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Saturday, 30 January 2016

जानलेवा पढ़ाई

  • लगातार बढ़ रहे हैं छात्र-छात्राओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले
  • मां-बाप की अपेक्षाओं के चलते गहरे मानसिक दवाब में जी रहे हैं किशोर

  • 2014 में 2403 छात्र-छात्राओं ने फेल होने के डर से मौत को गले लगाया






गाज़ियाबाद के मशहूर कॉलेज से बीटेक कर रही रितुपर्णा की दिनचर्या देखें- सुबह 8 बजे वो सोकर उठती है और 9 बजे तक तैयार होकर, नाश्ता वगैरह करके कॉलेज चली जाती है। लौटते हुए लगभग साढ़े चार-पांच बज जाते हैं। आने के तुरंत बाद रितु खाना खाकर सो जाती है और इसके बाद रात को नौ बजे उठकर सुबह चार बजे तक शांति में पढ़ाई करती है। सुबह चार बजे सोने के बाद वो सीधे आठ बजे स्कूल जाने के समय पर उठती है। इम्तहान के दिनों में यह रुटीन बदल जाता है, कॉलेज से 12-1 बजे तक आ जाने के बाद रितु 5 बजे तक दिन में भी पढ़ाई करती है। 

यहीं नहीं छुट्टी के दिन रितुपर्णा स्पेशल क्लासिस के लिए अपने सर के पास भी जाती है। जब हमने उससे पूछा कि इतनी ज्यादा पढ़ाई करने की क्या आवश्यकता है जबकि यह कोई आईआईटी या मेडिकल की तैयारी नहीं है, तो उसका कहना था कि कॉलेज की पढ़ाई और कोर्स बहुत ज्यादा है। पापा ने इतने पैसे खर्च करके मेरा एडमिशन कराया है। अगर मैं पढ़कर अच्छे नंबर नहीं लाई तो उन्हें खराब लगेगा। और फिर मैं आगे किसी कॉम्पटीटिव एक्ज़ाम में कैसे निकल पाऊंगी...? कैसे उनके सपनों को पूरा कर पाऊंगी? कैसे अपनी पहचान बना पाऊंगी...?  

ऐसा करने और सोचने वाली केवल रितु ही नहीं। यकीनन रितु की तरह आपके आस-पास भी ऐसे ही कितने बच्चे, किशोर होंगे जो अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने ऊपर आपके सपनों और आकांक्षाओं का बोझ लादकर जीना सीख लिया है। पर क्या हर बच्चा यह दवाब झेल पाता है? तब क्या होता है जब वो इस बोझ को ढो नहीं पाते, आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते...और मौत को गले लगा लेते हैं। 

याद है सुपरहिट फिल्म थ्री ईडियट्स फिल्म का वो सीन, जब एक छात्र केवल इसलिए फांसी के फंदे पर झूल जाता है क्योंकि डायरेक्टर उसे फेल कर देते हैं। पढ़ाई का प्रेशर और खासतौर पर एक अच्छे स्कूल में जाने, अच्छा करियर बनाने वाले कोर्स में चुने जाने का मानसिक दबाब इतना ज्यादा है कि बच्चे जो खुद बनना चाहते हैं, वो मां-बाप को बताने से पहले भी उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।

लगभग हर हफ्ते, पंद्रह दिन में हम अखबारों में किसी ना किसी छात्र या छात्रा द्वारा परीक्षाओं/पढ़ाई के दबाब में खुद की जान ले लिए जाने की खबरें पढ़ते हैं। दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इन आत्महत्याओं का सिलसिला और बढ़ जाता है। 

पिछले ही दिनों राजस्थान की कोचिंग नगरी, कोटा ने यहां बड़े पैमाने पर छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के चलते अखबारों के पन्नों पर जगह बनाई थी। साल 2015 में यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की तैयारी करने में जुटे 31 बच्चों ने खुदकुशी कर ली। प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की उम्मीद में यहां की कोचिंग क्लासेज़ में दाखिला लेने वाले कई किशोर व युवा अत्यधिक प्रतियोगी माहौल और कड़े पढ़ाई के रुटीन के चलते गहरे मानसिक दबाब में जीते हैं।

 माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से इस तरह की बातें कहते हुए सुने जा सकते हैं कि- पढ़ लो, मस्ती करने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है.., नेहा को देखा, कितनी होशियार है, एक बार में सीपीएमटी में निकल गई, मेहनत करती है वो, और तुमसे तो उम्मीद लगाना ही बेकार है..., पढ़ लोगे, मेहनत कर लोगे तो अच्छी जगह एडमिशन हो जाएगा, कहीं निकल जाओगे, वरना ज़िंदगी ऐसे ही गुज़र जाएगी...., तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई पर बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं हम, कुछ तो अच्छा रिजल्ट लाके दिखा दो... वगैरह, वगैरह..। 



बच्चों पर इस कदर आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है कि उन्हें पढ़ाई करना और अच्छे नंबर लाना ही ज़िदगी जीने की मकसद लगने लगता है।  


पीयूष वर्मा की कहानी

20 वर्षीय पीयूष (बदला हुआ नाम) ने केवल इसलिए अपनी कलाई काट कर जान देने की कोशिश की क्योंकि वो मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की परीक्षा में एक विषय में फेल हो गया था। तुरंत चिकित्सकीय सहायता ने उसकी जान तो बचा ली लेकिन उसकी मानसिक स्थिति को सामान्य करने के लिए अभी तक काउंसलिंग चल रही है। 

जब पीयूष से इस स्थिति में आने का कारण पूछा गया तो पता चला कि उसने तीन साल तक मेडिकल के एंट्रेस एक्ज़ाम के लिए कोचिंग की थी जिसके बाद उसका डेंटल में सलेक्शन हुआ। काफी डोनेशन देकर उसके डैडी ने उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। उसके परिवारवालों ने उसकी पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च किया था और उनको पीयूष से काफी उम्मीदें थी, ऐसे में जब वो पहली ही साल फाइनल्स में फेल हो गया तो उसकी अपने मम्मी –पापा को फेस करने की हिम्मत नहीं हुई और उसने यह कदम उठाना उचित समझा।

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

गाज़ियाबाद के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर सारंग देसाई का मानना है कि बच्चों को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए आज का प्रतियोगी युग सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके चलते मां-बाप अपने बच्चों से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाते हैं।

 हांलाकि डॉक्टर देसाई यह भी कहते हैं कि आजकल खासकर महानगरों में एक पॉजिटिव ट्रेंड यह उभरा है कि मां-बाप बच्चों केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि उनकी पसंद के और क्षेत्रों में भी जाने का मौका देने लगे हैं। लेकिन यह प्रतिशत काफी कम है। बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है। पर अधिकतर छोटे नगरों के युवा, जिनके मां-बाप अपनी जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाकर उन्हें महानगरों में पढ़ने के लिए भेजते हैं, के ऊपर अपेक्षाओं का दवाब बहुत ज्यादा होता है। 

आजकल की फिल्मों, सीरियल्स, इंटरनेट सभी पर बाज़ारवाद हावी है जिसने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया है। यह बाज़ारवाद हमें ज्यादा खर्चा करने, अच्छे से रहने, अच्छा खाने, अच्छा पहनने और अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने के लिए प्रेरित करता है। यह ज़रूरतें पूरी करने के लिए ज़रूरी है अच्छी नौकरी या वाइट कॉलर जॉब और इसके लिए ज़रूरी है पढ़ाई, बहुत ज्यादा पढ़ाई। ज़ाहिर हैं मां-बाप भी आज के इस बाज़ारवाद और प्रतियोगिता के युग में अपने बच्चे को पिछड़ते हुए नहीं देखना चाहते और उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना। 

अपेक्षाओं का बोझ मां-बाप से होता हुआ कब बच्चों तक पहुंच जाता है, वो समझ भी नहीं पाते और बच्चे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाने के अपराध बोध में दबकर आत्महत्या जैसे कदम उठा 
बैठते हैं।

इस समस्या से निबटने का हल बताते हुए डॉक्टर देसाई कहते हैं कि आज के युग में ज़रूरी यह है कि अपने बच्चों के साथ मित्रवत रिश्ता कायम किया जाए। उन की परेशानियों को सुनकर, उनकी इच्छाओं को सम्मान देकर और उनके सोच पर ध्यान देकर काफी हद तक इस दवाब पर लगाम लगाई जा सकती है।   


आत्महत्या रोकने के लिए हैल्पलाइन चलाने वाली समाज सेवी संस्था आसरा की साइट पर उपलब्ध आंकड़े देखें तो-

  • निमहंस की एक स्टडी के अनुसार भारत के 72 फीसदी छात्र इम्तहान के दवाब को झेलने में असमर्थ हैं।
  • यूनेस्को के अनुसार विश्व के 50 फीसदी बच्चें किसी ना किसी दवाब में बड़े हो रहे हैं।
  •  निमहंस की स्टडी के अनुसार हर 20 आईटी प्रॉफेशनल्स में से एक आत्महत्या करने का मन बनाता है।
  • पिछले पांच सालों में युवाओं के बीच डिप्रेशन 2 फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी तक पहुंच चुका है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्टडी बताती है कि विश्व के हर दस छात्रों में से एक छात्र कड़े दवाब में जी रहा है।

डराते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों की साइट पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि छात्रों में इम्तहान के दबाव चलते मौत को गले लगाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।




  • साल 2014 में भारत में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की जिनमें से 2403 छात्र थे। इन सभी ने परीक्षाओं में फेल होने के कारण या पास होने के दवाब के चलते अपनी जान ली।
  • इम्तहानों के दवाब के चलते आत्महत्या करना, भारतीयों द्वारा आत्महत्या किए जाने के प्रमुख दस कारणों में छठे स्थान पर आ पहुंचा है। यह पिछले साल 1.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा।    
  • चौंकाने वाली बात यह है एक्ज़ाम्स का यह दवाब केवल किशोरों या युवाओं को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी निशाना बना रहा है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी परीक्षा में फेल होना, आत्महत्या करने की तीसरी प्रमुख वजह रही जिसके कारण पिछले वर्ष 163 बच्चों (91 लड़के, 72 लड़कियां) ने आत्महत्या की।
  • आंकड़े बताते हैं एक्ज़ाम के दवाब के चलते आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी का ट्रेंड देखा जा रहा है और यह ट्रेंड देश की मेगा सिटीज़ में ज्यादा देखने को मिल रहा है। 

एक बात हमारी भी सुनें

इतनी सारी बातें लिखने, आंकड़े पेश करने और उदाहरण देने के पीछे हमारा मकसद केवल माता-पिताओं तक यह संदेश पहुंचाना हैं कि अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाब इतना भी मत डालिए कि वो कुम्हला जाएं। जिन बच्चों के बहाने आपने अपनी ज़िंदगी के सपने पूरे करने के सपने देखे हैं, अगर वहीं नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे आप? बाद में पछताने से बेहतर है अभी समझदारी का कदम उठाया जाए। पढ़ाई बच्चों के लिए ज़रूरी है, पर उनकी ज़िंदगी का एकमात्र मकसद नहीं। क्या होगा अगर वो फर्स्ट नहीं आ पाएंगे, प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं निकल पाएंगे, इंजीनियर नहीं बनेंगे, डॉक्टर नहीं बनेगें... शायद सबसे अलग, कुछ छोटा काम करें, लेकिन कम से कम खुश तो रहेंगे। हम नहीं कहते कि आप अपने बच्चों को पढ़ाई और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना छोड़ दें, बस इतनी गुज़ारिश है कि उन पर अपनी आकांक्षाओं और कड़े नियमों का इतना बोझ ना लादें कि उन्हें पर फैलाने की जगह ही ना मिलें।  

Sunday, 21 September 2014

ठंडी मौत...? कोल्ड ड्रिंक्स के रूप में धीमा ज़हर पी रहे हैं आप...


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- हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ की स्टडी से पता चला है कि अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स केवल मोटापा ही नहीं बढ़ाते बल्कि जान के दुश्मन भी हैं। मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन पूरे विश्व में हर साल लगभग पौने दो लाख (1,80000) लोगों की मौत का कारण बनता हैं। इनके सेवन के चलते हर साल लगभग एक लाख तैंतीस हज़ार लोग डायबिटीज़ के शिकार होकर, लगभग 6000 लोग कैंसर का शिकार होकर और लगभग 44,000 लोग दिल की बीमारियों का शिकार होकर मर जाते हैं। इस स्टडी के परिणामों को अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की मीटिंग में प्रस्तुत किया गया था। (डेली मेल यूके की 19 मार्च 2013 की रिपोर्ट)

-छत्तीसगढ़ स्थित दुर्ग, राजनन्दगांव और धमतारी जिलों के किसान बताते हैं कि वो अपने चावल के खेतों को कीटों से बचाने के लिए पेप्सी और कोक का इस्तमाल कर चुके हैं जो कि एक सफल प्रयोग साबित हुआ है। किसानों के अनुसार पानी में मिलाकर कोक और पेप्सी का फसल पर छिड़काव करना, कीटनाशकों के प्रयोग से कहीं ज्यादा सस्ता और सुलभ पड़ता है और इससे कीटों से फसल का बचाव भी हो जाता है। (बीबीसी न्यूज, 3 नवंबर 2004 की रिपोर्ट http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/3977351.stm )

-कार्बोनेटेड ड्रिंक्स को डायबिटीज़, हायपरटेंशन और गुर्दे की पथरी से जोड़ा गया है। खास तौर से कोला पेय में फॉस्फोरिक ऐसिड होता है जो यूरिनरी बदलाव और गुर्दे की पथरी का कारण बनता है। दिन में दो या ज्यादा कोला पीने से क्रॉनिक किडनी की बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। रेगुलर कोला और आर्टीफिशियल स्वीटनर वाली कोला दोनों से एक जैसे परिणाम मिलते हैं। (अमेरिकी चिकित्सा शोध पत्रिका पबमेड में 18 जुलाई, 2007 को प्रकाशित, http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/17525693?ordinalpos=1&itool=EntrezSystem2.PEntrez.Pubmed.Pubmed_ResultsPanel.Pubmed_DefaultReportPanel.Pubmed_RVDocSum )

-डेली एक्सप्रेस के मुताबिक जो लोग प्रतिदिन इस तरह के ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत तक ज्यादा होती है। शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान पाया कि जो लोग प्रतिदिन डायट ड्रिंक्स पीते हैं उनमें दिल के दौरे या नाड़ी संबंधी रोग होने की आशंका 43 प्रतिशत ज्यादा होती है। अध्ययन में यह भी देखा गया कि जो लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स कम पीते हैं, उन्हें रोजाना पीने वालों के मुकाबले दिल के खतरे कम होते हैं।

-एक स्टडी में यह दावा भी किया गया है कि दिन में एक लीटर या उससे ज्यादा कोल्ड ड्रिंक पीने से पुरुषों की प्रजनन शक्ति घट जाती है।

उपरोक्त सभी खबरें आपकी प्रिय कोल्ड ड्रिंक्स के विरुद्ध किसी भ्रामक प्रचार या अफवाहों का नतीजा नहीं हैं बल्कि प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित खबरें हैं जो बाकायदा शोध के बाद प्रकाशित की गई हैं। जी हां, अगर आप भी कोक, पेप्सी, फ्रूटी, स्लाइस या स्पोर्ट्स ड्रिंक्स के बहुत शौकीन हैं और इन्हें अपने जीवन का अभिन्न अंग बना चुके हैं तो हम आपको बता दें कि आप अपने शरीर को बीमारियों का घऱ बनाने का पूरा इंतज़ाम कर चुके हैं। क्योंकि इन मीठे पेय पदार्थों की शक्ल में दरअसल आप एक धीमा ज़हर खुद-ब-खुद अपनी रगों में पहुंचा रहे हैं। और अगर आपके बच्चे भी इसके शौकीन हैं तो बधाई, आपकी अगली पीढ़ी भी घातक रोगों का शिकार बनने की राह पर कदम रख चुकी है। आप जानना चाहेंगे हम ऐसा क्यों कह रहें हैं, तो पढ़िए यह विस्तृत रिपोर्ट-

-कोल्ड ड्रिंक्स में सोडियम मोनो ग्लूटामेट, ब्रोमिनेटेड बैजिटेबल ऑइल, मिथाइल बेन्जीन और एंडोसल्फान जैसे ज़हर मौजूद होने की भी रिपोर्ट्स मिली हैं।



क्या हैं सॉफ्ट ड्रिंक?
सॉफ्ट ड्रिंक्स नॉन अल्कोहलिक ड्रिंक्स होते हैं अर्थात इनमें अल्कोहल नहीं होता है। इसलिए ये 'सॉफ्ट' होते हैं। सॉफ्ट ड्रिंक्स में कोला, फ्लेवर्ड, वाटर, सोडा पानी, सिंथेटिक फ्रूट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स, स्पोर्ट्स ड्रिंक्स आदि आते हैं।

कोला और कोक जैसे कॉर्बोनेटेड ड्रिंक्स क्या हैं?
वो सॉफ्ट ड्रिंक्स जिनके अंदर कार्बन डाईऑक्साइड गैस होती है, उन्हें कॉर्बोनेटेड ड्रिंक्स कहते हैं। इनमें सभी तरह के सोडा, कोक, कोला, पेप्सी आदि शामिल हैं। 


क्या क्या है आपकी सॉफ्ट ड्रिंक में- कभी किसी सोडा कैन, या सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल पर उसके इन्ग्रीडिएन्ट्स के बारे में पढ़िएगा तो आपको निम्न प्रमुख इन्ग्रीडिएन्ट्स दिखेंगे- 




शुगर (सुक्रोज और कॉर्न सीरप)- 
एक साधारण कोल्ड ड्रिंक की बोतल में अत्यधिक मात्रा में चीनी होती है जो मोटापा, टाइप बी डायबिटीज़ और मैटाबॉलिक सिन्ड्रोम का कारण बनती है। हाई ब्लड प्रेशर, हाई कॉलेस्ट्रॉल और पेट का मोटापा इससे होने वाली अन्य बीमारियां हैं।

एस्पारटेम (aspartame)- यह डाइट सोडा का मुख्य अंश है जो भूख बढ़ाता है। तो अगर आप डाइट सोडा पीकर कैलोरी लेने से बचने की सोच रहे हैं तो हो सकता है कि इसकी वजह से लगने वाली भूख के कारण आप ज्यादा खाना खा लें और ज्यादा कैलोरीज़ ले लें।

कैरेमल कलर- यह कत्थई रंग होता है जिसमें 2-मिथाइलिमाइडोजोल और 4-मिथाइलिमाइडोजोल (2-Methylimidozole & 4- Methylimidozole ) रसायन होते हैं जिन्हें प्रयोगशाला में चूहों के ऊपर प्रयोग के दौरान फेफड़ों, यकृत और थाइरॉइड कैंसर से संबंधित पाया गया है।

सोडियम- डाइट सोडा में मिलाया जाने वाला अत्यधिक सोडियम, स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा देता है।

फॉस्फोरिक ऐसिड
 -कोल्डड्रिंक्स में मौजूद फॉस्फोरिक एसिड सबसे खतरनाक तत्वों में से एक हैं जो हड्डियों की कमज़ोरी और ऑस्टीयोपॉरोसिस का कारण है। कोल्ड ड्रिंक्स में सिट्रिक और फॉस्फोरस एसिड होता है, जिसका ज्यादा सेवन करना सेहत के लिए नुकसानदायक तो होता ही है, साथ ही यह एसिड दांतों के लिए भी नुकसानदायक होता है।

कैफीन- शायद सुनने में आपको अजीब लगे लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स में कैफीन एक प्रमुख तत्व होता है जो बच्चों में सिरदर्द, नींद ना आना, चिड़चिड़ापन आदि तकलीफों का कारण हो सकता है।

फ्लेवर एडीटिव्स- शुगर की मात्रा और सोडे की एसिडिटी के अतिरिक्त फ्रूट ड्रिंक्स में डाले जाने वाले फ्लेवर एडीटिव्स दांतो के इनैमल के खराब होने का कारण बनते हैं।




कीटनाशक- इन कोल्ड ड्रिंक्स में हमारे शरीर के लिए हानिकारक कीटनाशकों की मात्रा निर्धारित मानकों से कहीं अधिक होती है।


सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने पर सौगात में मिलती हैं ये बीमारियां


मोटापा : सॉफ्ट ड्रिंक्स में कैलोरीज और शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसलिए अधिक मात्रा में सॉफ्ट ड्रिंक मतलब मोटापे को निमंत्रण।

टूथ डिके : कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद शुगर एवं एसिड बच्चों के दाँत सड़ने के कई कारणों में से एक हैं। इन ड्रिंक्स में मौजूद एसिड दाँतों के इनेमल को धीरे-धीरे गला देता है।  

हड्डियों को कमजोर करना : कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद फॉस्फोरिक ऐसिड के कारण बच्चों की हड्डियों से कैल्शियम बाहर आता है जिससे उनके बोन्स कमजोर होते हैं। इस ड्रिंक्स में मौजूद अधिक मात्रा में फॉस्फोरस भी कैल्शियम को हड्डियों से बाहर निकालता है जो आगे जाकर ऑस्टियोपॉरोसिस जैसी बीमारी का कारण बनता है।

पेप्टिक अल्सर और पेट के रोग- शीतल पेय पेप्टिक अल्सर को और बढ़ाते है। यदि कोल्ड ड्रिंक्स में मिठास के लिए सैक्रीन का प्रयोग किया गया हो तो यह कैंसर पैदा कर देगा। मधुमेह, जोड़ों के दर्द और उच्च रक्तचाप वालों के लिए कोल्ड ड्रिंक्स बहुत हानिकारक है।

डायबिटीज़, कैंसर और दिल व फेफड़ो के रोग- ऊपर लिखी शोध की रिपोर्ट्स से यह स्पष्ट हो चुका है कि सॉफ्ट ड्रिंक्स इन घातक बीमारियों और कई मामलों में मौत का कारण बनती हैं।

कार्बोनेटेड ड्रिंक्स यानि कार्बन डाई ऑक्साइड के स्त्रोत- हमने बचपन से पढ़ा है कि हमारा शरीर प्राणवायु ऑक्सीजन लेता है और कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित करता है जो शरीर के लिए हानिकारक है। लेकिन इन कार्बोनेटेड ड्रिंक्स के ज़रिए हम कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर में ले जाते हैं। अगर आप महसूस करते हों तो कोला, कोक या पेप्सी पीते हीं एक दम से नाक में जलन का अहसास होता है जो सीधे दिमाग तक जाता है। लेकिन फिर भी उसे अनदेखा करके हम इन कार्बोनेटेड ड्रिंक्स को पीने में आनंद लेते हैं।



संसद की कैंटीन में नही मिलते कोल्ड ड्रिंक्स, लेकिन देश में खूब बिक रहा है यह ज़हर

आपको जानकर हैरानी होगी कि इन कोल्ड ड्रिंक्स में कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल की खबर आने के बाद से काफी समय पहले संसद की कैंटीन में इन कोल्ड ड्रिंक्स को बैन कर दिया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पूरे देश में और खासतौर से शिक्षा संस्थानों की कैंटीन में इनकी बिक्री बदस्तूर जारी है जो युवा पीढ़ी को अपना शिकार बना रही है।

'ठण्डा मतलब टॉयलेट क्लीनर, ठंडा मतलब कीटनाशक !'

-ठण्डे पेयों (कोल्ड ड्रिंक्स) का PH मान 2.4 से लेकर 3.5 तक होता है जो कि एसिड की परिसीमा में आता है, रासायनिक रुप से हम घरों में जो टॉयलेट क्लीनर उपयोग में लाते हैं इसका भी PH मान 2.5 से लेकर 3.5 के बीच होता है इसलिए इन कोल्ड ड्रिंक्स को टॉयलेट क्लीनर के रूप में भी प्रयोग में लाया जा सकता है। सामान्य रुप से पानी का PH मान 7.5 के आस-पास होता है जो हमारे पीने के लिये सर्वोत्तम है।

-पोटेशियम सॉर्बेट, सोडियम ग्लूकामेट, कार्बन डार्इ आक्सार्इड जैसे विष इसमें मिलाये जाते हैं। इसके अलावा मेलाथियान, लिण्डेन, डीडीटी जैसे हानिकारक रसायन भी मिलाये जाते हैं जिसके कारण यह कीटनाशक के रूप में भी काम करता है।

अमेरिकी शोध में सामने आया भारत का हाल-

हमारे देश के बारे में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूवेशन की ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडीज 2010 में कहा गया है कि भारत में 2010 में 95,427 लोगों की मौत की एक बड़ी वजह इन अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन बना। इन मौतों की दर में 1990 की तुलना में 161 प्रतिशत की वृद्धि हुई है 1990 में सॉफ्ट ड्रिंक्स की लत के कारण 36,591 लोगों ने दम तोड़ा था। 2010 पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कोला पीने के आदी लोगों में से 78,017 दिल की बीमारी की वजह से मरे, 11,314 लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स के कारण डायबिटीज के रोगी बन गये जबकि लगभग 6096 कैंसर रोगी बनकर दम तोड़ चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 में 36,591 लोगों की विभिन्न गैर संक्रामक रोगों से मरने का एक प्रमुख कारण अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स थे।

कैसे किया गया था शोध
भारत में 2010 में प्राकृतिक रूप से मरने वाले लोगों के आंकड़े इकठ्ठे किये गये और इसके लिये मौत की वजह की सभी उपलब्ध जानकारियाँ जुटाई गईं असमय मौत के मामलों में उम्र, लिंग और क्षेत्र के विश्लेषण में 67 अलग-अलग रिस्क फैक्टर्स को अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स पीने की आदत से मिलान किया गया और उनकी तुलना 1990 और 2010 के आंकड़ों से की गई। ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मेडिकल जन लैंसेट में में प्रकाशित रिपोर्ट से भी आंकड़े और जानकारियों को इस शोध में शामिल किया गया था। 


कंपनियों ने कहा गलत है रिपोर्ट
हांलाकि इस रिपोर्ट के विरोध में भारतीय कोला कंपनियों के पैरोकार संगठन इंडियन बेवरेज एसोसिएशन ने कहा था कि अति मीठे सॉफ्ट ड्रिंक्स से होने वाली मौतों की रिपोर्ट सही नहीं है इस रिपोर्ट से सिर्फ आम लोगों में भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया है। अब यह बात अलग है ये कंपनियां इस शोध की कोई मज़बूत काट प्रस्तुत नहीं कर पाईं।

अमिताभ बच्चन ने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बन्द किया

अमिताभ बच्चन ने आईआईएम, अहमदाबाद में एक व्याख्यान के दौरान बताया था कि उन्होंने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बंद कर दिया है। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि जयपुर में उनसे एक लड़की ने पूछा था कि जिस सॉफ्ट ड्रिंक को उनकी टीचर ने 'जहर' बताया है, वह उसका विज्ञापन क्यों करते हैं? लड़की के सवाल पर अमिताभ बच्चन निरुत्तर हो गए। लेकिन इस घटना ने उन्हें सोचने को मजबूर कर दिया और इसके बाद उन्होंने सॉफ्ट ड्रिंक का विज्ञापन करना बंद कर दिया- 'लोगों के दिमाग में यह छवि थी...इसलिए मैंने पेप्सी को इंडॉर्स करना बंद कर दिया।' 





आप भी करें यह प्रयोग- अगर आपको हमारी बातों पर यकीन नहीं तो आप खुद घर पर एक छोटा सा प्रयोग करके देखें। कोक या पेप्सी की बोतल लाईए और उसमें थोड़ा सा दूध मिला दीजिए। इसे दो तीन घंटो के लिए ऐसे ही छोड़ दीजिए। दो-तीन घंटों के बाद आप देखेंगे की बोतल की तली में सफेद मोटी कीचड़ जैसी चीज़ जमा हो जाती है जबकि ऊपर विरल और हल्के रंग का पेय दिखने लगता है।साधारण भाषा में कहें तो ऐसा इसलिए होता है कि कोक में मौजूद फॉस्फोरिक एसिड दूध के कैल्शियम को बाहर निकाल देता है। सोचिए ऐसा ही हाल ज्यादा मात्रा में कोल्ड ड्रिंक्स पीने पर शरीर में मौजूद हड्डियों के कैल्शियम का भी होता है। आप इसके बारे में गूगल पर भी पढ़ सकते हैं।


Tuesday, 30 July 2013

शिफ्टिंग के लिए मूवर्स और पैकर्स को सामान सौंप रहे हैं..? ज़रा संभल कर, कहीं ये आपको लूट ना लें

अगर आप अपना घर शिफ्ट करने के काम को आसान बनाने के लिए किसी मूवर्स एंड पैकर्स कंपनी की सेवाएं लेने की सोच रहे हैं, तो ज़रा अक्लमंदी से काम लीजिए। अपने मूवर्स और पैकर्स को चुनने और उनसे सेवाएं लेते समय आपने अगर सावधानी नहीं बरती तो कहीं ऐसा ना हो कि आसानी के चक्कर में आप परेशानी में पड़ जाए। पैसे भी गंवाए, सामान से भी हाथ धोना पड़े और मन की शांति भी जाए।
       जी हां ऐसा ही कुछ अनुभव रहा गुड़गांव में जैनपैक्ट में काम करने वाले भास्कर अग्रवाल का। कंपनी के काम से तीन साल के लिए विदेश जा रहे भास्कर ने जाने से पहले जब किराए का घर छोड़कर अपने पैतृक निवास आगरा में सामान शिफ्ट करने की सोची तो उन्हें भी इसके लिए मूवर्स और पैकर्स की सुविधाएं लेना आसान लगा। जस्ट डायल वेबसाइट से तिरुपति बालाजी मूवर्स एंड पैकर्स (पता- प्लॉट नं 1088, सेक्टर 28, द्वारका, फोन- 9313356600 / 9311405834 / 9990673021 / 011-32653508)का नंबर मिला और साढ़े आठ हज़ार में बात फाइनल हो गई। भास्कर बड़े खुश थे कि उनका सामान सुरक्षित आगरा पहुंच जाएगा और उन्हें कोई मेहनत या बेकारी का सिरदर्द भी नहीं लेना पड़ेगा। लेकिन भास्कर को क्या पता था कि उन्होंने आसानी नहीं परेशानी मोल ले ली है।
   शिफ्टिंग के दिन सामान पैक करने से ट्रक में लोड करने के समय तक तो कंपनी से आए जसपाल राना जी का व्यवहार बड़ा मृदु रहा लेकिन जैसे ही सामान ट्क में लोड हो गया राना के तेवर बदल गए। उसने भास्कर को साढ़े ग्यारह हज़ार का बिल पकड़ाया और बोला कि पूरा पेमेंट एडवांस करना पड़ेगा वरना ट्रक आगे नहीं जाएगा। जब भास्कर ने कहा कि बात तो सब मिलाकर साढ़े आठ हज़ार में तय हुई थी तो राना ने बताया  कि वो तो बेसिक खर्चा है बाकी सर्विस टैक्स वगैरह मिलाकर साढ़े ग्यारह हज़ार देना पड़ेगा और इन्श्योरेंस का खर्चा अलग से है। चूंकि सामान ट्रक में लोड हो चुका था, इसके बाद यह बात हुई थी तो भास्कर के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे, लेकिन फिर भी जब उसने राना से सामान वापस उतारने को कहा तो राना ने कहा कि सामान उतारने के पांच हज़ार रुपए लगेंगे। किसी तरह बहसबाज़ी के बाद दस हज़ार रुपए नकद लेकर राना ट्रक चलवाने को तैयार हुआ।

आखिर साढ़े ग्यारह बजे ट्रक आगरा के लिए निकला। गुड़गांव से आगरा 200 किमी है और ज्यादा से ज्यादा शाम पांच बजे तक ट्रक को आगरा पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन ट्रक रात को बारह बजे तक भी आगरा नहीं पहुंचा। जब जब भास्कर ने राना से बात की हर बार उसने बहाना बना दिया कि ट्रैफिक में फंसा हुआ है, पहुंच जाएगा। इसके बाद रात को बारह बजे राना भास्कर को फोन करके कहता है कि ट्रक तो यूपी पुलिस ने पकड़ लिया है। आप अगर पांच-छ हज़ार रुपए देने को तैयार हो तो मैं मामला रफा दफा कर दूं वरना वो लोग रात में ट्रक लूट भी सकते हैं, मेरी जिम्मेदारी नहीं है। 
भास्कर को अब तक समझ में आ गया था कि वो बहुत गलत फंस चुका है। खैर किसी तरह पड़ौस के वकील साहब द्वारा पुलिस की धमकी देने पर राना साहब ने ट्रक छुड़वाने की बात मानी और रात डेढ़ बजे ट्रक घर पहुंचा तो पता चला उसमें किसी दूसरे व्यक्ति का शिफ्टिंग का सामान भी लदा हुआ था। खैर अपना सारा सामान उतरवा कर भास्कर ने उस समय तो ट्रक को रवाना कर दिया पर अगली सुबह जब सामान खोला गया तो पता चला कि गैस का रेग्युलेटर गायब था, दो नई शर्ट्स और घी तेल के डिब्बे गायब थे और सेंटर टेबल का मैगज़ीन ग्लास टूटा हुआ था। भास्कर ने राना जी को भी फोन लगाने की कोशिश की पर अब वो फोन नहीं उठा रहे।
चोट खाने के बाद जब भास्कर ने तिरुपति बालाजी मूवर्स एंड पैकर्स कंपनी के बिल पर छपे सर्विस टैक्स नंबर को गूगल पर डाल कर सर्च किया तो पता चला कि इस कंपनी के खिलाफ पहले ही उपभोक्त फोरम में बहुत सारी शिकायते दर्ज हैं और केस भी चल रहे हैं - http://www.grahakseva.com/complaints/12878/tirupati-balaji-cargo-packers-and-movers-lost-my-goods, http://www.consumercomplaints.in/complaints/tirupati-balaji-cargo-packers-and-movers-c341724.html

मूवर्स और पैकर्स द्वारा मानसिक प्रताड़ना और पैसों व सामान दोनों की बरबादी झेलने के बाद भास्कर ने तो कान पकड़ लिए हैं कि वो अब मूवर्स और पैकर्स के चक्कर में नहीं पड़ेंगे। लेकिन ऐसा करने से फ्रॉड करने वाली कंपनियों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। वो भास्कर जैसे किसी और ग्राहक को परेशान करेंगी। इसलिए बेहतर है कि आप अपनी तरफ से सावधानी बरतें। अपना सामान शिफ्ट करते समय मूवर्स और पैकर्स को जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि अक्लमंदी से चुने। वरना आपको भी भास्कर की तरह कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ सकता है।

मूवर्स एंड पैकर्स चुनते समय ध्यान रखें
  • अगर आप जस्ट डायल से मूवर्स एंड पैकर्स चुन रहे हैं, तो उनकी साइट पर पंजीकृत किसी कंपनी का नाम ही चुने। पॉप अप विंडो में आने वाले विज्ञापनों से बच कर रहे, इनसे अपना मूवर्स एंड पैकर्स बिल्कुल ना चुने। अधिकतर फ्रॉड कंपनिया इसी तरह पॉप विंडो से विज्ञापन करती हैं।
  •  जस्ट डायल में हर कंपनी के आगे ग्राहको की रेटिंग भी दी हुई है, बेहतर हो कि पहले आप वो रेटिंग देख लें। अगर रेटिंग अच्छी है तभी उस कंपनी को चुने।
  • एक बार कंपनी का नाम, एड्रेस वगैरह पता चलने के बाद उसे गूगल पर डाल कर देख लें। अगर कंपनी द्वारा किया गया फ्रॉड, या कंपनी कि खिलाफ शिकायत गूगल पर या उपभोक्ता फोरम में होगी तो आपको पता चल जाएगा।
  • कंपनी से पहली बार में ही साफ साफ पैसों के बारे में बात कर ले। इंश्योरेंस, सर्विस टैक्स आदि सब की जानकारी ले लें।
  • शिफ्टिंग के समय सामान पैक करवाने से पहले ही बिल अवश्य मांग ले ताकि आपको भास्कर जैसी परेशानी का सामना ना करना पड़े।
  • अगर लोकल या पास के शहर में ही शिफ्टिंग करनी है तो बेहतर है कि आप अपनी गाड़ी ट्रक के पीछे या उसके साथ ही ले जाएं।
 

Friday, 26 July 2013

चॉकलेट, कैलोग्स और कोल्डड्रिंक्स में मिले कीड़े, बिस्कुट और जैम में फफूंद

   आप कोका कोला और फ्रूटी बड़े मज़े से पीते हैं। कैडबरी की चॉकलेट बहुत स्वाद ले कर खाते हैं, अपने बच्चों को टाइगर और ब्रिटेनिया के बिस्कुट खिलाते हैं और कैलोग्स कॉर्न फ्लेक्स या व्हीट फ्लेक्स आपके लिए सुबह का सबसे सेहत भरा  नाश्ता हैं, तो ज़रा गौर फरमाईए, यह रिपोर्ट आपके लिए आंख खोलने वाली है। इन सभी पैक्ड और डिब्बा बंद चीज़ों में जीवित कीड़े, कीट, तम्बाकू के पैकेट्स और फंगस मिल रही है। नेट पर कन्ज़्युमर फोरम वेबसाइट (http://www.consumerforums.in) पर इस तरह की इसी वर्ष अब तक 14 शिकायते दर्ज की जा चुकी हैं। जिनमें पूरे भारत से लोगों ने इन विभिन्न खाद्य पदार्थों में की़ड़ों से लेकर फंगस, कूड़ा, कांच और स्टेपलर पिन मिलने जैसी शिकायते दर्ज कराई हैं। आपक यह भा बता दें कि इन शिकायतों का ना तो अभी तक उपभोक्ता फोरम में निपटारा हुआ है और ना ही, सम्बन्धित कंपनी ने इस संबंध में कोई कार्यवाही की है।
हमने जब इनमें से कुछ लोगों से संपर्क स्थापित किया तो इन्होंने हमें बताया कि कंपनी में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की। कंपनी की तरफ से सिर्फ इतना कहा गया कि हम आपका सामान बदल देते हैं और अगर आप चाहे तो आपको ज़्यादा सामान दे देते हैं। कुछ कंपनिया यह कह कर मुकर गईं कि सामान एक्सपायरी तारीख के बाद का होगा या जिस दुकानदार की दुकान में वो रखा गया है वहां गंदगी के कारण कीड़े या फंगस इन खाद्य सामानों में पहुंचे होंगे लेकिन एक्सपायरी डेट से पहले का सामान खराब कैसे हो गया और सीलबंद सामानों में कीड़े कैसे चले गए इसका जवाब किसी कंपनी के पास नहीं था।

न्यूट्रिलाइट प्रोटीन पाउडर में कीट

फोरम में दर्ज कई शिकायते तो डराने वाली है जैसे कि अजमल फारुख नामक एम्वे कंपनी के एजेंट ने न्यूट्रिलाइट के प्रोटीन पाउडर में पेस्ट्स यानि कीटों के होने की शिकायत दर्ज की है (http://www.consumerforums.in/pest-in-the-product) ।
 आपको याद दिला दें कि एम्वे वो कंपनी है जो वर्ल्ड क्लास उत्पाद बनाने का दावा करती है। इनकी न्यूट्रिलाइट ब्रांड का यह प्रोटीन पाउडर लगभग 1000 रुपए का आता है और लोग अक्सर इसे अपने बच्चों के लिेए खरीदते हैं जिससे उनके विकास में वृद्धि हो। अब इन कीटों वाले प्रोटीन ड्रिंक को पीकर बच्चे बढ़ेंगे या बीमार पड़ेंगे इसका अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है।

 कैलोग्स में ज़िंदा कीड़े और मैगोट्स

कुछ ऐसा ही उदाहरण कैलोग्स के उत्पादों का है। यह कंपनी खासतौर से सुबह के नाश्ते के लिए स्वास्थयवर्धक सीरिअल्स, कॉर्न फ्लेक्स, व्हीट फ्लेक्स आदि बनाती है। मुंबई की अंजू नाहटा ने जब लोअर परेल स्थित बिग बाज़ार से खरीदे गए कैलोग्स एक्स्ट्रा मूस्ली नट्स सुबह के नाश्ते में खाने के लिए खोले तो उन्हें यह देखकर गहरा झटका लगा कि उसमें कीड़े चल रहे थे। उन्होंने तुरंत ई मेल के ज़रिए कंपनी में शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद कंपनी की तरफ से उनसे माफी मांगी गई और दूसरा डिब्बा दिया गया। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दूसरे पैकेट का भी वहीं हाल था यानि उसमें भी कीड़े थे। (http://www.consumerforums.in/contaminated-cereal-pack) । कैलोग्स के अन्य उत्पादों में भी कीड़े, मैगॉट्स, चींटिया और यहां तक कि प्लास्टिक मिलने तक के मामले सामने आए हैं जिनके बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं- http://www.consumeraffairs.com/food/kelloggs.html

कैडबरी चॉकलेट में कीड़े- 

कैडबरी चॉकलेट बच्चों और बड़ो दोनों को बहुत पसंद होती है। आजकल तो मिठाईयों की जगह भी तीज-त्यौहारों पर चॉकलेट देने का चलन चल पड़ा है, क्योंकि मिठाई में प्रयुक्त मावा कई बार नकली होता है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अमिताभ बच्चन जी भी हर खुशी के मौके पर मुंह मीठा कराने के लिए कैडबरी चॉकलेट खिलाते नज़र आते हैं।  लेकिन स्वास्थ्य के लिेए सुरक्षित और गुणवत्ता से भरपूर मानी जाने वाली चॉकलेट में
अगर आपको कीड़े चलते हुए दिखें तो भी क्या आप इससे मुंह मीठा करना चाहेंगे। जी हां, बैंगलोर की माधुरी जी ने भी जब अपनी पंसदीदा कैडबरी की फ्रूट एंड नट चॉकलेट में कीड़े चलते देखें तो उनके मुंह के साथ दिमाग में भी कड़वाहट भर गई।  ( http://www.consumerforums.in/live-bugs-found-in-cadburys-dairy-milk-roasted-almond)।

 

कोल्डड्रिंक्स में कीड़े, कीट और गुटखे के पाउच

यह फोटो हमें दिल्ली से मिस्टर सुनील पाल ने भेजी है
 
अब बात करते हैं कोल्ड ड्रिंक्स की, जिन्हें सलमान, आमिर और शाहरुख जैसे बड़े-बड़े सितारों  द्वारा बड़े ज़ोर शोर से बेचा जाता है। लेकिन इनकी सीलबंद बोतलों में कई बार लोगों को कोल्डड्रिंक के साथ-साथ कीड़े, गुटखे के पाउच, कूड़े और यहां तक कि फंगस के भी दर्शन होते रहते हैं। कोका कोला और मिनट मेड जूस में कीटाणु (http://www.consumerforums.in/adultrated-drink), http://www.consumerforums.in/foreign-particles-in-minute-maid, मैंगो स्लाइस की बोतल में कीड़ा और गुटखे का पाउच ( http://www.consumerforums.in, स्प्राइट की बोतल में ठोस कूड़ा (http://www.consumerforums.in/solid-waste-material-inside-the-sealed-bottle-of-sprite), और फ्रूटी में कीट पाए जाने जैसी कई शिकायतें लगातार आ रही है। लोग शिकायत भी दर्ज करते हैं लेकिन अफसोस कंपनी की तरफ से कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जाती। बल्कि कई मामलों में तो कंपनी जवाब तक देना ज़रूरी नहीं समझती। हम आपको बता दें कि कोल्डड्रिंक्स में अलग अलग चीज़े मिलने की शिकायतें आपको सबसे ज्यादा दिखेंगी।

बिस्कुट, ब्रैड और जैम में फंगस

बिस्कुट और फ्रूट जैम, ब्रैड वगैरह जो कि बच्चों को ज्यादा पसंद आने वासे खाद्य पदार्थ हैं और ज्यादातर घरों में बच्चो के लिए ही मंगाए जाते हैं में भी स्टेपलर पिन(http://www.consumerforums.in/foul-biscuits-sold), विषाक्त पदार्थ और फंगस (http://www.consumerforums.in/fungus-found-over-mixed-fruit-jam) आदि मिलने के मामले सामने आए हैं।

यहीं नहीं आटा, ब्रांडेड पानी की बोतलें, केक्स आदि में भी कीड़े, फंगस और पॉलीथीन आदि मिलने के कई मामले उपभोक्ता फोरम में दर्ज है जो बताते हैं कि स्वास्थ्यवर्धक सामान बेचने वाली इन बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पाद इतने स्वास्थ्यवर्धक है कि आम जनता तो छोड़ो कीट, कीड़े और फफूंदी भी इन्हें खाकर फल-फूल रहे हैं।

एक आध अपवाद होते हैं, माना जा सकता है कि शायद ग़लती हुई होगी और इन उत्पादों में कीड़े या कूड़ा आ गया लेकिन सवाल यह भी है कि साफ सफाई और हाइजीन की दुहाई देकर लागत से दो सो, ढाई सौ गुना महंगा सामान बेचने वाली और बड़े बड़े सितारों से अपने उत्पादों का विज्ञापन कराने वाली इन कंपनियों के खाद्य पदार्थों में गुणवत्ता मानकों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। क्या इस तरह के सामान बाज़ार में बेच कर यह कंपनिया सरेआम जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं कर रही हैं।
   
 

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...