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Friday, 23 November 2018

विश्व की सबसे प्रिमिटिव जीवित सभ्यता को अकेला छोड़ दीजिए, क्योंकि यही यह चाहते हैं..


अंडमान निकोबार के इर्द गिर्द बिखरे छोटे-बड़े लगभग 500 द्वीप समूहों में एक है नॉर्थ सेंटीनल आईलैंड। बंगाल की खाड़ी में बसा एक छोटा सा द्वीप जो क्षेत्रफल में मैनहैटेन के लगभग बराबर है। घने दुर्गम जंगलों से भरे और रेतीले तट से घिरे इस नितान्त निर्जन नज़र आने वाले द्वीप के मूल निवासी है सेंटीनल आदिवासी, जो करीब 65,000 सालों से यहां रह रहे हैं।
65,000 सालों का मतलब समझते हैं आप- यानि पृथ्वी पर आए अंतिम हिम युग से भी 35,000 साल पहले से, उत्तरी अमेरिका से मैमथ के गायब होने से 55,000 साल पूर्व और प्राचीन मिस्र के लोगों द्वारा गीज़ा में बनाए गए पिरामिडों से 62,000 साल पहले से सेंटीनल्स, इस द्वीप के निवासी हैं। इन्हें अफ्रीका के प्रथम मनुष्यों का प्रत्यक्ष वंशज माना जाता है। कुछ एन्थ्रोपॉलोजिस्ट इन्हें पाषाण युग का सदस्य मानते हैं।
विश्व की सबसे प्रिमिटिव जीवित इन्सानी सभ्यता ने, विकसित समाज द्वारा इनसे सम्पर्क किए जाने की हर कोशिश को नकारा है। सेंटीनल्स इन कोशिशों का स्वागत तीर और भालों की बौछारों से करते हैं। यह आदिवासी आग तक जलाना नहीं जानते। यह समुद्री मछलियों, जीवों और जंगली फलों को खाते हैं। इनकी भाषा सेंटिनलीज़ हैं जो आस-पास के द्वीप समूहों में रहने वाले अन्य आदिवासियों की भाषा से बिल्कुल अलग है।
माना जाता है कि यहां लगभग 500 आदिवासी रहते हैं, लेकिन यह केवल एक अनुमान है। इसका कोई सही आंकड़ा अभी तक उपलब्ध नहीं है। इनके प्रोटेक्शन के मद्देनज़र भारतीय कानून बनाया गया है जिसके अनुसार इन द्वीप के तीन मील के दायरे तक जाना, इनसे घुलने मिलने की कोशिश करना या फोटो खींचना, गैरकानूनी है। इसकी एक वजह यह भी है कि चूंकि सेंटिनलीज़ हज़ारों सालों से आधुनिक मानव सभ्यता और विकास के चक्र से अछूते रहे हैं, इनमें आधुनिक बीमारियों के प्रति इम्यूनिटी विकसित नहीं हो पाई है, जिसकी वजह से यह आधुनिक समाज के सम्पर्क में आने पर बैक्टीरिया के भी सम्पर्क में आ सकते हैं और साधारण फ्लू या इन्फ्लुएन्ज़ा जैसी बीमारी के वायरस भी इनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
1880 में ब्रिटिश नेवल ऑफिसर मॉरिस विडाल पोर्टमेन ने यहां कॉलोनाइजेशन की कोशिशों के तहत यहां के सेंटिनल आदिवासियों से सम्पर्क करने की कोशिशें की थी। यहां से एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति और 4 बच्चों को पकड़ लिया गया। लेकिन पोर्ट ब्लेयर तक आते-आते ही बुज़ुर्ग दम्पत्ति की मौत हो गई। शायद वो आधुनिक मानवों के सम्पर्क में आने के साथ ही पैथोजन्स के सम्पर्क में आ गए थे जिसकी प्रतिरोधक क्षमता नहीं होने के कारण उनकी मौत हो गई। चारों बच्चों को बाद में कुछ उपहार वगैरह देकर वापस इस द्वीप में छोड़ दिया गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश अफसरों ने कभी यहां दोबारा आने की कोशिश नहीं की। 
1967 में भारतीय एन्थ्रोपॉलोजिस्ट टीएन पंन्डित की टीम की इन आदिवासियों से सम्पर्क करने की सारी कोशिशें भी व्यर्थ साबित हुईं। 
1974 में नेशनल ज्योग्राफिक चैनल की टीम यहां एक डॉक्युमेन्ट्री 'मैन इन सर्च ऑफ मैन' के फिल्मांकन के लिए आई थी। लेकिन इस टीम को भी यहां घुसने नहीं दिया गया। आदिवासियों ने इन पर तीरों और भालों की बौछार कर दी,जिनमें से एक तीर डायरेक्टक के पैर में भी लगा था। 
ऐसे और भी कई प्रयास किए गए लेकिन आदिवासियों ने कभी भी सामान्य लोगों से घुलना-मिलना स्वीकार नहीं किया। 
डेली मेल, यूके की रिपोर्ट के अनुसार जॉन एलन चाउ, सारे भारतीय नियम कानूनों को ताक पर रखकर इन लोगों के बीच प्रभु यीशू का प्रचार करने पहुंचे थे। यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने स्थानीय नाविकों को 25,000 रुपए की रिश्वत दी थी। 14 नवम्बर को जब यह यहां पर गए तब एक आदिवासी बच्चे ने इन पर तीर चलाया था जो इनके हाथ में पकड़ी बाइबल पर लगा। लेकिन इस चेतावनी के बाद भी यह फिर वहां पर गए और अंतत: आदिवासियों ने इन्हें मार दिया। चाउ खुद भी यह जानते थे कि उनकी जान को खतरा है, नाविकों के पास छोड़े गए अपने नोट्स में उन्होंने यह सब लिखा है लेकिन फ़िर भी वो यहां जाते रहे। दुख है कि एक असमय, जवान मौत हुई लेकिन यह अनुरोध भी है कि पृथ्वी के इस जीवित इतिहास से छेड़खानी की कोशिश कृपया ना करें। इन्हें अकेला छोड़ दें। क्योंकि यही यह चाहते हैं, और यही हमारे यानि 'सभ्य विकसित समाज' के लिए भी अच्छा है। 
(source- Wikipedia Notes)

Monday, 3 July 2017

सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं, छिपा था क्या, कहां किसने ढका था....: ऋगवेद के सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है यह अमर गीत



वर्ष 1988 में दूरदर्शन पर हर रविवार की दोपहर श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक सीरियल प्रसारित हुआ करता था -'भारत एक खोज', जो कि पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा 1946 में लिखित किताब 'डिस्कवरी ऑव इंडिया' पर आधारित था। इसके 53 एपिसोड्स में भारत के 5000 सालों के इतिहास का फिल्मांकन किया गया था। लेकिन यहां हम सीरियल की बात नहीं करेंगे। बल्कि इस लेख का उद्देश्य इस सीरियल के शीर्षक गीत- "सृष्टि से पहले सत् नहीं था..." का महत्व सामने लाना है।

सनातन धर्म के सबसे आरम्भिक स्त्रोत, ऋगवेद के संस्कृतनिष्ठ सूक्तों से शुरू होने वाले, इस शीर्षक गीत में गूंजने वाली संस्कृत, बेहद क्लिष्ट होने के बावजूद कानों में रस घोलती है और सुनने वाले को एक अलग श्रव्य रस से परिचित कराती है।

लेखक व अनुवादक वसंत देव के बोल, संगीतकार वनराज भाटिया का संगीत और सुरीला समूह गायन वो विशेषताएं हैं जो इस गीत को समय और काल के परे लोकप्रिय बनाती हैं। पर ऐसा क्या खास है इसके बोलों में कि जब यह गीत कानों में गूंजता है तो सुनने वाले को एक अलग अनुभूति देता है?




क्या आप जानते हैं कि यह पूरा गीत दरअसल ऋगवेद के नासदीय और हिरण्यगर्भ सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है। जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति की शुरुआत का वर्णन है। जी हां, वो प्रश्न जिसका उत्तर विज्ञान आज तक ढूंढ रहा है।

हिन्दु धर्म में पूज्यनीय ऋगवेद को विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है। 5000 वर्ष पूर्व लिखे गए ऋगवेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की रचना से पहले का जो वर्णन है वो आज भी प्रासंगिक है। इसके रचयिता ऋषि प्रजापति परमेष्ठी माने जाते हैं। इस सूक्त के अनुसार सृष्टि की शुरूआत से पहले किसी तरह का कोई तत्व नहीं था, कोई अणु, परमाणु या पार्टिकल कुछ भी नहीं। आकाश, हवा, दिन, रात वगैरह भी नहीं थे। केवल अंधकार था, गहन अंधकार और शून्य, निर्वात, खालीपन। और तब, ब्रह्मतत्व या जिसे ईश्वर भी कहा जा सकता है, के मन में सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न हुई और 'कुछ नहीं' से 'कुछ' का निर्माण होने की नींव पड़ी।

जहां एक तरफ यह सूक्त ईश्वर के होने को स्थापित करता है और कहता है कि सृष्टि की शुरूआत को दरअसल ईश्वर के अलावा कोई नहीं जानता जो कि प्रकाशकणों के रूप में सब जगह उपस्थित हैं, वहीं उसके होने पर सवाल भी खड़ा करता है। यह भी पूछता है कि वाकई में ऐसा कोई करने वाला है भी या नहीं जिसके बल पर सूर्य, पृथ्वी या यह पूरा बृह्मांड स्थिर गति से चल रहे हैं।



इस गीत का दूसरा खंड जो कि सीरियल के अंत में गूंजता है, ऋगवेद के हिरण्यगर्भ सूक्त का हि्न्दी अनुवाद है। सूक्त का प्रथम श्लोक ज्यों का त्यों गीत में लिया गया है। हिरण्यगर्भ (golden womb) का अर्थ है उजला गर्भ या अंडा या उत्पत्ति स्थान। सनातन धर्म में इसे सृष्टि की शुरुआत का स्त्रोत माना जाता है। इसी के ज़रिए सूर्य, चन्द्रमा, देवताओं और जीवात्मा का जन्म हुआ है। हिरण्यगर्भ को सर्वाधिक पूज्यनीय बताया गया है। उगते सूर्य को भी हिरण्यगर्भ का रूप माना गया है जिसकी लालिमा उसकी पूर्ण शुद्धता से भरी उत्पत्ति का प्रतीक है , इसलिए यहां उसकी उपासना की भी बात कहीं गई है।

धारावाहिक की केवल अंतिम कड़ी में पूरा गीत लिया गया है। बाकि कड़ियों में शीर्षक गीत के कुछ ही अंतरे सुनाई पड़ते हैं ('अगम, अतल जल भी कहां था' के बाद सीधे 'सृष्टि का कौन है कर्ता' से लिया गया है।)

गीत के बोल इस तरह से हैं:

(शीर्षक गीत)

नासदासीनन्नोसदासीत्तानीम नासीद्रोजो नो व्योमा परो यत।
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गगहनं गभीरम्।।
(नासदीय सूक्त, ऋगवेद, दशम् मंडल, सूक्त- 129)

सृष्टि से पहले सत् नहीं था,
असत् भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं,
आकाश भी नहीं था।

छिपा था क्या, कहां,
किसने ढका था।
उस पल तो अगम, अतल
जल भी कहां था।

नहीं थी मृत्यु,
थी अमरता भी नहीं।
नहीं था दिन, रात भी नहीं
हवा भी नहीं।
सांस थी स्वयमेव फिर भी,
नहीं था कोई, कुछ भी।
परमतत्व से अलग, या परे भी।

अंधेरे में अंधेरा, मुंदा अंधेरा था,
जल भी केवल निराकार जल था।
परमतत्व था, सृजन कामना से भरा
ओछे जल से घिरा।
वही अपनी तपस्या की महिमा से उभरा।

परम मन में बीज पहला जो उगा,
काम बनकर वह जगा।
कवियों, ज्ञानियों ने जाना
असत् और सत् का, निकट सम्बन्ध पहचाना।

पहले सम्बन्ध के किरण धागे तिरछे।
परमतत्व उस पल ऊपर या नीचे।
वह था बटा हुआ,
पुरुष और स्त्री बना हुआ।

ऊपर दाता वही भोक्ता
नीचे वसुधा स्वधा
हो गया।।

सृष्टि ये बनी कैसे,
किससे
आई है कहां से।
कोई क्या जानता है,
बता सकता है?

देवताओं को नहीं ज्ञात
वे आए सृजन के बाद।

सृष्टि को रचा है जिसने,
उसको, जाना किसने।


सृष्टि का कौन है कर्ता,
कर्ता है व अकर्ता?
ऊंचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता।
वहीं सचमुच में जानता
या नहीं भी जानता।
है किसी को नहीं पता,
नहीं पता,
नहीं हैं पता,
नहीं हैं पता।


(उपसंहार अंतरा)
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेकासीत्।
स दाधारं पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्।।
(प्रथम श्लोक, हिरण्यगर्भ सूक्तम, ऋगवेद, दशम मण्डल, सूक्त -121)

वो था हिरण्यगर्भ, सृष्टि से पहले विद्यमान
वहीं तो सारे भूत जात का स्वामी महान

जो हैं अस्तित्वमान, धरती- आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

जिसके बल पर तेजोमय है अम्बर
पृथ्वी हरी-भरी, स्थापित, स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर।
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

गर्भ में अपने अग्रि धारण कर, पैदा कर,
व्यापा था जल इधर-उधर, नीचे ऊपर
जगा जोे देवों का एकमेव प्राण बनकर,
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

ऊं!!

सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता, पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक, अतुल जल नियामक रक्षा कर।
फैली है दिशाएं बाहु जैसी उसकी सब में, सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर।
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर..।

( सत्- सत्य/तत्व, अगम- अथाह,  हवि -हवन)

















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Sunday, 21 September 2014

क्या है विक्रम सम्वत और क्यों है भारतीय पंचांग अंग्रेजी कैलेण्डर से बेहतर ?



विक्रम संवत की शुरूआत उज्जैन के महाप्रतापी राजा विक्रमादित्य ने की थी। उन्होंने राजसत्ता संभालने का शुभारम्भ करने के लिए सृष्टि के पहले दिन अर्थात चैत्रा शुक्ल प्रतिपदा को चुना था। आज से 2069 वर्षों पूर्व वे उज्जैन की राजगद्दी पर बैठे थे और उस दिन की याद में उन्होंने अपने नाम पर विक्रम संवत चलाया था। यह संवत चन्द्रमा की गति (कला) पर आधरित है, इसलिए इसे चन्द्र वर्ष कहा जाता है।

इसे समझने से पहले भारतीय पंचांग को समझना आवश्यक है-


दिन, वार, महीना इत्यादि की जानकारी देने वाले अंग्रेजी कालपत्र को कैलेण्डर तथा भारतीय परम्परा वाले को कालपत्र को ‘पंचांग’ कहा जाता है। पंचांग आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कालपत्र है। इसमें काल की गणना के पांच अंग हैं जिन्हें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण कहा जाता है। इन पांच अंगों के आधार पर काल की गणना किये जाने के कारण भारतीय कैलेण्डर को ‘पंचांग’ नाम दिया गया है।

पंचांग न केवल अंग्रेजी कैलेण्डर के समान किसी दिन विशेष को दर्शाता है, बल्कि खगोलशास्त्र के आधार पर यह उस दिन के पूरे शुभ-अशुभ काल और योग को भी दर्शाता है। पंचांग में बारह मास के एक वर्ष के प्रत्येक दिन का हिसाब सूर्य और चन्द्र की गति पर निधरित किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक महीने में दो पक्ष (लगभग 15.15 दिनों के) होते हैं, जिन्हें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष नाम दिया गया है और एक वर्ष में दो आयन (उत्तरायण और दक्षिणायण) होते हैं। इन्ही दो आयनों में 12 राशियाँ और 27 नक्षत्र भ्रमण करते हैं। भारतीय काल गणना में नववर्ष की शुरुआत प्रकृति के द्वारा मनाये जा रहे नववर्ष से होती है। फाल्गुन मास की समाप्ति के साथ पतझड़ का मौसम समाप्त हो जाता है और वसन्त ऋतु आरम्भ हो जाती है। नये वर्ष के आगमन पर प्रकृति भी सभी पेड़-पौधें को नये पत्ते, फूल और फलों से अलंकृत करती है। पशु-पक्षियों समेत सभी प्राणी भी नववर्षारम्भ पर नयी आशा और उत्साह के साथ अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं।

भारत में मुख्यतः सूर्य और चन्द्र की गति पर आधरित दो अलग-अलग प्रकार से की जाने वाली काल-गणनाएं प्रचलित है। इनके अलावा एक तीसरे प्रकार की काल गणना भी कहीं-कहीं पर की जाती है जो कि नक्षत्रों के आधार पर होती है। चन्द्रमा 27 नक्षत्रों में अपने भ्रमण का एक चक्र लगभग 27 दिनों में पूरा करता है। इसी आधर पर नक्षत्रामास लगभग 27 दिनों का ही होता है। लेकिन तीनो प्रकार की काल-गणना में 12 महिनों के नाम-चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन ही है। भारतीय कालगणना को समझने के लिए पंचांग के पांचों अंगों को जान लेना आवश्यक है-

तिथि- अंग्रेजी महीनों में सामान्यतः 1 से लेकर 30/31 तक की तिथि होती है लेकिन भारतीय पंचांग में 1 से 15 तक की तिथियां ही निर्धरित की गयी है। चन्द्रमा की कला पर आधरित ये तिथियां किसी भी दिन के अंक (क्ंजम) को दर्शाती हैं। ये तिथियां हैं- प्रतिपदा (पहला दिन), द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रायोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा अथवा अमावस्या।

पक्ष और मास- इन पन्द्रह दिनों के समूह को ‘पक्ष’ कहा जाता है। चन्द्रमा जब बढ़ते क्रम में होता है, तब पंद्रहवें दिन पूर्णिमा आती है और उस पक्ष को ‘शुक्ल पक्ष’ कहा जाता है। और जब चन्द्रमा घटते क्रम में होता है, तब उसके पन्द्रहवें दिन अमावस्या आती है और वह ‘कृष्ण पक्ष’ कहलाता है। ये दोनों पक्ष मिलकर एक मास बनाते हैं।

वार- पंचांग का दूसरा अंग ‘वार’ है। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार (बृहस्पतिवार), शुक्रवार और शनिवार। ये सात दिन मिलकर एक सप्ताह बनाते हैं और इनमें से प्रत्येक दिन को ‘वार’ कहा जाता है।

हिन्दू पंचांग के द्वारा निर्धरित ये सात वार आज सम्पूर्ण विश्व में उसी दिन, उसी नाम और क्रम में स्वीकृत हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि रविवार के बाद ही सोमवार और इसी क्रम में आगे मंगलवार, बुधवार आदि क्यों आते है? या फिर जिस दिन को भारत में भी रविवार कहा जाता है उसी दिन को सम्पूर्ण विश्व रविवार क्यों कहता है? उस दिन को कोई मंगलवार या सोमवार या फिर अपने-अपने धर्म के अनुसार किसी अन्य नाम से क्यों नही पुकारता? ऐसे प्रश्नों का सीधा सा उत्तर यह है कि प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों ने ग्रहों के भ्रमण की स्थिति के आधार पर इन दिनों को नाम दिया है। यद्यपि यह गणना थोडी़ जटिल है, फिर भी में इसे सरल भाषा में समझा सकता है।

भारतीय ज्योतिष में काल (समय) की गणना सृष्टि के आरम्भ से की गयी है। सृष्टि के आरम्भ का सबसे पहला दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा था और इसी दिन से हमारा नववर्ष आरम्भ होता है। आरम्भ के पहले दिन सभी ग्रह (सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि) मेष राशि (पहली राशि) में थे और उस दिन जब पहला सूर्योदय हुआ था उसी समय से हमारी काल की गणना आरम्भ होती है। इसीलिए भारतीय काल-गणना में दिन आरम्भ सूर्योदय से माना गया है।

एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के समय को ‘अहोरात्रा’ कहा जाता है,जिसका पहला भाग ‘दिन’ और दूसरा भाग ‘रात्रि’ कहलाता है। काल (समय) की गणना करने के लिए दिन और रात्रि के दोनों हिस्सों को 6.6 भागों में बांटा गया है। इस भाग को ‘लग्न’ कहते हैं। और लग्न के आधे भाग केा ‘होरा’ कहा जाता है। इस प्रकार एक
  ‘अहोरात्रा’ में 12 लग्न या फिर 24 ‘होरा’ बनते हैं। इस तरह एक ‘अहोरात्रा’ यानि एक दिन में कुल 24 ‘होरा’ होते हैं। इसी ‘होरा’ को अब घण्टा कहा जाता है। सृष्टि के आरम्भ के पहले दिन सूर्योदय के समय जो सबसे पहला होरा घण्टा आया, उस पहली होरा का स्वामी सूर्य बना था और उसके बाद आने वाली 6 होराओं के स्वामी क्रमशः शुक्र, बुध्, चन्द्रमा, शनि, बृहस्पति और मंगल बनते चले गये। इस प्रकार सूर्योदय से 7 घण्टों की समाप्ति के बाद फिर से उसी क्रम में सभी ग्रह आते जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि 8वीं होरा का स्वामी फिर से सूर्य बना और उसके बाद शुक्र, बुध् आदि ग्रह उसी क्रम में अगली-अगली होराओं के अधिपति बनते जाते हैं। इस क्रम में पहले दिन की 24वीं होरा (पहले दिन का अन्तिम घण्टा) का स्वामी बुध् बना। यहां पहला अहोरात्रा (एक पूरा दिन) समाप्त होता है। पहला दिन सूर्य की होरा से आरम्भ होने के कारण उस दिन को रविवार कहा गया। 24वीं होरा बीतने के बाद उपरोक्त क्रम से दूसरे दिन के प्रथम होरा (सूर्योदय के समय) का स्वामी चन्द्र बनता है। इसी प्रकार पहले दिन सूर्य से आरम्भ होने के बाद प्रत्येक अगले दिन की पहली होरा (घण्टे) के स्वामी क्रमशः चन्द्र, मंगल, बुध्, बृहस्पति, शुक्र और शनि बनते चले गये। यही क्रम आज भी जारी है। इसीलिए इन दिनों के नाम आज भी उस दिन को मिलने वाली पहली होरा के अधिपति (स्वामी) ग्रह के नाम पर जाने जाते हैं।

इस प्रकार वार के दिनों के नामों (रविवार,सोमवार आदि) की देन प्राचीन भारतीय ऋषियों की है। वारों के नाम सूर्योदय के समय पड़ने वाली पहली होरा के अधिपति ग्रह के नाम पर होने के कारण ही भारतीय परम्परा में दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना जाता है न कि रात्रि के बारह बजे के बाद। इसका अर्थ यह है कि सूर्योदय से पहले यदि सोमवार है तो सूर्योदय के बाद मंगलवार हो जायेगा।


नक्षत्र- आकाश में विभिन्न आकार में दिखाई देने वाले तारों के समूह को नक्षत्रा कहते हैं। हमारे सौरमण्डल में इस प्रकार के 27 नक्षत्रा समूह हैं। इन में से प्रत्येक नक्षत्रा में चन्द्रमा लगभग एक दिन रहता है। ये 27 नक्षत्रा निम्नलिखित हैं- अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आद्रा, पुर्नवसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा (फाल्गुन), उत्तरा (फाल्गुन), हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराध, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा(आषाढ़), उत्तरा (आषाढ़), श्रवण, ध्निष्ठा, शतभिषा, पूर्वा (भाद्रपद), उत्तरा(भाद्रपद) और रेवती।

इन्ही 27 नक्षत्रों के नामों के आधार पर हिन्दू पंचांग में महीनों के नाम निर्धरित किये गये है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्रा में रहता है, उसी नक्षत्रा के नाम के आधर पर उस महीने का नामकरण हुआ है।


योग- सूर्य और चन्द्र की विशेष दूरियों को योग कहते हैं। योग 27 होते हैं- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, घृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति। इनमें से कुल 9 योगों विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यातिपात,परिघ और वैधृति को अशुभ माना जाता है और इन योगों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है।


करण- एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। अर्थात एक तिथि में दो ‘करण’ होते हैं। जिन्हें ‘पूर्वार्ध करण’ (पहले का) और ‘उत्तरार्ध करण’ (बाद का) कहा जाता है। ‘करण’ सूर्य और चन्द्रमा के बीच की कोणात्मक दूरी है। यह दूरी प्रत्येक चरण में 6.6 डिग्री में बढती जाती है और यही दूरी (करण) किसी तिथि का निर्धारण करती है। करण 11 हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। इन 11 करणों में से अन्तिम 4 करण (शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न) स्थिर हैं।

पंचांग के ये पांचों अंग मिलकर किसी एक दिन के स्वरूप का निर्धारण करते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। इसलिए तिथि की गणना भी उसी समय से होती है। इसका अर्थ यह है कि जिस तिथि को सूर्योदय नही मिलता, उस तिथि का क्षय माना जाता है। इसीलिये कभी-कभी किसी तिथि को दो बार सूर्योदय मिलने के कारण उस तिथि को दो बार मनाया जाता है और किसी तिथि को सूर्योदय न मिलने के कारण उस तिथि को छोड़ दिया जाता है।

Monday, 12 May 2014

सुपरमार्केट के एन्ट्री गेट से लेकर बिलिंग काउन्टर तक, हर कदम पर फैला होता है ग्राहकों को फंसाने के लिए बुनी गईं मनोवैज्ञानिक तरकीबों का जाल जिससे आप ज्यादा से ज्यादा खरीददारी करने के लिए प्रेरित हो सकें... सुपरमार्केट के लुभावने ऑफर्स और कस्टमर फ्रेंडली माहौल के पीछे का कड़वा सच...






आपके साथ कई बार ऐसा होता होगा ना, जब आप कुछ निश्चित राशि लेकर, और घर के सामान की लिस्ट बनाकर विशाल, बिग बाज़ार, सस्ता बाज़ार, ईज़ी डे या रिलायंस जैसे सुपरमार्केट जाते हैं.., और जब वापस आते हैं तो बहुत सारे पैसे खर्च करके बहुत सारी चीज़े खरीद लाते हैं। आटा लेने जाते हैं, लेकिन साथ में चिप्स, बटर, चॉकलेट्स, मैगी और सूप खरीद लाते हैं। 200 रुपए का सामान लेने जाते हैं और 2000 रुपए का सामान लेकर आ जाते हैं.. और जब कोई आपसे पूछता है कि तुम तो केवल दालें लेने गए थे, इतना सारा सामान कैसे ले आए, तो आप कहते हैं कि यार ऑफर में सस्ता मिल गया आगे काम आ जाएगा...।

 यकीन जानिए ऐसा करने वाले आप अकेले नहीं, अगर आप अपने जानने वाले मित्रों से पूछेंगे तो वो भी यहीं कहेंगे कि उनके साथ भी कुछ ऐसा ही होता है वो खरीदने कुछ और जाते हैं और खरीद कुछ और लाते हैं या फिर जितना सोच कर जाते हैं उससे दोगुना-चौगुना खर्च करके आते हैं।
इसे हम इम्पल्सिव बाइंग या हिन्दी में कहें तो प्रेरित या जल्दबाज़ी की खरीददारी कहते हैं। यह वो खरीददारी है, जिसके बारे में आपने सोचा नहीं होता लेकिन सुपरमार्केट जाकर वहां के माहौल और ऑफर्स से प्रेरित होकर आप यह खरीददारी कर लेते हैं। भले ही बाद में आप खुद को कोसते रहते हैं कि यार इतने पैसे खर्च हो गए, क्या ज़रूरत थी यह सब सामान लाने की... और अधिकतर समय तो आप सस्ते के लालच में ऐसा सामान ले आते हैं, जिसका कोई इस्तमाल ही नहीं होता।

पर हम आपको बता दें, इसके लिए खुद को कोसने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। क्योंकि इस तरह की खरीददारी में आपका नहीं उन सुपरमार्केट्स का दोष है जो ग्राहकों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर बेहद बारीकी से ऐसी रणनीतियां बनाते हैं जो सीधे आपकी जेब पर असर करती हैं और आपको ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए यानि इम्पल्सिव बाइंग के लिए प्रेरित करती हैं। आपको पता भी नहीं चलता और आप बड़ी आसानी से ग्राहक की मानसिकता पर असर करने वाली इन चालबाज़ियों का शिकार बन जाते हैं और खुशी-खुशी व्यर्थ की चीज़े या ज्यादा सामान खरीद कर चले आते हैं।
मनोवैज्ञानिक सिंद्धातों पर आधारित यह तरकीबें पूरे सुपरमार्केट का हिस्सा होती हैं। जी हां, आपको जानकर हैरानी होगी कि सुपरमार्केट के चटख एक्सटीरियर से लेकर अंदर सजाए गए उत्पादों के काउंटर, ट्रॉली की उपलब्धता, पीले या लाल रंगों के ऑफर बैनर्स और यहां तक कि वहां का शांत और सुरम्य वातावरण सबकुछ इसी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है जो आपको हर हाल में ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए उकसाता है। याद रखिए पार्किंग लॉट में घुसते ही यह माइंडगेम्स शुरू हो जाते हैं जो बिलिंग काउंटर तक चलते है। हर हिस्सा केवल और केवल इसलिए सज्ज होता है कि आपको पैसे खर्च करने के लिए प्रेरित कर सके।


ये होते हैं ग्राहकों की मानसिकता प्रभावित कर उन्हें खर्चा करने के लिए उकसाने वाले निर्दयी माइंडगेम्स


1-       एन्ट्री गेट यानि रिलेक्सिंग ज़ोन, खरीददारी के लिए जोश भरने वाला ज़ोन- जैसे ही आप सुपरमार्केट में प्रवेश करते हैं आपको ऊपर से ठंडी ताज़ी हवा के झोंके मिलते हैं। यह एयरी डीकम्प्रेशन ज़ोन होता है। प्रवेश द्वार के सामने ही ताज़े खाने के सामान, बेकरी प्रोडक्ट्स या फिर सुगंधित फूलों के काउंटर होते हैं। जो आपको रिलैक्स फील कराते हैं और आपमें सुपरमार्केट से खरीददारी करने के लिए जोश भर देते हैं। आप वहां ज्यादा से ज्यादा रुकना चाहते हैं। ध्यान रखिए आप अभी अभी खरीददारी करने घुसे हैं, आपके पास पैसे भी हैं और अब आपका मूड भी अच्छा हो गया... बस और क्या चाहिए हो गई खरीददारी की शुरूआत।

2-       स्टेटस सिंबल से जुड़ी है सुपरमार्केट की लोकेशन- भारत जैसे देश में जहां लोग सुपरमार्केट से खरीददारी करने को स्टेटस सिंबल मानकर चलते हैं, उनको ठगना और भी आसान होता है। भई कौन नहीं चाहेगा कि अपने पास वाली दुकान से एक एक चीज़ मांग कर लेने की बजाय और दुकानदार से एक एक चीज़ की मूल्य पूछने की बजाय आप को एयरकंडीशन्ड सुपरमार्केट में खुद सामान चुनने और देखने की आज़ादी मिले और फिर ट्रॉली में सामान लेकर पार्किंग तक जाने की तो बात ही और है। मॉल में जाकर खरीददारी करना स्टेटस सिंबल होता है जिसके कारण लोग अपने पड़ौस की सालों पुरानी दुकाने छोड़ कर सब्ज़ी तक सुपरमार्केट से खरीद कर लाते हैं।

3-       पार्किंग लॉट से शुरू हो जाती है मार्केटिंग- अगर आपने कभी ध्यान दिया हो तो जब किसी मॉल में सुपरमार्केट होता है तो अक्सर उसका एक एन्ट्री और एक्जिट गेट पार्किंग से ही होता है। और वहीं सामने सेल और ऑफर्स के चटख रंगों के बैनर लगे रहते हैं जिन्हें आप चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते और वहीं से ये आपके मन में सुपरमार्केट में खरीददारी के लिए प्रेरणा जगाना शुरू कर देते हैं। कई सुपरमार्केट कुछ खास कीमत की खरीददारी पर पार्किंग मुफ्त करने का ऑफर देते हैं। यह भी ग्राहकों को सुपरमार्केट में आने के लिए प्रेरित करने का तरीका होता है। बस आप एक बार किसी तरह यहां पहुंच जाएं, फिर तो आपकी जेब ढीली होनी तय हैं।

4-       बाहरी दीवारें दूर से आकर्षित करने वाले शोख रंगों की और अंदर होता है सौम्य रंग का इंटीरियर- सुपरमार्केट के एक्सटीरियर और इंटीरियर दोनों ही ग्राहकों को लुभाने के हिसाब से तैयार किया जाते हैं। बाहर की तरफ हमेशा चटख या वॉर्म रंग जैसे- लाल, पीले या नीले रंग इस्तमाल किए जाते हैं जो दूर से दिखाई देते हैं, और लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। जबकि अंदर के माहौल को रिलैक्सिंग और खुशनुमा बनाने के लिए सौम्य रंगों का इस्तेमाल किया जाता है जिससे लोग वहां ज्यादा रुकना चाहें। अंदर के काउंटर पर बैनर्स हमेशा पीले या चटख रंगों के होते हैं जिन पर ऑफर्स लिखे होते हैं और आप की नज़र ना चाहते हुए भी उन पर पड़ जाती है।  

5-       ट्रॉली का रोल बहुत अहम् है-  
   सुपरमार्केट में आपकी आसानी के लिए उपलब्ध ट्रॉली वास्तव में आपको ज्यादा शॉपिंग के लिए प्रेरणा देती है। आसानी से आप इसके साथ पूरे मार्केट में घूम सकते हैं, इसमें छोटे बच्चों के बैठने की भी सुविधा होती है, आप पर्स वगैरह भी रख सकते हैं और इसका बड़ा साइज़ आपको इसे पूरा भरने के लिए प्रेरित करता रहता है। आपके हाथ खाली हुए, आप हर चिंता से मुक्त हुए तो बस शॉपिंग करे जाएं।


6-       रोज़मर्रा की चीज़े और दुग्ध उत्पाद रखे जाते हैं आखिरी के काउंटर्स पर- आपके ज़रूरत की महत्वपूर्ण चीज़े, रोजमर्रा का सामान जिसे खरीदने के लिए ही अक्सर आप बिग बाज़ार या रिलायन्स या किसी अन्य सुपर मार्केट जाते हैं, वो दरअसल सबसे आखिरी के कोनों में रखी जाती हैं, ताकि उन तक पहुंचने से पहले आप पूरे सुपरमार्केट का चक्कर लगा सकें, आपकी नज़र में हर ऑफर आ जाए और आप दूसरी चीज़ों की खरीददारी भी कर लें।

7-       आई लेवल पर रखे सामानों का महत्व- सुपरमार्केट में अलग अलग काउंटर्स पर सामान रखने के लिए भी बाकायदा रणनीति बनाई जाती है। इसके लिए आई लेवल का बहुत महत्व होता है। आई लेवल यानि वो ऊंचाई जहां आपकी नज़र सबसे पहले जाती है। वो मसल याद है ना- जो दिखता है, वो बिकता है..। जी हां इसी तर्ज पर सुपरमार्केट आई लेवल को बाई लेवल मान कर चलते हैं। महंगे सामान और ब्रांडेड उत्पाद जिन्हें सुपरमार्केट ज्यादा से ज्यादा बेचना चाहते हैं इन आई लेवल की रैक्स पर रखे जाते हैं जैसे मैगी, जूस, मूस्ली पावर, नए और महंगे उत्पाद आदि। पोषक और अच्छे सामान लेकिन जो कदरन सस्ते हों, वो बीच की रैक्स पर होते हैं। बल्क में सामान सबसे ऊपर और सबसे ज्यादा मांग वाले, कम प्रॉफिट देने वाले और सस्ते सामान नीचे की रैक्स पर या कई बार अन्य ब्रांडेड सामानों के पीछे छिपे रहते हैं। भूलिए मत चलते चलते सबसे नीचे की रैक में से झुक कर सामान निकालना या फिर उनमें सामान ढूंढना अक्सर मुश्किल होता है और लोग अक्सर आई लेवल पर प्रदर्शित सामानों की शानदार पैकेजिंग या ऑफर से प्रभावित होकर उन्हें ही खरीद लाते हैं।


8-       बच्चों के आई लेवल का महत्व- विक्रेताओं के लिए बच्चों के आई लेवल का भी बहुत महत्व हैं। बच्चों के आई लेवल पर अक्सर चॉकलेट, बिस्किट्स, केक्स, खिलौने या अन्य सामान रखे जाते हैं जिन्हें देखकर बच्चे अपने माता-पिता से उन्हें खरीदने की ज़िद करते हैं और उन सामानों की आसानी से बिक्री हो जाती है।


9-       बैनर्स और सैम्पल स्टेशन- कई बार सुपरमार्केट्स में बड़े बैनर्स और सैम्पल स्टेशन लगे होते हैं जो लोगों को नई चीज़ आज़माने और फिर उन्हें खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। एक बार उपभोक्ता की नज़र में एक काउंटर आ जाता है तो वो अपने आप ही अन्य काउंटर और उस पर लिखे ऑफर देखते हुए चलता है और अपने मनमाफिक चीज़ खरीदने की कोशिश करता है। कई बार तो अगर किसी चीज़ की ज़रूरत ना भी हो तो केवल ऑफर्स कारण उपभोक्ता अपने आप उस सामान की ज़रूरत बना लेता है और उसे खरीद लेता है। और अगर वो उस वक्त खरीद ना भी पाएं, तो मनोविज्ञान के तहत वो ऑफर आपके दिमाग में बैठ जाता है और आप उसे कई बार घर जाकर भी भूलते नहीं हैं और अगली बार उसे खरीदने आते हैं या किसी और को उसे खरीदने के लिए भी सलाह दे सकते हैं।


10-   एक्ज़िट गेट और बिलिंग काउंटर है सबसे प्रॉफिटेबल क्षेत्र-  जब आप सुपरमार्केट में घुसे अच्छा माहौल देखकर आपका मूड बन गया और आपने जी भर कर खरीददारी कर ली, लेकिन बिलिंग काउंटर पर जब आप थके हुए होते हैं तो आपको सामने दिखते हैं बहुत सी चॉकलेट्स, चिप्स, स्नैक्स आदि चीज़ों के ऑफर जो आपको लास्ट मिनिट की इम्पल्सिव खरीददारी के लिए प्रेरित करते हैं और आप सोचते हैं कि चलो यह भी खरीद लेते हैं। एक्जिट गेट या पेमेन्ट काउन्टर पर लगी लाइन वाला हिस्सा सबसे प्रॉफिटेबल हिस्सा माना जाता है। यहीं वो जगह है जहां चॉकलेट्स, चिप्स या अन्य कम शेल्फ लाइफ वाले आइटम्स डिस्प्ले में लगे रहते हैं। लाइन में खड़े जब आप बोर हो रहे होते हैं तो इन उत्पादों को देखते और खरीदते हैं। यह पूरी तरह जबरदस्ती की खरीददारी होती है। क्योंकि आप केवल पैसे देने के लिए लाइन में लगे हैं और जितना खरीदना था, खरीद चुके हैं, लेकिन फिर भी इन सामानों को खरीदते हैं।

11-   सुपरमार्केट का साइज़ और भीड़ है महत्वपूर्ण- सुपरमार्केट का साइज़ और उसमें उपस्थित भीड़ भी बहुत महत्व रखती है। ज्यादा भीड़ में लोग कम घूमते हैं और कम सामान खरीदते हैं जबकि कम भीड़ होने पर लोग ज्यादा खरीदारी करते हैं। इसलिए सुपरमार्केट का साइज़ बड़ा होना बहुत ज़रूरी है।

12- चालबाज़ियों से भरे सेल और लुभावने ऑफर्स-  कभी आपने सुपरमार्केट के ऑफर्स पर ध्यान दिया है? यहां अधिकतर सेल लगी होती है या फिर इनके ऑफर इस कुछ इस तरह से होते हैं-
-दो के साथ एक फ्री
-दो चीज़े खरीदने पर तीसरी चीज़ पर 50 फीसदी का डिस्काउन्ट
-2000 रुपए की खरीददारी पर एक किलो चीनी फ्री
-पांच हज़ार रुपए की खरीददारी पर 10 प्रतिशत का एक्सट्रा डिस्काउन्ट
-एक कुर्ता 300 रुपए में जबकि 2 कुर्ते केवल 500 रुपए में...
-एक्सचेंज ऑफर- पुराना लाएं और नए पर 20 फीसदी की छूट पाएं..




अगर आप ध्यान दें तो पाएंगे कि इन सब ऑफर्स पर आपको फायदा तब मिलता है जब आप एक निश्चित रकम खर्च करते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप केवल एक कुर्ता खरीदने आए हैं तो यहां यह ऑफर देखकर कि आप को दो कुर्ते खरीदने पर एक फ्री मिल जाएगा आप दो कुर्ते खरीद लेते हैं। एक किलो चीनी मुफ्त पाने के लालच में ज़रूरत ना होने पर भी 2000 रुपए की खरीददारी कर लेते हैं। सेल के चक्कर में या आगे लाभ लेने के चक्कर में वो सामान खरीद लेते हैं जिसकी आपको ज़रूरत ही नहीं। अगर आप ध्यान दें तो वास्तव में यह ऑफर्स आपको ज्यादा खरीदने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। बचत के चक्कर में आप इन लुभावने ऑफर्स के जाल में फंसकर दरअसल ज्यादा पैसे खर्च करके आ जाते हैं। भूलिए मत इन सुपरमार्केट की सफलता ज्यादा से ज्यादा सामान बेचने पर ही निर्भर है।

12-   संबंधित उत्पाद आस-पास रखे जाते हैं- ग्राहकों को इम्पल्सिव खरीददारी के लिए प्रेरित करने के लिए सुपरमार्केट में एक दूसरे से संबंधित उत्पादों को आस-पास ही रखा जाता है ताकि ग्राहक अगर एक उत्पाद ले तो दूसरा उत्पाद लेने के लिए भी प्रेरित हो जाए। जैसे दूध के पास ही ब्रेड और बटर भी होता है और ग्राहक- अरे यार यह ब्रेड- बटर भी ले लेते हैं, सोचकर वो सामान खरीदते हैं जो वो खरीदने के लिए नहीं आए होते।

13-   शॉपर कार्ड यानि कस्टमर के फिर से आने की गारंटी- एक्जिट काउंटर या बिलिंग काउंटर पर आती है, कस्टमर कार्ड की
बारी। जिसे आपको यह कहकर दिया जाता है कि इसका कोई मूल्य नहीं और इस पर आपको पेबैक प्वॉइन्ट्स या कुछ डिस्काउन्ट मिलेगा। लेकिन याद कीजिए यह डिस्काउन्ट या पेबैक प्वॉइन्ट्स आपको कभी भी उसी समय की खरीददारी पर नहीं मिलते बल्कि अगली बार की खरीददारी के लिए काम आने वाले होते हैं। यानि यह शॉपर कार्ड आपने एक बार ले लिया तो अगली बार ज्यादा डिस्काउन्ट और पेबैक प्वॉइन्ट के लोभ में आपका वहां आना तय है। और एक सबसे ज़रूरी बात जो शायद आप नहीं जानते कि इस शॉपर कार्ड के ज़रिए आपका सारा डेटा कि आपने क्या खरीदा, कितने पैसों का खरीदा समेत आपका मोबाइल नंबर तक कंपनी को उपलब्ध हो जाता है जिसका उपयोग वो आगे मार्केटिंग की रणनीतियां बनाने में करती हैं।


14-   एमआरपी का खेल-  आपने अक्सर सुपरमार्केट के ऑफर्स देखे होंगे कि सामान एमआरपी से कम दामों में उपलब्ध। तो हम आपको बता दें कि बहुत से सामान खासकर खाने-पीने की चीज़े जिनमें दूध या ब्रेड बटर जैसे कुछ उत्पादों को छोड़ दिया जाए, तो वो आपको आपके पड़ौस वाली दुकान पर भी एमआरपी से कम मूल्य में ही मिलते हैं। उत्पाद पर छपी एमआरपी यानि अधिकतम बिक्री मूल्य में सभी का प्रॉफिट जुड़ा होता है। यह किसी भी चीज़ का अधिकतम मूल्य होता है जिससे ज्यादा मूल्य में उस उत्पाद को नहीं बेचा जा सकता, ना कि असली मूल्य। सुपर मार्केट आपको एमआरपी से कम मूल्य में सामान बेचने का लालच देकर असल में तो लोकल दुकानदार से ज्यादा कीमत में सामान बेच देते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आधा किलो सूजी का मूल्य पैकेट पर छपा है 32 रुपए तो लोकल दुकानदार वो बिना आपके कहे आपको 25 से 28 रुपए में दे देगा। जबकि सुपरमार्केट में बैनर पर लिखा होगा- ‘सूजी का मूल्य 32 रुपए, सुपरमार्केट मूल्य 30 रुपए’। और आप बड़ी खुशी-खुशी एमआरपी से दो रुपए कम में सूजी खरीद कर ले आते हैं और खुश होते हैं कि हमने तो सस्ती शॉपिंग कर ली। बल्कि सच तो यह है कि सुपरमार्केट की ऐसी तरकीबों के कारण आजकल अन्य खुदरा दुकानदारों ने भी एमआरपी पर ही चीज़े देनी शुरू कर दी हैं।

15-   कुछ सामानों पर पचास प्रतिशत की छूट लेकिन वैट अलग से- कई बार आपको इस तरह के ऑफर मिलते हैं कि कुछ विशेष सामानों, खासकर कपड़ों पर 50 फीसदी की छूट और नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होता है- वैट अलग से लगेगा। आप तो 50 फीसदी की छूट का लाभ पाने के लिए वहां आ जाते हैं और बहुत सी चीज़े खरीद लेते हैं लेकिन जब बिलिंग होती है तब आपको पता चलता है कि उसमें वैट भी जोड़ा गया है जो एमआरपी पर लिया जाता है। यानि 400 रुपए की चीज़ आपको 50 फीसदी डिस्काउंट के बाद मिली 200 रुपए में, और आपने इतना ही मूल्य समझकर इसे खरीद लिया। लेकिन अब बिलिंग के समय इस पर लगता है वैट, यानि 400 रूपए पर 5 फीसदी... मतलब 20 रुपए। और अब वो चीज़ आपको पड़ती है 220 रुपए की। वैट का यह खेल जब तक आपको समझ में आता है तब तक अक्सर आप बिलिंग काउंटर पर होते हैं और लौटने या सामान वापस रखने की गुंजाइश बहुत कम होती है और आप ज्यादा पैसे अदा करके वो सामान ले लेते हैं। ये कुछ छिपी हुई शर्तें होती हैं जो बिग बाज़ार के लुभावने ऑफर्स के आगे आपको दिखती नहीं।


16-  

जंक सामान पर मिलने वाले वैल्यू प्वॉइन्ट्स का सच- और अब बात करते हैं बिग बाज़ार की एक बहुत बड़ी स्कीम ‘जंक बेचो और सामान खरीदो’ स्कीम की। जिसे लेकर लोग बेहद उत्साहित रहते हैं। पास के कबाड़ी की दुकान से कहीं ज्यादा मूल्य पर बिग बाज़ार में कबाड़ बिकने का लोभ ऐसा होता है कि लोग ढूंढ ढूंढ कर घर से कबाड़ इकट्ठा करते हैं और उसे बेचकर बिग बाज़ार से वैल्यू प्वॉइन्ट्सके कूपन लेकर आते हैं। यह कूपन इस तरह से होते हैं कि कूपन के मूल्य से चार गुना खरीददारी करने पर आपको छूट मिलती है और यह छूट कुछ सामानों पर ही मिलती है। पर अब आप ज़रा देखें, आपने रद्दी वाले को सामान बेचा, आपको तुरंत पैसे मिल गए और आप उनको खर्च करने के लिए आज़ाद हो। लेकिन आपने अपनी कबाड़ बिग बाज़ार में बेचा, आपको पैसे नहीं मिले बल्कि मिले वैल्यू प्वॉइंट्स के कूपन। अप इन कूपन का लाभ भी आपको तभी मिलेगा जब आप चार गुना पैसे और बिग बाज़ार में खर्च करोगे। यानि एक तो आपकी दोबारा बिग बाज़ार में आने की गारंटी हो गई दूसरे यह भी पक्का हो गया कि आपको कूपन का लाभ पाना है तो और ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे.. अब ज़रा सोचिए कबाड़ से असली फायदा कौन कमा रहा है..?  

तो अगली बार जब आप सुपरमार्केट जाएं तो इन चीज़ों को खुद नोटिस करें। अपने मन को काबू में रखें और अपनी जेब ढीली होने से खुद को बचाएं।




Sunday, 9 February 2014

जानलेवा पेंटावैलेंट वैक्सीन???? दो सालों में टीकाकरण के बाद गई 54 बच्चों की जान, आखिरकार पहली बार सरकार ने भी माना पेंटावैलेंट टीकाकरण से जुड़े हैं तीन बच्चों की मौत के मामले



दिसंबर 2011 में भारत के इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम में शामिल की गई फाइव-इन-वन पेंटावैलेंट वैक्सीन के टीकाकरण के बाद अब तक नौ राज्यों में 54 नवजात शिशुओं की जाने जा चुकी हैं। इस जानलेवा टीके के प्रभावों, कारगरता, सुरक्षा और भारत में इसकी ज़रूरत पर सवाल उठाने वाले जन स्वास्थ्य विशेषज्ञो को ‘एंटी वैक्सीन लॉबी’ कहकर खारिज करने वाला स्वास्थ्य मंत्रालय अब खुद सवालों के घेरे में है। पहली बार इन विशेषज्ञों द्वारा पेंटावेलेंट को असुरक्षित कहे जाने की पुष्टि सरकारी जांच में भी हो गई है। जांच में तीन बच्चों की मौत को पेंटावैलेंट टीकाकरण से संबंधित पाया गया है और इनमें से एक मौत का वर्गीकरण तो सीधे ‘वैक्सीन रिएक्शन’ के तौर पर ही किया गया है। अब सवाल यह है कि क्या अब सरकार चेत जाएगी और इस वैक्सीन को देशव्यापी तौर पर शुरू करने से पहले इसकी ठीक से जांच करेगी या फिर 54 नवजातों की मौत, पेंटावैलेंट के दुष्प्रभावों और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञो की चिन्ताओं को दरकिनार करके सिर्फ डब्ल्यूएचओ के दवाब में इस वैक्सीन का प्रयोग जारी रखेगी....

जानलेवा पैंटावैलेंट वैक्सीन – दो साल, नौ राज्य, 54 नवजात शिशुओं की मौत, 135 अस्पताल भर्ती मामले... 

डिप्थीरिया, परटूसिस, टेटनस, हेपेटाइटिस बी और हिब मैनन्जाइटिस बीमारियों से बच्चों को बचाने लिए फाइव-इन-वन पैंटावैलेंट टीका यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (यूआईपी) के तहत 9 राज्यों में नवजात शिशुओं को लगाया जा रहा है। सरकार ने 14 दिसम्बर 2011 को तमिलनाडु और केरल से इसकी शुरूआत की थी। लेकिन इसे शुरु किए जाने के साल भर के अन्दर ही 19 बच्चों की मौत हो गई। इतने बच्चों की मौत और सुप्रीम कोर्ट में पैंटावेलेंट टीके के खिलाफ जनयाचिका दायर होने के बावजूद स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिसंबर 2012 में इसे सात अन्य राज्यों- गोवा, हरियाणा, गुजरात, जम्मू कश्मीर, पुद्दुचेरी, कर्नाटक और दिल्ली में शुरू कर दिया। नतीजा.....पैंटावेलेंट टीके की शुरुआत के बाद अन्य राज्यों से भी नवजात शिशुओं की मौत की खबरें मिलने लगी-

  •  14 दिसंबर 2011 को केरल और तमिलनाडु में पैंटावैलेंट टीकाकरण कार्यक्रम की शुरुआत के अगले ही दिन 15 दिसंबर को केरल में एन्सी नाम की एक बच्ची टीकाकरण के 20 घंटों के अंदर मर गई।
  • दिसंबर 2011 से फरवरी 2013 तक, लगभग एक साल के भीतर ही पेंटावैलेंट टीकाकरण के बाद 19 बच्चों की मौत के मामले दर्ज किए गए और 60 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। 
  • हरियाणा में पैंटावैलेंट दिसंबर 2012 में शुरु की गई थी और इसकी शुरुआत के एक महीने के भीतर ही 9 जनवरी 2013 को झज्जर जिले के जसौर खेड़ी गांव में एक नवजात बच्चे की टीकाकरण के कुछ घंटों बाद मौत हो गई। अब तक हरियाणा में 5 नवजात शिशुओं की जान जा चुकी है। 
  • कश्मीर में पेंटावैलेंट टीकाकरण के बाद सितंबर 2012 से अक्टूबर 2012 तक जीबी पंत अस्पताल में आठ नवजात शिशुओं की मौत दर्ज की गईं। सरकार ने जांच कमेटी भेजी जिसने इन मौतों को सैप्टीसीमिया और निमोनिया के कारण हुई मौत कहकर खारिज कर दिया और वैक्सीन को क्लीन चिट दे दी। हांलाकि इस पर काफी विवाद हुआ और कश्मीर के डॉक्टरों ने पैंटावेलेंट पर रोक लगाने की मांग भी की।
  • पेंटावैलेंट टीकाकरण के दो सालों में अब तक दिल्ली में 3, गोवा में 2, गुजरात में 2, हरियाणा में 5, जम्मू-कश्मीर में 12, कर्नाटक में 6, केरल में 16 और तमिलनाडु में 8 नवजात शिशुओं समेत सात राज्यों के कुल 54 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है जबकि 135 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। 



स्वास्थ्य मंत्रालय ने पहली बार माना पेंटावेलेंट टीकाकरण से जुड़ी है शिशुओं की मौत

हर बार पेंटावेलेंट टीकाकरण के बाद हुई नवजात शिशुओं की मौतों की जांच की गई और हर बार इन मामलों में पेंटावेलेंट की भूमिका को नकार दिया गया। पेंटावैलेंट को सुरक्षित टीका कहकर सरकार ने इसका प्रयोग जारी रखा।
लेकिन पहली बार दिल्ली के संजय शर्मा की आरटीआई के जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय ने जो दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं उनमें स्पष्ट लिखा है कि तीन बच्चों की मौतें पैंटावेलेंट टीकाकरण से जुड़ी हुई हैं। जबकि इनमें से एक मौत का वर्गीकरण सीधे ‘वैक्सीन रिएक्शन’ के तौर पर किया गया है। यह तीनों मामले तमिलनाडु के हैं।
इन दस्तावेजो में बीस शिशुओं की मौत की जांच रिपोर्ट दी गई है। हांलाकि शुरुआती जांच में आठ मामलों को सडन इन्फेन्ट डेथ सिन्ड्रोम (सिड्स) के मामले कहा गया था लेकिन नई रिपोर्ट में सिर्फ एक मामले को सिड्स के अन्तर्गत रखा गया है जबकि सात अन्य मौतों को वर्गीकृत के अयोग्य (अनक्लासिफायबल) श्रेणी में डाल दिया गया है।

यहां हम आपको बता दें कि अनक्लासिफायबल उन मामलों को कहा जाता हैं जिनमें मौत की कारणों की जांच के लिए पूरी जानकारी उपलब्ध ना हो। राष्ट्रीय एईएफआई समिति (National Adverse Events Following Immunisation Committee) जो कि टीकाकरण से होने वाले दुष्प्रभावों की जांच करती है, ने इन 20 मामलो की जांच की थी जिसकी ताज़ी केजुअल्टी असेसमेन्ट रिपोर्ट में भी इन बच्चों की मौत के कारणों और पोस्टमार्टम की जांच के बाद इन्हें वैसोजैनिक शॉक के कारण हुई मौते करार दिया है।

शुरु से सवालों के घेरे में है पेंटावेलेंट वैक्सीन, कोर्ट में भी जारी है इसके खिलाफ लड़ाई
सरकार द्वारा देश भर में पैंटावैलेंट वैक्सीन शुरू किए जाने का फैसला शुरूआत से ही सवालों के घेरे में है। नेशनल टैक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्यूनाइजेशन (NTAGI) ने जब 2010 में इस टीके को तमिलनाडु और केरल में शुरू करने का प्रस्ताव दिया था तब इसी समूह के कुछ सदस्यों समेत भारत सरकार के नीति सलाहकार और एक भूतपूर्व नौकरशाह ने इसका विरोध करते हुए दिसंबर 2010 में इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनयाचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था-
  • यह प्रस्ताव बिना उन आंकड़ों को ध्यान में रखे दिए हैं जो यह बताते हैं कि हिब से होने वाली मैनेन्जाइटिस दरअसल भारतीय बच्चों में विश्व के अन्य देशों से कहीं कम होती है। इसलिए इन बच्चों को हिब का टीका देने की कोई ज़रूरत नहीं है। 
  • उन देशों, जिनमें काफी सालों से पैंटावैलेंट टीके का प्रयोग किया जा रहा है, से मिले आंकड़े बताते हैं कि इससे बच्चों को असल में कोई फायदा नहीं हो रहा है।
  • सरकार ने पहले तो लगभग वो सारी पब्लिक सैक्टर यूनिट्स बंद कर दीं जो डीपीटी, बीसीजी और मीसल्स के टीके बहुत ही कम लागत में तैयार करके उपलब्ध कराती थीं। और इनके बन्द किए जाने के कुछ समय बाद ही सरकार ने नए टीकों को शुरु करने का निर्णय लिया जो कि निजी क्षेत्र द्वारा ही बनाई जाती हैं। 
  • इस टीके का प्रभाव शक के घेरे में है, जिनके साइड इफैक्ट्स हैं और यह बिना किसी ठोस अध्ययन के सिर्फ डब्ल्यूएचओ के दबाव में इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम में जोड़ा जा रहा है। 
  • सरकार को इसे शुरू करने से पहले बिना डीपीटी वैक्सीन के साथ इसे संयुक्त किए, बच्चों पर इसके प्रभाव के बारे में जानकारी लेनी चाहिए और इसकी सुरक्षा की जांच की जानी चाहिए।
बढ़ते दबाव के कारण सरकार को उस समय वैक्सीन शुरू करने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। लेकिन फिर सरकार ने दिसम्बर 2011 से इस वैक्सीन को दक्षिण भारतीय राज्यों तमिलनाडु और केरल में शुरू करने का निर्णय ले लिया। लेकिन शुरुआत के कुछ ही महीनों में पेंटावैलेंट टीकाकरण से हुई मौतों को देखते हुए एक अन्य डॉक्टर योगेश जैन ने भी 2013 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनयाचिका दायर करके इस वैक्सीन प्रतिबंधित करने की मांग की।

डॉ योगेश जैन की याचिका में कहा गया है कि पैंटावेलेंट वैक्सीन के गम्भीर साइड इफैक्ट्स है और यह कनाडा, यूएस, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, यूके और जापान जैसे विकसित देशों में प्रतिबंधित है। वहीं विकासशील देशों में भी पैंटावेलेंट के कारण बच्चों की जाने जा चुकी हैं। भारत सरकार ने इन सारी बातों को अनदेखा करते हुए डब्ल्यू एच ओ और गावी जैसी वैश्विक एजेंसियों के दवाब में पेंटावेलेंट को यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम में शामिल किया है।

डॉ योगेश जैन के वकील ने यह भी दावा किया था कि जितने बच्चों की मौत की रिपोर्ट सरकार के पास है, दरअसल उससे कहीं ज्याद जानें पेंटावेलेंट ले चुकी है और जिन्हें रिपोर्ट नहीं किया गया है। सितम्बर 2013 में इस जनयाचिका पर कार्यवाई करते हुए चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अगुआई वाली पीठ ने केन्द्र और पेंटावेलेंट टीके की निर्माता कंपनी सीरम इन्स्टीट्यूट, पुणे को इस संबंध में नोटिस भी भेजा था।

अन्य देशों में भी जानलेवा साबित हुई है पेन्टावैलेन्ट 



  • श्रीलंका में 2008 में पैंटावैलेंट को शुरू किया गया लेकिन पांच बच्चों की मौत के बाद इसे निलंबित कर दिया गया।
  • जुलाई 2009 में भूटान में इसकी शुरूआत के बाद 9 बच्चों की मौत के मामले सामने आए जिसके बाद इसे इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम से हटा दिया गया। बाद में डब्ल्यूएचओ के समझाने पर भूटान ने दोबारा यह वैक्सीन शुरू की लेकिन इसके बाद फिर से चार बच्चों की मौत हो गई जिसके बाद भूटान में इसका प्रयोग रोक दिया गया।
  • पाकिस्तान में पेंटावेलेंट की शुरूआत होने पर तीन बच्चों की मौत हुई जिनमें से एक स्वस्थ नवजात बच्चा तो टीकाकरण के आधे घंटे के भीतर ही मर गया।
  • वियतनाम में इस वैक्सीन को 2010 में शुरू किया गया था जिसके बाद दुष्प्रभावों के मामले सामने आते रहे। लेकिन 1 अक्टूबर 2012 से 31 मार्च 2013 तक 12 बच्चों की मौत और 9 बच्चों की अस्पताल में भर्ती के बाद मई 2013 में यहां भी पैंटावैलेंट वैक्सीन क्विनवैक्सेम पर रोक लगा दी गई।
दिलचस्प बात यह है कि इन सभी देशों में बच्चों की मौत के मामलों की जांच के बाद वैक्सीन को क्लीन चिट दे दी गई और इसे वापस शुरू कर दिया गया। इसी तरह हर ‘विकासशील’ देश में पेंटावेलेंट टीकाकरण के बाद बच्चों की जान जाने के मामलों की जांच में कभी भी वैक्सीन को दोषी नहीं माना गया। हर बार या तो वो कोइन्सिडेन्टल मृत्यू के मामले थे, या सडन इन्फेन्ट डेथ सिन्ड्रोम के या फिर जानकारी के अभाव में उन्हें अवर्गीकृत कर दिया गया।

देश को हिब वैक्सीन की ज़रूरत ही नहीं

1997-99 में हिब मैनेंजाइटिस के लिए एक कम्यूनिटी बेस्ड स्टडी (मिन्ज़ स्टडी) में यह पाया गया था कि हिब मैनेंजाइटिस के मामले भारत में सिर्फ 0.007 फीसदी होते हैं यानि हर एक लाख बच्चों पर 7 बच्चों में यह बीमारी होती है, जो काफी कम हैं और जिसके लिए पूरी जनसंख्या को हिब का टीका देने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन सरकार ने इस स्टडी को पुरानी कहकर खारिज कर दिया।

पेंटावैलेंट टीके को इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम में शुरू करते वक्त वॉट स्टडी का हवाला दिया गया जो तुलनात्मक तौर पर नई स्टडी थी और जिसमें हिब बीमारी के आंकड़ों को काफी बढ़ाकर प्रस्तुत किया गया था। इसी स्टडी को आधार बनाकर हिब के टीके को भारत में शुरू करने का निर्णय लिया गया। यहां यह बताना ज़रूरी है कि यह स्टडी बिना जनसंख्या आधारित आंकड़ों के की गई थी और इसके लिए वित्तीय अनुदान ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन इम्यूनाइजेशन (गावी) ने दिया था। गावी वही संस्था है जिसने डब्ल्यूएचओ के साथ मिलकर भारत में पेंटावेलेंट टीके का प्रयोग शुरू करने का प्रस्ताव दिया था।


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क्या है पैंटावैलेंट वैक्सीन

भारत सरकार के इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम के अन्तर्गत सरकारी अस्पतालों में नवजात शिशुओं को पहले ओरल पोलियो वैक्सीन के साथ हैपेटाइटिस बी और डीपीटी के टीके लगाए जाते थे। लेकिन लिक्विड पैंटावैलेंट पांच गंभीर बीमारियों से बचाने वाला संयुक्त टीका है जिसमें डिप्थीरिया, परटूसिस, टेटनस, हेपेटाइटिस बी और हिब मैनेंजाइटिस के टीके शामिल हैं।
भारत सरकार ने डब्ल्यूएचओ का प्रस्ताव मानते हुए डीपीटी और हैपेटाइटिस बी की वैक्सीन की जगह इस टीके को अपने युनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम में शामिल करने का निर्णय लिया। इसके पीछे एक तो यह तर्क दिया गया कि चूंकि यह एक संयुक्त वैक्सीन है इसलिए इसके आने के बाद बच्चों को अलग अलग टीकों के इंजेक्शन्स लगाने की बजाय एक ही इंजेक्शन से सारे टीके एक ही बार में लगाए जा सकेंगे और दूसरा यह कि इससे एक और जानलेवा बीमारी हिब मैनेन्जाइटिस से भी भारतीय बच्चों का बचाव हो जाएगा।

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एक था जतिन.... 

दिल्ली की पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) नाम की एक संस्था के सदस्यों ने कश्मीर और हरियाणा में पेंटावेलेंट टीकाकरण के बाद मृत हुए बच्चों के घर जाकर निजी तौर पर उनके परिवारजनों से बात की। इसी महीने 5 फरवरी को संस्था के सदस्य हरियाणा के झज्जर जिले के जसौर खेड़ी जिले में जतिन के परिवार से मिले जिसकी मृत्यू 9 जनवरी 2013 को पेंटावेलेंट टीकाकरण के कुछ ही समय बाद हो गई थी। जतिन के परिवारजनों से उन्हें जो जानकारी मिली वो आपके सामने है, इसे पढ़िए और खुद फैसला लीजिए।
जतिन का जन्म 22 अक्टूबर 2012 को हुआ था। पिता नरेन्दर और मां रितू की दूसरी संतान जतिन का जन्म पूरे नौ महीने के बाद हुआ था और वो पूरी तरह से स्वस्थ शिशु था। जन्म के समय उसका वज़न 2.8 किग्रा था और नियमित रूप से मां के दूध पीने के कारण उसका वज़न बढ़ भी रहा था। 9 जनवरी, 2013, बुधवार के दिन जतिन की मां उसे पास के आंगनबाड़ी केन्द्र में टीका लगवाने ले गई। यहां जतिन को उसी महीने गांव में शुरू किए गये पेंटावेलेंट टीके का इंजेक्शन दिया गया। लेकिन इंजेक्शन लगने के कुछ सेकेन्ड्स बाद ही जतिन अचेत हो गया। परिवार ने सोचा कि टीके के प्रभाव के कारण जतिन सो गया है। वो उसी अवस्था में उसे घर ले आए। लेकिन जब देर रात तक जतिन नहीं उठा तब परिवारजन उसे रोहतक में एक निजी क्लीनिक में ले गए जहां उसे मृत (ब्रॉट डैड) घोषित कर दिया गया।
जतिन की दादी यह बताते हुए रो पड़ती हैं कि कैसे उस दिन टीका लगने से पहले जतिन पूरी तरह से ठीक था और उसमें कोई खांसी, दमा या अन्य बीमारी के लक्षण नहीं दिख रहे थे। वो पूरी तरह से सामान्य था। लेकिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उन्हें यहीं समझाने की कोशिश करते रहे कि जरूर जतिन को पहले से निमोनिया या एंठन रही होगी, और ऐसे में जब उसने वैक्सीन ली तो रिएक्शन के कारण उसकी मौत हो गई...।
जतिन को खोने के बाद परिवारजन वैक्सीन के नाम से इतना डर चुके हैं, कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के बार-बार कहने के बावजूद वो अपने दूसरे दो साल के बेटे को कोई भी वैक्सीन नहीं दिलाना चाहते।

                                                                                                                                                        

वैक्सीन के कारण एक भी बच्चे की मौत स्वीकार्य नहीं....

डॉ जैकब पुलियल, विभागाध्यक्ष, बाल रोग विभाग (पीडियाट्रिक्स), सेंट स्टीफन्स अस्पताल, दिल्ली 
"इन मामलों में सबसे पहले यह स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है कि बच्चों की मौत में पेंटावेलेंट की भूमिका है। तीन मामलों में तो यह साबित हो गया है और बाकी मामलों में भी ठीक से जांच आवश्यक है। पेंटावेलेंट नुकसानदेह है, यह मानना ज़रूरी है। हम वैक्सीन के खिलाफ नहीं है लेकिन बच्चों की सुरक्षा सबसे अहम है। अगर वैक्सीन लगानी ही है तो एक साथ पेंटावेलेंट में ना लगाकर अलग अलग लगाए, डीपीटी लगाएं और हेपेटाइटिस बी और हिब अलग से लगाए ताकि बच्चों की जान की रक्षा हो सके। वैक्सीन ज़रूरी है लेकिन सुरक्षित वैक्सीन जो बच्चों की जान बचाए, ना कि जान लें।"






डॉ योगेश जैन (एमडी) जन स्वास्थ्य चिकित्सक, जन स्वास्थ्य सहयोग, जिला बिलासपुर, छत्तीसगढ़ (पूर्व में – असिस्टेंट प्रोफेसर ऑफ पीडियाट्रिक्स, एम्स, दिल्ली)

"मेरा पहला मुद्दा यह है कि अगर किसी भी टीके को लगाने के बाद 24 घंटे के अंदर कोई बच्चा मर जाता है और आप यह कह देते हैं कि बच्चे को पूर्व में कोई बीमारी थी, या कोई और वजह थी, या उसकी देखभाल में लापरवाही बरती गई जिसके कारण वो मर गया और हमारे पास वैक्सीन को इसका जिम्मेदार मानने का कोई कारण नहीं.., तो यह संतोषजनक उत्तर नहीं है। यह मेरे हिसाब से पूरे के पूरे वैक्सीन कार्यक्रम की असफलता है। दूसरी बात यह कि क्या जन स्वास्थ्य कार्यक्रम में कोई न्यूनतम मृत्यू दर निर्धारित की गई है कि एक लाख बच्चों को वैक्सीन देने पर इतने बच्चों की मृत्यू स्वीकार्य है..., अगर नहीं तो फिर इन बच्चों की मौत के लिए क्या जवाब है? क्यों बच्चों की मौत के बाद भी हम वैक्सीन को सुरक्षित मान रहे हैं और इसका प्रयोग रोक नहीं रहे हैं? मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं वैक्सीन के खिलाफ नहीं हूं। मेरा बस यह कहना है कि वैक्सीन से जान बचनी चाहिए, जानी नहीं चाहिए और जान जा रही है तो इसकी जांच बहुत ज्यादा ज़रूरी है, एक्शन लेना ज़रूरी है।"
                                                                                                                                                          


पेंटावेलेंट के कारण ही हुई हैं मौतें... एक  विश्लेषण

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण से मिले आंकड़ों के मुताबिक पेंटावेलेंट टीकाकरण के बाद 54 बच्चे मर चुके हैं। सबसे ज्यादा -26 बच्चों की मौत वैक्सीन की पहली खुराक के बाद ही हो गई थी, उनसे कम की दूसरी खुराक के बाद (10 बच्चों की) और सबसे कम की तीसरी खुराक के बाद (3) मौत हुई। जबकि बाकी 15 मामलों में दी गई खुराकों की संख्या दर्ज नहीं की गई। 
दिल्ली के सेंट स्टीफन्स अस्पताल के डॉक्टर जेकब पुलियल के अनुसार चूंकि अधिकतर बच्चों की मृत्यू पहली ही खुराक लेने के बाद हुई है, इसलिए इसे संयोग नहीं कहा जा सकता कि इतने सारे बच्चों की मौत टीकाकरण के पहले दिन, पहली खुराक लेते ही हो गई। दवाई की संवेदनशीलता को इससे जोड़कर देखें तो भी यह संयोग नहीं लगता क्योंकि अधिकतर लोग जो दवा के प्रति संवेदनशील होते हैं, वो पहली ही खुराक में प्रतिक्रिया दे देते हैं।

विभिन्न राज्यों में दर्ज एईएफआई के दुष्प्रभाव

अब सवाल यह उठता है कि विभिन्न राज्यों में वैक्सिनेशन के बाद बच्चों की मौत की दरों में इतनी असमानता क्यों है। जनवरी 2013 तक, पेंटावेलेंट की शुरुआत के एक साल बाद तक, केरल में जहां 14 मृत्यू के मामले दर्ज किए गए थे वहीं तमिलनाडु में ज्यादा खुराकें दिए जाने के बावजूद मौत के केवल 4 मामले थे। दूसरे साल वैक्सीन जब 6 और राज्यों में शुरू की गई तब राज्यों के बीच यह असमानता और स्पष्ट दिखने लगी। वैक्सीन की हिमायत करने वाले लोग कहते हैं कि अगर वाकई वैक्सीन खतरनाक है तो ऐसा क्यों है कि गुजरात में लाखों बच्चों को पेंटावेलेंट का टीका लगाए जाने के बावजूद वहां एईएफआई (एडवर्स इवेन्ट्स फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन) के मामले कम हैं और गोवा में ज्यादा हैं जहां कि कम लोगों को वैक्सीन दी गई है?

लेकिन अगर आंकड़ों की समीक्षा की जाये तो दरअसल इसकी वजह राज्यों की शिशु मृत्यू दर से संबंधित है। गोवा, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में निगरानी तंत्र बहुत अच्छा है जहां लगभग सभी शिशुओं की मृत्यू दर्ज की जाती है।


State
Deaths
Babies vaccinated per death
IMR
Goa
2
3829
10
J&K
12
7284
49
Kerala
16
12252
12
Haryana
5
38372
54
Tamil Nadu
8
51823
31
Karnataka
6
75150
45
Gujarat
2
229246
50
Puducherry
0
Data not available

Delhi
3
Data not available


जहां गोवा में टीकाकरण किए हर 3829 बच्चों पर एक बच्चे की मृत्यू हुई वहीं गुजरात में हर 2.3 लाख बच्चों के टीकाकरण पर एक बच्चे की मृत्यू दर्ज की गई। इसका कारण राज्यों की शिशु मृत्यू दर देखकर जाना जा सकता है। यह साफ है कि गोवा और केरल राज्य जिनकी शिशु मत्यू दर 10 और 12 है वहां पेंटावेलेंट की शुरूआत के बाद शिशु मृत्यू दर बढ़ गई और गुजरात जहां कि शिशु मृत्यू दर बहुत ज्यादा है, वहां एईएफआई के मामलों की रिपोर्टिंग बहुत कम हुई है। 
इसलिए अगर पेंटावेलेंट टीकाकरण के बाद होने वाली मृत्यू दर निकालनी है तो गोवा और केरल के मामले देखे जाने चाहिए जहां स्वास्थ्य देख-रेख और रिपोर्टिंग तंत्र अच्छा है। अगर हम गोवा के मामले से भी देखें जहां हर चार हज़ार टीकाकरण किए गए बच्चों पर 1 बच्चे की मृत्यू हुई है तो एक साल में 25 मिलियन बच्चों का टीकाकरण करने पर 6250 बच्चे हर साल मरेंगे।

और अंत में एक महत्वपूर्ण तथ्य- 19-20 नवम्बर 2013 को दिल्ली में ग्लोबल वैक्सीन सेफ्टी इनीशिएटिव की दूसरी मीटिंग की रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील देशों में वैक्सीन के सक्रिय निगरानी अध्ययन की बहुत ज्यादा ज़रूरत है। क्योंकि यहां वैक्सीन का प्रयोग बहुत बढ़ गया है और बहुत सी वैक्सीन्स तो बिना सुरक्षा जांचे केवल विकासशील देशों में ही शुरू की जा रही हैं। 

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