Tuesday, 24 March 2020

इनकी ज़िन्दगी का एक ही मकसद है स्वदेशी किस्मों और बीज़ों को बचाना और किसानों को जैविक खेती की तरफ लौटाना- मिलिए भारत की बीजमाता से




‘बीयाने बैंक, कोंभाकणे’.., लाल स्याही से लिखी इस इबारत वाले काठ के दरवाज़े को ठेलते हुए जब आप अन्दर पहुंचते हैं तो कहीं कच्ची मिट्टी के घड़ों में रखी धान की किस्में दिखती हैं, कहीं टांड से लटकी हुए मटर और तोरी की स्थानीय फसलें तो कहीं लकड़ी की अल्मारियों में करीने से सजे कांच के जारों में रखे दालों, सब्ज़ियों, दलहनों, तिलहन और सेम के बीज। जी हां, आप देश के पहले स्वदेशी किस्मों की फसलों के बीज बैंक में हैं।
इस बैंक में 53 तरह की फसलों की 114 स्वदेशी किस्मों के बीजों को पारम्परिक आदिवासी तरीकों से संग्रहित किया गया है। देश के अपनी तरह के इस पहले बैंक के पीछे जो व्यक्तित्व है वो हैं श्रीमती राहिबाई सोमा पोपेरे।

सादी महाराष्ट्रियन साड़ी में दिखने वाली इस महिला किसान ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर जैव विविधता को कायम रखने, स्वदेशी किस्मों को बचाने और स्थानीय लोगों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में अभूतपूर्व काम किया है। यहां के लोग इन्हें बीजमाता कहकर पुकारते हैं। इन्हें वर्ष 2020 के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से भी नवाज़ा गया है।  





54 वर्षीय राहिबाई पोपेरे, अहमदनगर, महाराष्ट्र के गांव कोंभाकणे की निवासी हैं। यह स्थानीय महादेव कोली आदिवासी संप्रदाय से हैं। 17 साल की उम्र में शादी होने के बाद राहिबाई जब यहां आईं तो उनके ससुराल की सात एकड़ भूमि में से केवल 3 एकड़ पर मानसून आधारित कृषि होती थी। बाकी समय परिवार के सदस्य एक चीनी मिल में मजदूरी किया करते थे। राहिबाई ने पारम्परिक तरीके से खेती करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने खेत में ही जलकुण्ड बनाए और यहां सब्ज़िया उगानी शुरू की। इसी दौरान उन्होंने देखा कि लगातार संकरित बीज़ों और रासायनिक खाद की खेती करने के कारण गांव के बच्चों में बीमारियां और कुपोषण के मामले बढ़ रहे हैं। स्थानीय किसान लगातार स्वदेशी किस्मों को छोड़कर संकरित बीजों से खेती कर रहे थे और इसकी वजह से धीरे धीरे स्थानीय किस्में खत्म हो रहीं थी।



बस यहीं से राहिबाई के जीवन को मकसद मिला। उन्होंने बड़े जतन से स्वदेशी बीजों और फसलों को संग्रहित करना शुरू किया और साथ ही जैविक खेती के लिए भी लोगों को प्रेरित करने लगीं। उन्होंने लोगों को रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड्स के खतरे के बारे में भी आगाह करना शुरू किया। शुरूआत मुश्किल थी, लोग उनकी कोशिशों का मज़ाक भी उड़ाते थे, लेकिन जैसे जैसे उन्होंने खुद जैविक खेती के ज़रिए स्वदेशी बीजों से अच्छी उपज लेनी शुरु की, उनकी मेहनत का फल मिलने लगा, आस-पास के लोग भी उनकी मुहिम से जुड़ने लगे। आज आधे से ज़्यादा स्थानीय किसान उनकी जैसी खेती कर रहे हैं।

पोपेरे बताती हैं कि पहले किसान बैंक से उधार लेकर संकरित बीज खरीदते थे। रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड्स भी लेने पड़ते थे। लेकिन हम उन्हें अपने बैंक से इस शर्त पर बीज देते हैं कि उपज के बाद वो दोगुने बीज वापस करेंगे। स्वदेशी बीजों का इस्तमाल करने से रासायनिक खाद की भी ज़रूरत नहीं पड़ती और किसानों की सालाना लगभग 5000 रुपए की बचत होती है।



फसलों की स्थानीय किस्मों को खोजना, उनका रोपण करना, उनके बीजों को इकट्ठा करना, दूसरों को उन्हें बोने के लिए प्रेरित करना और उनके माध्यम से बीजों को फिर से इकट्ठा करना अब उनका जुनून बन गया है। किसान उनके बैंक में स्वदेशी किस्मों के बीजों को लेने और खेती की पारम्परिक तकनीकों को 
समझने के लिए अक्सर आते हैं। 
उनकी देखादेखी आसपास के गांवों के लोगों ने भी इस तरह को सीड बैन्क्स शुरू किए हैं। कई संस्थाएं भी उनकी सहायता के लिए आगे आई हैं। राहिबाई किसानों और छात्रों को बीच चुनने, मिट्टी की उपज बढ़ाने के तरीके और पेस्ट मैनेजमेन्ट के तरीकों के बारे में प्रशिक्षित भी करती हैं। 

अशिक्षित होने के बावजूद अपनी लगन और मेहनत के चलते राहिबाई ने एग्रोबायोडाइवर्सिटी, जंगली खाद्य स्त्रोतों और पारम्परिक कृषि के तरीकों के बारे में सीखा हैं। उन्होंने लगभग 50 एकड़ की भूमि को संरक्षित करके उसमें 17 तरह की विभिन्न फसलों को उगाने में सफलता पाई है। साथ ही घर के पिछवाड़े एक किचिन गार्डन भी स्थापित किया है। जिसमें 32 अलग- अलग फसलों की 122 किस्में हैं। पोपेरे अब तक अहमदनगर के 3500 किसानों को फसलों की विविधता और जंगली खाद्य स्त्रोतों को संरक्षित रखने इसका प्रशिक्षण दे चुकी हैं। आदिवासी परिवारों की खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राहिबाई 25,000 घरों में किचिन गार्डन बनाने की योजना पर काम कर रही हैं।

‘हर इंसान खुद ही अपनी ज़िन्दगी का निर्धारक है’ में विश्वास करने वाली पोपेरे का नाम बीबीसी की 2018 की टॉप 100 महिलाओं में शामिल हैं साथ ही उन्हें 2019 के नारी शक्ति सम्मान से भी सम्मानित किया गया है।                                                       



Saturday, 21 March 2020

मिलने आना वक्त....


कभी गुज़रने से फुरसत मिले तो मिलने आना ए वक्त
कितनी बातें तुमको बतानी है,
बहुत से अहसानों का शुक्रिया अदा करना है।
वो उलझे हुए प्रश्नों का जवाब जो तुमने दिया है,
वो अहसासों का सही मतलब जो तुमने समझाया है,
जो घाव भरे हैं,
जो मरहम लगाए हैं
और जो रस्सी की ऐंठन सी लगी मुश्किलों को अपने गुज़रने के साथ सुलझाया है,
सभी के लिए तो धन्यवाद कहना है।

तुम्हारे साथ चलते चलते ही तो जाना है कि गलतियां कितनी खूबसूरत होती हैं,
नादानियां कितनी दिलकश होती हैं,
और शैतानियों की फितरत कुछ ऐसी होती है कि वो पहले तंग करती हैं और फ़िर चेहरे पर मुस्कान लाने का सबब बन जाती हैं।
तुम्हे दोस्त बनाने का, तुमसे गपशप करने का बड़ा मन है,
बरसात के किसी रोज़ आना,
अदरक, तुलसी की चाय पिलाऊंगी और गर्मागर्म प्याज के पकोड़े,
खुश हो जाओ उसके स्वाद से,
तो चुपके से कुछ दोस्तों के राज़ बता देना
और बस इतना खुलासा कर देना कि
उन गुस्ताखियों की क्या सजा मिलनी है,
जो ना चाहते हुए भी हुई जा रही हैं.....

Sunday, 15 March 2020

जो मंज़िल चुनी, उस तक पहुंच कर ही दम लिया और रच कर रही इतिहास: पद्मश्री से सम्मानित भारतीय महिलाओँ की कहानी



यह भारत की वो महिलाएं हैं जिन्होंने हर बंधन को तोड़कर, हर मुश्किल से लड़कर ना केवल अपने सपनों को साकार किया है बल्कि समाज और देश के विकास में भी अपना योगदान दिया है। सरकार ने इस साल 141 पद्म पुरस्कार दिए हैं और उन्हें पाने वालों में 34 महिलाएं हैं। चलिए इन पद्म पुरस्कार विजेताओं में से कुछ से मिलते हैं-


1-     सफाई कर्मचारी से विधान सभा का सफर- भागीरथी देवी



·        “कौन कहता है आसमां में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो”
आसमां में सूराख करने का यह करिश्मा कर दिखाया हैं इस साल पद्म पुरस्कार पाने वाली भागीरथी देवी ने जो रामनगर, पश्चिम चम्पारण से बिहार विधान सभा की सदस्या हैं। भागीरथी देवी पश्चिम चम्पारण के नरकटियागंज के एक महादलित परिवार से आती हैं। कभी यह नरकटियागंज के ब्लॉक विकास कार्यालय में मात्र 800 रूपए माह की तन्ख्वाह पर काम करने वाली सफाई कर्मचारी हुआ करती थीं। साइकिल पर घूम कर काम करने वाली भागीरथी देवी  ने गांव की लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया है। महिलाओं के संगठन बनाकर लोगों को घरेलू हिंसा और दलित हिंसा के बारे में जागरूक करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


2-     पेड़- पौधों को जानने वाली तुलसी अम्मा




·        अब मिलिए कर्नाटक की तुलसी गौड़ा जी से। 72 साल की तुलसी अम्मा मूलत: हलक्की आदिवासी हैं। इनके पास चिकित्सकीय पौधों से जुड़े ज्ञान का भण्डार है। किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद तुलसी अम्मा ने पर्यावरण को संरक्षित करने में अतुलनीय योगदान दिया है। यह अब तक 30,000 से ज़्यादा पौधे रोप चुकी हैं और फॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट की नर्सरीज़ की देखभाल करती हैं।



3-     महाराष्ट्र की ‘सीड मदर’


·        सफल होने के लिए बस दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए, इस सोच को और प्रगाढ़ करती हैं- महाराष्ट्र की 56 वर्षीय आदिवासी महिला राहिबाई सोमा पोपोरे। इन्होंने खुद से एग्रो बायो- डाइवर्सिटी के संरक्षण के बारे में सीखा है और आज यह अपने इस काम के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने लगभग पचास एकड़ की कृषि भूमि का संरक्षण किया है जहां ये 17 अलग अलग तरह की फसलें उगाती हैं। इन्होंने खाली पड़ी ज़मीनों पर जल संरक्षण करने के अपने तरीके विकसित किए हैं। पोपेरे, किसानों और छात्रों को सही बीज चुनने, मिट्टी को उपजाऊ रखने और कीड़ों से फसल को बचाने की ट्रेनिंग देती हैं। लोगों की सहायता करने के लिए यह स्वसहायता समूह भी चलाती हैं। इनकी इन्हीं खूबियों के चलते इन्हें ‘सीड मदर’ के नाम से जाना जाता है।


4-     केरल की पारम्परिक कठपुतली कला की अन्तिम जीवित जानकार


·        81 साल की मूज़िक्कल पंकाजक्क्षी केरल की पारम्परिक कठपुतली कला नोक्कूविद्या पावाक्कली की अकेली जानकार हैं। यह बेहद मुश्किल कठपुतली कला है जिसे सीखने के लिए कड़ा प्रशिक्षण और बेहद मेहनत लगती है। इस कला में कलाकार को कठपुतलियों को अपने अपर लिप पर बैलेंस करना होता है और उनकी चालों को नियंत्रित करने के लिए धागों के साथ आंख की पुतलियों को भी लगातार चलाना पड़ता है। यह अपने स्टायल और अलग तरीके से अंजाम दिए जाने के कारण एक दुर्लभ विद्या मानी जाती है। पंकाजक्क्षी पांच दशकों से इसे कर रही हैं। फिलहाल वो इस कठपुतसी विधा की एकमात्र जानकार हैं जो खत्म होने के कगार पर है। उन्हें इस विद्या को जीवित रखने के लिए पद्म पुरस्कार से नवाज़ा गया है। 


5-     हल्दी क्रांति की जनक ट्रिनिटी सय्यू



·        मेघालय की ट्रिनिटी सय्यू का नाम हल्दी की खेती के साथ जुड़ चुका है। सय्यू अपने गांव की 800 से ज़्यादा महिलाओं को जैविक खेती के ज़रिए शुद्धतम और उच्चतम किस्म की हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। इनके स्वसहायता समूह की महिला किसान लाकाडोंग किस्म की हल्दी की खेती करती हैं जो खाना बनाने में इस्तमाल होने के साथ ही एक एन्टी इन्फ्लेमेट्री, एन्टी डायबीटिक और एन्टी कैन्सरस चिकित्सकीय गुणों वाली उपज भी है। सय्यू जैयन्तिया हिल आदिवासी महिला हैं जहां मातृसत्तात्मक सत्ता चलती है। परिवार की सम्पत्ति महिलाओं को मिलती है। अपनी मां से मिली पारिवारिक सम्पत्ति और कृषि के गुणों का सय्यू बेहद कौशल के साथ संरक्षण कर रही हैं।

6-     सिर पर मैला ढोने वाली ऊषा चोमर बनी महिला शक्ति की पहचान


·        जिजीविषा, इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और हौसले का जीता-जागता उदाहरण हैं, राजस्थान के अलवर जिले में रहने वाली ऊषा चोमर। मात्र 10 साल की उम्र में शादी होने के बाद जब वो अपने ससुराल पहुंची तो उन्हें सिर पर मैला ढोने के काम में लगा दिया गया। समाज में हर कोई उन्हें तिरस्कृत नज़रों से देखता था और उस काम से बचने का कोई रास्ता भी नहीं था। तब ऊषा की मुलाकात सुलभ इंटरनेशनल के डॉ बिन्देश्वर पाठक से हुई, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने जैसी मैला ढोने वाली महिलाओं को एकत्र किया और जूट और पापड़ बनाने जैसे कामों की शुरूआत की। धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता बढ़ी और ऊषा मैला ढोने के उस काम से बाहर निकल आईं। यह उनकी कोशिशों का ही परिणाम है कि आज अलवर में कोई मैला ढोने वाली महिला नहीं रह गई है। आज उनके बच्चे स्कूल और कॉलेज में पढ़ रहे हैं, समाज में उनका मान सम्मान है और वो सुलभ इन्टरनेशनल की प्रेसिडेन्ट भी बन गई हैं।

7-    माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम की जनक -चिन्ना अम्मा



  •     चिन्ना पिल्लई मदुरै के पास के एक छोटे से गांव से हैं। लेकिन छोटी जगह इनकी बड़ी सोच और बड़ी सफलता में बाधा नहीं बन पाई। चिन्ना ने अपने गांव की गरीबी से जूझने के लिए और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए आसपास के गांवों की महिलाओं के साथ मिलकर खुद का एक माइक्रोक्रेडिट बैंकिंग सिस्टम शुरू किया जिसके ज़रिए ज़रूरतमन्दों को बेहद कम दर पर कर्ज़ दिया जाता है। उनकी इस छोटी से कोशिश ने बहुत सी महिलाओं को गरीबी से बाहर निकालकर आत्मनिर्भर बनने में भी मदद की। इन्हें 1999 में स्त्री शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उस समय के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने चिन्ना अम्मा को पुरस्कार देते समय उनके पैर भी छुए थे। इन्हें इनके काम के लिए 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
यह भारत की वो गौरवशाली नारियां हैं जिन्होंने हर बंधन, हर रोक, हर परम्परा को तोड़कर अपने लिए रास्ता साफ किया है। जो फेमिनिज़्म की सही पहचान हैं, जिन्हें ना तो पित्रसत्तात्मक सोच रोक पाई और ना ही इन पर थोपी गई वर्ण व्यवस्था। 



Friday, 19 July 2019

सृष्टि के कण कण में बस शिव ही शिव हैं

श्रावण भगवान शिव की आराधना का मास है। संस्कृत में ‘शि’ का अर्थ है कल्याणकारी और ‘व’ का अर्थ है दाता। यानि शिव शब्द से आशय है - कल्याण को देने वाला।

शिव पुराण में शिव को अजन्मा माना जाता है, मतलब जिसका जन्म नहीं हुआ। जो हमेशा से थे और रहेंगे। जिनकी ना कोई शुरूआत है और ना ही अन्त। लेकिन विष्णु पुराण के अनुसार शिव की उत्पत्ति भगवान विष्णु के माथे के तेज़ से हुई है। और तेज़ से उत्पन्न होने के कारण ही भगवान शिव हमेशा योग मुद्रा में रहते हैं।

हिन्दू महीनों के नाम नक्षत्रों पर हैं। और श्रावण नक्षत्र का स्वामी चन्द्रमा है जो भगवान भोलेनाथ के मस्तक पर विराजमान है। इस समय सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश करते समय बारिश होती है और हलाहलधारी भगवान शिव को ठण्डक मिलती है इसलिए श्रावण मास उनका प्रिय महीना है और सोमवार प्रिय वार। शीश पर सोम यानि चंद्रमा को धारण करने की वजह से ही सोमवार को उनकी पूजा का खास महत्व है। यह भी माना जाता है कि चंद्रमा की पूजा करने से वो खुद भगवान शिव तक पहुंचती है।

त्रिदेवों में शिव जी का रूप सबसे अलग और अनूठा है। वो सृष्टि के संहारक भी है और सृष्टि के जीवो और भौगोलिक पिण्डों के बीच सामंजस्य बैठाकर इसे सुचारू रूप से चलाने वाले सिद्ध योगी भी। शीश की जटाओं पर उन्होंने उग्र जलधारा वाली गंगा और मस्तक पर शीतल चंद्रमा को धारण कर रखा है। यह दोनों भोलेनाथ को उस हलाहल विष की गर्मी से शीतलता प्रदान करते हैं जो उन्होंने समुद्र मंथन के समय पिया था।

शिव के गले में पवित्र रुद्राक्ष की माला भी है और विषैला वासुकि नाग भी। शिव के हाथ में त्रिशूल हैं और डमरू भी। वो योगी भी हैं और नटराज भी।
मृगछाला पहने शिवजी बाघ की खाल के आसन पर विराजमान, कैलाश पर्वत पर धूनी रमाते हैं। सरलता इतनी कि यह छप्पन भोग नहीं बल्कि बेलपत्र, धतूरा और दूध के प्रसाद से प्रसन्न हो जाते हैं।

विरोधाभास पूरे शिव परिवार में देखने को मिलता है। शिव के गले में नाग है जबकि उनके जयेष्ठ पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर है जो नाग को खाता है। कनिष्ठ पुत्र गणेष का वाहन मूषक है जो कि सर्प का प्रिय भोजन हैं। माता पार्वती का वाहन शेर है जबकि शिव जी खुद नन्दी बैल पर चलते हैं। यह विरोधाभासी परिवार सभी को मिलजुल कर रहने का संदेश देता है।

शिव सबसे रहस्यमयी और भोले देव भी हैं। शिव को केवल मनुष्य ही नहीं देवता, दानव, असुर, पिचाश, भूत, गंधर्व, यक्ष सभी पूजते हैं। वो राम के भी आराध्य हैं और रावण के भी और दोनों को ही समान रूप से वरदान भी देते हैं।
आदि है, अन्त है। सूक्ष्म है, अनन्त है
सृष्टि के कण कण में बस शिव ही शिव है...

Thursday, 11 July 2019

वेटिकन की कब्रें खोदकर ढूंढा जा रहा है 36 साल पहले गायब हुई इमैन्युएला को, सुलझने की बजाय और उलझ रही है मिस्ट्री


Truth is stranger than fiction- "सच कहानी से ज़्यादा अजीब होता है"।
दुनिया के सबसे छोटे देश 'वेटिकन सिटी' में मिस्ट्री और थ्रिल से भरी ऐसी ही कहानी घट रही है। यह कहानी है 'इमैन्युएला ऑरलैन्डि' की, जो 36 साल पहले गायब हो गई थी और जिनकी तलाश लगातार नए राज़ सामने ला रही है।
-शुरूआत किरदारों से करते हैं। इमैन्युएला ऑरलैन्डि की कहानी के अहम किरदारों में हैं उनके मरहूम पिता जो वेटिकन चर्च के क्लर्क थे। इमैन्युएला के बड़े भाई 'पीट्रो ऑरलेन्डो' जो फिलहाल साठ साल के हैं और अब तक उनकी खोज जारी रखे हुए हैं और 'वेटिकन सिटी' जिसके आस-पास पूरी इन्वेस्टिगेशन घूमती है।
-इमैन्युएला का पूरा परिवार वेटिकन सिटी में रहता था। 22 जून 1983 को 15 साल की इमैन्युएला, सेंट्रल रोम में म्यूज़िक क्लास लेने गई थी। और कभी नहीं लौटी।
-वेटिकन सिटी से जुड़े परिवार का मामला था लिहाजा बड़े स्तर पर खोज की गई। हालांकि वेटिकन अथॉरिटीज़ ने जांच में ज़्यादा सहयोग नहीं दिया। इमैन्युएला नहीं मिली।
- इस दौरान ऑरलेन्डि परिवार को बहुत सारे अज्ञात कॉल्स और खत मिले। कभी मानव तस्करी से इमेन्युएला के गायब होने को जोड़ा गया, कभी वेटिकन पुलिस के सेक्स रैकेट से और कभी यह खबर मिली कि वेटिकन सिटी के एक मुजरिम को छुड़ाने के लिए उनका अपहरण किया गया है। विदेशों में भी उनेकी खोज की गई।
-2012 में इटली के मॉबस्टर एनरिको डी पीडिस की कब्र में इमैन्युएला को दफनाए जाने की लीड मिली। इस कब्र को खोदा गया और यहां मिली अस्थियों का डीएनए टेस्ट कराया गया लेकिन वो इमैन्युएला की नहीं निकलीं।
-इसी साल मार्च में पीट्रो को एक क्रिप्टिक लैटर मिला जिसमें एक एन्जल की मूर्ति की फोटो थी और लिखा था कि वहां देखिए जहां यह मूर्ति इशारा कर रही है।
-एन्जल की यह मूर्ति वेटिकन सिटी में सेन्ट पीटर्स बेसिलिका के पीछे बने उस ट्यूटॉनिक कब्रिस्तान में मिली जहां जर्मन और ऑस्ट्रियन राजपरिवार के लोगों को दफनाया जाता है।
- काफी मशक्कत के बाद, वेटिकन अथॉरिटिज़ से आज्ञा लेकर कल इन कब्रों को खोदा गया।

-लेकिन कब्रों को खोदने के बाद मिस्ट्री और बड़ी हो गई। क्योंकि इमैन्युएला की अस्थियां मिलना तो दूर बल्कि उन कब्रों में जो दो जर्मन राजकुमारियां दफन थी, उनके ताबूत भी बिल्कुल खाली पाए गए।
-इस खोज ने यह सवाल और खड़ा कर दिया है कि आखिर वो दो राजकुमारियां जो यहां दफन थी, उनकी अस्थियां और फ्यूनरेरी अर्न कहां गए। (फ्यूनरेरी अर्न मेटल या सिरामिक के बने ढक्कनदार पात्र होते हैं जो दफनाए गए लोगों के साथ रखे जाते हैं। राजकुमारियों की अस्थियों के साथ ये पात्र भी गायब थे।)
- लोग यह भी शक जता रहे हैं कि यह क्रिप्टिक लैटर इसलिए भेजा गया था ताकि खाली कब्रों का राज़ दुनिया के सामने लाया जा सकें। वेटिकन अब इस मामले की जांच कराने की बात कह रहा है।
- 2013 में जब पीट्रो अपनी बहन की खोज में सहयोग की अपील करने के लिए पोप जॉन पॉल द्वितीय से मिले थे तो उन्होंने कहा था कि 'तुम्हारी बहन स्वर्ग में हैं'। हैरान पीट्रो ने इस बारे में पोप से बात करने की काफी कोशिश की कि क्या वो जानते हैं कि इमैन्युएला मर चुकी है और उसके साथ क्या हुआ लेकिन पोप इसके बाद पीट्रो से कभी नहीं मिले।
-अभी तक जो भी इन्वेस्टिगेशन हुई है उसके सारे सिरे वेटिकन सिटी से जुड़ते हैं।
-पीट्रो डिटरमाइन्ड हैं कि वो सच्चाई पता करके रहेंगे। खोज जारी है।
-इस सबके बीच.., इमैन्युएला की मां मारिया आज भी वेटिकन सिटी में ही रहती हैं।

Sunday, 10 March 2019

मेरी दुआएं उनके लिए जिन्होंने नाममुकिन को मुमकिन करने का हौसला दिया.....



आखिरकार चुनावों का ऐलान हो गया है। परीक्षा की घड़ी आ गई है। कयास हम कितने भी लगा लें पर रिज़ल्ट आने से पहले नहीं कहा जा सकता कि टॉपर कौन होगा। इसलिए बात उन बातों की जो कयासों से परे हैं।
2014 में जब नई सरकार सत्ता में आई थी तो उसे चुनने का कारण मनमोहन सरकार की नाकामियां थी, लगातार बढ़ रही अराजकता थी, दिन पर दिन खुल रहे घोटाले थे, बढ़ती महंगाई थी, अपराध और बेरोजगारी का बढ़ता ग्राफ था और देश में जगह-जगह हो रहे बम धमाके थे। पाकिस्तान जब चाहे तब हमें आंखे दिखाता था और हमारे सैनिकों के सिर तक काट कर ले जाता था।
मोदी सरकार सत्ता में आई तो बदलाव आया। आज महंगाई काबू में है, अराजकता पर लगाम है, जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में कहीं कोई बम नहीं फटा। घोटाले नहीं हुए। हां, राफेल स्कैम पर बात करना बेमानी है क्योंकि उसकी सच्चाई सब जानते हैं, भले ही मानें ना। कुम्भ इतने भव्य स्तर पर हुआ। और उसमें सबकुछ हुआ सिवाय भगदड़ में लोगों के मरने के, जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था।
घोटाले करके विदेश में बस जाने के दिन लद गए। अब तो हाल यह है कि लोग विदेश भागने के बाद भी भारत सरकार के डर में जीते हैं। क्रिश्चियन मिशेल तक को भारत ले आए हम। माल्या जो ग्यारह हज़ार करोड़ का कर्ज लेकर भागा था, उससे 13 हज़ार करोड़ वसूल लिए और इसके बावजूद उसके एक्सट्रेडिशन की कोशिशें जारी हैं। नीरव मोदी का बंगला उड़ा दिया। उसकी हालिया हालत देखकर अन्दाजा़ लगाया जा सकता है कि वह अपने बच जाने को लेकर कितना सुनिश्चित है। अपराधियों की आंखों में कानून का यहीं डर तो देखना चाहते थे हम...।
आज पाकिस्तान डरता है हमसे। हां, उन लोगों के भोलेपन पर कुछ नहीं कहना, जिन्हें सर्जिकल स्ट्राइक और अभिनन्दन का ढाई दिन में वापस आ जाना केवल सेना का शौर्य लगता है और जिन्हें इमरान खान की कोशिशों में डर नहीं शान्ति की पहल दिखती है। पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ जाने में भी इन भोलेभाले लोगों को सरकार की नीतियों का हाथ नहीं दिखता।
आज हम बतौर एक देश इस सरकार के नेतृत्व में ना केवल सुरक्षित महसूस करते हैं, बल्कि शक्तिशाली भी मानने लगे हैं खुद को। हमारा लीडर ऐसा है जो जहां जाता है, लोग उसे हाथों हाथ लेते हैं फिर चाहे अमेरिका हो या अरब देश। यहीं तो चाहते थे हम।
यह भी दिक्कत थी हमें कि राजनेताओं के घोटालों में शामिल होने के बावजूद कोई उन पर हाथ नहीं डालता। इस सरकार ने यह भी कर दिखाया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ज़मानत पर है, हैराल्ड हाउस खाली करना पड़ा है। चिदम्बरम और उनके सुपुत्र अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, वाड्रा साहब रोज़ ई़़डी के मेहमान बन रहे हैं।
कश्मीर मुद्दे पर तो ऐसा कड़ा रुख आजतक किसी का नहीं दिखा। अलगाववादी नेता जेल में हैं, और सरकार को आंखे दिखाने वाले राजनेता डरे हुए हैं कि इस सरकार का कोई भरोसा नहीं, पता नहीं कब 370 हटा दें। सड़कें बन रही हैं, विकास हो रहा है, और तो और, जिन जिन योजनाओं की इस सरकार में नींव पड़ी, अधिकतर पूरी भी हो चुकी हैं। यहीं तो चाहिए था हमें, हमेशा से अपनी सरकार से....
रही बात असिहष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई की की जो एज़ पर विपक्षी दल, बढ़ी है, तो उनके लिए बस यह कहना है कि इन पांच सालों और उससे पहले के पांच सालों के आंकड़े उठा कर देख लें कि किस वक्फे में दंगे ज़्यादा हुए हैं। हां यह ज़रूर है कि बीते पांच सालों में हमने बायस्ड पत्रकारिता की नई मिसालें कायम होती देखी हैं। नेता, अभिनेता, पत्रकार, आम लोग, सबके चेहरों से नकाब उतर गए हैं।
पहले हम जिन पर आंख मूंद कर विश्वास कर लेते थे उनसे अब सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे सवाल कर रहे हैं तो हाल यह है कि अब तक जो शान्त और बौद्धिक नज़र आते थे, वो अब बदले बदले से सरकार नज़र आने लगे हैं।
बाकी, अन्तिम फैसला तो हम पर ही हैं कि हम किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरा देंगे। मई की गर्मी में सब क्लीयर हो जाएगा...पर मेरी दुआएं उनके साथ हैं, जिन्होंने इस देश में जबरदस्त बदलाव की नींव रखी है और नामुमकिन को मुमकिन करने का भरोसा दिया है..

Thursday, 3 January 2019

बधाई....???????????


परम्पराएं धर्म की बैकबोन होती हैं। ये वो नियम-कायदे हैं, जिनके कारण वो धर्म, बाकियों से अलग बनता है। और जिन नियमों से किसी को नुकसान नहीं पहुंचता और जो उस धर्म को मानने वालेआराम से मान रहे हैं, उन पर आघात करने का मतलब उस धर्म को आघात पहुंचाना है।
उस वकील नौशाद अहमद खान को बधाई, जिन्होंने लॉर्ड अयप्पा को मानने वाली उन महिलाओं की बेचैनी समझी जो सबरीमाला के दर्शन करना चाहती थीं और जिनकी अगुआई में वकीलों ने पीआईएल फाइल की। हालांकि उनमें एक भी लॉर्ड अयप्पा का भक्त नहीं था या थी।
उस महिला एक्टिविस्ट रेहाना को भी बधाई, जिसने डिवोटी ना होने के बावजूद सबरीमाला मन्दिर तक पहुंचने के लिए 'हिंसक' भक्तों की भीड़ से लड़ाई की।
उन सभी फेमिनिस्टों को भी बधाई, जो शायद कभी भी सबरीमला नहीं जाएंगी लेकिन जिन्होंने अपनी सोशल मीडिया दीवारों के ज़रिए यह जताया कि लॉर्ड अयप्पा के मन्दिर में जाने की अनुमति मिलना, महिला और पुरुषों के बीच इक्वेलिटी लाने के लिए अत्यधिक ज़रूरी है।
बधाई के पात्र वो दो महिलाएं भी हैं, जो अयप्पा डिवोटी तो नहीं हैं लेकिन जिन्होंने महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ी और रात के अंधेरे में गर्भगृह जाकर सैकड़ो वर्षों पुरानी परम्परा तोड़ने की हिम्मत दिखाई।
एक बधाई उन सभी आज़ादख़्याल महिलाओं को भी बनती है, जिन्हें अपने धर्म की पाबन्दियों से तो कोई परेशानी नहीं है लेकिन उन्होंने अयप्पा भक्त महिलाओं के लिए ह्यूमन चेन बनाकर उनकी ईक्वेलिटी की वकालत की।
इस बधाई के महत्वपूर्ण पात्र हैं- केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन साहब। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के प्रति इनकी निष्ठा लाजवाब है। भले ही महिला जज ने ऐतराज जताया था, भले ही कोर्ट में रिव्यू पैटीशन डाली गई थी, भले ही लगातार लॉर्ड अयप्पा के डिवोटी विरोध कर रहे थे, लेकिन इन्होंने अपना सारा ध्यान, राज्य से जुड़े बाकी सारे महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर फॉलो करने में लगाया और चोरी छिपे, रात के अंधेरे में, प्रशासनिक मार्ग से, कैमरे के साथ दो महिलाओं को सबरीमाला के गर्भगृह में ना केवल प्रवेश कराया बल्कि बहुत ही गर्व के साथ अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए वो विडियो भी बाकायदा प्रेस को दिया। इन्होंने कोर्ट के आदेश के ऊपर राज्य में होने वाले कैओज़ की भी चिन्ता नहीं की।
और सबसे ज़्यादा बधाई के पात्र हैं वो 'निष्पक्ष' मीडियाकर्मी जिन्हें वो ह्यूमन चेन तो दिखाई दी जिसमें एक भी अयप्पा डिवोटी नहीं था, लेकिन केरल की लाखों अयप्पा डिवोटी महिलाओं का शान्तिपूर्ण दीप प्रज्वलन वाला विरोध नहीं दिखा। जो इस बात पर खुश हैं कि केरल, जो कि सौ प्रतिशत साक्षरता वाला राज्य है, वहां की दबी कुचली अयप्पा डिवोटी महिलाओं को इन्होंने पुरुषों के बराबर ईक्वेलिटी दिला दी।
मुूबारक, मुबारक, मुबारक, हम इस धर्मनिरपेक्ष देश में जहां सभी अपने अनुसार अपने धर्म को मानने और उसकी परम्पराओं का पालन करने के लिए स्वतन्त्र हैं, लोगों की धार्मिक सम्प्रभुता को जीवित रख पाए। 

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