Saturday, 30 January 2016

जानलेवा पढ़ाई

  • लगातार बढ़ रहे हैं छात्र-छात्राओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले
  • मां-बाप की अपेक्षाओं के चलते गहरे मानसिक दवाब में जी रहे हैं किशोर

  • 2014 में 2403 छात्र-छात्राओं ने फेल होने के डर से मौत को गले लगाया






गाज़ियाबाद के मशहूर कॉलेज से बीटेक कर रही रितुपर्णा की दिनचर्या देखें- सुबह 8 बजे वो सोकर उठती है और 9 बजे तक तैयार होकर, नाश्ता वगैरह करके कॉलेज चली जाती है। लौटते हुए लगभग साढ़े चार-पांच बज जाते हैं। आने के तुरंत बाद रितु खाना खाकर सो जाती है और इसके बाद रात को नौ बजे उठकर सुबह चार बजे तक शांति में पढ़ाई करती है। सुबह चार बजे सोने के बाद वो सीधे आठ बजे स्कूल जाने के समय पर उठती है। इम्तहान के दिनों में यह रुटीन बदल जाता है, कॉलेज से 12-1 बजे तक आ जाने के बाद रितु 5 बजे तक दिन में भी पढ़ाई करती है। 

यहीं नहीं छुट्टी के दिन रितुपर्णा स्पेशल क्लासिस के लिए अपने सर के पास भी जाती है। जब हमने उससे पूछा कि इतनी ज्यादा पढ़ाई करने की क्या आवश्यकता है जबकि यह कोई आईआईटी या मेडिकल की तैयारी नहीं है, तो उसका कहना था कि कॉलेज की पढ़ाई और कोर्स बहुत ज्यादा है। पापा ने इतने पैसे खर्च करके मेरा एडमिशन कराया है। अगर मैं पढ़कर अच्छे नंबर नहीं लाई तो उन्हें खराब लगेगा। और फिर मैं आगे किसी कॉम्पटीटिव एक्ज़ाम में कैसे निकल पाऊंगी...? कैसे उनके सपनों को पूरा कर पाऊंगी? कैसे अपनी पहचान बना पाऊंगी...?  

ऐसा करने और सोचने वाली केवल रितु ही नहीं। यकीनन रितु की तरह आपके आस-पास भी ऐसे ही कितने बच्चे, किशोर होंगे जो अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने ऊपर आपके सपनों और आकांक्षाओं का बोझ लादकर जीना सीख लिया है। पर क्या हर बच्चा यह दवाब झेल पाता है? तब क्या होता है जब वो इस बोझ को ढो नहीं पाते, आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते...और मौत को गले लगा लेते हैं। 

याद है सुपरहिट फिल्म थ्री ईडियट्स फिल्म का वो सीन, जब एक छात्र केवल इसलिए फांसी के फंदे पर झूल जाता है क्योंकि डायरेक्टर उसे फेल कर देते हैं। पढ़ाई का प्रेशर और खासतौर पर एक अच्छे स्कूल में जाने, अच्छा करियर बनाने वाले कोर्स में चुने जाने का मानसिक दबाब इतना ज्यादा है कि बच्चे जो खुद बनना चाहते हैं, वो मां-बाप को बताने से पहले भी उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।

लगभग हर हफ्ते, पंद्रह दिन में हम अखबारों में किसी ना किसी छात्र या छात्रा द्वारा परीक्षाओं/पढ़ाई के दबाब में खुद की जान ले लिए जाने की खबरें पढ़ते हैं। दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इन आत्महत्याओं का सिलसिला और बढ़ जाता है। 

पिछले ही दिनों राजस्थान की कोचिंग नगरी, कोटा ने यहां बड़े पैमाने पर छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के चलते अखबारों के पन्नों पर जगह बनाई थी। साल 2015 में यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की तैयारी करने में जुटे 31 बच्चों ने खुदकुशी कर ली। प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की उम्मीद में यहां की कोचिंग क्लासेज़ में दाखिला लेने वाले कई किशोर व युवा अत्यधिक प्रतियोगी माहौल और कड़े पढ़ाई के रुटीन के चलते गहरे मानसिक दबाब में जीते हैं।

 माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से इस तरह की बातें कहते हुए सुने जा सकते हैं कि- पढ़ लो, मस्ती करने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है.., नेहा को देखा, कितनी होशियार है, एक बार में सीपीएमटी में निकल गई, मेहनत करती है वो, और तुमसे तो उम्मीद लगाना ही बेकार है..., पढ़ लोगे, मेहनत कर लोगे तो अच्छी जगह एडमिशन हो जाएगा, कहीं निकल जाओगे, वरना ज़िंदगी ऐसे ही गुज़र जाएगी...., तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई पर बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं हम, कुछ तो अच्छा रिजल्ट लाके दिखा दो... वगैरह, वगैरह..। 



बच्चों पर इस कदर आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है कि उन्हें पढ़ाई करना और अच्छे नंबर लाना ही ज़िदगी जीने की मकसद लगने लगता है।  


पीयूष वर्मा की कहानी

20 वर्षीय पीयूष (बदला हुआ नाम) ने केवल इसलिए अपनी कलाई काट कर जान देने की कोशिश की क्योंकि वो मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की परीक्षा में एक विषय में फेल हो गया था। तुरंत चिकित्सकीय सहायता ने उसकी जान तो बचा ली लेकिन उसकी मानसिक स्थिति को सामान्य करने के लिए अभी तक काउंसलिंग चल रही है। 

जब पीयूष से इस स्थिति में आने का कारण पूछा गया तो पता चला कि उसने तीन साल तक मेडिकल के एंट्रेस एक्ज़ाम के लिए कोचिंग की थी जिसके बाद उसका डेंटल में सलेक्शन हुआ। काफी डोनेशन देकर उसके डैडी ने उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। उसके परिवारवालों ने उसकी पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च किया था और उनको पीयूष से काफी उम्मीदें थी, ऐसे में जब वो पहली ही साल फाइनल्स में फेल हो गया तो उसकी अपने मम्मी –पापा को फेस करने की हिम्मत नहीं हुई और उसने यह कदम उठाना उचित समझा।

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

गाज़ियाबाद के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर सारंग देसाई का मानना है कि बच्चों को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए आज का प्रतियोगी युग सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके चलते मां-बाप अपने बच्चों से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाते हैं।

 हांलाकि डॉक्टर देसाई यह भी कहते हैं कि आजकल खासकर महानगरों में एक पॉजिटिव ट्रेंड यह उभरा है कि मां-बाप बच्चों केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि उनकी पसंद के और क्षेत्रों में भी जाने का मौका देने लगे हैं। लेकिन यह प्रतिशत काफी कम है। बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है। पर अधिकतर छोटे नगरों के युवा, जिनके मां-बाप अपनी जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाकर उन्हें महानगरों में पढ़ने के लिए भेजते हैं, के ऊपर अपेक्षाओं का दवाब बहुत ज्यादा होता है। 

आजकल की फिल्मों, सीरियल्स, इंटरनेट सभी पर बाज़ारवाद हावी है जिसने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया है। यह बाज़ारवाद हमें ज्यादा खर्चा करने, अच्छे से रहने, अच्छा खाने, अच्छा पहनने और अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने के लिए प्रेरित करता है। यह ज़रूरतें पूरी करने के लिए ज़रूरी है अच्छी नौकरी या वाइट कॉलर जॉब और इसके लिए ज़रूरी है पढ़ाई, बहुत ज्यादा पढ़ाई। ज़ाहिर हैं मां-बाप भी आज के इस बाज़ारवाद और प्रतियोगिता के युग में अपने बच्चे को पिछड़ते हुए नहीं देखना चाहते और उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना। 

अपेक्षाओं का बोझ मां-बाप से होता हुआ कब बच्चों तक पहुंच जाता है, वो समझ भी नहीं पाते और बच्चे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाने के अपराध बोध में दबकर आत्महत्या जैसे कदम उठा 
बैठते हैं।

इस समस्या से निबटने का हल बताते हुए डॉक्टर देसाई कहते हैं कि आज के युग में ज़रूरी यह है कि अपने बच्चों के साथ मित्रवत रिश्ता कायम किया जाए। उन की परेशानियों को सुनकर, उनकी इच्छाओं को सम्मान देकर और उनके सोच पर ध्यान देकर काफी हद तक इस दवाब पर लगाम लगाई जा सकती है।   


आत्महत्या रोकने के लिए हैल्पलाइन चलाने वाली समाज सेवी संस्था आसरा की साइट पर उपलब्ध आंकड़े देखें तो-

  • निमहंस की एक स्टडी के अनुसार भारत के 72 फीसदी छात्र इम्तहान के दवाब को झेलने में असमर्थ हैं।
  • यूनेस्को के अनुसार विश्व के 50 फीसदी बच्चें किसी ना किसी दवाब में बड़े हो रहे हैं।
  •  निमहंस की स्टडी के अनुसार हर 20 आईटी प्रॉफेशनल्स में से एक आत्महत्या करने का मन बनाता है।
  • पिछले पांच सालों में युवाओं के बीच डिप्रेशन 2 फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी तक पहुंच चुका है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्टडी बताती है कि विश्व के हर दस छात्रों में से एक छात्र कड़े दवाब में जी रहा है।

डराते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों की साइट पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि छात्रों में इम्तहान के दबाव चलते मौत को गले लगाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।




  • साल 2014 में भारत में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की जिनमें से 2403 छात्र थे। इन सभी ने परीक्षाओं में फेल होने के कारण या पास होने के दवाब के चलते अपनी जान ली।
  • इम्तहानों के दवाब के चलते आत्महत्या करना, भारतीयों द्वारा आत्महत्या किए जाने के प्रमुख दस कारणों में छठे स्थान पर आ पहुंचा है। यह पिछले साल 1.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा।    
  • चौंकाने वाली बात यह है एक्ज़ाम्स का यह दवाब केवल किशोरों या युवाओं को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी निशाना बना रहा है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी परीक्षा में फेल होना, आत्महत्या करने की तीसरी प्रमुख वजह रही जिसके कारण पिछले वर्ष 163 बच्चों (91 लड़के, 72 लड़कियां) ने आत्महत्या की।
  • आंकड़े बताते हैं एक्ज़ाम के दवाब के चलते आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी का ट्रेंड देखा जा रहा है और यह ट्रेंड देश की मेगा सिटीज़ में ज्यादा देखने को मिल रहा है। 

एक बात हमारी भी सुनें

इतनी सारी बातें लिखने, आंकड़े पेश करने और उदाहरण देने के पीछे हमारा मकसद केवल माता-पिताओं तक यह संदेश पहुंचाना हैं कि अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाब इतना भी मत डालिए कि वो कुम्हला जाएं। जिन बच्चों के बहाने आपने अपनी ज़िंदगी के सपने पूरे करने के सपने देखे हैं, अगर वहीं नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे आप? बाद में पछताने से बेहतर है अभी समझदारी का कदम उठाया जाए। पढ़ाई बच्चों के लिए ज़रूरी है, पर उनकी ज़िंदगी का एकमात्र मकसद नहीं। क्या होगा अगर वो फर्स्ट नहीं आ पाएंगे, प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं निकल पाएंगे, इंजीनियर नहीं बनेंगे, डॉक्टर नहीं बनेगें... शायद सबसे अलग, कुछ छोटा काम करें, लेकिन कम से कम खुश तो रहेंगे। हम नहीं कहते कि आप अपने बच्चों को पढ़ाई और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना छोड़ दें, बस इतनी गुज़ारिश है कि उन पर अपनी आकांक्षाओं और कड़े नियमों का इतना बोझ ना लादें कि उन्हें पर फैलाने की जगह ही ना मिलें।