Thursday, 11 July 2019

वेटिकन की कब्रें खोदकर ढूंढा जा रहा है 36 साल पहले गायब हुई इमैन्युएला को, सुलझने की बजाय और उलझ रही है मिस्ट्री


Truth is stranger than fiction- "सच कहानी से ज़्यादा अजीब होता है"।
दुनिया के सबसे छोटे देश 'वेटिकन सिटी' में मिस्ट्री और थ्रिल से भरी ऐसी ही कहानी घट रही है। यह कहानी है 'इमैन्युएला ऑरलैन्डि' की, जो 36 साल पहले गायब हो गई थी और जिनकी तलाश लगातार नए राज़ सामने ला रही है।
-शुरूआत किरदारों से करते हैं। इमैन्युएला ऑरलैन्डि की कहानी के अहम किरदारों में हैं उनके मरहूम पिता जो वेटिकन चर्च के क्लर्क थे। इमैन्युएला के बड़े भाई 'पीट्रो ऑरलेन्डो' जो फिलहाल साठ साल के हैं और अब तक उनकी खोज जारी रखे हुए हैं और 'वेटिकन सिटी' जिसके आस-पास पूरी इन्वेस्टिगेशन घूमती है।
-इमैन्युएला का पूरा परिवार वेटिकन सिटी में रहता था। 22 जून 1983 को 15 साल की इमैन्युएला, सेंट्रल रोम में म्यूज़िक क्लास लेने गई थी। और कभी नहीं लौटी।
-वेटिकन सिटी से जुड़े परिवार का मामला था लिहाजा बड़े स्तर पर खोज की गई। हालांकि वेटिकन अथॉरिटीज़ ने जांच में ज़्यादा सहयोग नहीं दिया। इमैन्युएला नहीं मिली।
- इस दौरान ऑरलेन्डि परिवार को बहुत सारे अज्ञात कॉल्स और खत मिले। कभी मानव तस्करी से इमेन्युएला के गायब होने को जोड़ा गया, कभी वेटिकन पुलिस के सेक्स रैकेट से और कभी यह खबर मिली कि वेटिकन सिटी के एक मुजरिम को छुड़ाने के लिए उनका अपहरण किया गया है। विदेशों में भी उनेकी खोज की गई।
-2012 में इटली के मॉबस्टर एनरिको डी पीडिस की कब्र में इमैन्युएला को दफनाए जाने की लीड मिली। इस कब्र को खोदा गया और यहां मिली अस्थियों का डीएनए टेस्ट कराया गया लेकिन वो इमैन्युएला की नहीं निकलीं।
-इसी साल मार्च में पीट्रो को एक क्रिप्टिक लैटर मिला जिसमें एक एन्जल की मूर्ति की फोटो थी और लिखा था कि वहां देखिए जहां यह मूर्ति इशारा कर रही है।
-एन्जल की यह मूर्ति वेटिकन सिटी में सेन्ट पीटर्स बेसिलिका के पीछे बने उस ट्यूटॉनिक कब्रिस्तान में मिली जहां जर्मन और ऑस्ट्रियन राजपरिवार के लोगों को दफनाया जाता है।
- काफी मशक्कत के बाद, वेटिकन अथॉरिटिज़ से आज्ञा लेकर कल इन कब्रों को खोदा गया।

-लेकिन कब्रों को खोदने के बाद मिस्ट्री और बड़ी हो गई। क्योंकि इमैन्युएला की अस्थियां मिलना तो दूर बल्कि उन कब्रों में जो दो जर्मन राजकुमारियां दफन थी, उनके ताबूत भी बिल्कुल खाली पाए गए।
-इस खोज ने यह सवाल और खड़ा कर दिया है कि आखिर वो दो राजकुमारियां जो यहां दफन थी, उनकी अस्थियां और फ्यूनरेरी अर्न कहां गए। (फ्यूनरेरी अर्न मेटल या सिरामिक के बने ढक्कनदार पात्र होते हैं जो दफनाए गए लोगों के साथ रखे जाते हैं। राजकुमारियों की अस्थियों के साथ ये पात्र भी गायब थे।)
- लोग यह भी शक जता रहे हैं कि यह क्रिप्टिक लैटर इसलिए भेजा गया था ताकि खाली कब्रों का राज़ दुनिया के सामने लाया जा सकें। वेटिकन अब इस मामले की जांच कराने की बात कह रहा है।
- 2013 में जब पीट्रो अपनी बहन की खोज में सहयोग की अपील करने के लिए पोप जॉन पॉल द्वितीय से मिले थे तो उन्होंने कहा था कि 'तुम्हारी बहन स्वर्ग में हैं'। हैरान पीट्रो ने इस बारे में पोप से बात करने की काफी कोशिश की कि क्या वो जानते हैं कि इमैन्युएला मर चुकी है और उसके साथ क्या हुआ लेकिन पोप इसके बाद पीट्रो से कभी नहीं मिले।
-अभी तक जो भी इन्वेस्टिगेशन हुई है उसके सारे सिरे वेटिकन सिटी से जुड़ते हैं।
-पीट्रो डिटरमाइन्ड हैं कि वो सच्चाई पता करके रहेंगे। खोज जारी है।
-इस सबके बीच.., इमैन्युएला की मां मारिया आज भी वेटिकन सिटी में ही रहती हैं।

Sunday, 10 March 2019

मेरी दुआएं उनके लिए जिन्होंने नाममुकिन को मुमकिन करने का हौसला दिया.....



आखिरकार चुनावों का ऐलान हो गया है। परीक्षा की घड़ी आ गई है। कयास हम कितने भी लगा लें पर रिज़ल्ट आने से पहले नहीं कहा जा सकता कि टॉपर कौन होगा। इसलिए बात उन बातों की जो कयासों से परे हैं।
2014 में जब नई सरकार सत्ता में आई थी तो उसे चुनने का कारण मनमोहन सरकार की नाकामियां थी, लगातार बढ़ रही अराजकता थी, दिन पर दिन खुल रहे घोटाले थे, बढ़ती महंगाई थी, अपराध और बेरोजगारी का बढ़ता ग्राफ था और देश में जगह-जगह हो रहे बम धमाके थे। पाकिस्तान जब चाहे तब हमें आंखे दिखाता था और हमारे सैनिकों के सिर तक काट कर ले जाता था।
मोदी सरकार सत्ता में आई तो बदलाव आया। आज महंगाई काबू में है, अराजकता पर लगाम है, जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में कहीं कोई बम नहीं फटा। घोटाले नहीं हुए। हां, राफेल स्कैम पर बात करना बेमानी है क्योंकि उसकी सच्चाई सब जानते हैं, भले ही मानें ना। कुम्भ इतने भव्य स्तर पर हुआ। और उसमें सबकुछ हुआ सिवाय भगदड़ में लोगों के मरने के, जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था।
घोटाले करके विदेश में बस जाने के दिन लद गए। अब तो हाल यह है कि लोग विदेश भागने के बाद भी भारत सरकार के डर में जीते हैं। क्रिश्चियन मिशेल तक को भारत ले आए हम। माल्या जो ग्यारह हज़ार करोड़ का कर्ज लेकर भागा था, उससे 13 हज़ार करोड़ वसूल लिए और इसके बावजूद उसके एक्सट्रेडिशन की कोशिशें जारी हैं। नीरव मोदी का बंगला उड़ा दिया। उसकी हालिया हालत देखकर अन्दाजा़ लगाया जा सकता है कि वह अपने बच जाने को लेकर कितना सुनिश्चित है। अपराधियों की आंखों में कानून का यहीं डर तो देखना चाहते थे हम...।
आज पाकिस्तान डरता है हमसे। हां, उन लोगों के भोलेपन पर कुछ नहीं कहना, जिन्हें सर्जिकल स्ट्राइक और अभिनन्दन का ढाई दिन में वापस आ जाना केवल सेना का शौर्य लगता है और जिन्हें इमरान खान की कोशिशों में डर नहीं शान्ति की पहल दिखती है। पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ जाने में भी इन भोलेभाले लोगों को सरकार की नीतियों का हाथ नहीं दिखता।
आज हम बतौर एक देश इस सरकार के नेतृत्व में ना केवल सुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि शक्तिशाली भी मानने लगे हैं खुद को। हमारा लीडर ऐसा है जो जहां जाता है, लोग उसे हाथों हाथ लेते हैं फिर चाहे अमेरिका हो या अरब देश। यहीं तो चाहते थे हम।
यह भी दिक्कत थी हमें कि राजनेताओं के घोटालों में शामिल होने के बावजूद कोई उन पर हाथ नहीं डालता। इस सरकार ने यह भी कर दिखाया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ज़मानत पर है, हैराल्ड हाउस खाली करना पड़ा है। चिदम्बरम और उनके सुपुत्र अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, वाड्रा साहब रोज़ ई़़डी के मेहमान बन रहे हैं।
कश्मीर मुद्दे पर तो ऐसा कड़ा रुख आजतक किसी का नहीं दिखा। अलगाववादी नेता जेल में हैं, और सरकार को आंखे दिखाने वाले राजनेता डरे हुए हैं कि इस सरकार का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब 370 हटा दें। सड़कें बन रही हैं, विकास हो रहा है, और तो और, जिन जिन योजनाओं की इस सरकार में नींव पड़ी, अधिकतर पूरी भी हो चुकी हैं। यहीं तो चाहिए था हमें, हमेशा से अपनी सरकार से....
रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की की जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं।
पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं।
बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है..

Thursday, 3 January 2019

बधाई....???????????


परम्पराएं धर्म की बैकबोन होती हैं। ये वो नियम-कायदे हैं, जिनके कारण वो धर्म, बाकियों से अलग बनता है। और जिन नियमों से किसी को नुकसान नहीं पहुंचता और जो उस धर्म को मानने वालेआराम से मान रहे हैं, उन पर आघात करने का मतलब उस धर्म को आघात पहुंचाना है।
उस वकील नौशाद अहमद खान को बधाई, जिन्होंने लॉर्ड अयप्पा को मानने वाली उन महिलाओं की बेचैनी समझी जो सबरीमाला के दर्शन करना चाहती थीं और जिनकी अगुआई में वकीलों ने पीआईएल फाइल की। हालांकि उनमें एक भी लॉर्ड अयप्पा का भक्त नहीं था या थी।
उस महिला एक्टिविस्ट रेहाना को भी बधाई, जिसने डिवोटी ना होने के बावजूद सबरीमाला मन्दिर तक पहुंचने के लिए 'हिंसक' भक्तों की भीड़ से लड़ाई की।
उन सभी फेमिनिस्टों को भी बधाई, जो शायद कभी भी सबरीमला नहीं जाएंगी लेकिन जिन्होंने अपनी सोशल मीडिया दीवारों के ज़रिए यह जताया कि लॉर्ड अयप्पा के मन्दिर में जाने की अनुमति मिलना, महिला और पुरुषों के बीच इक्वेलिटी लाने के लिए अत्यधिक ज़रूरी है।
बधाई के पात्र वो दो महिलाएं भी हैं, जो अयप्पा डिवोटी तो नहीं हैं लेकिन जिन्होंने महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ी और रात के अंधेरे में गर्भगृह जाकर सैकड़ो वर्षों पुरानी परम्परा तोड़ने की हिम्मत दिखाई।
एक बधाई उन सभी आज़ादख़्याल महिलाओं को भी बनती है, जिन्हें अपने धर्म की पाबन्दियों से तो कोई परेशानी नहीं है लेकिन उन्होंने अयप्पा भक्त महिलाओं के लिए ह्यूमन चेन बनाकर उनकी ईक्वेलिटी की वकालत की।
इस बधाई के महत्वपूर्ण पात्र हैं- केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन साहब। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के प्रति इनकी निष्ठा लाजवाब है। भले ही महिला जज ने ऐतराज जताया था, भले ही कोर्ट में रिव्यू पैटीशन डाली गई थी, भले ही लगातार लॉर्ड अयप्पा के डिवोटी विरोध कर रहे थे, लेकिन इन्होंने अपना सारा ध्यान, राज्य से जुड़े बाकी सारे महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर फॉलो करने में लगाया और चोरी छिपे, रात के अंधेरे में, प्रशासनिक मार्ग से, कैमरे के साथ दो महिलाओं को सबरीमाला के गर्भगृह में ना केवल प्रवेश कराया बल्कि बहुत ही गर्व के साथ अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए वो विडियो भी बाकायदा प्रेस को दिया। इन्होंने कोर्ट के आदेश के ऊपर राज्य में होने वाले कैओज़ की भी चिन्ता नहीं की।
और सबसे ज़्यादा बधाई के पात्र हैं वो 'निष्पक्ष' मीडियाकर्मी जिन्हें वो ह्यूमन चेन तो दिखाई दी जिसमें एक भी अयप्पा डिवोटी नहीं था, लेकिन केरल की लाखों अयप्पा डिवोटी महिलाओं का शान्तिपूर्ण दीप प्रज्वलन वाला विरोध नहीं दिखा। जो इस बात पर खुश हैं कि केरल, जो कि सौ प्रतिशत साक्षरता वाला राज्य है, वहां की दबी कुचली अयप्पा डिवोटी महिलाओं को इन्होंने पुरुषों के बराबर ईक्वेलिटी दिला दी।
मुूबारक, मुबारक, मुबारक, हम इस धर्मनिरपेक्ष देश में जहां सभी अपने अनुसार अपने धर्म को मानने और उसकी परम्पराओं का पालन करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लोगों की धार्मिक सम्प्रभुता को जीवित रख पाए। 

Friday, 23 November 2018

विश्व की सबसे प्रिमिटिव जीवित सभ्यता को अकेला छोड़ दीजिए, क्योंकि यही यह चाहते हैं..


अंडमान निकोबार के इर्द गिर्द बिखरे छोटे-बड़े लगभग 500 द्वीप समूहों में एक है नॉर्थ सेंटीनल आईलैंड। बंगाल की खाड़ी में बसा एक छोटा सा द्वीप जो क्षेत्रफल में मैनहैटेन के लगभग बराबर है। घने दुर्गम जंगलों से भरे और रेतीले तट से घिरे इस नितान्त निर्जन नज़र आने वाले द्वीप के मूल निवासी है सेंटीनल आदिवासी, जो करीब 65,000 सालों से यहां रह रहे हैं।
65,000 सालों का मतलब समझते हैं आप- यानि पृथ्वी पर आए अंतिम हिम युग से भी 35,000 साल पहले से, उत्तरी अमेरिका से मैमथ के गायब होने से 55,000 साल पूर्व और प्राचीन मिस्र के लोगों द्वारा गीज़ा में बनाए गए पिरामिडों से 62,000 साल पहले से सेंटीनल्स, इस द्वीप के निवासी हैं। इन्हें अफ्रीका के प्रथम मनुष्यों का प्रत्यक्ष वंशज माना जाता है। कुछ एन्थ्रोपॉलोजिस्ट इन्हें पाषाण युग का सदस्य मानते हैं।
विश्व की सबसे प्रिमिटिव जीवित इन्सानी सभ्यता ने, विकसित समाज द्वारा इनसे सम्पर्क किए जाने की हर कोशिश को नकारा है। सेंटीनल्स इन कोशिशों का स्वागत तीर और भालों की बौछारों से करते हैं। यह आदिवासी आग तक जलाना नहीं जानते। यह समुद्री मछलियों, जीवों और जंगली फलों को खाते हैं। इनकी भाषा सेंटिनलीज़ हैं जो आस-पास के द्वीप समूहों में रहने वाले अन्य आदिवासियों की भाषा से बिल्कुल अलग है।
माना जाता है कि यहां लगभग 500 आदिवासी रहते हैं, लेकिन यह केवल एक अनुमान है। इसका कोई सही आंकड़ा अभी तक उपलब्ध नहीं है। इनके प्रोटेक्शन के मद्देनज़र भारतीय कानून बनाया गया है जिसके अनुसार इन द्वीप के तीन मील के दायरे तक जाना, इनसे घुलने मिलने की कोशिश करना या फोटो खींचना, गैरकानूनी है। इसकी एक वजह यह भी है कि चूंकि सेंटिनलीज़ हज़ारों सालों से आधुनिक मानव सभ्यता और विकास के चक्र से अछूते रहे हैं, इनमें आधुनिक बीमारियों के प्रति इम्यूनिटी विकसित नहीं हो पाई है, जिसकी वजह से यह आधुनिक समाज के सम्पर्क में आने पर बैक्टीरिया के भी सम्पर्क में आ सकते हैं और साधारण फ्लू या इन्फ्लुएन्ज़ा जैसी बीमारी के वायरस भी इनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
1880 में ब्रिटिश नेवल ऑफिसर मॉरिस विडाल पोर्टमेन ने यहां कॉलोनाइजेशन की कोशिशों के तहत यहां के सेंटिनल आदिवासियों से सम्पर्क करने की कोशिशें की थी। यहां से एक बुज़ुर्ग दम्पत्ति और 4 बच्चों को पकड़ लिया गया। लेकिन पोर्ट ब्लेयर तक आते-आते ही बुज़ुर्ग दम्पत्ति की मौत हो गई। शायद वो आधुनिक मानवों के सम्पर्क में आने के साथ ही पैथोजन्स के सम्पर्क में आ गए थे जिसकी प्रतिरोधक क्षमता नहीं होने के कारण उनकी मौत हो गई। चारों बच्चों को बाद में कुछ उपहार वगैरह देकर वापस इस द्वीप में छोड़ दिया गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश अफसरों ने कभी यहां दोबारा आने की कोशिश नहीं की। 
1967 में भारतीय एन्थ्रोपॉलोजिस्ट टीएन पंन्डित की टीम की इन आदिवासियों से सम्पर्क करने की सारी कोशिशें भी व्यर्थ साबित हुईं। 
1974 में नेशनल ज्योग्राफिक चैनल की टीम यहां एक डॉक्युमेन्ट्री 'मैन इन सर्च ऑफ मैन' के फिल्मांकन के लिए आई थी। लेकिन इस टीम को भी यहां घुसने नहीं दिया गया। आदिवासियों ने इन पर तीरों और भालों की बौछार कर दी,जिनमें से एक तीर डायरेक्टक के पैर में भी लगा था। 
ऐसे और भी कई प्रयास किए गए लेकिन आदिवासियों ने कभी भी सामान्य लोगों से घुलना-मिलना स्वीकार नहीं किया। 
डेली मेल, यूके की रिपोर्ट के अनुसार जॉन एलन चाउ, सारे भारतीय नियम कानूनों को ताक पर रखकर इन लोगों के बीच प्रभु यीशू का प्रचार करने पहुंचे थे। यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने स्थानीय नाविकों को 25,000 रुपए की रिश्वत दी थी। 14 नवम्बर को जब यह यहां पर गए तब एक आदिवासी बच्चे ने इन पर तीर चलाया था जो इनके हाथ में पकड़ी बाइबल पर लगा। लेकिन इस चेतावनी के बाद भी यह फिर वहां पर गए और अंतत: आदिवासियों ने इन्हें मार दिया। चाउ खुद भी यह जानते थे कि उनकी जान को खतरा है, नाविकों के पास छोड़े गए अपने नोट्स में उन्होंने यह सब लिखा है लेकिन फ़िर भी वो यहां जाते रहे। दुख है कि एक असमय, जवान मौत हुई लेकिन यह अनुरोध भी है कि पृथ्वी के इस जीवित इतिहास से छेड़खानी की कोशिश कृपया ना करें। इन्हें अकेला छोड़ दें। क्योंकि यही यह चाहते हैं, और यही हमारे यानि 'सभ्य विकसित समाज' के लिए भी अच्छा है। 
(source- Wikipedia Notes)

Sunday, 14 October 2018

कश्मीरी पन्डितों पर हुए हर अन्याय का दस्तावेज है 'रिफ्यूजी कैम्प'



उनको देखकर मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया।
मुझको देखकर आप भी चुप हैं, अगला नम्बर आपका है।

रिफ्यूजी कैम्प को पढ़ने के बाद एक यहीं ख़याल है जो बार-बार आता है, कि काश उस समय, उसी वक्त सबने साथ मिलकर चन्द आतंकियों के खिलाफ एकजुटता दिखा दी होती तो कश्मीर सही मायनों में सब्ज शादाब होता। ना कश्मीरी पन्डित विस्थापित होते और ना ही वहां के मुसलमान आतंक के ज़हर से भरी फिज़ा में सांस लेने को मजबूर होते। लेखक आशीष कौल, जो कि खुद 1989 में कश्मीर के विस्थापित रहे हैं और जिन्होंने हर मंज़र को अपनी आंखों से देखा है, हर दर्द को महसूस किया है, ने उस समय के हालातों को बेहद सजीवता से  किताब के पन्नों में उतारा है। यह कहानी से ज़्यादा लेखक की भावनाओं का लेखन है।

 रिफ्यूजी कैम्प की कहानी 1984 के कश्मीर से शुरू होती है जब घाटी में अमन का दौर था। कश्मीरी पन्डितों और मुसलमानों के बीच दोस्तियां भी थी औेर मोहब्बत भी। यह वो समय था जब कश्मीरी पन्डित रसूख के साथ वादी में रहते थे। फ़िर सरकार बदली और वक्त भी धीरे-धीरे बदलने लगा। वादी में आतन्कियों की बसावट होने लगी। हालात बदलने लगे। रिश्तों की गर्मी, सर्द पड़ने लगी। खुशी और दोस्ती का दौर कैसे धीरे-धीरे तल्खियों और दुश्मनियों में तब्दील हो गया इसका वर्णन लेखक ने अपने नायक अभिमन्यू की आंखों से किया है। यह कहानी बताती है कि किस तरह सोचे समझे तरीके से शक्तिशाली सत्तासीन ताकतों ने कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पन्डितों को वहां से निकालने की ज़मीन इंच दर इंच तैयार की और आखिरकार लाखों लोगो को उनके घर से बेघर कर दिया गया। उनके अपनों को मार दिया गया, घरों को जला दिया गया और यह सब हुआ सत्ता की छत्रछाया में।

पक्के घरों की शान्त ज़िन्दगी चन्द घन्टों में पीछे छूट गई और ईमानदार, संस्कारी और नफासत पसन्द कश्मीरी पन्डितों के ऊपर शरणार्थी कैम्पों की गन्दी और अव्यवस्थित ज़िन्दगी थोप दी गई। मुस्लिम तुष्टिकरण का शिकार बने कश्मीरी पन्डित अपने घर से तो बेघर हुए ही, सरकार के लिए भी बोझ बन गए। 'रिफ्यूजी कैम्प' कश्मीरी पन्डितों के साथ हुए हर अन्याय का दस्तावेज है।

इस कहानी का नायक कहीं गिरता हैं, कहीं संभलता हैं, कहीं कमज़ोर पड़ता है.. वो कभी सरकार से आस लगाता है तो कभी आम हिन्दुस्तानियों से। जब कहीं आस पूरी नहीं होती तो वो अन्त में खुद ही परिस्थितियों से लड़ने का निर्णय करता है..। उसे समझ में आ जाता है कि उसकी परेशानियों का हल केवल उसके खुद अपने लिए लड़ने में और अपनी ज़मीन को हर हाल में वापिस हासिल करने में है।

आशीष कौल की यह कहानी इसलिए पढ़ना ज़रूरी है ताकि आप आज़ाद भारत में कश्मीरी पन्डितों पर हुई ज़ुल्मों की सच्चाई जान पाए। कश्मीर के इतिहास के उस काले अध्याय से रूबरू हो पाएं जिसे छिपाए रखने की हर संभव कोशिश की गई है। यह जान सकें कि सत्ता के लालच और वोटबैंक के स्वार्थ ने किस तरह इस देश की पीढ़ियां  बरबाद कर दी। यह समझ पाएं कि अपने ही देश में शरणार्थी बनकर जीने का अर्थ क्या होता है। यह किताब कश्मीर के सही इतिहास को भी समझाती है, उन राजनीतिक परिस्थितियों की भी बात करती है जिसकी वजह से बार-बार वादी के हालात बदले और आज तक वहां स्थिरता नहीं आ पाई है।

आशीष कौल की किताब की खासियत यह है कि यह जो हुआ उसे तो सामने लाती है लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी किसी एक के मत्थे नहीं मढ़ती। इसमें सरकार के साथ कश्मीरी पन्डितों और कश्मीरी मुसलमानों की नाकामियों की भी बात की गई है। दोष उनका भी था क्योंकि वो एकजुट होकर इन आतंकवादियों से लड़े नहीं और उनकी चालों का शिकार बन गए। कहानी का अन्त लेखक ने उम्मीद के रूप में गढ़ा है। यह काल्पनिक अन्त कश्मीर समस्या के समाधान का एक रास्ता भी सुझाता है।

इसे पढ़िए, निश्चित तौर पर पढ़िए, उस डरावनी हकीकत से दो चार होने के लिए पढ़िए जिसका ज़िक्र तक नहीं करता कोई।

Monday, 13 November 2017

बहुत हैरान-परेशान करने वाले सवाल पीछे छोड़ता है प्रद्युम्न मर्डर केस


8 सितम्बर 2017 को हुए रयान मर्डर केस की गुत्थी अब सुलझ चुकी है, कातिल मिल गया है और मोटिव भी मिल गया है। लेकिन पूरे देश को हैरान करने वाले इस हत्याकांड के सुलझने के साथ ही बहुत सारे ऐसे सवाल सामने आ खड़े हुए हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करते हैं और एजूकेशन सिस्टम, स्टूडेन्ट्स साइकी और जांच एजेन्सी की ऐसी तस्वीरें सामने लाते हैं जो बेचैन करने वाली हैं।
कातिल छात्र का व्यावहार : इस हत्याकान्ड का सबसे चौंकाने वाला पहलू। एक ग्यारहवीं के छात्र ने केवल इसलिए प्रद्युम्न का गला रेत दिया क्योंकि वो एक्ज़ाम फोबिया से ग्रसित था। उसे टालना चाहता था। वजह तो हैरान करने वाली है ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा आश्चर्यचकित करने वाला है, हत्या को करने का तरीका और इसे अन्जाम देने के बाद छात्र का व्यावहार। उसने प्रद्युम्न को यह कहकर टॉयलेट में बुलाया कि उसे कुछ हैल्प चाहिए, और वहां पीछे से उसका गला चाकू से रेत दिया। वो चाकू जो उसने कुछ दिनों पहले ही खरीद कर रख लिया था। जिसे लेकर वो स्कूल आ रहा था। हत्या के बाद पहले उसने वो चाकू कमोड में फेंका और फ़िर वो पूरी तरह से कूल, नॉर्मल रहकर गार्डनर के पास गया और उसे बताया कि टॉयलेट में ज़ख्मी बच्चा पड़ा है। फ़िर बड़े आराम से उसने एक्ज़ाम दिया और छुट्टी में घर चला गया। पूरी पूछताछ प्रक्रिया के दौरान वो नॉर्मल रहा। कोई रिग्रेट, कोई डर नहीं।और यह छात्र केवल साढ़े सोलह साल का है।
जिन लोगों को यह शक है कि छात्र ऐसा नहीं कर सकता वो ज़रा गुड़गांव स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों (SCRB) के पिछले साल के आंकड़े देख लें, जो यह बताते हैं कि 2016 में हरियाणा में हुए कुल मर्डर्स में से 5 फीसदी, किशोरों द्वारा किए गए (16-18 एज ग्रुप, कुल 55 किशोर)। रेप करने वाले किशोरों का फीसद इससे ज़्यादा है (64 किशोर)। इसके अलावा भी गैंगरेप, किडनैपिंग, डकैती, लूट वगैरह के मामलों में भी बड़ी संख्या में किशोरों को अरेस्ट किया गया है।
मोटिव: हालांकि बहुत से लोग मोटिव को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन साइकॉलिजिस्ट का कहना है (टाइम्स ऑफ इन्डिया रिपोर्ट) कि चूंकि बच्चे के घर में मां-बाप के बीच लड़ाई-झगड़े का माहौल था, वो हिंसा को लेकर न्यूट्रल हो गया था। और जहां तक एक्ज़ाम के प्रेशर का सवाल है, वो तो वाकई बहुत बड़ी चीज़ है, जिस घर में भी बोर्ड परीक्षा देने वाले बच्चे हैं वो इसे आसानी से समझ सकते हैं। पिछले कुछ सालों में खासकर कोचिंग नगरी कोटा समेत देश के कई हिस्सों में एक्ज़ाम/ एन्ट्रेन्स एक्ज़ाम प्रेशर के चलते छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
छात्र एक्स्ट्रीम स्टेप्स उठा रहे हैं, बस इस मामले में एक छात्र ने खुद को नुकसान पहुंचाने की बजाय किसी दूसरे की जान ले ली। बाकी देखते हैं, मामले की जांच जारी है, सच जो भी होगा सामने आएगा।
गुड़गांव पुलिस का रोल: रोचक बात हैं, गुड़गांव पुलिस ने तुरत-फुरत केस सॉल्व करके बस कन्डक्टर अशोक को पकड़ लिया, मर्डर वैपन भी बरामद हो गया और गुनाहगार ने कत्ल किया जाना कुबूल भी कर लिया। और फ़िर सीबीआई की जांच में बात पूरी तरह बदल जाती है। पुलिस द्वारा किसी बेगुनाह को गुनाहगार बनाने का इतना बड़ा और परोक्ष सुबूत दहलाने वाला है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि केवल एक अशोक के अपराधी साबित होने से पूरी ड्राइवर, मेड, सर्वेन्ट्स, कामगारों पर शक का माहौल बन गया। उनके प्रति हम अपने बच्चों में डर बैठाने लगे, हमारे मन में डर बैठ गया।
यह बड़ी जांच का विषय है कि क्यों अशोक ने गुनाह कुबूला और वो चाकू कहां से आया जिससे खून तो नहीं हुआ पर गुड़गांव पुलिस ने उसे बतौर मर्डर वैपन ज़ब्त कर लिया। गुड़गांव पुलिस का यह कहना कि उनकी जांच शुरूआती दौर में थी, इसलिए उनसे गलती हुई, काफी नहीं है। इतनी बड़ी बात को गलती कहकर नहीं टाला जा सकता। पुलिस बहुत सशक्त होती है, औऱ उनमें अपराध और अपराधी को सूंघने की शक्ति होती है, ऐसी गलती पुलिस से होनी सम्भव ही नहीं। इस मामले में गुड़गांव पुलिस पर बड़ा मामला बनना चाहिए, क्योंकि अगर सीबीआई बीच में नहीं आती तो उन्होंने तो अशोक को ही फांसी के तख्ते तक पहुंचा दिया था.. जबकि हमारी माननीय अदालत का आदर्श वाक्य यह है कि भले ही 100 अपराधी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए। यह गम्भीर मामला है, गुड़गांव पुलिस और उन अधिकारियों की पूरी जांच होनी चाहिए जिनके दबाब में यह काम किया गया। ताज़ा खबर यह भी है कि सीबीआई मामले से जुड़े चार पुलिस अधिकारियों की जांच कर रही है।
स्कूल प्रबंधन का रोल: और अब सबसे महत्वपूर्ण बात- स्कूल प्रबंधन का इसमें क्या रोल रहा। इस पर सीबीआई की भी जांच जारी है कि कत्ल के बाद किस किस को फोन किया गया, क्यों सुबूतों को मिटाने, उनसे छेड़छाड़ करने की कोशिश की गई और इसमें और कौन कौन शामिल है। एक बार जांच पूरी होने दीजिए, सीबीआई पर कोई दबाब नहीं रहा, तो इससे जुड़े भी बड़े बड़े नाम सामने आएंगे।

Saturday, 23 September 2017

'दिनकर' का हास्य बोध


हठ कर बैठा चांद एक दिन,
माता से यह बोला
सिलवां दो मां मुझे ऊन का,
मोटा एक झिंगोला।
सन-सन चलती हवा रात भर,
जाड़े से मरता हूं।
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह,
यात्रा पूरी करता हूं।
आसमान का सफर,
और यह मौसम है जाड़े का।
अगर ना हो इंतज़ाम,
दिलवा दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।
बेटे की सुन बात कहा माता ने,
अरे सलोने!
कुशल करे भगवान,
लगे ना तुझको जादू टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है,
पर मैं तो डरती हूं।
कभी एक रूप में ना तुझको,
देखा करती हूं।
कभी एक अंगुल भर चौड़ा,
और कभी कुछ मोटा।
बड़ा किसी दिन हो जाता है,
और किसी दिन छोटा।
घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन,
ऐसा भी करता है।
नहीं किसी की आंखों को तू,
दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही बता,
नाप तेरी किस रोज़ लिवाएं।
सी दें एक झिंगोला,
जो हर रोज़ बदन में आए।

‘चांद का कुर्ता’, रामधारी सिंह दिनकर की विद्रोही और राष्ट्रवादी कवि की छवि से यह कविता बिल्कुल मेल नहीं खाती। कहां “ जो तटस्थ है समय लिखेगा उनके भी अपराध “ और “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जैसी उनकी रचनाएं और कहां यह सुखद बाल कविता।

वीर रस के कवि के रूप पहचान और ख्याति पाने वाले दिनकर का मन बाल कविताएं लिखने में भी रमता था। उनके शिशु गीत, बाल कविताएं बहुत रोचक हैं,  मनोरंजक हैं और तीक्ष्ण हास्य समेटे हैं। इन कविताओं में चांद है, सूरज है, चूहा है, पढ़ाकू मियां हैं और मिर्च का मज़ा भी है।

‘सूरज का ब्याह’ में वो लिखते हैं-
“अगर सूर्य ने ब्याह किया, दस पांच पुत्र जन्माएगा।
सोचो तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा।
अच्छा है सूरज क्वारा है, वंश विहीन, अकेला है।
इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है”।



अब ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’ के अंश देखिए-
“चूहे ने यह कहा, चुहिया छाता और घड़ी दो।
लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वो पगड़ी दो।
दिल्ली मैं देखूंगा, आज़ादी का नया ज़माना,
लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना”।


एक और प्रसिद्ध कविता है उनकी ‘पढ़क्कू की सूझ’
जिसमें वो लिखते हैं-
“एक पढ़क्कू बड़े तेज़ थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे।
जहां ना कोई बात, वहां भी नई बात गढ़ते थे।
एक रोज़ वे पड़े फिक्र में, समझ नहीं कुछ पाए।
बैल घूमता है, कोल्हू में कैसे बिना चलाए?”
  
उनकी प्रेम, श्रृंगार और वीर रस से भरी कविताएं पढ़ते समय, उनके व्यक्तित्व का यह खण्ड बिसरा मत देना। अपनी शब्दकृतियों के बल पर यह छायावादी कवि, “दिनकर” बनकर हिन्दी कविता के आकाश में तब तक दमकता रहेगा जब तक हिन्दी जीवित है, काव्य जीवित है और भावनाएं जीवित हैं। बाकी एक प्रशंसक के रूप में मुझे तो उनके हास्य बोध का ज्ञान उनकी इस प्रसिद्ध कृति से भी होता है जो हमेशा मुश्किलें ढूंढने वाली मनुष्य प्रवृत्ति पर कटाक्ष करती है-  

“रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चांद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है,
उलझने अपनी बना कर आप ही फंसता,

और फ़िर हंसता ना, रोता है”।   

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