Friday, 9 August 2013

लावारिस लाशों का क्रिया-कर्म करने वाले शरीफ चाचा को आजतक नहीं मिली सरकारी सहायता

फैज़ाबाद वाले शरीफ चाचा का नाम तो आप सबने सुना ही होगा जो 22 वर्षों से लावारिस लाशे, चाहे वो हिन्दू की हो या मुसलमान की, को बाइज़्जत उनके आखिरी मुकाम तक पहुंचा रहे हैं। कई बार मीडिया में उनकी कहानी और उनके द्वारा किए जा रहे इस सबाब के काम को लेकर कहानियां छप चुकी हैं, प्रोग्राम भी बनाए और प्रस्तुत किए जा चुके हैं। लेकिन आप जो नहीं जातने हैं, वो यह है कि मकान नं 269, खिड़की अली बेग, फैज़ाबाद में रहने वाले शरीफ चाचा को उनके द्वारा किए जा रहे इस समाज सेवा के काम के बावजूद देश भर में पहचान तो मिली है, सरकार से तारीफ के हार और तालियां तो मिली हैं लेकिन मदद बिल्कुल नहीं मिली। और आज वो तंगहाली में ज़िदंगी गुज़ार रहे हैं। पास के होटल वाले से खाना मिल जाता है, टूटा-फूटा मकान रहने को है, एक बिटिया की शादी नहीं हुई और लाश के अंतिम संस्कार या दफनाने में जो पैसे लगते हैं वो चाचा किसी तरह इधर-उधर से चंदा मांगकर जमा करते हैं और मय्यत को उसके आखिरी अंजाम तक पहुंचा आते हैं।
           शरीफ चाचा बड़े रोष के साथ बतातै हैं कि इतने सारे नेता उनसे मिलने आते हैं। हर कोई मदद का वादा करके जाता है, कोई कहता है मकान दिलवाएंगे, कोई कहता है सरकारी सहायता दिलवाएंगे और कोई कहता है कि आपके साथ दो-तीन लोग और इस काम में लगवा देंगे लेकिन मदद के यह वादे पूरे कभी नहीं होते। हर  साल छब्बीस जनवरी या पंद्रह अगस्त पर नेता उन्हें बुला लेते हैं, मंच पर अपने साथ खड़ा करके कुछ तारीफ और सहानुभूति बटोर लेते हैं और बस इसके बाद अगले साल तक की छुट्टी।
उन्हीं के शब्दों में- "एक बार तो सलमान खुर्शीद ने भी हमें बुलाया था और सरकारी मदद दिलाने का भरोसा दिया था लेकिन जब हम वहां गए तो बस एक हार पहना दिया, तालियां पिटवा दी, कुछ देर अपने साथ खड़ा कर लिया और बस फिर वापस भेज दिया। पर आज तक मदद के नाम पर कुछ नहीं मिला है। आमिर ख़ान ने भी टीवी पर बुलाया था लेकिन उसने भी बस आने -जाने का खर्चा देकर वापस भेज दिया। लाशों के क्रिया कर्म के काम के लिए कोई पैसे की मदद नहीं दी"
चाचा दुखी होकर कहते हैं कि आज महंगाई के ज़माने में एक हिन्दू भाई की लाश को जलाने में लगभग तीन हज़ार और मुसलमान भाई की मय्यत दफनाने में पांच हज़ार तक का खर्चा आ जाता है लेकिन यह सब वो अपने आस-पास के लोगों से चन्दा इकट्ठा करके इंतज़ाम करते हैं या जितना उनसे बन पड़ता है अपने पास से लगाते हैं लेकिन ऐसा कब तक चल पाएगा। कोई ठोस इंतज़ाम तो ज़रूरी है जिसके लिए उन्हें सरकार से आस है और जो अब तक बस आस ही बनी हुई है। चूंकि पुलिस वाले और अस्पताल वाले उन्हें जान गए हैं इसलिए लावारिस लाश मिलने की स्थिति में तुरंत उन्हें फोन तो कर देते हैं लेकिन पैसों की मदद बिल्कुल नहीं करते।
उन्हें इस बात की भी चिंता है कि उनकी इस विरासत को कौन संभालेगा, कौन उनके बाद उनके इस काम को आगे बढ़ाएगा। उनकी उम्र 72 हो चली है। हाथ-पैरों में अब पहले जैसी ताकत नहीं रह गई है लेकिन फिर भी उन्होंने तीन ठेले लाशें उठाने के लिए लगा रखे हैं जिनमें से एक सरकारी अस्पताल, एक रेलवे स्टेशन और एक पुलिस स्टेशन पर खड़ा रहता है।
चाचा की परेशानी का एक सबब यह भी है कि उनके शरीर में अब अकेले ठेला ढोने और लाशों को उठाने की ताकत नहीं रही है लेकिन कोई भी दूसरा आदमी लावारिस लाश को छूना नहीं चाहता, या बड़ी मुश्किल से तैयार होता है इसलिए शरीर में ताकत नहीं होने के बावजूद शरीफ चाचा खुद ही लाश को ठेले पर लादते हैं और उसकी आखिरी यात्रा पर ले जाते हैं।
शरीफ चाचा के इस सबाब के काम ने उन्हें मन की शांति दी है, पहचान दी है लेकिन उन्हें मलाल सिर्फ इस बात का है कि उन्हें कोई छोटी सी भी सरकारी सहायता आज तक नहीं मिली जिससे उनके काम में मदद हो पाए।


(शरीफ चाचा ने हमसे अपना नंबर भी देने का आग्रह किया है ताकि अगर कोई उनकी मदद के लिेए आगे आना चाहे तो उन तक पहुंच सके। इसलिए उनका नंबर दे रही हूं- 9235853230)

मछली जल की रानी है, आलू-कचालू बेटा कहां गए थे....दादी नानी के ज़माने की यह कविताएं कहीं खो ना जाएं..

  • मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है, हाथ लगाओगे डर जाएगी, बाहर निकालोगे मर जाएगी....,
  • चंदा मामा दूर के पूए पकाए भूर के, आप खाए थाली में, मुन्ने को दें प्याली में...
  • आलू -कचालू बेटा कहां गए थे, बंदर की टोकरी में सो रहे थे, बंदर ने लात मारी रो रहे थे, मम्मी ने प्यार किया हंस रहे थे...,
  • आज सोमवार है चूहे को बुखार है, चूहा गया डॉक्टर के, डॉक्टर ने लगाई सुई, चूहा बोला उई उई उई...
  • मम्मी की रोटी गोल-गोल, पापा का पैसा गोल-गोल, दादा का चश्मा गोल-गोल...
  • उठो लाल अब आंखे खोलो, पानी लाई हूं मुंह धोलो...
  • वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो...
  • बुन्देले हरबोलो के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मरदानी वो तो झांसी वाली रानी थी...
  • फूलो से तुम हंसना सीखो और भौंरो से गाना, पेड़ो से तुम सीखो बच्चो फल आते ही झुक जाना...
यह उन कुछ प्यारी सी कविताओं के नमूने हैं जिन्हें हम सब ने कभी ना कभी अपनी हिन्दी की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा होगा। कुछ को नर्सरी या केजी में तो कुछ को दूसरी, तीसरी, छठी या सातवी कक्षा में। आज भी हम लोग जब मिलते हैं और हिन्दी की मशहूर कविताओं की बात निकलती है, या हमें अपने बच्चों को कविताएं सिखाना होता है तो इन्हीं जैसी कविताएं याद आती हैं। यह कुछ वो कविताएं हैं जो हमें अपनी दादी-नानियों या मम्मी-पापा से विरासत में मिली। जब यह कविताएं वो गुनगुनाते हैं तो हम भी उनके साथ मिलकर इन्हें गुनगुनाने लगते हैं। यह वो कविताएं हैं जो पीढ़ियो या दूरियों के फर्क को मिटा कर हमें सब से जोड़ देती हैं। क्योंकि हमारे बुज़ुर्गों ने यह कविताएं अपने स्कूलो में सीखीं और हमने अपने स्कूलों में। परिवार के सारे लोग, सारी पीढ़ियां इन्हें जानती हैं, गुनगुनाती हैं...
 लेकिन अब शायद हमारे बच्चों के साथ ऐसा ना हो क्योंकि हमारे बच्चों की किताबों से यह कविताएं या तो बिल्कुल ही गायब हो चुकी हैं या कहीं कहीं इक्का दुक्का दिखती हैं। आज स्कूलों और किताबों का स्वरूप तो बदला ही है, कोर्स का स्वरूप भी बदल गया है और बदल गई है ज़माने से चली आ रही हिन्दी की कहानियां और कविताएं भी जिन्हें हम भारतीय लोग अपने बचपन में पढ़ते और सीखते थे। लेकिन अब चूंकि हर पब्लिक स्कूल अपने स्तर के हिसाब से अलग अलग किताबें लेकर आता है तो उनमें कविताएं भी बिल्कुल अलग होती हैं।
खासतौर पर अगर आप अपने ही बच्चों की हिंदी की किताबें देखेंगे तो उनमें आपके ज़माने की कविताएं सिरे से गायब मिलेंगी।आज  इन कविताओं की अलग से सीडी निकलती है या फिर इन्हें नेट पर पढ़ा जा रहा है या यह कविताएं बच्चों को उनके मां-बाप या बाबा-दादी सिखा रहे हैं। लेकिन जिस तेज़ी से घर छोटे हो रहे हैं,  संयुक्त परिवारो की प्रथा खत्म हो रही है और मांएं भी बाहर जाकर काम कर रहीं हैं, वो समय दूर नहीं जब मां बाप भी बच्चों को यह कविताएं सिखा नहीं पाएंगे और यह कविताएं लुप्त हो जाएंगी।
 हैरानी की बात यह है कि इंग्लिश की नर्सरी राइम्स और प्रसिद्ध कविताओं जैसे जैक एंड जिल.., जॉनी जॉनी यस पापा..., हम्पटी डम्पटी, चब्बी चीक्स.., ट्विकंल ट्विंकल लिटिल स्टार... आदि के साथ ऐसा नहीं हुआ हैं यह कल भी बच्चों की अंग्रेज़ी किताबों का हिस्सा थी, आज भी हैं और शायद हमेशा रहेंगी। ढूंढे से भी नहीं मिलेंगी तो बस हिन्दी की वो कविताएं जिन्हें हम बचपन से गुनगुनाते आएं हैं।


Thursday, 8 August 2013

शैतानी गुणों वाली सब्ज़ियां माने जाते हैं प्याज और लहसुन...

  • बहुत से लोग क्यों नहीं खाते प्याज और लहसुन
  • क्या हैं इसके पीछे की धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं
  • क्या यह शैतानी गुणों को बढ़ावा देने वाली सब्ज़ियां हैं?
बहुत से धर्मों को मानने वाले लोग प्याज और लहसुन खाना पसंद नहीं करते। आपके घरों या जान-पहचान वालो में भी ऐसे लोग होंगे जो प्याज-लहसुन नहीं खाते होंगे। लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की कि ऐसा क्यों हैं। अगर आप अपने घर में दादी, नानी या किसी अन्य बुज़ुर्ग से, जो इन्हें ना खाते हों, इस बारे में पूछेंगे तो अधिकतर लोगों का यहीं जवाब होगा कि- अब हमसे यह मत पूछो कि क्यों नहीं खाते, बस जैसा हमारे बड़ो ने बता दिया वो हम कर रहे हैं। वो लहसुन प्याज नहीं खाते थे, हम भी नहीं खाते। लेकिन लहसुन और प्याज नहीं खाने के पीछे असल वजह क्या है यह आपको शायद कम ही लोग बता पाएंगे। हमने भी जब इस सवाल का जवाब खोजा तो रोचक जवाब मिले। प्याज व लहसुन जैसी वो सब्ज़िया जिनमें इतने रोग प्रतिरोधक गुण होते हैं, को लोगो द्वारा खाए योग्य नहीं माने जाने के पीछे जो कारण निकल कर आए वो धार्मिक भी हैं, पौराणिक भी और वैज्ञानिक भी।
पहले तो आपको यह बता दें कि सिर्फ वैष्णव धर्म में ही नहीं बल्कि और भी कई धर्मों में प्याज और लहसुन को शैतानी गुणों वाली, शैतानी दुर्गंध वाली, गंदी और प्रदूषित सब्ज़िया माना जाता है। प्राचीन मिस्त्र के पुरोहित प्याज और लहसुन  को नहीं खाते थे। चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी इन सब्ज़ियों को खाना पसंद नहीं करते। हमारे वेदों में बताया गया है कि प्याज और लहसुन जैसी सब्ज़ियां प्रकृति प्रदत्त भावनाओं में सबसे निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तजेना और अज्ञानता को बढ़ावा देकर किसी व्यक्ति द्वारा भगवद् या लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं, व्यक्ति की चेतना को प्रभावित करती हैं इसलिए इन्हें नहीं खाना चाहिेए।
भगवान कृष्ण के उपासक भी प्याज और लहसुन नहीं खाते क्योंकि यह लोग वहीं सब्ज़िया खाते हैं जो कृष्ण को अर्पित की जा सकती हैं, और चूंकि प्याज और लहसुन कभी भी कृष्ण को अर्पण नहीं किए जाते इसलिए कृष्ण भक्त इन्हें नहीं खाते।

 प्याज और लहसुन की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक और दंतकथाए-

प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे तभी दो राक्षस राहू और केतू भी वहीं आकर बैठ गए। भगवान ने उन्हें भी देवता समझकर अमृत की बूंदे दे दीं। लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि यह दोनों राक्षस हैं। भगवान विष्णु ने तुरंत उन दोनों के सिर धड़ से अलग कर दिए। इस समय तक अमृत उनके गले से नीचे नहीं उतर पाया था और चूंकि उनके शरीरों में अमृत नहीं पहुंचा था, वो उसी समय ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो गए। लेकिन राहू और केतु के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए दोनों राक्षसो के मुख अमर हो गए (यहीं कारण है कि आज भी राहू और केतू के सिर्फ सिरों को ज़िन्दा माना जाता है)। पर भगवान विष्णु द्वारा राहू और केतू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिरों से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे। चूंकि यह दोनों सब्ज़िया अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज़ गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता। कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मज़बूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं।

 इन दोनों सब्जि़यों को मांस के समान माना जाता है इसके पीछे भी एक कथा है। प्राचीन समय में ऋषि मुनि पूरे ब्रह्मांड के हित के लिए अश्वमेध और गोमेध यज्ञ करते थे जिनमें घोड़े अथवा गायों को टुकड़ों में काट कर यज्ञ में उनकी आहूति दी जाती थी। यज्ञ पूर्ण होने के बाद यह पशु हष्ट पुष्ट शरीर के साथ फिर से जीवित हो जाते थे। एक बार जब ऐसे ही यज्ञ की तैयारी हो रही थी तो एक ऋषिपत्नी जो की गर्भवती थी, को मांस खाने की तीव्र इच्छा हुई। कुछ और उपलब्ध ना होने की स्थिति में ऋषिपत्नी ने यज्ञाहूति के लिए रखे गए गाय के टुकड़ो में से एक टुकड़ा बाद में खाने के लिए छिपा लिया। जब ऋषि ने गाय के टुकड़ो की आहूति देकर यज्ञ पूर्ण कर लिया तो अग्नि में से पुनः गाय प्रकट हो गई। पर ऋषि ने देखा की गाय के शरीर के बाएं भाग से एक छोटा सा हिस्सा गायब था। ऋषि ने तुरंत अपनी शक्ति से जान लिया कि उनकी पत्नी ने वह हिस्सा लिया है। अब तक उनकी पत्नी भी सब जान चुकी थी। ऋषि के क्रोध से बचने के लिए उनकी पत्नी ने वह मांस का हिस्सा उठा कर फेंक दिया। लेकिन यज्ञ और मंत्रो के प्रभाव के कारण टुकड़े में जान आ चुकी थी। इसी मांस के टुकड़े की हड्डियों से लहसुन उपजा और मांस से प्याज। इसलिए वैष्णव अनुयायी प्याज और लहसुन को सामिष भोजन मानते हैं और ग्रहण नहीं करते।
तुर्की में भी इन सब्जियों को प्रयोग ना करने के पीछे एक दंतकथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब भगवान ने शैतान को स्वर्ग से बाहर फेंका तो जहां उसका बांया पैर पड़ा वहां से लहसुन और जहां दायां पैर पड़ा वहां से प्याज उगी।
जैन धर्म को मानने वाले लोग भी प्याज और लहसुन नहीं खाते लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि यह दोनों जड़ें हैं और जैन धर्म में माना जाता है कि अगर आप किसी पौधे के फल, फूल, पत्ती या अन्य भाग को खाओ तो उससे पौधा मरता नहीं है लेकिन चूंकि प्याज और लहसुन जड़े हैं इसलिए इन्हें खाने से पौधे की मृत्यू हो जाती है।
इसके उत्तेजना और जुनून बढ़ाने वाले गुणों के कारण चीन और जापान में रहने वाले बौद्ध धर्म के लोगों ने कभी इसे अपने धार्मिक रिवाज़ो का हिस्सा नहीं बनाया। जापान के प्राचीन खाने में कभी भी लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता था।

 आयुर्वेद में प्याज-लहसुन

भारत के प्राचीन औषधि विज्ञान आर्युवेद में भोज्य पदार्थो को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है- सात्विक, राजसिक और तामसिक। अच्छाई और सादगी को बढ़ावा देने वाले भोज्य पदार्थ, जुनून और उत्तेजना बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ और तामसिक यानि अज्ञानता या दुर्गुण बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ।प्याज और लहसुन राजसिक भोजन के भाग हैं जो लक्ष्य सिद्धि, साधना और भगवद् भक्ति में बाधा डालते हैं इसलिए लोग इन्हें खाना पसंद नहीं करते।
हांलाकि यह भी सच है कि वनस्पति विज्ञान के अनुसार एलियम कुल की ये सब्ज़ियां रोग प्रतिरोधक क्षमता भी देती हैं। प्याज जहां गर्मी के लिए अच्छा होता है वहीं लहसुन में अत्यधिक एंटीबायोटिक गुण होते हैं।


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Tuesday, 6 August 2013

एक तलाकशुदा महिला का साक्षात्कार

कहते हैं भारतीय समाज बहुत आधुनिक हो गया है, लोग खुले विचारों और खुलेपन के साथ सबकुछ स्वीकार करने लगे हैं लेकिन फिर भी कुछ सच हैं जो कभी नहीं बदलते और उन्हीं में से एक सच यह भी है कि आज भी हमारा भारतीय समाज तलाकशुदा महिलाओं के मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और उनके प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया रखता है। सच क्या है यह जानने के लिए हमने आज के ज़माने की सफल और आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करने वाली एक तलाकशुदा महिला मिस गीता आहूजा से बात की। मिस आहूजा एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, दिल्ली में उनका अपना ऑफिस हैं। तलाकशुदा होने के बावजूद मिस गीता आहूजा आज खुश हैं, आज़ाद है लेकिन उनकी यह खुशी, दर्द की जिन सीढ़ियों पर चलकर हासिल हुई है, उनके बारे में जब हमने उनसे पूछा तो उन्होंने दिल खोलकर हमसे बात की। आप भी जानिए कि इस समाज की हकीकत क्या है और तलाकशुदा महिलाओं को किस नज़र से देखा जाता है...
एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर- गीता आहूजा

आपने अपने पति से तलाक क्यों लिया? कैसे हुआ यह सब, क्यों हुआ?

मैंने जिस लड़के से शादी की थी वो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। हम नेट पर मिले थे। और फिर हम दोनों के परिवारों की मर्ज़ी से हमारी शादी हो गई। शादी के बाद से ही उसने अपना काम करना छोड़ दिया था, हांलाकि मैं शादी से पहले भी इन्टीरियर डिज़ाइनिंग के प्रोजेक्ट्स लेती थी लेकिन शादी के बाद उसने मेरा यह काम भी छुड़वा दिया। वो भी काम छोड़ चुका था, मुझे भी काम नहीं करने देता था तो ज़ाहिर है घर में आर्थिक तंगी चल रही थी। जब हमारी इस बात पर लड़ाई होने लगी तब उसने कहा ठीक है तुम किसी जगह नौकरी कर सकती हो। मैं नौकरी तलाश करती थी तो वो हर बात पर नज़र रखता था, बहुत टोका-टाकी करता था कि यह नौकरी ऐसी है, यह बहुत दूर है, यह कंपनी अच्छी नहीं है या यहां के लोग अच्छे नहीं हैं वगैरह-वगैरह। हद तो तब हो गई जब वो नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय भी मेरे साथ जाने लगा। हर समय मेरे साथ ही घूमता था। मुझे अगर पूरा दिन भी इंटरव्यू के लिए बैठना पड़े तो भी मेरे साथ बैठा रहता था। मैं किसी से फोन पर बात करती थी तो सुनता था। कोई सहेली मेरे घर आती थी तो हमारे साथ बैठ जाता था और जब मौका मिलता था कोई भी छोटी से छोटी बात पकड़कर मुझे जली-कटी सुनाते रहता था। मुझे लगता था जैसे मैं किसी जेल में बन्द हूं। मैं काफी डिप्रेशन में आ गई थी। पागल सी हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। मैंने कभी छिप कर मम्मी पापा से बात की भी तो वो भी मुझे ही समझा देते थे कि यह कोई बड़ी बात नहीं सब ठीक हो जाएगा पर उन्हें पता नहीं था कि मैं कितनी परेशान थी। आखिरकार एक दिन मैं लड़-झगड़ कर किसी तरह अकेली अपने मायके मेरठ चली गई। और दो दिन बाद लौटी तो देखा वो अपना सारा सामान लेकर घर छोड़ कर चला गया था। बस उसी दिन मैंने पक्का फैसला कर लिया कि अब मुझे इस बोझ बनते रिश्ते को खत्म करना है। मैंने महिला आयोग में अर्जी दी और 2006 में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से हमारा तलाक हो गया।

क्या तलाक का फैसला करना आपके लिए मुश्किल था, क्या किसी ने आपकी बात सुनी, आपका साथ दिया?
बहुत बहुत मुश्किल था वो वक्त, वो फैसला लेना। उस समय समझ ही नहीं आता था मैं क्या करूं। मैं मम्मी पापा से बात करती थी तो वो मना कर देते थे, समझाने लगते थे। लोग क्या कहेंगे यह सोच कर भी डर लगता था। पूरे समय मन में यही उलझन रहती थी कि क्या करूं। मन में बुरे-बुरे खयाल आते थे। लेकिन फिर मैंने ही अपने आपको हिम्मत दी। मैंने सोच लिया कि मुझे इस तरह मर-मर के नहीं जीना है। मुझे इस बोझ से आज़ादी चाहिए थी और फिर मैंने फैसला कर लिया कि चाहे जो हो जाए मैं अब तलाक लेकर रहूंगीं। मैंने अपनी छोटी बहन को सारी बातें बताईं और तब किसी ने पहली बार मेरे दुख को समझा और मेरा साथ दिया। जब मैंने मम्मी-पापा को इस फैसले के बारे में बताया तो वो तो बहुत गुस्सा हुए थे, मुझसे बात करना छोड़ दिया था वो बोलते थे कि बच्चे के बारे में सोचो बच्चा आ जाएगा तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन मैं जानती थी कि बच्चे के बाद मेरे लिए इस रिश्ते को तोड़ना और मुश्किल होगा। मैं अपने फैसले पर अडिग रही और तलाक ले लिया।

तलाक के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं रही होगी?
नहीं बिल्कुल नहीं, बल्कि ज़िंदगी की असली जंग तो अब शुरू हुई थी। तलाक लेने के बाद तो मेरे प्रति लोगों के तेवर ही बदल गए। मेरे बहुत से रिश्तेदार जैसे मेरी बुआ जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया। सब लोग मुझे ही ग़लत ठहराते थे। जिस भी रिश्तेदार को इस बारे में पता चलता था वो मेरी ही गलती निकालता था। लोग कहते थे कि मुझमे ही कुछ कमी होगी इसलिए शादी टूट गई। मैं मम्मी-पापा के पास जाती थी तो वो मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। उन्होंने मुझे कहीं भी ले जाना बन्द कर दिया। उन लोगों ने भी जाना-आना छोड़ दिया क्योंकि उनसे भी लोग सौ सवान करते थे। वो तो शुक्र हैं कि उन्होंने शादी पर दिल्ली में मुझे एक मकान भी दिया था। मैं यहीं आ गई और यहीं रहना शुरू कर दिया। छः महीने तक मैं घर नहीं गई। कितने समय मैं यह सोचकर घर में बन्द रहती थी कि अब क्या होगा। मैं जाऊंगी तो लोग मुझे कैसे देखेंगे, कैसी कैसी बाते करेंगे। पर कहते हैं ना समय बहुत बड़ा मरहम होता है। धीरे-धीरे मैंने अपने आपको संभाला, नौकरी शुरू की तो काफी हद तक मैं इस तनाव से बाहर आने लगी।

 जीवन की इस घटना ने क्या आपको कुछ बदला भी, सिखाया भी?
सबसे बड़ी बात तो यह सिखाई कि ज़िंदगी हर चीज़ की कीमत वसूलती है। आज़ादी आपको यूंही नहीं मिलती, बड़ा संघर्ष करना पड़ता है इसके लिेए। और असली आज़ादी तब मिलती है जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाओ। शुरूआत मे तलाक के बाद मैं पापा-मम्मी से खर्चा लेती थी, क्योंकि मैं नौकरी तो कर नहीं रही थी, तो ज़ाहिर है मुझे उनकी सुननी भी पड़ती थी आखिर मैं उनकी मोहताज़ जो थी। मैं एक गलत शादी से ज़रूर आज़ाद हो गई थी लेकिन अपने परिवार के तानों से आज़ाद नहीं थी। यह आज़ादी मुझे तब मिली जब मैंने खुद कमाना शुरु किया। जब मैंने अपने पापा से खर्च लेना छोड़ दिया, उनकी बातें सुनना छोड़ दिया तब जाकर जिंदगी में थोड़ा सुकून आया। अकेली महिला का जीवन बहुत मुश्किल भरा होता है, यह अब तक मैंने सुना था लेकिन अब यह सब मेरे साथ घट रहा था। आस-पास के लोग, पड़ौसी, ऑफिस के सहयोगी इस बात का बड़ा फायदा उठाते थे। कोई भी कुछ भी बोल कर निकल जाता था। आसानी से मेरा काम नहीं होता था। लेकिन इन्हीं बातों ने मुझे मज़बूत बनाया। धीरे-धीरे मैंने अपने लिए लड़ना और जीतना सीख लिया और आज तो लोग मुझसे डरते हैं (मुस्कुराहट के साथ)। आज की गीता और सात साल पहले की गीता में ज़मीन आसमान का फर्क है।

क्या कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा?
सोचा, कभी -कभी जब दूसरों के परिवारों और बच्चों को देखती हूं तो मेरा भी बड़ा मन करता है कि मेरा भी परिवार हो, बच्चे हों, ज़िम्मेदारियां हों। मम्मी-पापा, रिश्तेदार भी बहुत ज़ोर देते हैं कि दूसरी शादी कर लो, अकेले ज़िंदगी नहीं कटती। लेकिन अब जब मैं अपने आप से सवाल करती हूं कि मुझे ज़िंदगी में क्या ज्यादा ज़रूरी लगता है तो बस एक ही जवाब मिलता है- आज़ादी। और फिर इस बात का डर भी है कि कहीं फिर से मेरे साथ वैसा ही कुछ हुआ तो, इसलिए शादी करने का मन नहीं करता।

पर अकेलापन तो लगता होगा, जीवनसाथी की कमी तो महसूस होती होगी?
हां होती है, तब होती है जब अकेलापन नहीं कटता। लेकिन अब मैंने अपने आप को काम में इतना डुबो दिया है कि मुझे वक्त ही नहीं मिलता यह सब सोचने का। कभी अकेलापन लगता भी है, तो दोस्तो से बात कर लेती हूं, अपनी बहन से बात कर लेती हूं। फिर सब ठीक लगने लगता है।

कोई अच्छा लड़का मिला तो दोबारा शादी करेंगी?
(हंसते हुए) आज तो मैं सफल हूं, आत्मनिर्भर हूं अगर सही लड़का मिला जो मुझे और मेरे करियर को भी उतना ही सम्मान दे जितना अपने को देता है तो सोचूंगी।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगी
बस यहीं कि जिंदगी में कुछ भी, खासतौर से अपनी खुशी और आज़ादी, वो भी एक लड़की के लिए पाना बहुत मुश्किल होता है। अगर अपनी शर्तों पर ज़िदंगी जीनी है तो बहुत लड़ाईया लड़नी पड़ती हैं, खुद को पत्थर जैसा मज़बूत बनाना पड़ता है, कुर्बानियां देनी पड़ती हैं और सबसे ज़रूरी बात समाज में रहना सीखना पड़ता है... और यकीन मानिए एक तलाकशुदा औरत के लिए यह समाज बहुत कठोर है।


  

Monday, 5 August 2013

ज़रूरी नहीं कि गर्भवती मां से उसके बच्चे को एड्स हो ही जाए, संक्रमित सुई चुभने पर भी एड्स से बचना मुमकिन

  • गर्भवती मां से बच्चे को एड्स होने के खतरा सिर्फ 33 फीसदी
  • डॉक्टर की देखरेख और इलाज से हो सकता है सामान्य बच्चा
  • एड्स संक्रमित सुई चुभने पर भी इलाज संभव
  • 72 घंटे के अंदर दवाई ले लेने पर नहीं होता एड्स
हमने अक्सर एड्स जागरूकता के लिए चलाए जा रहे विज्ञापनों में यह पढ़ा है, देखा है और सुना भी है कि एड्स की जानकारी ही बचाव है लेकिन सच यह है कि इतने ज़ोर शोर से और इतने समय से एड्स की जागरूकता के लिए चलाए जा रहे विज्ञापनों के बावजूद लोगों में एड्स को लेकर कई गलत धारणाएं और भ्रांतिया है। जैसे कि लोग हमेशा यह सोचकर चलते हैं कि अगर गर्भवती स्त्री को  एड्स है तो उसके बच्चे को भी ज़रूर एड्स होगा या एचआईवी संक्रमित सुई चुभ जाने से लोगों को एड्स हो जाता है, या फिर एड्स से ग्रस्त व्यक्ति सामान्य ज़िंदगी नहीं जी सकता.... लेकिन सच्चाई यह है कि उपरोक्त बातों में सच्चाई कम है, एड्स का भय ज्यादा।


भ्रांति नंबर -1 एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती स्त्री से उसके बच्चे को एड्स होने की 99 फीसदी संभावना है
सच्चाई-
 यह बात बिल्कुल गलत है। सच यह है कि एचआईवी पॉजिटिव मां के गर्भवती होने पर उसके बच्चे को एड्स होने खतरा केवल 33 फीसदी होता है। और अगर गर्भ धारण के समय बीमारी का पता चलते ही डॉक्टर से मिल लिया जाए और आपका इलाज शुरू हो जाए तो यह खतरा दो फीसदी से भी कम रह जाता है। यहीं नहीं प्रसव के आखिरी महीनों में  बीमारी का पता चलने पर भी, पैदा होने वाले बच्चे में बीमारी की रोकथाम संभव है। लेकिन इस सब के लिए ज़रूरी है कि गर्भधारण के समय ही एड्स की जांच कराई जाए और सबसे महत्वपूर्ण अगर आपको एड्स है तो अपने डॉक्टर से कुछ ना छिपाएं। गर्भधारण के तुरंत बाद इलाज शुरू करें तो आपका बच्चा सामान्य ही होगा। एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती मां से बच्चे को एचआईवी होने का खतरा ज़रूर है लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि बच्चा बीमार ही पैदा हो।

 भ्रांति नंबर-2 एड्स रोगी के खून से संक्रमित सुई चुभने पर एड्स हो जाता है

सच्चाई- इस बात में आधी सच्चाई है। क्योंकि यह सच है कि यदि एड्स से बीमार किसी व्यक्ति के खून से संक्रमित सुई आपको चुभ जाए तो आपको एड्स हो सकता है लेकिन साथ ही यह बात भी सच है कि अगर सुई चुभे ऐसे व्यक्ति को 72 घंटे के अंदर एड्स के इलाज संबधी दवा दे दी जाए तो उसे एड्स नहीं होता। जी हां अगर आपको सुई चुभने के बाद आप तुरंत किसी एड्स के रोकथाम संबंधी चिकित्सालय या सरकारी अस्पताल में पहुंच कर अपनी जांच करवाएं तो वहां आपकी जांच के बाद आपको एक दवा लेने की सलाह दी जाती है। अगर 72 घंटे के अंदर आप यह दवा ले लें तो आपको एड्स नहीं होगा। यह दवा थोड़ी महंगी ज़रूर होती है लेकिन जिंदगी से बढ़कर कुछ भी नहीं।

भ्रांति नंबर-3 अगर आपको एड्स है तो आपके जीवनसाथी को भी एड्स हो जाएगा
सच्चाई- यह बात भी सही नहीं है। अगर आप कण्डोम का इस्तमाल करें और कुछ सावधानियां बरतें तो आप अपने जीवनसाथी को इस रोग से पूरी तरह बचा सकते हैं।

भ्रांति नंबर-4 
एड्स से ग्रस्त व्यक्ति सामान्य ज़िंदगी नहीं जी सकता
सच्चाई- एड्स रोग के मामले में यह सबसे बड़ी भ्रांति है जिसके कारण ना सिर्फ अन्य लोगों ने एड्स रोगियों से दूरी बना कर रखी हुई है बल्कि इसके रोगी भी यह सोचकर अपनी ज़िंदगी से प्यार करना छोड़ देते हैं कि एड्स के बाद तो वैसे भी मैं सामान्य जीवन नहीं जी सकता तो दवा लेने या इलाज कराने से क्या फायदा। जबकि सच यह है कि एड्स रोगी भी थोड़ी सी सावधानी रखकर, अपने रहन-सहन, खान-पान के तरीको में बदलाव लाकर और सही इलाज और सही दवा के नियमित सेवन से बिल्कुल स्वस्थ और सामान्य ज़िंदगी जी सकते हैं।

मत भूलिए की एड्स का वायरस आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है यदि आप अपनी दिनचर्या और आदतों में बदलाव लाकर और दवाई लेकर रोग और संक्रमण से बचे रह सकें तो आराम से सामान्य और संपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी यह है कि रोग का पता लगते ही तुरंत सरकार द्वारा बनाए गए एआरटी (एंटी रिट्रोवायरल ट्रीटमेंट केन्द्र) पर खुद को पंजीकृत करा कर दवाई वा इलाज शुरू करें।यह इलाज और दवाई बिल्कुल मुफ्त है।

दिल्ली में एआरटी के नौ सेवा केन्द्र हैं- 

  1. एम्स अस्पताल
  2. सफदरजंग अस्पताल
  3. एलआरएस इंस्टीट्यूट ऑफ टीबी एंड एलाइड साइंसेज, महरौली
  4. दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, हरिनगर, दिल्ली
  5. लोकनायक अस्पताल, जवाहर लाल नेहरू मार्ग
  6. डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल, खड़ग सिंह मार्ग
  7. कलावती सरन बाल अस्पताल, पंचकुईया मार्ग
  8. गुरू तेग बहादुर अस्पताल, शाहदरा
  9. डॉ बाबा साहेब अंबेडकर अस्पताल, रोहिणी
(इन सेवा केंद्रो पर एड्स के रोगी की जांच, सलाह मश्वरा, पजीकरण, इलाज वगैरह होता है साथ ही मुफ्त दवा भी दी जाती है)
 
इसके अतिरिक्त दिल्ली में समाज सेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे सामुदायिक एड्स केयर होम्स भी हैं। एड्स रोगी यहां भी संपर्क कर सकते हैं
  • आकांक्षा (भजनपुरा- 32566703, 9810255143)
  • सहारा माइकल केयर होम (दरिया गंज- 23280713, 9958638081)
  • शलोम (जनकपुरी- 26432055, 25546519, 26461487)
  • चाइल्ड सर्वाइवल ऑफ इन्डिया ( खेड़ा खुर्द -27844749, 9810986101)
  • केयर एंड सपोर्ट होम ( तिलक नगर- 42133937, 9891277482)
  • नाज़ केयर होम (ईस्ट ऑफ कैलाश- 26910499, 9910339996)
  • लव, फेथ एंड एक्शन ट्रस्ट (पहाड़ गंज- 23583116)
  • दीप्ति फांउडेशन (नज़फगढ़-28010125, 20382417)
इसके अतिरिक्त एड्स संबंधी किसी भी सलाह हेतू आप देहली नेटवर्क ऑफ पॉजिटिव पीपल, नेबसराय पर भी संपर्क कर सकते हैं ( 29535239, 29534370)
 
(डॉक्टर से बातचीत पर आधारित)
 
 

विदेश जाने वाले भारतीय रक्षा के लिए साथ ले जाते हैं स्वास्तिक चिन्ह, भगवान की मूर्ति, श्रीयंत्र...



विदेशों में युवाओं की रक्षा करते हैं, गणेश जी की मूर्ति, देवी मां का चित्र, रुद्राक्ष माला, वैष्णो मां की लाल चुनरी, कान्हा जी की तस्वीर या पीतल के ठाकुर जी... जी हां, बहुत से भारतीय माता-पिता अपने युवा बच्चों को विदेश भेजते समय इन चीजों  को उनके साथ इस भरोसे से भेजते हैं कि यह विदेश में ना केवल उनके लाड़लों की रक्षा करेंगी, बल्कि उन्हें सफलता भी दिलाएंगी और शायद भारत की संस्कृति से भी जोड़े रखेंगी।

  लैपटॉप या डायरी पर स्वास्तिक का चिन्ह और पर्स में महामृत्युंजय मंत्र लिखा हुआ कागज़ या पैरों में काला डोरा.... यह सब ऐसे टोटके या कहें धार्मिक विश्वास हैं जिनके साथ अभिभावक युवा बच्चों के साथ अपना विश्वास भेजते हैं कि अगर हम तेरे साथ नहीं हैं तो यहीं चीज़े तेरे साथ रहेंगी और तेरी रक्षा करेंगी।

     भारत देश के मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे युवाओं को जब भी कंपनी के काम से विदेशों जैसे अमेरिका, लंदन, मलेशिया, दुबई या किसी और देश में में जाने का मौका मिलता है तो वो लोग भले ही कितने भी खुश हो लें, लेकिन मम्मी-पापाओं और करीबी रिश्तेदारों के लिए अपने बच्चों को इतनी दूर भेजने का फैसला करना आसान नहीं  होता।  सात समुंदर पार विदेश में कौन मेरे बच्चे की देखभाल करेगा, कौन उसका ख़याल रखेगा, कौन उसके दुख दर्द बांटेगा, कहीं वो बीमार पड़ गया तो... जैसे बहुत से डर हैं, जो माता-पिता को परेशान करते रहते हैं और इसलिए बहुत से हिन्दुस्तानी लोग अपने बच्चो को अकेले बाहर भेजते समय अपने विश्वास के रूप में भगवान की मूर्तियां, तस्वीरें, रुद्राक्ष, माला, माता की लाल चुनरी... जैसी कोई ना कोई चीज़ उनके सामान में रखकर उनके  साथ भेज देते हैं, जो उनके ना होने की स्थिति में विदेश में उनके बच्चों की रक्षा करेंगी।
इसके अलावा लैपटॉप, टैबलेट या फोन जैसी चीज़ो पर रोली से  स्वास्तिक बनाना और बच्चों के जाने से पहले घर में सत्यनारायण की पूजा रखना, छप्पन भोग लगवाना, प्रसाद बंटवाना जैसे बहुत से काम हैं जो मां बाप अपने विदेश जाने वाले बच्चों के जाने से पहले करवाना पसंद करते हैं।

 आई टी कंपनी जेनपेक्ट में काम करने वाले सॉफ्टवेयर कंसलटेन्ट रजनीश अग्रवाल को एक प्रोजेक्ट के लिए जब छह महीने के लिए अमेरिका जाने का मौका मिला तो उसकी पत्नी ने रजनीश के साथ गणेश जी की मूर्ति रखी और साथ ही लैपटॉप पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह भी बनाया जिससे रजनीश को अपने काम में सफलता मिले। उसी की कंपनी से जब उसका एक सहयोगी राहुल कुछ समय पहले अमेरिका गया था तो उनके मम्मी पापा ने उसके कपड़ो के साथ माता की लाल चुन्नी रखी थी। टीसीएस की आस्था जब तीन महीने के लिए जर्मनी गई तो पहले तो मां ने घर पर सत्यनारायण की पूजा करवाई और फिर उसके पैर में काला धागा बांध कर उसे जर्मनी भेजा कि कहीं उसे या उसकी सफलता को किसी की नज़र ना लगे। विप्रो, गुड़गांव में काम करने वाले अंशुल अग्रवाल को भी जब सऊदी अरब जाने का मौका मिला तो उनकी मां ने उसकी अटैची में श्रीयंत्र रखा ताकि उसका हर काम शुभ हो। औरो को शायद अजीब लगने वाली यह चीजें भारत के लोगों के विश्वास की प्रतीक हैं जिन्हें अपने बच्चो के साथ भेजकर दरअसल मां-बाप उनके लिए भगवान का साथ भेजते हैं।

देसी चूर्ण, मसाले और नमकीन खूब मंगाया और भेजा जाता है विदेश में बसे भारतीयों को
जी हां, विदेश में बाकी सारी सुविधाएं भले ही मिले लेकिन कुछ चीज़े ऐसी हैं, जो भारत में ही मिलती हैं और जिनका स्वाद, ज़रूरत या आदत विदेश में बसे भारतीयो को नहीं भूलाए नहीं भूलती। इसलिए जब भी वो यहां आते हैं या यहां से कोई परिचित वहां जाता है तो नित्यम चूर्ण, आनंदम चूर्ण, कोई और चूर्ण, मसाले या चटपटी नमकीन विदेश में बसे भारतीय अपने लिए ले जाते हैं या मंगवाते हैं।

Saturday, 3 August 2013

शरीर की दुर्गति, धार्मिक विश्वास और अंगो के दुरुपयोग का डर रोकता है अंगदान करने से


आजकल अंग दान को लेकर काफी प्रचार किया जा रहा है। लोगों को अंगदान के प्रति जागरूक किया जा रहा है कि मरने के बाद भी आपका शरीर औरो के काम आ सकता है, आप मर कर भी अमर हो सकते हैं.. वगैरह, वगैरह... लेकिन सच्चाई यही है कि अंग दान को लेकर अभी बहुत से डर और भ्रांतिया लोगों के दिमाग में है। नेत्रदान के लिए तो लोग फिर भी तैयार हो जाते हैं, लेकिन अंग दान को लेकर अभी भी लोगों में झिझक है, और यह झिझक सिर्फ पुरानी विचारधारा के लोगों में ही नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी में भी है। जहां पुरानी पीढ़ी के लोग इस बात में विश्वास करते हैं कि मरने के बाद पूरे शरीर का दाह संस्कार नहीं किए जाने पर आत्मा मुक्त नहीं होती, वहीं नई पीढ़ी के लोगों को यह डर सताता है कि उन्होंने अगर अपने अंग दान कर भी दिए तो कहीं ऐसा ना हो कि उनकी बिक्री की जाए। ऐसे बहुत से डर हैं जो लोगो को अंगदान करने से रोकते हैं।


मुक्ति ना मिलने का डर
बहुत से बुज़ुर्ग लोगों का कहना है कि अंगदान करना ग़लत है। हमारे धर्म में ऐसा नहीं होता। मरने के बाद अगर पूरे शरीर का दाह संस्कार ना हो तो, मनुष्य की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति के लिए ज़रूरी है कि पूरे शरीर को अग्नि के हवाले किया जाए ना कि उसमें से अंग निकाल लेने के बाद खोखले शरीर को। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अगर हम अंगदान के बाद बिना किसी अंग के जलाए जाएंगे तो अगले जनम में हमें वो अंग नहीं मिलेगा। आगरा की एक गृहणी साठ वर्षीया कान्ता गुप्ता साफ कहती हैं, कि भैया हमारे धर्म में यह सब नहीं चलता। हमारे यहां पूरा शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता। हम तो अपना अंगदान नहीं करेंगे। अगर और लोगों के अंग खराब हैं, या काम नहीं करते तो यह भगवान की मर्ज़ी है लेकिन मैं अपने धर्म के विरुद्ध जाकर मरने के बाद अपने शरीर के अंगो को दान नहीं करूंगी, मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी।

शरीर की दुर्गति का डर
लोगों के मन में शरीर की दुर्गति का भी डर है। लोगों का मानना है कि एक बार मरने के बाद यदि शरीर तुरंत अंगदान के लिए चला गया तो उसके बाद पट्टियों से बंधा और खोखला शरीर वापस आता है। शरीर की यह दुर्गति मरने वाला भले ही ना देख पाएं लेकिन उसके रिश्तेदारों के लिए अपने मृत संबंधी को ऐसी हालत में देखना आसान नहीं होता। फिर जो मर चुका है वो शरीर पूज्यनीय हो जाता है जिसके सभी रिश्तेदार दर्शन करने आते हैं। अब अगर शरीर चीड़ फाड़ के बाद वापस आएगा तो लोग मृत शरीर का दर्शन करने में भी हिचकेंगे। आई टी कंपनी में इंजीनियर सौरभ सबरवाल कहते हैं कि मैं तो इस ख़याल से ही बुरा महसूस करता हूं कि मेरे किसी मृत रिश्तेदार के शरीर की ऐसी हालत हो कि उसके शरीर को काटा जाए और वो पूरा सफेद पट्टियों में बंधा हुआ घर आए, फिर मैं अपने शरीर की ऐसी हालत के बारे में तो सोच भी नहीं सकता।

अंगो के दुरुपयोग का डर
युवा पीढ़ी के वो लोग, जो अंगदान द्वारा बहुत से ज़रूरतमंद लोगों को ज़िंदगी दिए जाने और खुद के अमर हो जाने की भावना का सम्मान करते हैं, इस डर से अंगदान करने से हिचकते हैं कि कहीं उनके अंगों को निकालने
के बाद उनका दुरुपयोग ना किया जाए। जेएनयू में एमए की छात्रा सोनाक्षी गोयल का कहना है कि अगर हम अंगदान कर भी दें, तो इसकी क्या गारंटी है कि हमारे अंग ज़रूरतमंद लोगों को ही लगाए जाएंगे। यह तो सभी जानते हैं कि आजकल हर चीज़ का धंधा होता है चाहे वो दान किया गया खून हो, आंखे हो या फिर शरीर के अन्य अंग। हम तो अपने अंग दान कर दें और वो ज़रूरतमंद या किसी गरीब व्यक्ति को ना मिलें बल्कि डॉक्टर उन्हें बेचकर अपनी जेब गर्म करे तो हमारे अंगदान का क्या फायदा। इस तरह तो हम उसकी दुकान चलाने में मदद करेंगे ना कि किसी की जान बचाएंगे।

 

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...