीं नौकरी करता है और थोड़ा बहुत खेत है जिससे  मां-बाप का गुज़ारा होता है। प्रदीप चाहकर भी उनके लिए पैसे नहीं भेज पाता। कहता है कि मेरे लिए ही पूरा नहीं पड़ता, उनके लिए क्या भेजूं। 

प्रदीप का सपना है कि वो जल्द ही एक मास्टर स्प्रेयर बन जाए और कम से कम एक दिन में पांच घरों को कवर करने लगे, तब मालिक उसकी तन्ख्वाह में ढाई हज़ार की बढ़ोत्तरी कर देगा और उसे नए लोगों को काम सिखाने का मौका भी मिलेगा और तब शायद कुछ बचे तो वो अपने घरवालों को भेज भी सकता है...।






Sunday, 21 September 2014

“नौसेना की नियुक्ति, नौकरी नहीं बल्कि जीने का तरीका है... जिसमें आप साल के 365 दिन, 24 घंटे देश की सेवा के लिए तैयार रहते हैं.."...


 पंचकुला, हरियाणा के निवासी युवा रोहित मण्डरवाल भारतीय नौसेना की एक्जीक्यूटिव शाखा में सब लेफ्टिनेंट हैं और फिलहाल एझिमला, केरल में नियुक्त हैं। 23 साल के रोहित एक बेहद मेधावी छात्र रहे हैं। चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से 78 फीसदी अंकों के साथ बीटेक उत्तीर्ण करने के बाद रोहित का सात मल्टीनेशनल कंपनियों में कैम्पस साक्षात्कार के जरिए चयन हुआ, लेकिन रोहित ने नौसेना में जाकर देशसेवा करने को प्राथमिकता दी। रोहित उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सफल है, मेधावी हैं, काबिल हैं और जोश से भरे हुए हैं, जो देशसेवा को सर्वोपरि मानते हैं और जिनके लिए जिंदगी केवल काटने का नहीं बल्कि उसे बेहतर तरीके से और अपनी शर्तों पर जीने का नाम है। हमने रोहित की पढ़ाई, रुचियों से लेकर नौसेना जैसा जोखिम भरा प्रॉफेशन चुनने के बारे में बातें की और उन्होंने बेहद बेबाकी और सरल तरीके से अपनी बातें रखीं। आप भी पढ़िए जोश और आंखो में सपने संजोए इस युवा नेवी ऑफिसर के विचार-


अपनी रुचियों के बारे में कुछ बताईए।

मेरी इंजीनियरिंग में बहुत रुचि है। मुझे यह विषय बेहद पसंद हैं। बीटेक करने के बाद कैम्पस सलेक्शन में ही मेरा सात कंपनियों में सलेक्शन हो गया था जिनमें माइक्रोसॉफ्ट और विप्रो जैसी कंपनियां भी थी। मैंने कार्डिफ यूनिवर्सिटी, लंदन में रिसर्च के लिए भी आवेदन किया हुआ था जिसमें मेरा रीसर्च टॉपिक था- डेटा इन्ट्रूजन। वो लोग मेरे रीसर्च टॉपिक और मेरी सबजेक्ट नॉलेज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे सीधे ग्रेजूएशन के बाद ही रीसर्च स्कॉलर बनाने के लिए सिलेक्ट कर लिया था जो बहुत कम मामलों में होता है।


तो फिर आप रीसर्च छोड़कर नेवी में कैसे पहुंच गए?


दरअसल नेवी हमेशा से ही मेरी पसंद रही है। मेरे काफी रिश्तेदार सेना में रहे हैं और हैं भी। तो इसको लेकर हमेशा ही उत्साहित रहा। मैंने एसएसबी का एक्ज़ाम दिया था। जब उसमें पास हो गया और मेरा सलेक्शन नेवी में हो गया तो बस मैं सबकुछ भूल गया और मैंने नेवी जॉइन करने का फैसला कर लिया।

लेकिन यहां आपको अपने फेवरेट विषय में कुछ करने का मौका तो मिला ही नहीं होगा। आपकी रीसर्च तो रह गई?

ऐसा नहीं है। नेवी में भी रीसर्च करने के लिए काफी कुछ है। यह मेरी रुचि का क्षेत्र है तो मैं हर जगह अपने लिए मौके ढूंढ लेता हूं। यहां मैंने अकैडमी के कम्प्यूटर पर काफी काम किया। पहले हमारे यहां क्विज़ वगैरह कम्प्यूटर पर नहीं होते थे लेकिन मैंने जावा में एक प्रोग्राम बनाया और अब क्विज़ कम्प्यूटर पर होते हैं। स्कोरबोर्ड वगैरह भी मैंने विकसित किया। फिर अब मैं नेवी की एक्ज़ीक्यूटिव ब्रांच में हूं। जो प्रशासकीय शाखा है। यहां मुझे सबमैरीन को हैंडल करने का अवसर मिलेगा। जिसे मैं और बेहतर करने के लिए अपनी तरफ से कुछ इंजीनियरिंग एक्सपेरिमेन्ट्स और रीसर्च कर सकता हूं। तो मौके तो यहां भी हैं।

लेकिन नेवी ही क्यों। आप थलसेना या वायुसेना को भी तो चुन सकते थे?

जी हां बिल्कुल। लेकिन नेवी का महत्व बहुत ज्यादा है। केवल रक्षा के संबंध में ही नहीं बल्कि कूटनीतिक मामलों में भी नेवी की भूमिका बहुत अहम् है। आप जानती हैं कि चीन, भारत से जो अच्छे और दोस्ताना संबंध रखना चाहता है, उसकी क्या वजह है। दरअसल चीन के पेट्रोलियम पदार्थों का आयात अंगोला से जलमार्ग के द्वारा होता है। यह रास्ता हिंद महासागर से होकर गुज़रता है जो भारतीय नौसेना के प्रभुत्व का क्षेत्र है इसलिए चीन के सामान को वहां से गुज़रने के लिए भारतीय नौसेना की मदद चाहिए ही चाहिए। अगर कल को चीन के हमसे अच्छे संबंध नहीं रहे तो क्यों भारतीय नौसेना चीन की मदद करेगी...? नौसेना का सामरिक महत्व बहुत ज्यादा है, इसलिए यहां काम करने का रोमांच भी ज्यादा है। बस इसलिए नौसेना को चुना।


काफी समय से नेवी में लगातार हादसों की जो खबरें आ रही हैं उसके बाद तो यह एक जोखिम भरा क्षेत्र बन गया है। जहां युद्ध के बिना भी देश में ही पनडुब्बियों पर धमाकों या उनके डूबने के हादसे होते रहते हैं और युवा ऑफिसरों की जानें चली जाती हैं। ऐसे में क्या आपको नेवी जॉइन करते समय डर नहीं लगा। क्योंकि आप जिस शाखा में हैं उसमें रहते हुए आपको भी सबमैरीन्स पर जाना ही होगा
।

नहीं, बिल्कुल नहीं। नेवी को लेकर डर तो कभी भी नहीं था। हां यह ज़रूर है कि सुरक्षा को ध्यान में रखना ज़रूरी है। क्योंकि जब मैं सबमैरीन पर जाऊंगा तो मेरे ऊपर केवल मेरी ही नहीं, मेरे साथियों और मेरे साथ काम करने वाले अन्य सभी लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होगी। मेरा नंबर तो बहुत बाद में आता है, सबसे पहले मुझे उन लोगों की जान की परवाह करनी है जो मेरे साथ गए हैं। इसलिए सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन इसके लिए हमारी नौसेना में लगातार प्रयास चल रहे हैं। काफी सारी पनडुब्बियां रीफिटिंग के लिए गई हुईं हैं। बहुत सारी चीज़ों को ठीक किए जाने के प्रयास चल रहे हैं। तो मुझे लगता है कि आगे यह परेशानी नहीं आएगी। और दूसरे अगर मुझे मालूम है कि किसी वैसल में कोई खराबी है या बीच समुद्र में जाकर वो परेशानी का सबब बन सकती है तो अपने साथियों की जान जोखिम में डालने से बेहतर मुझे यह लगेगा कि मैं अपने वरिष्ठ ऑफिसर्स को इससे अवगत कराऊं और उस वैसल की रिफिटिंग के लिए बात करूं। तो मैं ऐसा करने की कोशिश करूंगा। क्योंकि अगर एक भी सबमरीन हादसा होता है तो केवल देश के सैनिकों की जानें ही नहीं जाती, देश को आर्थिक नुकसान भी होता है, नौसेना की छवि भी खराब होती है। इसलिए मैं कोशिश करूंगा ऐसा ना हो।


लेकिन कई बार ऐसा होता है जब आपको सबकुछ जानते हुए भी, उसी वैसल पर जाना पड़ता है जो खतरनाक है, परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं। कोई सुरक्षा का मामला हो सकता है, तब आप क्या करेंगे।
देखिए नौसेना की नौकरी मेरे लिए नौकरी नहीं बल्कि जीने का तरीका है, जिंदगी का मकसद है जहां हमें साल के 365 दिन और चौबीसों घंटे देश की सेवा के लिए तैयार रहना पड़ता है। हमारा उद्देश्य यहीं है, हम निस्वार्थ सेवा करने में यकीन रखते हैं। तो कल को ऐसी परिस्थिति अगर आती है तो मैं हमेशा तैयार हूं। मैंने देश की रक्षा के लिए ही नौसेना जॉइन की है। और अगर सब लोग नौसेना की दुर्घटनाओं से डर कर पीछे हटने लगे तो नौसेना का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। किसी ना किसी को तो यह करना ही पड़ेगा ना। और मैं कभी भी अपना कर्तव्य निभाने से नहीं चूकूंगा। और मैं ही क्या हमारी नौसेना में एक भी इंसान ऐसा नहीं जो ज़रूरत पड़ने पर पीछे हट जाए।


लेकिन इतने समय से स्कॉर्पीन डील भी तो अटकी हुई है। नौसेना उन्हीं पुरानी पनडुब्बियों से काम चला रहा है।

नहीं ऐसा नहीं है। स्कॉर्पीन डील हो चुकी है। 2016 तक वो स्कॉर्पीन पनडुब्बियां हमें मिल भी जाएंगी। बात यह है कि उनमें तॉरपीडो नहीं है और आधुनिक सोनार सिस्टम नहीं है जो यूएस प्रयोग करता है। हमारी अधिकतर पनडुब्बियां भी रूस रीफिटिंग के लिए गई हुईं हैं।

नौसेना की ऐसी हालत की वजह आप किसे मानते हैं?

देखिए दरअसल नौसेना में हायरआर्की बहुत ज्यादा होती है। अगर मान लीजिए कि अभी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत है तो मैं यहां से फाइल आगे बढ़ाऊंगा, उसके बाद वो हायरआर्की के सारे अफसरों से होती हुई मंत्रालय तक पहुंचेगी और फिर फंड सैंक्शन होगा। फंड आते-आते इतना समय लग जाता है कि बहुत सी परेशानियां सुलझ नहीं पाती। लगातार देरी होती जाती है। यहीं वजह है कि कई बार तो लोग यह सोचते है कि अगर मैं अभी बैटरी की डिमांड करूंगा तो उसकी फाइल आगे बढ़ते-बढ़ते और फंड आते-आते तो काफी वक्त लग जाएगा, इससे बेहतर इसी पुरानी बैटरी को ठीक करके काम चला लूं। इसलिए ऐसी परेशानी होती है। पर अब तो हालात काफी सुधर रहे हैं। निकट भविष्य में उम्मीद है कि सबकुछ अच्छा होगा।

आप अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगे?

मैं अपनी तरफ से यहीं कहना चाहूंगा कि इन हालातों पर चिंता करने की नहीं बल्कि इनका हल ढूंढने की ज़रूरत है। हमें फंड की ज़रूरत है। एक बार हमें फंड सही समय पर मिलने लगेगा तो बहुत सारी परेशानियां खतम हो जाएंगी।

Thursday, 19 June 2014

आंखों में सपने हो और कुछ करने की तमन्ना हो तो बिहार से बॉलीवुड का सफर दूर नहीं...

सप्ताह का साक्षात्कार- रवि भूषण भारतीय


पान सिंह तोमर फिल्म के गुस्सैल और आक्रोशित बलराम सिंह तोमर याद हैं आपको....?... और अगर आपने हाल ही में रिलीज़ नेशनल अवॉर्ड विजेता फिल्म ‘फिल्मिस्तान’ देखी है तो उसके बंदूकधारी पाकिस्तानी किडनैपर को भी नहीं भूले होंगे आप.....! इन किरदारों में जान फूंकने वाले युवक का नाम है रवि भूषण भारतीय। बिहार के पूर्णिया जिले के रवि की आंखों में बचपन से बॉलीवुड में जाने के सपने सजते थे, और अब वो अपनी मेहनत, हिम्मत और प्रतिभा के दम पर अपनी मंजिल के बहुत करीब पहुंच चुके हैं। वो दिन दूर नहीं जब भोपाल के माखनलाल विश्वविद्यालय का यह छात्र आपको बॉलीवुड के चमकते सितारे के रूप में दिखेगा..., क्योंकि जहां हुनर हो, आजमाइश की तैयारी हो, खुद को उस चीज़ के लिए झोंकने की चाह हो, जिसका सपना आंखों में सजता हैं, वहां सफलता में कहां इतना दम कि वो पीछे-पीछे ना आए।

हमने जब रवि से उनके सफर, सपनों और अनुभव के बारे में बात की तो उन्होंने बेहद ईमानदारी और बेबाकी से अपने अनुभव हमारे साथ साझा किए। आप भी यह साक्षात्कार पढ़ेंगे तो जान पाएंगे कि अगर चाह हो और इरादा पक्का हो तो रास्ता मिल ही जाता है... फिल्मी अंदाज में कहें तो- अगर आप किसी चीज़ को दिल-ओ-जान से चाहों तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है..

शुरूआत आपके अतीत से करते हैं। कहां से हैं आप और बॉलीवुड तक पहुंचने का खयाल कैसे आया?

मैं बिहार के एक छोटे से गांव पूर्णिया का रहने वाला हूं और मेरी स्कूलिंग जवाहर नवोदय विद्यालय से हुई है। शुरूआत से ही अभिनय का शौक था और स्कूली रंगकर्म में भाग लिया करता था। 1998 की बात है, तब मैं बारहंवी कर चुका था, हमारे यहां एनएसडी का वर्कशॉप हुआ जो आलोक चटर्जी ने करवाया था। मैंने उसमें भाग लिया और उन्होंने मेरे काम की काफी सराहना की। मैंने उनसे पूछा कि मैं अभिनय को अपना प्रॉफेशन बनाना चाहता हूं और मुझे कहां जाना चाहिए। तब उन्होंने मुझे भोपाल या दिल्ली जाने की सलाह दी। बस रास्ता मिल गया था और मैं भोपाल आ गया। यहां मैंने माखनलाल विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया।

लेकिन आपने माखनलाल विद्यालय को ही क्यों चुना?

इसकी दो वजहें थीं। पहली तो मैं आगे एनएसडी में दाखिला लेना चाहता था जिसके लिए ग्रेजुएट होना ज़रूरी था, दूसरे मैंने जिस कोर्स में दाखिला लिया था- बैचलर ऑफ जर्नलिज्म, वो भी ऐसा था जो मेरे लिए सहायक होता। मेरे कुछ सीनियर्स ने भी मुझे काफी प्रोत्साहित किया था और आलोक चटर्जी की बात भी मुझे याद थी। तो बस उस समय माखनलाल विद्यालय ही सबसे सही विकल्प लगा और उसमें दाखिला ले लिया। यहां आकर भी मैं लगातार रंगमंच से जुड़ा रहा। मैंने कभी अभिनय को नहीं छोड़ा।

फिर एनएसडी में दाखिला लिया?
नहीं एनएसडी में नहीं एफटीआई में दाखिला लिया। दरअसल साल 2003 में मैं एनएसडी में दाखिले के लिए गया था। इंटरव्यू तक पहुंचा लेकिन वहां मेरा दाखिला नहीं हुआ। वो मेरे लिए मायूसी का वक्त था। मैं वापस भोपाल लौट आया और थिएटर से जुड़ गया। लगभग 6 महीने मैंने जमकर थिएटर किया। मैं हबीब तनवीर से जुड़ा, अलखनंदन जी के ग्रुप नट-बुंदेले से जुड़ा। वहां मैंने अंडोरा नाम से एक नाटक किया था जिसके लिए मुझे मध्यप्रदेश की तरफ से बेस्ट एक्टर के लिए भी नामित किया गया था। छ: महीने वहां रुकने के बाद मैं एफटीआई में दाखिला लेने पुणे चला गया। और यह मेरा सौभाग्य था कि एफटीआईआई में 28 साल पहले बंद हुआ एक्टिंग का कोर्स उसी साल दोबारा शुरू किया गया था। एफटीआई के डायरेक्टर त्रिपुरारी शरण ने इसे शुरू किया था। पूरे देश से केवल 20 लोगों का उसमें सलेक्शन हुआ था जिनमें से एक मैं था।

आपको पहला ब्रेक कम मिला?

2007 की शुरूआत में मेरा एफटीआई का कोर्स खत्म हुआ और तभी मुझे मेरी पहली फिल्म मिली- ‘वो सुबह किधर निकल गई’। 86 मिनट की यह फिल्म पांच दोस्तों की कॉलेज लाइफ और उसके बाद की जिंदगी पर आधारित थी। इसे गोवा फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था। अभी हाल में ही इंडिया हैबिटेट सेंटर में भी इसकी स्क्रीनिंग की गई थी। फिलहाल इस फिल्म को स्टार गोल्ड ने खरीद लिया है।

उसके बाद का सफर कैसा रहा। ‘वो सुबह किधर निकल गई‘ से ‘पान सिंह तोमर’ और ‘फिल्मिस्तान’ तक कैसे पहुंचे? 


उसके बाद का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। 2007 में मैं मुम्बई आ गया। मैंने सोच लिया था कि अब वापस नहीं जाना है और हर हाल में अपनी मंजिल को हासिल करना है। मैं लगातार अच्छे रोल की तलाश में था। इस दौरान सीआईडी, क्राइम पेट्रोल जैसे सीरियल्स में कुछ छोट-मोटे रोल्स भी किए। लेकिन पान सिंह तोमर तक पहुंचते पहुंचते एक डेढ़ साल लग गया। मुझे पता चला कि तिग्मांशु धूलिया को एक एग्रेसिव चेहरे की तलाश थी। वो लगभग पूरी इंडस्ट्री का ऑडिशन ले चुके थे। मुझे मालूम था कि इस रोल के लिए मैं ही सबसे फिट हूं। मैंने उन्हें एसएमएस किया, तब जवाब नहीं आया। दोबारा एसएमएस किया, तब उन्होंने मुझे बुलाया और डेढ़ घंटे तक खुद मेरा ऑडिशन लिया। उसके बाद भी उन्होंने कुछ बताया नहीं। दूसरे दिन उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि मुझे बलराम के रोल के लिए चुन लिया गया है। उस वक्त इतनी ज्यादा खुशी हो रही थी कि बयान नहीं कर सकता। पहली बार इतने बड़े बैनर में, बड़े अभिनेताओं और डायरेक्टर के साथ काम करने का मौका मिला था। मैं बहुत खुश था। बस इसके बाद फिल्मिस्तान और अन्य फिल्में मिली।

और कौन सी फिल्में कर रहे हैं?
रणदीप हूडा के साथ शूटर नाम की फिल्म कर रहा हूं जिसके डायरेक्टर विश्राम सावंत हैं। इसके अलावा स्प्रिंग थंडर नाम से एक फिल्म कर रहा हूं जो बिल्कुल तैयार है। एक और फिल्म है, जिसका नाम शायद बुल, बुलबुल, बंदूक होगा। इसका पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है। इसमें मैंने केके मेनन, जैकी श्रॉफ और जिमी शेरगिल जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया है। इसके अलावा मेरी पहली लीड रोल की जो फिल्म है वो है ‘खेलमंत्रा’। इस फिल्म का हीरो मैं हूं। यह फिल्म पूरी तरह से मेरे कंधो पर टिकी है। सटोरियो और सट्टेबाज़ी की कहानी है। पूरी तरह कमर्शियल फिल्म है। य़ह फिल्म पूरी हो चुकी है और बस इसके डिस्ट्रीब्यूशन की बात चल रही है। उम्मीद है कि सितम्बर-अक्टूबर तक यह फिल्म रिलीज़ हो जाएगी।



फिल्म इंडस्ट्री में आपका अनुभव कैसा रहा? लोग कहते हैं यह चकाचौंध की दुनिया है, यहां जमना आसान नहीं। फिर आपके तो परिवार में भी कोई दूर दूर तक फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ नहीं है। ऐसे में आपको कितनी मुश्किलें हुईं?
देखिए यहां दिखावा वाला मामला बहुत चलता है। फिल्म इंडस्ट्री में दो तरह की चॉकलेट्स हैं। एक बहुत बढ़िया क्वालिटी की और बढ़िया चॉकलेट है लेकिन उसकी पैकेजिंग बड़ी लोकल टाइप है। मार्केटिंग अच्छी नहीं। इसलिए उसकी मांग कम है। ज्यादा लोग उसे नहीं खरीदते और दूसरी ओर एक कामचलाऊ, ठीकठाक चॉकलेट है लेकिन उसकी पैकेजिंग बड़ी जबरदस्त है, शानदार दिखती है तो लोग उसे खरीदने चले आते हैं। यहां लॉबीज़ भी बहुत चलती हैं। आपने किस डायरेक्टर के साथ काम किया है, यह भी महत्वपूर्ण होता है। मुझे यह बातें हालांकि देर से समझ आईं लेकिन अब आ गई हैं। दूसरे, मुझे अपने काम पर हमेशा से भरोसा था। मैं जानता था कि मुझमें टैलेंट है और देर से ही सही मौका मिलेगा। मैं हमेशा सकारात्मक रहा, हिम्मत कभी नहीं हारी। बस दीवार में से एक ईंट उखाड़ने की देर है, पूरी दीवार टूटती चली जाती है। मुझे भी एक ब्रेक मिला, लोगों ने काम देखा तो अब यकीन है कि मंजिल दूर नहीं।

लेकिन स्ट्रगल का दौर कैसा रहा। आर्थिक तंगी के दौर में कैसे अपने आपको संभाला।
मेरे भैया डॉक्टर हैं और जब मैंने अपने घर में इस प्रॉफेशन को चुनने के बारे में बताया था तो पापा खुश नहीं थे। क्योंकि वो यहीं चाहते थे कि मैं भी भैया की तरह डॉक्टर बनूं। लेकिन मैं सबकुछ छोड़कर आ गया। जब तक भोपाल में था, थिएटर के साथ हमेशा कुछ काम करता रहा ताकि कोई फाइनेंशियल दिक्कत ना हो। लेकिन मेरे मम्मी-पापा और भैया ने भी मेरा पूरा साथ दिया। वो लोग भले ही नहीं चाहते थे कि मैं यह काम करूं लेकिन उन्होंने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा। मुझे याद है जब मेरा एफटीआईआई में एडमिशन हुआ था तो उसकी सालाना फीस ढाई लाख रुपए थी। तब मैं बहुत परेशान हो गया था। सोचता था कि मुझे दाखिला नहीं लेना। तब मेरे भैया ने मुझसे कहा कि- लोगों को तो यहां एडमिशन नहीं मिलता और तुम्हें मिल गया है तब तुम मना कर रहे हो। तुम फीस की चिंता क्यों कर रहे हो। यह सब हम देख लेगें। तब मेरे भैया ने सारी जिम्मेदारी ली। उन्हीं लोगों का प्यार और विश्वास है कि मैं यहां तक पहुंचा हूं। हर कदम पर वो लोग मेरे साथ रहे।

जो लोग आपकी तरह आंखों में सपने लिए बॉलीवुड का रुख करते हैं, उनके लिए कोई सलाह?

बस यहीं कहूंगा कि चकाचौंध से प्रभावित होकर यहां बिल्कुल मत आओ। यहां आओ तो पूरी तैयारी और होमवर्क के साथ आओ। और यह भी याद रखों कि यहां सफल होने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है। मायूसी मिलती है लेकिन निराश नहीं होना है। कोशिश करते रहना है तो सफलता ज़रूर मिलती है। हमेशा पॉजिटिव एटीट्यूड के साथ काम करो। साथ ही घरवालों का सहयोग और साथ भी बहुत ज़रूरी है।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगे?

मैं यहीं कहना चाहता हूं कि सफलता के रास्ते पर आपको बहुत सारे झूठे और दिखावटी लोग भी मिलते हैं जो आपको पहले तो नीचा दिखाते हैं और जब आप किसी मुकाम पर पहुंच जाते हैं तो वहीं लोग आपकी बढ़ाई करते हैं। आप कभी भी ऐसे लोगों की बातों में आकर खुद को मत परखिए। अपने हुनर पर यकीन रखिए। अपनी ज़मीन कभी मत छोड़िए और हमेशा जैसे हैं, वैसे ही बनकर रहिए। आपको सफलता ज़रूर मिलेगी।

चित्रलेखा अग्रवाल





Tuesday, 18 February 2014

लक्ष्मी को मिल गई मोहब्बत..!

 आलोक को उसकी मासूमियत और हिम्मत के आगे उसका तेजाब से झुलसा चेहरा कहीं नज़र नहीं आता। स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेन के ज़रिए साथ आए आलोक और लक्ष्मी कहते हैं.. ज़िंदगी भर साथ रहेंगे...



लक्ष्मी की ज़िंदगी में मोहब्बत बन कर आए हैं आलोक दीक्षित। स्पॉट एसिड कैम्पेन के ज़रिए एसिड अटैक का शिकार बनी लड़कियों की सहायता करने वाले और लोगों में इसके प्रति जागरूकता जगाने वाले आलोक दीक्षित की लक्ष्मी से मुलाकात 2012 में हुई थी। और कुछ ही महीनों में दोनों के बीच प्यार ने जड़े जमा लीं।

हम और आप जैसे लोगों को कुछ अजीब लग सकता है... आज के ज़माने में जब खूबसूरती को किसी भी रिश्ते के लिए बहुत बड़ी चीज़ माना जाता है, ऐसे में 25 साल के आलोक ने लक्ष्मी  के तेजाब से जले चेहरे को नकारते हुए उसकी ‘खूबसीरत’ से प्यार किया। वहीं लड़कों की फितरत और ज़माने की अच्छाईयों से विश्वास खो चुकी 24 साल की लक्ष्मी को भी आलोक के निडर व्यक्तित्व और स्पष्टता ने फिर से ज़िंदगी से प्यार करना सिखा दिया।   

इन दोनों का प्यार बहुत खूबसूरत है। हमने जब इस रिश्ते के बारे में जानने के लिए इनसे मुलाकात की तो यह दोनों पूरे समय साथ ही बैठे रहे। पूरी बातचीत के दौरान कभी लक्ष्मी आलोक को समझा रही थीं, तो कभी आलोक लक्ष्मी को। दोनों एक दूसरे को थाम रहे थे, सही कर रहे थे, समझा रहे थे, बीच में रोक रहे थे और प्यार से डपट भी रहे थे...। दोनों, खासतौर से लक्ष्मी तो अपने प्यार की शुरुआत के दिनों के बार में बात करती हुई बेहद उत्साहित थी। उनसे हुई बातचीत के कुछ खास अंश उन्हीं की ज़ुबानी आपके लिए-

लक्ष्मी (आलोक का हाथ पकड़ कर)- सब इनसे बहुत डरते थे। यह बहुत कम बोलते थे ना और बाबा टाइप भी थे। जब सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस चल रहा था तो सब लोग आपस में गले मिले। लेकिन इनको गले लगाने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही थी। तब मैं ज़बरदस्ती इनसे गले मिली।

आलोक- जब 17 मई 2013 को यह पहली बार हमसे मिलने आई थी तो हमें बड़ा अच्छा लगा। इसने औरों की तरह चेहरा नहीं ढका हुआ था। बड़ी हिम्मत से बातें कर रही थी। फिर जब यह कैम्पेन से जुड़ गई तो फिर हम रोज़ मिलने लगे। हमारी मीटिंग में कई बार लोग बातें करते रहते थे और हम एक ही कमरे में बैठे फोन पकड़कर आपस में वॉट्स अप पर चैटिंग करते रहते थे।

लक्ष्मी- एक बार ना क्या हुआ मैं बाहर थी और यह अन्दर काम कर रहे थे। मैं खांस रही थी तो इन्होंने काढ़ा बनाया और मुझे दिया। तब पहली बार इन्होंने मुझसे कहा- लक्ष्मी यह सब जो हमारे बीच हो रहा है ना सही नहीं हो रहा...। यह ऐसे कहे जा रहे थे और मेरे मन में लड्डू ‘फुट’ रहे थे। (आलोक मुस्कुराते हुए लक्ष्मी से कहते हैं- लक्ष्मी लड्डू फुटते नहीं हैं, फूटते हैं...)

आलोक- (लक्ष्मी के सिर पर हाथ रखते हुए)- हमने भी नहीं सोचा था ऐसा कुछ होगा पर क्या करें अब तो हो गया। हमें इनकी मासूमियत बहुत पसंद है। यह बिल्कुल बच्चों जैसी हैं। और बहुत हिम्मत वाली हैं। किसी से डरती नहीं।

लक्ष्मी (सामने एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए)- वो रूम देख रही हैं। वो हमारे प्यार का गवाह है। वहां इन्होंने हमें 7 अगस्त 2013 को प्रपोज़ किया था।

आलोक- हम तो कानपुर से हैं। पहले पहल मम्मी पापा को परेशानी हुई थी कि हम लक्ष्मी को पसंद करते हैं लेकिन उन्हें मालूम था कि हम उनकी सुनने वाले तो हैं नहीं। वहीं करेंगे जो करना है, तो अब उन्होंने भी धीरे-धीरे लक्ष्मी को अपनाना शुरु कर दिया है। बाकी रिश्तेदारों से हमें कोई मतलब नहीं।

लक्ष्मी- भले ही हमारी औपचारिक शादी नहीं हुई लेकिन हम दोनों तो खुद को शादीशुदा ही मानते हैं। हमें साथ रहने के लिए किसी सामाजिक बंधन की ज़रूरत नहीं हैं। मैं इन्हें प्यार करती हूं, यह मुझे प्यार करते हैं, बस यहीं ज़रूरी है।

आलोक- हमें बच्चे-वच्चे करने हुए, परिवार बनाना हुआ, तो उसके लिए शादी की क्या ज़रूरत है। हम तो बल्कि इसके लिए भी कैम्पेन चलाने वाले हैं कि दो प्यार करने वालों को साथ रहने के लिए, परिवार बनाने के लिए शादी की ज़रूरत नहीं है। मर्ज़ी होनी चाहिए बस।

लक्ष्मी (आलोक का हाथ कसकर पकड़ते हुए) यह मुझे छोड़कर कभी जा ही नहीं सकते। मैं जाने ही नहीं दूंगी और यह कभी जाएंगे भी नहीं।

आलोक (लक्ष्मी की तरफ देखते हुए मुस्कुराते हुए) हां बाबू हमें पता है तुम नहीं जाने दोगी। हम भी तुम्हें नहीं जाने देंगे...।


और मैं... बुत बनी, चेहरे पर मुस्कान लिए इन दोनों की देख रही थी...इनकी बातें सुन रही थी और सोच कर रही थी... प्यार क्या ऐसा होता है...? हां… प्यार ऐसा ही होता है...। पता नहीं आगे जाकर यह रिश्ता क्या रंग ले लेकिन फिलहाल तो इसमें सिर्फ प्यार का रंग है और वो हर कोई महसूस कर सकता है।  

Tuesday, 3 September 2013

आधुनिक भारत की एक बच्ची के सपने, सीखें और सरोकार...

 साक्षात्कार की कड़ी में इस बार प्रस्तुत है देश की राजधानी दिल्ली में पढ़ने वाली एक ग्यारह वर्ष की बच्ची का साक्षात्कार।  आधुनिक भारत और  कम्प्यूटर युग में जीने वाले बच्चों की इच्छाएं, उम्मीदें, रोष और आक्रोश को लेकर जब हमने एक ग्यारह साल की बच्ची से सवाल पूछे तो बहुत रोचक जवाब मिले। इनकी दुनिया बिल्कुल अलग होती है, उसमें सपने भी है, आगे बढ़ने की इच्छा भी और यथार्थवादिता भी। यह बच्चे अपनी नज़र से दुनिया को देखते हैं, अपने तरीके से उसकी विवेचना करते हैं और अपने तरीके से ही उसमें ढलने और उसे बदलने की चाहत भी रखते हैं। यह जो कहते हैं मन से कहते हैं। झूठ बोलना और लाग-लपेट करना इन्हें नहीं आता.... किसी भी बात से इन्हें जज मत कीजिए। बस इस बच्ची के सपनों, सीखों और सरोकारों के बारे में पढ़िए, अपना बचपन याद कीजिए और आनंद लीजिए...


आपका परिचय..
मेरा नाम साक्षी बंसल है। मैं डीपीएस स्कूल, दिल्ली में सिक्स्थ क्लास में पढ़ती हूं। मेरे पापा और मम्मी दोनों डॉक्टर हैं और मैं उनको बहुत प्यार करती हूं। और मैं मार्स और स्विटज़लैंड घूमना चाहती हूं।

क्या बात है..., आपकी हॉबीज़..
डांस करना, गाना गाना, टेस्टी खाना खाना, एक्टिंग करना, बास्केट बॉल खेलना और फैशन करना।

फैशन करना...! आपके हिसाब से यह फैशन होता क्या है?
फैशन मतलब अच्छे और स्टायलिश कपड़े पहनना, सुंदर दिखना, स्मार्ट दिखना... जिससे सब आपकी तारीफ करें।

आप बड़े होकर क्या बनना चाहती हो साक्षी?
 वैसे तो मुझे बड़ा होकर आईएएस बनना है ताकि मैं सारे लोगों को कंट्रोल कर सकूं। लेकिन मुझे मालूम है आईएएस का एक्ज़ाम बहुत डिफिकल्ट होता है, इसलिए इसके साथ ही मैं इंजीनियरिंग की भी तैयारी करूंगी जिससे आईएएस ना बन पाऊं तो इंजीनियर बन जाऊं।

और इंजीनियर बनकर क्या करोगी?
मैं खूब सारी मशीन्स बनाऊंगी जैसे एक ऐसा बॉटल कैप बनाऊंगी जिसको लगाने से किसी भी बॉटल का पानी हमेशा ठंडा रहे। एक पोर्टेबल फ्रिज बनाऊंगी जिसे जब जाहे बड़ा करके रूम में रखा जा सके और जब चाहे छोटा करके कहीं भी ले जाया जा सके।

गुड...। आपने अपने मम्मी-पापा से क्या सीखा हैं?
पापा ने मुझे यह सिखाया है कि अगर हम एक्चुली में कुछ चाहे तो उसे जरूर अचीव कर सकते हैं। जैसे मैं दो सालों से अपने स्कूल में मार्कर कप के लिए कोशिश कर रही थी जो उसे मिलता है जिसके सारे सब्जेक्ट्स में सबसे अच्छे ग्रेड्स आएं...मैंने कोशिश की और आखिरकार मुझे मार्कर कप मिल ही गया। मेरी मम्मी ने मुझे यह सिखाया है कि हमें सबकी रेस्पेक्ट करनी चाहिए चाहें वो अमीर हो या गरीब, बड़ा हो या छोटा।

 आपको अपने मम्मी-पापा में क्या सबसे अच्छा लगता है और क्या खराब? 
सबसे अच्छा यह लगता है कि मम्मी पापा मुझे बहुत प्यार से समझाते हैं। गलती करती हूं तो थोड़ा डांटते हैं पर फिर प्यार भी करते हैं और मेरी गलती भी बताते हैं। और जो बात मुझे पापा की अच्छी नहीं लगती वो यह है कि वो मुझे मूवीज़ नहीं दिखाते और मम्मी की यह बात खराब लगती है कि वो पापा से रिक्वेस्ट नहीं करती कि साक्षी को मूवीज़ दिखाओ।

और कौन सी चीज़े हैं जो आपको अच्छी नहीं लगती?
जब मम्मी-पापा डांटते हैं तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। मुझे डांट खाने से नफरत हैं। इसके अलावा मुझे घर में शांति अच्छी नहीं लगती। शांति रहती है तो मैं बोर हो जाती हूं। मुझे दूध पीना और सुबह-सुबह उठकर स्कूल जाना भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि जल्दी उठने के कारण मेरी नींद पूरी नहीं होती।

हीरोइन्स कौन सी पसंद हैं?  
करीना, केटरीना और आलिया। मुझे कैटरीना का स्टाइल पसंद है, करीना का टैलेंट और आलिया की सुंदरता...

आपके लिए दुनिया में सबसे ज़रूरी क्या है?
मेरी फैमिली, फ्रैंड्स और मेरी रेप्यूटेशन।

रेप्यूटेशन से क्या मतलब है आपका?
मतलब, सभी लोगों की नज़र में मैं हमेशा एक अच्छी लड़की बन कर रहूं। सब लोग यह कहें कि कितनी इंटैलीजेंट, स्वीट और अंडरस्टैन्डिंग लड़की है। अच्छी रेप्यूटेशन होनी बहुत ज़रूरी है। रेप्यूटेशन नहीं तो कुछ नहीं।

और आपके हिसाब से ज़िंदगी में सबसे महत्वपूर्ण क्या चीज़े होती हैं?
स्टडीज़- अगर आप लाइफ में कुछ बनना चाहते हो तो स्टडीज़ बहुत ज्यादा ज़रूरी हैं। और इसके बाद टीवी, टैबलेट्स, फेसबुक, मोबाइल, मूवीज़ और फैशन...

आप अपने फ्रैंड्स कैसे चुनती हो, मतलब कैसे लोगों को फ्रैंड बनाना पसंद करती हो?
जो मेरी एज के हों, स्वीट हो, लविंग हो, फ्रैंडली हो, मेरी तारीफ करे, मुझे कॉम्पलिमेंट्स दें। मुझसे चिढ़े ना और मेरी किसी बात पर ओवररिएक्ट ना करे।

आपको अपने भारत देश की किस चीज़ से चिढ़ है?
गंदगी से। और कंट्रीज इतनी नीट एंड क्लीन होती हैं पर हमारा इंडिया बहुत गंदा रहता है। यहां के लोग कितना क्राइम करते हैं। इतना प्रोटेस्ट होता रहता है लेकिन लोग सुधरते ही नहीं हैँ। यहां ब्लैक मनी भी बहुत हैं। लोग सिर्फ आपको तभी सपोर्ट करते हैं जब आप रिच हों। और एक जो सबसे बड़ी प्रॉब्लम जो मुझे लगती है वो यह कि यहां के लोगों को एंगर कंट्रोल करना नहीं आता। ज़रा-ज़रा सी बात पर कहीं भी खड़े होकर लड़ने-झगड़ने और चिल्लाने लगते हैं।

अगर आपको इंडिया का प्राइम मिनिस्टर बनाया जाए तो आप क्या क्या काम करोगी?
मैं कंट्री को नीट रखने के लिए स्ट्रिक्ट कानून बनाऊंगी। इसके बाद इतने सारे केसेज जो लटके रहते हैं और जिनका फैसला नहीं होता उनके लिए कानून बनाऊंगी कि केस जल्दी से जल्दी सॉल्व किए जाएं। और सबसे इम्पॉर्टेन्ट बात, मैं यह कानून बनाऊंगी कि इंडिया में हर तीन घंटे में फैशन बदलना चाहिए और सारे लोगों को उसे फॉलो करना चाहिए।  मैं यह कानून लागू करूंगी कि सारे बच्चों को उनके मम्मी-पापा उनके मनपसंद गेम्स दिलाएं, उन्हें मना ना करें। स्कूल की सारी क्लासेज में स्मार्ट बोर्ड और एसी होना ही चाहिए, मैं इसे भी कम्पलसरी कर दूंगी।

अगर तुम्हें एक बार मौका मिले कि तुम अपनी मर्जी से कुछ भी चेंज कर सकती हो तो क्या चेंज करोगी।
पहले तो मैं अपने घर को बंग्ले में कन्वर्ट कर दूंगी और दूसरे अपनी गाड़ी मर्सिडीज़ गाड़ी में बदल दूंगी और वो भी पांच करोड़ साठ लाख रुपए वाली मर्सिडीज़ में।

भगवान तुमसे तीन दुआएं मांगने को कहे तो क्या मांगोगी?
पहली यह कि कभी मेरे गन्दे मार्क्स ना आएं। दूसरी कॉपी में सारा काम हमेशा कम्पलीट रहे और तीसरी यह कि मुझे मम्मी-पापा कभी भी डांटे नहीं।

(For Sakshi :-))



Friday, 23 August 2013

लोग अछूतों की तरह व्यवहार करते हैं हमसे.. पानी पिलाना तो दूर तमीज़ से बात तक नहीं करते...

यह लोग मेरे घर आते हैं आपके यहां भी ज़रूर आते होंगे.. कभी कोई चिट्ठी लेकर, कभी रिश्तेदारों द्वारा भेजे गए उपहार लेकर तो कभी आपके द्वारा वेबसाइट या टीवी से मंगाए गए सामान को लेकर।
लेकिन कभी आपने इन पर गौर किया है। कितनी ही बार ऐसा हुआ होगा कि जब ये आप के घर की घंटी बजाते हैं तो आप झुंझला पड़ते हैं कि यहीं समय मिला था आने का... आप इन्हें हमेशा गेट के बाहर रखते हैं, कई बार तो आप इन पर अपना गुस्सा भी उतारते हैं... शायद ही हमारे मन में कभी खयाल आता होगा कि यह भी हमारे जैसे पढ़े लिखे इंसान है, इनकी भी इज़्जत है और प्यार और तमीज़ से बोला जाना इन्हें भी अच्छा लगता है....
आरामैक्स कूरियर कंपनी के फील्ड ऑफिसर कुलदीप 
हमने जब होम शॉप एट्टीन का सामान पहुंचाने वाले दो डिलीवरी बॉयज़ से बात की तब उनकी ज़िंदगी और हम लोगों द्वारा अनजाने या जान बूझ कर इनके अपमान किए जाने का आभास हुआ।

इनकी ज़िंदगी मोटरसाइकिल पर कटती है। होम शॉप एट्टीन का सामान कस्टमर तक पहुंचाने वाली कूरियर कंपनी आरामैक्स के फील्ड ऑफिसर या आम भाषा में कहें तो डिलीवरी बॉयज़ सुबह नौ बजे से कूरियर पहुंचाने का अपना काम शुरू कर देते हैं। कंपनी में लगभग 40 फील्ड ऑफिसर्स हैं और सभी दिल्ली के अलग-अलग इलाके कवर करते हैं। कुलदीप और इनके दोस्त देवेंदर पाल पूर्वी दिल्ली का इलाका कवर करते हैं।

जब हमने कुलदीप से पूछा कि आप की क्वालिफिकेशन क्या है तो उन्होंने बताया कि वो आर्ट्स में स्नातक हैं इनके दोस्त देवेंदर के पास भी स्नातक की डिग्री है लेकिन वो इस काम को करने के लिए मजबूर है क्योंकि उन्हें कोई और काम नहीं मिला। और अब इस काम को दिन में 11 से 12 घंटे और महीने के छब्बीस दिन करते हुए वो इतने व्यस्त रहते हैं कि दूसरी नौकरी ढूंढने का उनके पास समय ही नहीं है।

आरामैक्स कंपनी के ही देवेन्दर पाल
इस काम से आपकी कितनी आय हो जाती है... इस सवाल के जवाब में कुलदीप ने बताया कि उनका पैकेज साढ़े नौ हज़ार रुपए प्रति महीने का है जिसमें से 600 रुपए पीएफ के कट जाते है बाकी मैडिकल इंश्योरेंस वगैरह कट कर इनके हाथ हर महीने आठ से साढ़े आठ हज़ार रुपए आते हैं। कंपनी पेट्रोल का खर्चा रोज़ अलग से देती है।
इतने रूपए में खर्च चल जाता है आप लोगो का... जब हमने यह पूछा तो देवेन्दर ने कहा... खर्च चलने या चलाने की बात कहां है, घर तो चलाना ही है, चाहे हंसकर चलाएं या रोकर। पैसे इतने ही मिलते हैं, कोई और काम करने का समय नहीं है तो घर इनमें ही चलाते हैं जैसे भी चले....हम अगर एक भी दिन घर पर बैठ जाएं तो कंपनी पैसे काट लेती है। बीमारी हो या घर में कोई कैजुअल्टी हो, शादी हो या त्यौहार हो... इससे कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें तो महीने की चार इतवारों की छुट्टी के अलावा हर रोज़ काम पर जाना ही है। ज़िंदगी मुश्किल है लेकिन क्या करें काम तो करना ही है।

आप अपने काम से संतुष्ट है...  जब हमने यह पूछा तो कुलदीप ने हंसते हुए कहा कि मैडम हमें तो असंतुष्ट होने का समय ही नहीं मिलता और ना अपना काम छोटा लगता है, रोटी तो इसी से खा रहे हैं। दिन भर मोटरसाइकिल पर घूम-घूम कर जितना मिलता है उसी में खुश रहने की कोशिश करते है लेकिन लोग हमें ज़रूर यह एहसास कराते रहते हैं कि हम बहुत छोटे लोग है और हमारी ज़िदंगी कीड़े मकौड़ो जैसी है....

आप ऐसा क्यों कह रहे हैं.. मैंने हैरानी से पूछा तो फिर से कुलदीप ही बोले....

"मैडम अब क्या बताएं, अपने काम से हमें इतनी परेशानी नहीं होती जितनी हमारे प्रति लोगों के रवैये से  होती है। जिनके घर हम सामान पहुंचाते हैं वो तो हमें इंसान समझते ही नहीं है। हम सुबह 9 बजे से ही डिलीवरी करने निकल जाते हैं। बारिश हो, धूप हो, पानी हो.. हमें तो अपना काम करना ही है लेकिन कई बार लोगों का व्यवहार हमारी तरफ इतना बुरा होता है कि मन खराब हो जाता है।"
 "कॉलोनी के ऊंचे-ऊंचे घर वाले लोग बहुत ही छोटे दिल वाले होते हैं। हम भी पढ़े लिखे हैं। लेकिन जब हम किसी के घर कुछ सामान पहुंचाने जाते हैं तो वो हमसे ऐसे अछूतो की तरह व्यवहार करते हैं कि क्या बताएं।"
 अपना अनुभव साझा करते हुए कुलदीप बोले कि एक बार तो मैं जून में यहीं कॉलोनी में तीसरी मंज़िल पर रह रही एक महिला के घर सामान पहुंचाने गया था। गर्मी बहुत थी वैसे तो हम लोग अपना पानी लेकर ही निकलते हैं लेकिन उस दिन पानी खत्म हो गया था तो मैंने उस महिला से कह दिया कि मैडम थोड़ा पानी पिला दीजिए। इस पर मैडम मुझसे बोलती हैं कि भैया आज हमारे यहां पानी आया नहीं था, इसलिए पानी है नहीं वरना पिला देते... और यह तो एक वाक्या है, जाने कितने ही लोग हमसे ऐसा ही व्यवहार करते हैं। खुद तो कभी पानी की खैर पूछते ही नहीं और अगर कभी हमने बहुत मजबूरी में पानी मांग लिया तो कभी अलग से रखी बोतल में लाकर दे देंगे.., कभी सादा पानी ले आएंगे, कभी मना कर देंगे, गिलास में तो कभी पिलाते ही नहीं जैसे कि हम अछूत हों।

अब तक चुप खड़े देवेंदर ने भी बताना शुरु किया..".कितनी ही बार बारिश आ रही होती हैं और हम सामान, देने जाते हैं तो भी लोग हमें बाहर ही खड़ा रखते हैं, लोगों को पैसे लाने होते हैं... 10-10, 15-15 मिनट में लोग पैसे लेकर आते हैं.. और तब तक बाहर शेड ना भी हो तब भी कोई यह तक नहीं कहता कि गेट के अन्दर आकर पोर्च में ही खड़े हो जाओ।"

"लोगों को पता होता है होम डिलीवरी पर आने वाला सामान खोलकर नहीं देख सकते, कंपनी पहले से ही रूल्स बता देती है लेकिन तब भी कई लोग तो इसी पर झगड़ा करते हैं। एक बार तो एक आदमी ने मेरे से बहुत ज़िद की कि सामान खोल कर देखने पर ही लूंगा। मैंने उनसे मना किया कि यह रूल्स के खिलाफ है तो वो मुझसे झगड़ा करने लगा, मुझे गाली तक दे डाली... और हम तो कुछ कह नहीं सकते क्योंकि कस्टमर तुरंत हैल्पलाइन पर शिकायत कर देते हैं। और कंपनी तो चूंकि कस्टमर से पैसे लेती है इसलिए कस्टमर उनके लिए भगवान है और हमारे जैसे लोगों की बेइज्जती होती भी रहे तो भी कंपनी मैनेजमेंट हमें यही कहकर चुप करा देता है कि यार तुम कुछ बोला मत करो.., या बहस नहीं करनी चाहिए थी.., या तुम्हारी गलती होगी वगैरह- वगैरह.."

 "मैडम हम भी पढ़े लिखे लोग है, भाग्य की बात है कि हम यह काम कर रहे हैं। बस लोगों के व्यवहार से दुख होता है। अगर हमें भी इंसान समझकर प्यार से और इज़्जत से बातें कर लेंगे तो उनका क्या घट जाएगा...."

कुलदीप द्वारा कहे गए इस आखिरी वाक्य ने मुझे भी अपने अंदर झांकने पर मजबूर कर दिया क्योंकि कई बार तो मैं भी कूरियर लेकर आने वाले लोगों पर झल्ला उठती हूं जब मैं टीवी देख रही होती हूं या अपना कोई काम कर रही होती हूं और अचानक से घंटी बजती है और मुझे उठकर जाना पड़ता है तो बड़ा गुस्सा आता है मुझे... खैर इन दोनों से बात करके मेरी भी आंखे खुली है और शायद मैं और मेरे जैसे इन दोनों की कहानी पढ़ने वाले लोगों की भी आंखे खुले और हम भविष्य में डिलीवरी बॉयज़ से इज़्जत से बात करें...




Sunday, 11 August 2013

Confessions of a wife.... एक पत्नि का कुबूलनामा...

समाज में पत्नियों के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता रहा है। लोग अपने हिसाब से पत्नी को नई नई उपमाएं देते हैं। कोई कहता है हम तो अपनी पत्नी से बहुत डरते हैं और कोई कहता है कि पत्नी तो बस लड़ती रहती है। पत्नी के ऊपर खूब चुटकुले बने, खूब मज़ाक उड़ाए गए और जितना कहा जा सकता था कहा गया। कभी पत्नी, पति के जीवन में ज़हर घोलने वाली बनी, कभी सास को सताने वाली बनी, कभी हिटलर बनी तो कभी जासूस के नाम से उसे नवाज़ा गया। चुटकुलो, कहानियों, कविताओं और व्ययंगो में उसे जी भर के इज़्जत बख्शी गई। उसे पूजा गया तो सिर्फ मां के रूप में पूजा गया जबकि पत्नी के रूप में उसने कभी बेइज़्जती सही, कभी व्यंयग के बाण सहे, कभी गालियां खाई, कभी मार, कभी फटकार और शायद हमेशा ही बचा हुआ खाना, वो भी सबसे आखिरी में। आज ऐसी ही एक शिक्षित पत्नी से के कुबूलनामे को लेकर हम आपके सामने उपस्थित हैं। इस पत्नी की तस्वीर माफ कीजिएगा, नहीं दे पाएंगे क्योंकि वो नहीं चाहती।

क्या आप एक आदर्श पत्नी है।
बिल्कुल नहीं। जब मेरा पति आदर्श पति नहीं है तो मैं भी तो उसी की पत्नी हूं। पति के रास्ते ही चलूंगी। लेकिन फिर भी मैं उससे बहुत बेहतर हूं।

आपके पति तो काफी पढ़े लिखे इंसान हैं, आप भी नौकरी करती हैं, तो क्या आप दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य है?
शादी से पहले तक मैं भी यहीं समझती थी कि पढ़ा-लिखा इंसान एक अच्छा इंसान होता है लेकिन शादी के बाद मेरा भ्रम टूट गया। मुझे समझ में आ गया कि पढ़ा लिखा इंसान दरअसल ज्यादा खराब होता है क्योंकि एक गंवार इन्सान जब अपनी पत्नी को गालियां देता है, चीखता चिल्लाता है तो हम यह कह देते हैं कि यह तो गंवार है इसे अपनी पत्नी से बोलने की अक्ल नहीं लेकिन वहीं काम अगर एक ऐसा पढ़ा लिखा इंसान करे जिसने सोसाइटी के तौर तरीके सीखे हैं, ऊंची पढ़ाई पढ़ी है, गाड़ी में घूमता है, अच्छे कपड़े पहनता है तो उसे हम क्या कहेंगे। एक गंवार है इसलिए ग़लती कर रहा है और दूसरा पढ़ा लिखा होकर भी ज़ाहिलो जैसी हरकत कर रहा है। आपको किस पर ज्यादा अफसोस होगा?

आजकल पति काफी सहायता करते हैं घर पर पत्नियों की। आपके भी करते होंगे?
बिल्कुल करते हैं। लेकिन सिर्फ उतनी ही जितनी करना चाहते हैं और सिर्फ तब तक, जब तक उनका मन करें। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है, मैं चाहूं ना चाहूं मुझे काम करना ही पड़ता है। आराम करना चाहूं तो भी और नहीं करना चाहूं तो भी।

क्या आप अपने पति की इज़्जत करती हैं?
हां सबके सामने तो इज़्जत से ही बोलना पड़ता है। और फिर मेरे संस्कार है तमीज़ से बोलने के तो मैं तमीज़ से ही बोलती हूं लेकिन जहां तक मन से इज़्जत करने की बात है मैं नहीं करती।

क्यों...
क्योंकि मेरे पति ने एक भी पति धर्म नहीं निभाया है। शादी के सात फेरों के समय उन्होंने वचन दिया था कि वो जब भी कोई खर्चा किसी भी समय, किसी भी चीज़ पर या किसी के लिए भी करेगें , उसमें मेरी मंत्रणा लेगें, लेकिन वो तो ऐसा कभी नहीं करते बल्कि अगर मैं पूछती भी हूं तो मुझे जली कटी सुनने को मिलती है। दूसरा वचन- वो मेरे मायके वालों को भी उतनी ही इज़्जत देंगे जितनी कि अपने घरवालों को देते है लेकिन यह वचन भी हमेशा ही टूटता है। वो यह चाहते हैं कि मैं उनके मां बाप की पूजा करूं लेकिन मेरे माता-पिता को वो जब चाहे बेइज़्जत कर देते हैं। और एक वचन यह भी था कि वो कभी भी मुझे चार लोगों, मेरी सहेलियों के बीच बेइज़्जत नहीं करेगें, कभी कुछ गलती निकालनी होगी या डांटना होगा तो अकेले में बोलेगें लेकिन यह वचन भी मेरे पति ने नहीं निभाया। वो तो किसी के भी सामने मेरे से कुछ भी बोल देते हैं। मेरे बराबर वालों और बड़ो के सामने तो छोड़ो, मुझसे छोटे बच्चों तक के सामने मुझे डांट देते हैं। आप ही बताईए वचन लेकर ही तो हम पति-पत्नि बने थे लेकिन जब वो अपने वचन निभा ही नहीं रहे तो हम पति पत्नि तो बस नाम के ही हुए ना। बल्कि मैं तो यह कहूंगी वो मेरे पति रहे ही नहीं सिर्फ मेरे बच्चों के पिता हैं। फिर मैं उनकी पति के तौर पर इज़्जत क्यों करूं।

पर आप के पति में कोई तो खूबी होगी?
पति में नहीं एक बेटे में हैं। वो दुनिया के सबसे अच्छे बेटों में से एक हैं। अपनी मां की बहुत इज़्जत करते हैं लेकिन सवाल यह है कि यह कैसी इज़्जत है कि वो अपनी मां की तो इज़्जत कर रहे और दूसरों की मां की बेइज़्जती। और मां की इज़्जत करने वाला क्या पत्नि की इज़्जत नहीं करता। कैसा दोगला चरित्र है तुम्हारा। तुम मां की इज़्जत करते हो और अपनी जीवनसाथी पत्नि को गालियां देते हो जो तुम्हारे ही बच्चे की मां है।

तो आप सास की वजह से परेशान हैं?
नहीं बिल्कुल नहीं। सास तो बहुत बाद में आती है। मेरे और उनके बीच की कड़ी तो बेटा है। जब वो मेरी इज़्जत नहीं करेगा तो सास-ससुर या कोई भी और रिश्तेदार क्यों करेगा। यह तो मानी हुई बात है कि मायके में पति की इज़्जत करवाना पत्नि के हाथ में है और ससुराल में पत्नि की इज़्जत करवाना पति के हाथ में। आज अगर ससुराल में कोई मुझ पर हावी हो रहा है या मेरे से बदतमीज़ी कर रहा है तो यह उसकी गलती नहीं है, मेरे पति की गलती है जो उसे ऐसा करने दे रहा है। सास और पत्नी के बीच संतुलन कायम करना तो पति का काम है ना।

अगर ऐसा है तो आपके सास से तो काफी मधुर संबंध होंगे।
कैसे होंगे। अगर सास मुझसे कुछ कहे तो मेरे पति कहते हैं कि कोई बात नहीं बड़ी हैं सुन लो और अगर मैंने रोज़मर्रा के काम के दौरान छोटी सी भी बात बोल दी तो आप इसको लेकर मुझसे झगड़ोगे, यह बोलोगे कि तू तो मेरी मां को घर से निकालना चाहती है, लड़ना चाहती है तो इस तरह से तो आप खुद अपनी पत्नि को मां से दूर कर रहे हो ना। मतलब अगर बेटा अपनी मां को कुछ बोले तो ठीक लेकिन हम तो दूसरे घर के हैं हम कैसे बोल सकते हैं... तो यह भेद तो बेटा ही पैदा कर रहा है ना।

इसकी वजह आप क्या मानती है?
पूर्वाग्रह से ग्रसित नज़रिया। पति यह मानकर चलते हैं कि उनकी मां कभी कोई गलती कर नहीं सकती और  पत्नि कभी सुधर नहीं सकती। वो हमेशा ही गलत होगी। जबकि वो यह भूल जाते हैं कि शादी के बाद पत्नि के प्रति तो उनका कर्तव्य और बढ़ जाता है। हमारे शास्त्रों में पूजा भी तब पूरी होती है जब पति और पत्नि मिल कर उसे अंजाम दें। मां अगर देवी है तो पत्नि भी गृहलक्ष्मी होती है। अगर तुम गृहलक्ष्मी की इज़्जत नहीं करते तो कभी तु्म्हें बरकत नहीं मिलती।

आपको क्या लगता है। घर में आप दोनों के झगड़े का असर बच्चो पर भी पड़ता है?
हां पड़ता है ना। मेरे बच्चे देखते हैं ना कि कैसे पापा और मम्मी आपस में लड़ते रहते हैं। कैसे पापा नानी-नाना और मामा मौसी के बारे में गलत बोलते रहते हैं और कैसे पापा हमेशा दादी को फेवर करते हैं। और वो यह भी देख रहा है कि इन वजहों से घर में सब अलग थलग रहते हैं। ना पापा मम्मी से बोलते हैं ना मम्मी पापा से। जिस के पास जाओ वो उन्हें डांट देता है। सारा गुस्सा उन पर निकलता है। घर में प्यार और एक दूसरे को इज़्जत देने का कोई माहौल ही नहीं है। देखते हैं बच्चे सब और वहीं सीख रहे हैं।

तो आपको तो इस दिशा मे कुछ करना चाहिए।
कैसे करूं। अकले कितना करूं। इंसान कहां तक और कितना चुप रहेगा। कोई गंदगी उड़ाएगा तो छींटे तो उस के साथ साथ आस-पास खड़े सारे लोगों पर पड़ेंगे ना। बच्चे गाली देना सीख रहे हैं, लड़ना झगड़ना सीख रहे हैं और आगे जाकर वो भी यहीं करेंगे जो हम लोग कर रहे हैं। इसका हल मैं अकेले तो नहीं कर सकती ना। बच्चों की दुनिया तो मां-बाप दोनों होते हैं ना। किसी एक से तो वो नहीं सीख सकते। उन्हें तो दोनों का प्यार और साथ चाहिए जब वो नहीं मिल रहा है तो वो कैसे एक प्यार के सौहाद्रपूर्ण वातावरण में बड़े होंगे। कैसे अच्छे इंसान बनेंगे और कैसे अपने परिवार से प्यार करना सीख पाएंगे।

शादीशुदा ज़िंदगी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी।
सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि शादीशुदा ज़िंदगी नसीब से मिलती है। इसे ग्रांटेड नहीं लेना चाहिए। कितने ही लोग है जो शादी के लिए तरस रहे हैं। एक ज़िंदगी है, छोटा सा जीवन है और उसमें भी हम एक दूसरे की इज़्जत नहीं कर सकते। वो पल जिन्हें हम यादगार बना सकते हैं जिनमें अपने बच्चों का भविष्य संजो सकते हैं, संवार सकते हैं,  उन्हें इस तरह एक दूसरे से लड़ाई झगड़े में बेकार कर रहे हैं। प्यार से रहने के लिए बस एक दूसरे को इज़्जत ही तो देनी पड़ती है लेकिन हम पूरी दुनिया को तो इज़्जत देते है पर जो हमारा जीवनसाथी है उसी को इज़्जत देना भूल जाते हैं। और जब आंख खुलती है तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है।
 

Tuesday, 6 August 2013

एक तलाकशुदा महिला का साक्षात्कार

कहते हैं भारतीय समाज बहुत आधुनिक हो गया है, लोग खुले विचारों और खुलेपन के साथ सबकुछ स्वीकार करने लगे हैं लेकिन फिर भी कुछ सच हैं जो कभी नहीं बदलते और उन्हीं में से एक सच यह भी है कि आज भी हमारा भारतीय समाज तलाकशुदा महिलाओं के मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और उनके प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया रखता है। सच क्या है यह जानने के लिए हमने आज के ज़माने की सफल और आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करने वाली एक तलाकशुदा महिला मिस गीता आहूजा से बात की। मिस आहूजा एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, दिल्ली में उनका अपना ऑफिस हैं। तलाकशुदा होने के बावजूद मिस गीता आहूजा आज खुश हैं, आज़ाद है लेकिन उनकी यह खुशी, दर्द की जिन सीढ़ियों पर चलकर हासिल हुई है, उनके बारे में जब हमने उनसे पूछा तो उन्होंने दिल खोलकर हमसे बात की। आप भी जानिए कि इस समाज की हकीकत क्या है और तलाकशुदा महिलाओं को किस नज़र से देखा जाता है...
एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर- गीता आहूजा

आपने अपने पति से तलाक क्यों लिया? कैसे हुआ यह सब, क्यों हुआ?

मैंने जिस लड़के से शादी की थी वो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। हम नेट पर मिले थे। और फिर हम दोनों के परिवारों की मर्ज़ी से हमारी शादी हो गई। शादी के बाद से ही उसने अपना काम करना छोड़ दिया था, हांलाकि मैं शादी से पहले भी इन्टीरियर डिज़ाइनिंग के प्रोजेक्ट्स लेती थी लेकिन शादी के बाद उसने मेरा यह काम भी छुड़वा दिया। वो भी काम छोड़ चुका था, मुझे भी काम नहीं करने देता था तो ज़ाहिर है घर में आर्थिक तंगी चल रही थी। जब हमारी इस बात पर लड़ाई होने लगी तब उसने कहा ठीक है तुम किसी जगह नौकरी कर सकती हो। मैं नौकरी तलाश करती थी तो वो हर बात पर नज़र रखता था, बहुत टोका-टाकी करता था कि यह नौकरी ऐसी है, यह बहुत दूर है, यह कंपनी अच्छी नहीं है या यहां के लोग अच्छे नहीं हैं वगैरह-वगैरह। हद तो तब हो गई जब वो नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय भी मेरे साथ जाने लगा। हर समय मेरे साथ ही घूमता था। मुझे अगर पूरा दिन भी इंटरव्यू के लिए बैठना पड़े तो भी मेरे साथ बैठा रहता था। मैं किसी से फोन पर बात करती थी तो सुनता था। कोई सहेली मेरे घर आती थी तो हमारे साथ बैठ जाता था और जब मौका मिलता था कोई भी छोटी से छोटी बात पकड़कर मुझे जली-कटी सुनाते रहता था। मुझे लगता था जैसे मैं किसी जेल में बन्द हूं। मैं काफी डिप्रेशन में आ गई थी। पागल सी हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। मैंने कभी छिप कर मम्मी पापा से बात की भी तो वो भी मुझे ही समझा देते थे कि यह कोई बड़ी बात नहीं सब ठीक हो जाएगा पर उन्हें पता नहीं था कि मैं कितनी परेशान थी। आखिरकार एक दिन मैं लड़-झगड़ कर किसी तरह अकेली अपने मायके मेरठ चली गई। और दो दिन बाद लौटी तो देखा वो अपना सारा सामान लेकर घर छोड़ कर चला गया था। बस उसी दिन मैंने पक्का फैसला कर लिया कि अब मुझे इस बोझ बनते रिश्ते को खत्म करना है। मैंने महिला आयोग में अर्जी दी और 2006 में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से हमारा तलाक हो गया।

क्या तलाक का फैसला करना आपके लिए मुश्किल था, क्या किसी ने आपकी बात सुनी, आपका साथ दिया?
बहुत बहुत मुश्किल था वो वक्त, वो फैसला लेना। उस समय समझ ही नहीं आता था मैं क्या करूं। मैं मम्मी पापा से बात करती थी तो वो मना कर देते थे, समझाने लगते थे। लोग क्या कहेंगे यह सोच कर भी डर लगता था। पूरे समय मन में यही उलझन रहती थी कि क्या करूं। मन में बुरे-बुरे खयाल आते थे। लेकिन फिर मैंने ही अपने आपको हिम्मत दी। मैंने सोच लिया कि मुझे इस तरह मर-मर के नहीं जीना है। मुझे इस बोझ से आज़ादी चाहिए थी और फिर मैंने फैसला कर लिया कि चाहे जो हो जाए मैं अब तलाक लेकर रहूंगीं। मैंने अपनी छोटी बहन को सारी बातें बताईं और तब किसी ने पहली बार मेरे दुख को समझा और मेरा साथ दिया। जब मैंने मम्मी-पापा को इस फैसले के बारे में बताया तो वो तो बहुत गुस्सा हुए थे, मुझसे बात करना छोड़ दिया था वो बोलते थे कि बच्चे के बारे में सोचो बच्चा आ जाएगा तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन मैं जानती थी कि बच्चे के बाद मेरे लिए इस रिश्ते को तोड़ना और मुश्किल होगा। मैं अपने फैसले पर अडिग रही और तलाक ले लिया।

तलाक के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं रही होगी?
नहीं बिल्कुल नहीं, बल्कि ज़िंदगी की असली जंग तो अब शुरू हुई थी। तलाक लेने के बाद तो मेरे प्रति लोगों के तेवर ही बदल गए। मेरे बहुत से रिश्तेदार जैसे मेरी बुआ जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया। सब लोग मुझे ही ग़लत ठहराते थे। जिस भी रिश्तेदार को इस बारे में पता चलता था वो मेरी ही गलती निकालता था। लोग कहते थे कि मुझमे ही कुछ कमी होगी इसलिए शादी टूट गई। मैं मम्मी-पापा के पास जाती थी तो वो मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। उन्होंने मुझे कहीं भी ले जाना बन्द कर दिया। उन लोगों ने भी जाना-आना छोड़ दिया क्योंकि उनसे भी लोग सौ सवान करते थे। वो तो शुक्र हैं कि उन्होंने शादी पर दिल्ली में मुझे एक मकान भी दिया था। मैं यहीं आ गई और यहीं रहना शुरू कर दिया। छः महीने तक मैं घर नहीं गई। कितने समय मैं यह सोचकर घर में बन्द रहती थी कि अब क्या होगा। मैं जाऊंगी तो लोग मुझे कैसे देखेंगे, कैसी कैसी बाते करेंगे। पर कहते हैं ना समय बहुत बड़ा मरहम होता है। धीरे-धीरे मैंने अपने आपको संभाला, नौकरी शुरू की तो काफी हद तक मैं इस तनाव से बाहर आने लगी।

 जीवन की इस घटना ने क्या आपको कुछ बदला भी, सिखाया भी?
सबसे बड़ी बात तो यह सिखाई कि ज़िंदगी हर चीज़ की कीमत वसूलती है। आज़ादी आपको यूंही नहीं मिलती, बड़ा संघर्ष करना पड़ता है इसके लिेए। और असली आज़ादी तब मिलती है जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाओ। शुरूआत मे तलाक के बाद मैं पापा-मम्मी से खर्चा लेती थी, क्योंकि मैं नौकरी तो कर नहीं रही थी, तो ज़ाहिर है मुझे उनकी सुननी भी पड़ती थी आखिर मैं उनकी मोहताज़ जो थी। मैं एक गलत शादी से ज़रूर आज़ाद हो गई थी लेकिन अपने परिवार के तानों से आज़ाद नहीं थी। यह आज़ादी मुझे तब मिली जब मैंने खुद कमाना शुरु किया। जब मैंने अपने पापा से खर्च लेना छोड़ दिया, उनकी बातें सुनना छोड़ दिया तब जाकर जिंदगी में थोड़ा सुकून आया। अकेली महिला का जीवन बहुत मुश्किल भरा होता है, यह अब तक मैंने सुना था लेकिन अब यह सब मेरे साथ घट रहा था। आस-पास के लोग, पड़ौसी, ऑफिस के सहयोगी इस बात का बड़ा फायदा उठाते थे। कोई भी कुछ भी बोल कर निकल जाता था। आसानी से मेरा काम नहीं होता था। लेकिन इन्हीं बातों ने मुझे मज़बूत बनाया। धीरे-धीरे मैंने अपने लिए लड़ना और जीतना सीख लिया और आज तो लोग मुझसे डरते हैं (मुस्कुराहट के साथ)। आज की गीता और सात साल पहले की गीता में ज़मीन आसमान का फर्क है।

क्या कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा?
सोचा, कभी -कभी जब दूसरों के परिवारों और बच्चों को देखती हूं तो मेरा भी बड़ा मन करता है कि मेरा भी परिवार हो, बच्चे हों, ज़िम्मेदारियां हों। मम्मी-पापा, रिश्तेदार भी बहुत ज़ोर देते हैं कि दूसरी शादी कर लो, अकेले ज़िंदगी नहीं कटती। लेकिन अब जब मैं अपने आप से सवाल करती हूं कि मुझे ज़िंदगी में क्या ज्यादा ज़रूरी लगता है तो बस एक ही जवाब मिलता है- आज़ादी। और फिर इस बात का डर भी है कि कहीं फिर से मेरे साथ वैसा ही कुछ हुआ तो, इसलिए शादी करने का मन नहीं करता।

पर अकेलापन तो लगता होगा, जीवनसाथी की कमी तो महसूस होती होगी?
हां होती है, तब होती है जब अकेलापन नहीं कटता। लेकिन अब मैंने अपने आप को काम में इतना डुबो दिया है कि मुझे वक्त ही नहीं मिलता यह सब सोचने का। कभी अकेलापन लगता भी है, तो दोस्तो से बात कर लेती हूं, अपनी बहन से बात कर लेती हूं। फिर सब ठीक लगने लगता है।

कोई अच्छा लड़का मिला तो दोबारा शादी करेंगी?
(हंसते हुए) आज तो मैं सफल हूं, आत्मनिर्भर हूं अगर सही लड़का मिला जो मुझे और मेरे करियर को भी उतना ही सम्मान दे जितना अपने को देता है तो सोचूंगी।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगी
बस यहीं कि जिंदगी में कुछ भी, खासतौर से अपनी खुशी और आज़ादी, वो भी एक लड़की के लिए पाना बहुत मुश्किल होता है। अगर अपनी शर्तों पर ज़िदंगी जीनी है तो बहुत लड़ाईया लड़नी पड़ती हैं, खुद को पत्थर जैसा मज़बूत बनाना पड़ता है, कुर्बानियां देनी पड़ती हैं और सबसे ज़रूरी बात समाज में रहना सीखना पड़ता है... और यकीन मानिए एक तलाकशुदा औरत के लिए यह समाज बहुत कठोर है।


  

Monday, 29 July 2013

सौंधी खुश्बू सा रूप सजा है और मन की गहराई में मिट्टी की बू-बांस भी है...

पीले घाघरे में सोमाली और उसकी भावज कनुआ
ना बहुत साज सिंगार, ना ब्यूटी पार्लर के चक्कर और ना ही जिम या योगा क्लासेज की भागदौड़, और हां ना ही डिज़ाइनर कपड़े... यह गांव की गोरियां हैं, रंग रंगीले राजस्थान के गांव की गोरियां। भारत की देसी खूबसूरती इन गोरियों में फिर भी छलकती है।  पतली कमर, कमर पर कसा खूबसूरत गोटे वाला पीले फूलों का घाघरा, उस पर कमर में स्टायल से बांधी गई गोटे पट्टी वाली गुलाबी चुनर जिसका पल्लू सिर पर भी ढका हुआ है.. तिस पर आत्मसम्मान से भरा चेहरा, चेहरे पर खिलती विश्वास भरी मुस्कान, सुतवां नाक, नाक में नथनी
 और बड़ी लाल माथे की बिंदिया... यह रूप है राजस्थान की सोमाली का। और यह जो गोटे वाले धानी घाघरे  और गुलाबी रंग की चूनर ओढ़े शरमाती हुई गोरी सोमाली के बगल में खड़ी है वो है कनुआ, सोमाली की भावज....
अब आप सोच रहे होंगे कि इस छोटी सी सोमाली और कनुआ में खबर कहां है, क्या है और मैं क्यों इनकी सुंदरता की तारीफ के पुल बांधे जा रही हूं... तो इसकी वजह है सोमाली का आत्मसम्मान और वो विशुद्ध देसी खूबसूरती जिसके आज मुझे दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में दर्शन हुए।
 बात बस इतनी सी थी कि आज सोमवार को सरोजिनी नगर के सोमवार बाज़ार में जब मैं खरीददारी करने पहुंची हुई थी तो घूमते हुए मेरी नज़र सोमाली की छोटी सी राजस्थानी गहनों की रेहड़ी पर पड़ी।जिस पर सोमाली अपनी मां ढपली और भावज कनुआ के साथ ग्राहकों को सामान दिखाने में लगी थी। मुझे भी एक माला पसंद आई और मैंने मोल पूछा। सोमाली ने 200 रूपए की माला बताई और मैंने बनिया स्वभाव के फलस्वरूप मोलभाव करके 150 रुपए में बात तय कर ली। मैंने सोमाली को पैसे दिए, माला ली और चल दी।
 
सोमाली की गहनों की रेहड़ी-पट्टी

 मैं बस कुछ ही दूर पहुंची होंगी कि पीछे से किसी की आवाज़ सुनाई दी... मैडम, मैडम...मैंने मुड़ कर देखा तो सोमाली और कनुआ दौड़े आ रहीं थी। पास आ कर कनुआ ने मेरे हाथ में 50 रुपए पकड़ाए और बोली मैडम आप पैसे वापस लेना भूल गईं थी। मैंने हैरानी से देखा, हंसते हुए कहा...अरे मैं भूल गई थी तो तुम रख लेती, तुम्हारा फायदा हो रहा था, वैसे भी मैंने 50 रुपए कम कर दिए थे... और सोमाली गर्व से बोली..."ऐसे कैसे रख लेते मैडम, चीज बेचते हैं, हेराफेरी थोड़े ही करते हैं, फालतू पैसे हमें ना फलेंगे"

अपनी मां ढपली के साथ सोमाली
और मैं लाजवाब हो गई। इस छोटी सी सोमाली को मैंने गौर से देखा और वो मुझे वास्तव में भारत का सच्चा प्रतिनिधित्व करती महसूस हुई। सुन्दर, सजीला, गर्व और स्वाभिमान से भरा भारत, ईमानदार भारत, सिर पर पल्लू ओढ़े लेकिन सिर ताने खड़ा भारत।

सोमाली के बारे में जानने की भी इच्छा हुई। जब पूछा तो उसने बताया कि अपने पूरे परिवार के साथ राजस्थान से आई है वो और फिलहाल मदनपुर खादर में रहती है। यहां मां ढपली और भावज के साथ वो गहने बेचती है और उसका आदमी, भाई और पापा लाजपत नगर में रेहड़ी पट्टी लगाते हैं। जब मैंने सोमाली से तस्वीर खिंचवाने को कहा तो देखिए कैसे फट से कैमरे के सामने खड़ी हो गई। अपनी भावज कनुआ, जो बहुत शरमा रही थी को भी खड़ा कर लिया। एक फोटो अपनी मां के साथ भी खिंचवाई और हां जब मैं चलने लगी तो यह कहना भी नहीं भूली कि मैडम फोटो तो दिखा दो। बात छोटी सी है लेकिन इस छोटी सी बात ने आज मुझे बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और भारत की सुंदरता से मिलवाया भी।  

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...