Saturday, 31 August 2013

Madras Cafe- A great, gripping, gruesome tale of war & conspiracy

Madras Cafe- a film that chronicles incidents leading to assassination of former PM..,  a film that unveils how our national security agencies like RAW act to combat national threats..., a film that reveals modus operandi of ferocious rebel outfits & peace keeping forces..., a film that reinforces a simple truth that the most vulnerable & helpless victims of any war are innocent people.., a movie that shows clashes of ambitions amongst rebel leaders very clearly..., a movie that is so fast paced and thrilling that it keeps you glued with your seat till the last frame appears... and an Indian movie that reminds you of a Hollywood war movie...

 Well, I saw Madras Cafe yesterday & found it very interesting and  thrilling watch with an honest intention & theme to dig truth as deep as possible.

The movie starts with Major Vikram's (played by John Abrahm) confession of his guilt over his failure of foiling assassination of former Indian PM whose killing was conspired by an unknown economic hitman & executed by LTF - rebellious Tamil tigers from Sri Lanka.

John Abraham shines as a covert RAW agent Vikram, who was sent to Jaffna to persuade rebel group LTF's chief Bhaskaran for surrendering arms & thus paving India's way for holding provincial elections there.
He meets Bala there, a RAW official who had been working there for long. He also meets other people & try to accomplish Herculean task assigned to him, but was back-stabbed by Bala who failed his attempts & got him kidnapped by LTF.  Wounded & broken, Vikram then decides to uncover the conspiracy behind the continuing civil war. While on his quest of truth, he meets a retired RAW officer (Dibang) in Singapore who gives him some crucial pieces of information. Jaya, a war journalist also helps him uncover truth which is terrifying & brutal. The plot ultimately leads to the assassination of an ex Indian PM.

As an ordinary viewer who is not an intellectual person, not a movie critic & not a historian, I find this movie great, gripping, gruesome & an eye opener. This movie is an honest & successful effort to enlighten an ordinary person about the consequences of war & power play.

One must watch 'Madras Cafe' to understand how government work & how some people take important decisions for masses without thinking about their future...  & how these irresponsible decisions change the fate of millions & force them to live in a life of refuge & fear for good.

The film gives an insight of how foul policies implemented by the government lead to formation of rebel they are formed & how do they deviate from their core philosophies. How the fate of an entire country & community is discussed & altered over a cup of coffee..,  How polity & bureaucracy work... How a handful of people's ambitions make them snatch others' right to live... and how innocent men, women & children are emotionally manipulated by their mentors for sacrificing their own lives for killing others and that too, with pride.

LTTE, which is LTF in Madras Cafe, first introduced suicide bombers & plastic explosives for assassinations which later became very popular & changed the face of global terrorism. They first inducted child soldiers in their rebel army & also started use of cyanide capsules. Their fighters used to wear cyanide capsules in their necks & whenever they were grabbed by the forces, they swallowed  those capsules to save themselves from interrogation & revealing anything about LTF's whereabouts.

I Liked John Abraham very much who effortlessly plays his part of both a wounded and betrayed soldier and a result oriented & fearless RAW agent-determined to unveil the truth. Nargis Fakri, as a war correspondent Jaya is natural. I like supporting cast as well but the best of all is the girl who played Dhanu, assassin of former PM. Her part is chilling, ruthless & she plays it effortlessly & with a smile.
I like this movie very much. In fact I saw a really good movie, after a really long time. If anyone wants to have a taste of chilling reality, go for Madras Cafe.

Thursday, 29 August 2013

चौरासी कोसी से चौरासी कोस दूर अयोध्यावासी..बेवजह पिसी जनता, रोजी रोटी की जुगाड़ मुश्किल

विहिप द्वारा चौरासी कोसी परिक्रमा करने की मांग उठाने और सपा सरकार द्वारा उसे रोकने का प्रबंध करने के बीच अयोध्या के आम आदमी का भविष्य एक बार फिर अधर में है। सड़कों पर पुलिस वालों का पहरा, राजनेताओं की हलचल, लगातार कम होते पर्यटक और इन सबके बीच पिसती स्थानीय जनता...  अयोध्या और फैज़ाबाद के लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाना मुहाल हो गया है। रामलला के दर्शन करने या घूमने आने वाली जनता से होने वाली कमाई पर टिकी शहर की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है। दुकाने बंद पड़ी हैं या ग्राहकों से खाली...और यह सारा हंगामा उस चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर हो रहा है जिसका ना तो अभी वक्त है और ना ही स्थानीय जनता से रत्ती भर भी समर्थन। 


छावनी बना शहर, स्थानीय लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाना हुआ मुश्किल

रामेश्वर दास की सरयू नदी के पास एक छोटी सी पूजा सामग्री की दुकान है, जो उसकी रोज़ी रोटी का एकमात्र साधन है। इस दुकान से ही रामेश्वर अपने पांच लोगों वाले परिवार का पेट पाल रहा है... अपनी बीमार मां का इलाज करा रहा है। बेटे को हाईस्कूल में पढ़ा रहा है और बेटी की शादी की तैयारी कर रहा है। उसने सोच लिया था कि इस बार सावन और भादों के मौसम में इतना कमा लेगा कि बेटी की शादी के लिए पैसा जुट जाएगा। लेकिन कम्बख्त राजनीति और राजनेता.... जो मौसम कमाने का है... उस सीजन में तो लोगों का आना ही बन्द हो गया।

सूना पड़ा सरयू का तट
विहिप की चौरासी कोसी परिक्रमा की गूंज क्या गूंजी... अयोध्या थर्रा गया। पुलिस ने अयोध्या समेत फैज़ाबाद और आस-पास के इलाकों, रास्तों और कस्बों को छावनी बना दिया है। जगह-जगह बैरीकेडिंग हो गई है, नतीजा... लोगों ने यहां आना बन्द कर दिया और सामान्य दिनों में एक दिन की दुकानदारी में चार- पांच हज़ार रोज की कमाई कर लेने वाले रामेश्वर की दुकान पर आजकल 300-400 रुपए भी मुश्किल से आ रहे हैं।

 सरयू का तट जो हमेशा चहल-पहल से भरा रहता था, लगभग सुनसान सा हो गया है...सड़क पर कर्फ्यू जैसा माहौल है, कोई यहां आना नहीं चाहता। क्या सब्ज़ी वाले, क्या रिक्शा वाले, क्या फेरी वाले, क्या दुकानदार.. सभी परेशान है।

 छोटे दुकानदार और फेरी वालों पर पड़ी सबसे ज्यादा मार

लगभग यही हाल फैज़ाबाद में लकड़ी के छोटे-छोटे खिलौने, करछुल, मसाजर, स्पैटुला, तस्वीरें, खड़ाऊ, रई वगैरह बेचने वाले रघु का है। आस-पास के ग्रामवासी और दूसरे राज्यों से आने वाले पर्यटक रघु का यह सामान शौक से खरीद कर ले जाते हैं लेकिन अब पुलिस और राजनेताओं की हलचल और इसके कारण विवादों में घिरी राम लला की नगरी से लोगों ने कन्नी काटनी शुरू कर दी है। लोग कम आते हैं तो रघु की बिक्री भी कम ही होती है। पता नहीं इस महीने कहीं फांको की नौबत ना आ जाए।

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, पन्नू गाइड, गिरधारी पान वाला, विष्णु तस्वीर वाला, सुनील मछलियों के लिए आटे की गोलियां बेचने वाला,  नाव चलाने वाले मल्लाह, गले की मालाएं, जंजीरे, कड़े, चूड़ियां आदि बेचने वाला अन्तु और यहां तक कि सरयू नदी के पास ही सुलभ शौचालय चला कर रोज़गार कमाने वाले मानस जैसे सभी लोग विहिप के इस चौरासी कोसी परिक्रमा के चक्कर में उलझ कर परेशान हो रहे हैं।

ढाबे. धर्मशालाओं और चाय-समौसों की दुकानों का कारोबार भी प्रभावित

फैज़ाबाद से अयोध्या के रास्ते में बने बहुत से ढाबों पर आजकल खाना कम बनता है। अयोध्या में सड़क किनारे बनी चाय, समोसे, जलेबी और पूरी सब्ज़ियों की दुकानों पर भी मेज़े खाली पड़ी हैं
जहां पहले इस सीजन में इन दुकानों और ढाबों के बाहर लोगों की लाइन लगी रहती थी, आजकल मुश्किल से भीड़ जुटती है। कारीगर खाली बैठे हैं, चूल्हे ठंडे पड़े हैं और आटा ऐसे ही रखा है।

होटल वालों और धर्मशालाओं की हालत तो और भी खराब है। यहां कमरे खाली पड़े हैं। नए लोग तो आए नहीं बल्कि जब से चौरासी कोसी का मामला गर्माया है पहले से रह रहे लोग और होटल छोड़ कर चले गए।

  • यहां हिन्दू-मुस्लिमों के बीच सौहाद्रपूर्ण वातावरण
  • मुस्लिम आज भी बनाते हैं खड़ाऊं और रामलला की तस्वीरें
फैज़ाबाद के निवासी विकास अग्रवाल बेहद रोष के साथ बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए अयोध्या का इस्तमाल करती हैं। कभी कोई राम मंदिर बनाने की मांग को लेकर आ जाता है तो कभी असमय चौरासी कोसी परिक्रमा की बात चलती है और इन सब के बीच यहां के स्थानीय निवासी पिस जाते हैं।

विकास साफ कहते हैं कि फैज़ाबाद और अयोध्या में कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच कोई झगड़ा नहीं है। दोनों प्यार और एकता के साथ रहते हैं। बल्कि असलियत तो यह है कि यहां आज भी मुसलमान खड़ाऊ बनाते हैं और रामलला की तस्वीरों को फ्रेम में जड़ते हैं। बाकी हिन्दुस्तान या दुनिया में कुछ भी चल रहा हो लेकिन यहां कम से कम हिंदू-मुसलमान के बीच कोई तनाव नहीं। और वैसे भी यहां किसी के पास इन सब लड़ाईयों में उलझने का वक्त ही नहीं है। लेकिन बाहर के कुछ आसामाजिक तत्व या राजनीतिक पार्टियों द्वारा भटकाए गए कार्यकर्ता ज़रूर यहां आकर माहौल को गंदा करते हैं और यहां के शांति और सौहाद्रपूर्ण वातावरण में ज़हर घोलने का काम करते हैं।

यहीं के एक अन्य निवासी सचिन शर्मा जो फैज़ाबाद में एक छोटे होटल के मालिक हैं बताते हैं कि यहां के लोगों को राजनीति से इतना सरोकार नहीं है कि वो जब तब राजनेताओं के बहकावे में आकर उन्हीं लोगो से लड़ाई करें जिनके साथ वो रह रहे हैं या फिर छोटी-छोटी बातों पर दंगा करने पर उतर आएं। यहां कोई बहुत अमीर लोग नहीं रहते। मध्यमवर्गीय इलाका है, मध्यमवर्गीय लोग है जिनकी आय का मुख्य साधन यहां आने वाले पर्यटकों से होने वाली कमाई पर निर्भर है। और यह पर्यटक भी कोई बहुत उच्चवर्गीय नहीं होते। यहां अग्रेज़ या बाहर के देशों से तो लोग आते नहीं, मुख्यतः आस-पास के शहरों. गांवो, राज्यों या भारत के ही अन्य राज्यों से लोग आते हैं जिनका आने का कारण मुख्यतः धार्मिक रहता है।

यह मध्यमवर्गीय लोग ही यहां के निवासियों की रोजी कमाने का साधन है जो इन्हें पूजा सामग्री, लकड़ी की छोटी-मोटी वस्तुएं, आर्टिफिशियल गहने, तस्वीरे आदि बेच कर अपना काम चलाते हैं। और जब अयोध्या राजनीतिक क्रियाकलापों की धुरी बन जाता है तब सबसे पहले यहां सैनिक उतरते हैं, पुलिस बल बढ़ता हैजैसा कि इस बार हुआ। बाहरी लोग यहां आकर टिक गए। तनाव उनकी वजह से बढ़ा, शहर छावनी उनकी वजह से बना और परेशान हो गई जनता...
  • जिस चौरासी कोसी परिक्रमा को लेकर इतना हंगामा है, वो तो अप्रैल-मई में होती है
  • स्थानीय जनता नहीं कर रही है समर्थन

विकास अग्रवाल बताते हैं कि चौरासी कोसी परिक्रमा के लिए यहां के स्थानीय़ निवासियों में से तो शायद चौरासी लोग भी ना जुटें। यह परिक्रमा साधू संत करते हैं और यह अप्रैल-मई के दौरान होती है। बाकी यहां मुख्यतः पचकोसी और चौदहकोसी परिक्रमाएं होती हैं और वो भी दीवाली के आस-पास। इसलिए इस वक्त यह मुद्दा उठाना गलत है और सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया गया जान पड़ता है।

Monday, 26 August 2013

शरीर और मन को एक सूत्र में बांध देता है योग

योग के साथ मेरे अनुभव
योग में जाकर ही अपने शरीर और मन की शक्ति को जाना जा सकता है
लम्बे और सुखी जीवन की कुंजी है प्राणायाम
मंत्र और योग-निद्रा तनाव दूर करके मन में खुशी भर देते हैं

योग क्या है, इसे कैसे करते हैं, इसके क्या फायदे हैं, इसके बारे में सुना ज़रूर था लेकिन अब से एक साल पहले तक कभी भी किसी योग्य गुरू के सानिध्य में योग करने का मौका नहीं मिला। फिर यह भी सुन रखा था कि योग के लिए योग्य गुरु अत्यन्त आवश्यक है। अगर गलत तरीके से योग किया जाए तो नुकसान ज़्यादा होता है फायदा कम... और चूंकि यहां घर के आसपास कोई अच्छा योग संस्थान नहीं था नहीं इसलिए योग करने का मौका ही नहीं मिला।

जब भी वज़न घटाने का मन हूआ जिम ही जाना पड़ा। पिछले साल मैं जब अपने बढ़ते वज़न से बहुत ज्यादा परेशान थी तो फिर से पास ही एक जिम में जाना शुरू किया। लगभग 2 महीने तक बहुत मेहनत करने के बाद भी वज़न टस से मस ना हुआ... ऊपर से मैं थक इतना ज्यादा जाती थी कि घर आकर कोई और काम होता ही नहीं था.. फिर भी वज़न घटाने की चाह में जिम जाती थी.. पर काफी दिनों तक भी जब कोई परिणाम नहीं मिले मैंने जिम बीच में ही छोड़ दिया और योगा कक्षा की तलाश शुरू की।
आखिरकार पास ही में बापू नेचर क्योर अस्पताल में योग कक्षाओं का पता चला और मैंने उसमें जाना शुरू कर दिया....
पहली ही क्लास में योग करते हुए इतना ज़्यादा अच्छा लगा कि मैंने उसी समय ठान लिया कि अब योगा ही करना है... जैसे जैसे मैं योगा करती गई, इसे जानती गई, और प्राणायाम करना भी मुझे आने लगा मुझे अच्छा और हल्कापन तो महसूस होने ही लगा साथ ही मेरे मन से तनाव भी काफी हद तक कम हो गया।

जहां अब तक जिम में मैं मशीनों की सहायता से व्यायाम करती थी और काफी थक भी जाती थी वहीं योग ने मुझे मेरे खुद के शरीर के प्रयोग से व्यायाम करना सिखाया। यहां कोई मशीन नहीं थी- सिर्फ एक दरी..., खिड़की, दरवाज़ो और रौशनदानों से भरपूर खुला हुआ हवादार कमरा, दीवारों पर ओम की तस्वीरें, शांत माहौल और योग गुरू की आवाज़।
हमारा योग कक्ष
जिम में जहां मैं कई बार तेज़ आवाज़ में बजते गानों की आवाज़ से परेशान हो जाती थी वहीं योग-कक्ष का यह सौम्य वातावरण बेहद शांत अनुभूति देता था। तीसरी मंजि़ल पर बने हमारे साफ-सुथरे, गोबर से लिपी दीवारों और बांस और फूस की बनी ढालू छत वाले योग कक्ष की खिड़कियों से कहीं नीम के वृक्ष की कोमल टहनियां अंदर झांकती थी तो कहीं से सदाबहार के रंग-बिरंगे फूल...

इस कक्ष में आकर ही इतना अच्छा महसूस होता था कि अपने आप मन योग को करने लगेगा। हमारे योग की शूरूआत ओम् के उच्चारण से होती है। हम सभी अपनी-अपनी दरी पर आलथी-पालथी मार कर बैठ जाते हैं और ध्यानावस्था में आंखे बन्द करके सबसे पहले तीन बार ओम् का उच्चारण जिसे हमारे योग गुरू रवीन्द्र जी उदरध्वनि प्राणायाम कहते हैं, करते हैं।

हमारे योग गुरू रवीन्द्र सर
तीन बार सांस के साथ ओम् का उच्चारण और उसके बाद तीन बार गायत्री मंत्र का जाप... इसके बाद हम दोनों हाथों को आपस में रगड़कर गर्म हो चुकी हथेलियों को बंद आंखो पर रखते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे आंखे खोलते हैं.... शुरूआत में ही योग की यह प्रार्थना बेहद सुकून देती है। मन में शांति का अहसास होता है.... बहुत अच्छा लगता है।
शुरूआती प्रार्थना के बाद थोड़ा सा वॉर्म-अप व्यायाम- जिसमें चक्की चालन, नौका चालन, बटरफ्लाई और कुछ ऐसे ही थोड़े बहुत शारीरिक व्यायाम होते हैं जिन्हें लगभग 15 मिनट तक धीरे-धीरे करने के बाद हम योग शुरू करते हैं।

योग की शुरूआत होती है सूर्य नमस्कार से। जो शरीर की 13 अवस्थाओं से मिलकर बना एक चक्र है और अपने आप में संपूर्ण व्यायाम माना जाता है। अगर आपने योग शुरू ही किया है तो विश्वास कीजिए जिम में घंटो मशीनों के साथ एक्सरसाइज़ करते या ट्रेडमिल पर दौड़ते हुए भी आपको इतना पसीना नहीं आता होगा जितना की सूर्य नमस्कार के सिर्फ तीन चक्र करने पर आ जाएगा। और आपके पूरे शरीर के हर जोड़ का व्यायाम हो जाएगा सो अलग।

खैर हम लोग तो रोज़ सूर्य नमस्कार के बारह से पंद्रह चक्र करते हैं। और इसके बाद पांच मिनट तक शवासन में विश्राम के बाद शुरू होते हैं अन्य योग... जैसे ताड़ासन, वृक्षासन, वीरभद्र आसन, कटिचक्रआसन, त्रिकोणासन, पवनमुक्त आसन, उत्थान पाद आसन, सर्वांगासन, हलासन, नौकासन, धनुरासन, भुजंगासन, गौमुख आसन आदि... इनमें से हर रोज़ कुछ कुछ, अलग-अलग आसन किए जाते हैं। हर आसन शरीर के एक विशेष हिस्से को सुदृढ़ और कुशल बनाने के लिए होता है...
योग कक्ष में शवासन में आराम

 योग का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसका हर आसन आपके शरीर के लचीलेपन को बढ़ाता है और चूंकि सभी आसन सांस के साथ किये जाते हैं, यह सांस के प्रति आपकी सजगता को बढ़ाते हैं। हर आसन के साथ आप अपने शरीर को और जान पाते हैं।

यह जिम जैसा बेहद थकाने वाला व्यायाम नहीं है बल्कि हर बार योगासन करके बहुत अच्छा लगता है। शुरूआत में आप किसी आसन को नहीं कर पाते और उसे लगातार करने की कोशिश करते हैं और फिर कुछ समय के बाद जब अभ्यास के साथ आप उस योगासन को करना सीख जाते हैं तो बेहद खुशी का अनुभव होता है।
हर आसन को कुशलता के साथ करना सीख लेने के साथ आपकी अपने शरीर और सांसो के प्रति सजगता और लचीलापन बढ़ता जाता है। और अगर आपका वज़न ना भी घटे तो शरीर का अच्छी शेप में आना तय है और वो भी जिम के व्यायाम से कहीं जल्दी और सरलता से।

योग का एक महत्वपूर्ण भाग है प्राणायाम जिसे आमतौर पर योगाभ्यास के बाद किया जाता है। सभी योग हो जाने के बाद पांच मिनट तक शवासन या बालासन में विश्राम के बाद फिर से आलती पालथी मार कर बैठते हैं और प्राणायाम करते हैं। कपाल भांति प्राणायाम और अनुलोम विलोम प्राणायाम तो हम लगभग रोज ही करते हैं, लेकिन यहां आकर मैंने और भी प्राणायाम जैसे नाड़ी शोधन, भ्रामरी, बाह्यान्त्र, अभ्यान्त्र, उज्जयी प्राणायाम आदि के बारे में जाना और उन्हें करना सीखा...

प्राणायाम शरीर के बंधों के साथ किए जाते हैं जिनमें मूल बंध, जालंधर बंध और उड्डयान बंध होते हैं। इन बंधो को लगाना सीखने के बाद आपको अपने शरीर पर अच्छे से नियंत्रण करना आ जाता है। शरीर का पोश्चर अच्छा हो जाता है। शरीर का संतुलन बढ़ जाता है। योगा करने के बाद ही मैं जान पाईं कि हमारे शरीर और सांसों में एक रिद्म होता है, शरीर के हर भाग और सांसो पर नियंत्रण मुकम्मल करता है योग।

प्राणायाम करते लोग
यहां आकर मैंने जलनेति भी सीखा...यानि एक नाक से पानी अंदर लेकर दूसरी नाक से निकालना... सुनने में ज़रूर मुश्किल है लेकिन एक बार जो योग करने लगे उसके लिए सबकुछ आसान हो जाता है... जलनेति नाक को साफ करने, ज़ुकाम, खांसी और यहां तक साइनस से भी लड़ने का बेहद अच्छा उपाय है। और जिन लोगों को खर्राटों की परेशानी है उनके लिए तो जलनेति से अच्छा कोई इलाज ही नहीं। मैंने यहां बहुत से लोगों को खर्राटों के इलाज के लिए जलनेति और सूत्रनेति करने आते देखा है।

एक और चीज़ का ज़िक्र ज़रूरी है और वो है योग निद्रा.... शरीर और मन का आराम क्या होता है, शरीर के हर छोटे से छोटे अंग को कैसे जाना और समझा जा सकता है और कैसे तनाव से मुक्ति पाकर पूर्ण आराम की अवस्था में पहुंचा जा सकता है... यह मुझे योग निद्रा ने समझाया। योग निद्रा- वो निद्रा जिसमें हम सोते नहीं बस बाहरी संसार से विमुख होकर अपने शरीर और मन के प्रति सजग हो जाते हैं और असीम शांति का अनुभव करते हैं।

योगा में आकर जाना कि मंत्रों का भी हमारे शरीर और मन पर बेहद प्रभाव पड़ता है। गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र मन की चेतना और स्वास्थ्य के लिए अमृत सरीखे हैं।

जिम ने मुझे शरीर को थका कर पसीना बहाना सिखाया था और योगा ने मुझे शरीर को जानना सिखाया। योगा में आकर जाना कि आप सब कुछ अपने शरीर से ही पा सकते हैं, सिर्फ मन और शरीर को एकसार करने की ज़रूरत है। आपके शरीर में ही हर बीमारी का इलाज है बस योग से उस शक्ति को जगाने की ज़रूरत है। जिम आपके शरीर को मज़बूत बनाता है और योग शरीर में छिपी मज़बूती को सामने लाता है।

प्राणायाम सांसों की गति को जानना, समझना और उन्हें बढ़ाना सिखाते हैं। वायु या सांस को योग में प्राण कहते हैं, और प्राणायाम प्राण को बस में करने की तकनीक है। बस एक बार प्राण आपके बस में आ जाए, शरीर आपके नियंत्रण में अपने आप आ जाएगा... और फिर एक स्वस्थ शरीर और दिमाग के साथ जीवन जीने का आनंद और खुशी दोगुनी हो जाएगी।

(यह मेरा अपना अनुभव और विचार हैं। इसको लिखने का मकसद जिम जाने वालों को हतोत्साहित करना बिल्कुल नही ंहै, हां पर कम एक बार योगा करने के लिए प्रोत्साहित करना ज़रूर है)

Saturday, 24 August 2013

काश फिर लौट आए मेरी अनगिनत प्रतिभाओं का बचपन....

कभी हम भी ऐसे कार्यक्रमों का हिस्सा हुआ करते थे
एक ज़माना वो भी था जब हम भी राधा-कृष्ण, गोपियां, पन्ना धाय, डांडिया नर्तक या कैटवॉक करते मॉडल बन कर मंच पर उतरा करते थे। जब मेकअप रूम में नई-नई पहचानें और पात्र गढ़े जाते थे और भारी-भरकम कपड़े-गहने पहनकर और साज श्रंगार करके हम अनुशासित तरीके से मंच पर जाने का बेसब्री से इंतज़ार करते थे। एक बार मंच पर पहुंचे नहीं कि हमारा प्रदर्शन देखने लिए बाहर कुर्सियों पर इतंज़ार करते लोगों के चेहरे पर मुस्कान खिल जाती थी और हम मंच पर चाहे आगे हों या पीछे, मुख्य पात्रों का हिस्सा हों या बैकग्राउंड की भीड़ का भाग...... अपने हिस्से का अभिनय कुशलतापूर्वक करके खुद को बेहद गौरवान्वित महसूस करते थे। सैकड़ो तालियों की गूंज में हम अपने लिए प्रशंसा और खुशी ढूंढ लेते थे।

डांस के लिए बेहद उत्साह से तैयार हुआ मेरा बेटा
कल अपने बेटे के स्कूल में जन्माष्टमी उत्सव के लिए गई और उसके साथ इतने सारे अन्य छोटे-छोटे बच्चों को मंच पर अपनी नाट्य प्रतिभा का प्रदर्शन करते देखा तो दिल खुश हो गया। सहसा ही बीते हुए उन स्कूली दिनों की याद आने लगी जब हम भी स्कूल में थे और अध्यापक-अध्यापिकाओं द्वारा तैयार किए गए स्टेज कार्यक्रमों का हिस्सा बनते थे। बच्चों की परफॉर्मेंस में मुझे अपना बचपन याद आने लगा।

जब मेरा बेटा स्कूल में अपने डांस के लिए इतने उत्साह से तैयार हो रहा था तो पहले तो उसे डांट दिया कि क्यों इतने एक्साइटिड हो यह तो सभी करते हैं... लेकिन फिर अचानक ही अपने वाक्य पर खुद ही सोचने लगी। सभी कहां करते हैं... बचपन में शायद करते हों लेकिन बड़े होकर तो नहीं किया... और आज अगर वो उत्साहित है तो यह होना लाज़िमी है... भूल गईं अपने स्कूली दिन चित्रा जब अगर छोटा सा भी तुम्हारा रोल हो तो उसकी तैयारी में और उसके लिए तैयार होने में रातों की नींद उड़ जाया करती थी। आखिर मंच पर प्रदर्शन देने वाले हम अपने आपको कक्षा के बाकी छात्र-छात्राओं से अलग जो समझते थे... और लोग कक्षा में पढ़ाई करेंगे और हम अपनी परफॉर्मेंस की तैयारी करने जाएंगे... कितने गर्व से टीचर को बताया करते थे कि मैम हमें एन्युअल फंक्शन की तैयारी के लिए जाना है....

अब सोचती हूं कि बड़ा होकर हमने यह मज़ा और उत्साह तो खो ही दिया। वो मंच पर पहुंचने से पहले का डर, कि कहीं कुछ गलती ना हो जाए... वो अपना कार्यक्रम पूरा होने के बाद की खुशी कि हमने तो सब कुछ सही सलामत कर लिया अब बाकियों की बारी... अब यह अनुभव क्या फिर कभी होगा..

कल अनमोल के स्कूल के इतने सारे बच्चों को मंच पर अभिनय करते देखकर लगा कि दरअसल स्कूल का मंच ही ऐसा मंच है जो बच्चों के इतने सारे टैलेंट बाहर निकालकर लाता है। हमारे भी लाया था... चाहे अभिनय की प्रतिभा हो या वाद-विवाद, या नृत्य या गान, रंगोली या पेन्टिंग.. या एथलेटिक्स हो या फिर फुटबॉल, बास्केट बॉल या बैडमिंटन का गेम.. या एनसीसी और एनएसएस ही क्यों ना हो.. हममें से कितने ही ऐसे लोग हैं... जिन्होंने स्कूल या कॉलेज में तो इन विधाओं में शायद जीत दर्ज की हो, कीर्तिमान स्थापित किए हों लेकिन अब याद भी नहीं होगा कि कभी हम भी ये सब किया करते थे...
कभी हममे से किसी ने भी मंच पर ऐसे मटकी फोड़ी होगी
जब तक स्कूल में थे अपनी प्रतिभाओं के प्रदर्शन पर तालियां पाकर मन खुश हो जाता था, हम खुद को सातंवे आसमान पर पाते थे और आज हमारी प्रतिभाएं ही बदल गईं है... शायद आज वो अच्छा स्टेटस, आत्मविश्वास, सेलरी, फैशन और हम अपनी जॉब और घर को कितना संतुलित कर सकते हैं, कितना अच्छे से अपने आपको प्रेज़ेंट कर सकते हैं... के प्रदर्शन पर आकर टिक गईं है... पर यह भी वक्त की मांग है और डार्विनिज़्म के अनुसार टिक वहीं पाता है जो खुद को बदलते वक्त के साथ ढाल पाता है।

खैर अपने बेटे के स्कूल का प्रोग्राम देखकर मुझे भी अपने दिन याद आ गए। काश कोई जादू की छड़ी मेरे पास होती और मैं कुछ समय के लिए उन दिनों को वापस लौटा पाती...अपनी अनगिनत प्रतिभाओं को जान और प्रदर्शित कर पाती... सजती-संवरती, मंच पर जाती, तालियां बटोरती और वापस आ जाती....   

Ek Ruka hua Faisla...

Ek ruka hua Faisla (A delayed verdict)... Saw this fabulous movie once again today. Whenever I see this movie it makes me introspect my own acts, counteracts & judgements.
Almost all the times it happens that our decisions & judgements are based on conceived notions. What we learn from our observations become our experiences, experiences become beliefs & beliefs definitely interfere with our pragmatism & neutrality to judge situations & people........

  Ek ruka hua Faisla ..... When I saw this movie.. many of my doubts cleared. One must watch this movie to understand complexities of thoughts, nature & one's responses towards something or someone.. & most importantly to understand the fundamentals of our judgement.
The movie gives a fantastic message that no one in this world is pure & in perfect neutral condition to judge a misdeed conducted by some x, y, z person.

The movie is a jurors' room drama. Their hesitations, beliefs & dilemma about convicting a slum lad - an accused of murdering his father, have beautifully been portrayed by the director.

Is the boy guilty or non guilty? ....the movie revolves around the debate. Twelve jurors are about to discuss whether or not the boy should be convicted. Each one of the jurors has his own view with which he sees the crime & the accused. Only one of the 12 jurors conceives the accused non guilty & says he actually is a victim of situation & biased perceptions.

He eventually discusses every little detail of the case & statements of the witnesses. One of the jurors wants to reach home soon so he can enjoy evening show of Dilip Kumar's Mashaal..., one hates slum dwellers & one particularly wants to hang the boy to satisfy his anger for his own son who doesn't take care of him (Pankaj Kapoor in a marvelous role). As jurors discuss the case & pull their doubts..., skeletons start falling from their own cupboards. The movie shows jurors as same ordinary persons we all are & like us they all have their beliefs & perceptions which affect their judgement.

I feel this movie is a social message. It clearly states that no person is perfect, unbiased, neutral & qualified enough to judge other person's acts. Every single being, no matter how intelligent or intellectual he may be, has his own biases & perceptions that greatly affect his power & wish of discriminating between right & wrong....


Friday, 23 August 2013

लोग अछूतों की तरह व्यवहार करते हैं हमसे.. पानी पिलाना तो दूर तमीज़ से बात तक नहीं करते...

यह लोग मेरे घर आते हैं आपके यहां भी ज़रूर आते होंगे.. कभी कोई चिट्ठी लेकर, कभी रिश्तेदारों द्वारा भेजे गए उपहार लेकर तो कभी आपके द्वारा वेबसाइट या टीवी से मंगाए गए सामान को लेकर।
लेकिन कभी आपने इन पर गौर किया है। कितनी ही बार ऐसा हुआ होगा कि जब ये आप के घर की घंटी बजाते हैं तो आप झुंझला पड़ते हैं कि यहीं समय मिला था आने का... आप इन्हें हमेशा गेट के बाहर रखते हैं, कई बार तो आप इन पर अपना गुस्सा भी उतारते हैं... शायद ही हमारे मन में कभी खयाल आता होगा कि यह भी हमारे जैसे पढ़े लिखे इंसान है, इनकी भी इज़्जत है और प्यार और तमीज़ से बोला जाना इन्हें भी अच्छा लगता है....
आरामैक्स कूरियर कंपनी के फील्ड ऑफिसर कुलदीप 
हमने जब होम शॉप एट्टीन का सामान पहुंचाने वाले दो डिलीवरी बॉयज़ से बात की तब उनकी ज़िंदगी और हम लोगों द्वारा अनजाने या जान बूझ कर इनके अपमान किए जाने का आभास हुआ।

इनकी ज़िंदगी मोटरसाइकिल पर कटती है। होम शॉप एट्टीन का सामान कस्टमर तक पहुंचाने वाली कूरियर कंपनी आरामैक्स के फील्ड ऑफिसर या आम भाषा में कहें तो डिलीवरी बॉयज़ सुबह नौ बजे से कूरियर पहुंचाने का अपना काम शुरू कर देते हैं। कंपनी में लगभग 40 फील्ड ऑफिसर्स हैं और सभी दिल्ली के अलग-अलग इलाके कवर करते हैं। कुलदीप और इनके दोस्त देवेंदर पाल पूर्वी दिल्ली का इलाका कवर करते हैं।

जब हमने कुलदीप से पूछा कि आप की क्वालिफिकेशन क्या है तो उन्होंने बताया कि वो आर्ट्स में स्नातक हैं इनके दोस्त देवेंदर के पास भी स्नातक की डिग्री है लेकिन वो इस काम को करने के लिए मजबूर है क्योंकि उन्हें कोई और काम नहीं मिला। और अब इस काम को दिन में 11 से 12 घंटे और महीने के छब्बीस दिन करते हुए वो इतने व्यस्त रहते हैं कि दूसरी नौकरी ढूंढने का उनके पास समय ही नहीं है।

आरामैक्स कंपनी के ही देवेन्दर पाल
इस काम से आपकी कितनी आय हो जाती है... इस सवाल के जवाब में कुलदीप ने बताया कि उनका पैकेज साढ़े नौ हज़ार रुपए प्रति महीने का है जिसमें से 600 रुपए पीएफ के कट जाते है बाकी मैडिकल इंश्योरेंस वगैरह कट कर इनके हाथ हर महीने आठ से साढ़े आठ हज़ार रुपए आते हैं। कंपनी पेट्रोल का खर्चा रोज़ अलग से देती है।
इतने रूपए में खर्च चल जाता है आप लोगो का... जब हमने यह पूछा तो देवेन्दर ने कहा... खर्च चलने या चलाने की बात कहां है, घर तो चलाना ही है, चाहे हंसकर चलाएं या रोकर। पैसे इतने ही मिलते हैं, कोई और काम करने का समय नहीं है तो घर इनमें ही चलाते हैं जैसे भी चले....हम अगर एक भी दिन घर पर बैठ जाएं तो कंपनी पैसे काट लेती है। बीमारी हो या घर में कोई कैजुअल्टी हो, शादी हो या त्यौहार हो... इससे कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें तो महीने की चार इतवारों की छुट्टी के अलावा हर रोज़ काम पर जाना ही है। ज़िंदगी मुश्किल है लेकिन क्या करें काम तो करना ही है।

आप अपने काम से संतुष्ट है...  जब हमने यह पूछा तो कुलदीप ने हंसते हुए कहा कि मैडम हमें तो असंतुष्ट होने का समय ही नहीं मिलता और ना अपना काम छोटा लगता है, रोटी तो इसी से खा रहे हैं। दिन भर मोटरसाइकिल पर घूम-घूम कर जितना मिलता है उसी में खुश रहने की कोशिश करते है लेकिन लोग हमें ज़रूर यह एहसास कराते रहते हैं कि हम बहुत छोटे लोग है और हमारी ज़िदंगी कीड़े मकौड़ो जैसी है....

आप ऐसा क्यों कह रहे हैं.. मैंने हैरानी से पूछा तो फिर से कुलदीप ही बोले....

"मैडम अब क्या बताएं, अपने काम से हमें इतनी परेशानी नहीं होती जितनी हमारे प्रति लोगों के रवैये से  होती है। जिनके घर हम सामान पहुंचाते हैं वो तो हमें इंसान समझते ही नहीं है। हम सुबह 9 बजे से ही डिलीवरी करने निकल जाते हैं। बारिश हो, धूप हो, पानी हो.. हमें तो अपना काम करना ही है लेकिन कई बार लोगों का व्यवहार हमारी तरफ इतना बुरा होता है कि मन खराब हो जाता है।"
 "कॉलोनी के ऊंचे-ऊंचे घर वाले लोग बहुत ही छोटे दिल वाले होते हैं। हम भी पढ़े लिखे हैं। लेकिन जब हम किसी के घर कुछ सामान पहुंचाने जाते हैं तो वो हमसे ऐसे अछूतो की तरह व्यवहार करते हैं कि क्या बताएं।"
 अपना अनुभव साझा करते हुए कुलदीप बोले कि एक बार तो मैं जून में यहीं कॉलोनी में तीसरी मंज़िल पर रह रही एक महिला के घर सामान पहुंचाने गया था। गर्मी बहुत थी वैसे तो हम लोग अपना पानी लेकर ही निकलते हैं लेकिन उस दिन पानी खत्म हो गया था तो मैंने उस महिला से कह दिया कि मैडम थोड़ा पानी पिला दीजिए। इस पर मैडम मुझसे बोलती हैं कि भैया आज हमारे यहां पानी आया नहीं था, इसलिए पानी है नहीं वरना पिला देते... और यह तो एक वाक्या है, जाने कितने ही लोग हमसे ऐसा ही व्यवहार करते हैं। खुद तो कभी पानी की खैर पूछते ही नहीं और अगर कभी हमने बहुत मजबूरी में पानी मांग लिया तो कभी अलग से रखी बोतल में लाकर दे देंगे.., कभी सादा पानी ले आएंगे, कभी मना कर देंगे, गिलास में तो कभी पिलाते ही नहीं जैसे कि हम अछूत हों।

अब तक चुप खड़े देवेंदर ने भी बताना शुरु किया..".कितनी ही बार बारिश आ रही होती हैं और हम सामान, देने जाते हैं तो भी लोग हमें बाहर ही खड़ा रखते हैं, लोगों को पैसे लाने होते हैं... 10-10, 15-15 मिनट में लोग पैसे लेकर आते हैं.. और तब तक बाहर शेड ना भी हो तब भी कोई यह तक नहीं कहता कि गेट के अन्दर आकर पोर्च में ही खड़े हो जाओ।"

"लोगों को पता होता है होम डिलीवरी पर आने वाला सामान खोलकर नहीं देख सकते, कंपनी पहले से ही रूल्स बता देती है लेकिन तब भी कई लोग तो इसी पर झगड़ा करते हैं। एक बार तो एक आदमी ने मेरे से बहुत ज़िद की कि सामान खोल कर देखने पर ही लूंगा। मैंने उनसे मना किया कि यह रूल्स के खिलाफ है तो वो मुझसे झगड़ा करने लगा, मुझे गाली तक दे डाली... और हम तो कुछ कह नहीं सकते क्योंकि कस्टमर तुरंत हैल्पलाइन पर शिकायत कर देते हैं। और कंपनी तो चूंकि कस्टमर से पैसे लेती है इसलिए कस्टमर उनके लिए भगवान है और हमारे जैसे लोगों की बेइज्जती होती भी रहे तो भी कंपनी मैनेजमेंट हमें यही कहकर चुप करा देता है कि यार तुम कुछ बोला मत करो.., या बहस नहीं करनी चाहिए थी.., या तुम्हारी गलती होगी वगैरह- वगैरह.."

 "मैडम हम भी पढ़े लिखे लोग है, भाग्य की बात है कि हम यह काम कर रहे हैं। बस लोगों के व्यवहार से दुख होता है। अगर हमें भी इंसान समझकर प्यार से और इज़्जत से बातें कर लेंगे तो उनका क्या घट जाएगा...."

कुलदीप द्वारा कहे गए इस आखिरी वाक्य ने मुझे भी अपने अंदर झांकने पर मजबूर कर दिया क्योंकि कई बार तो मैं भी कूरियर लेकर आने वाले लोगों पर झल्ला उठती हूं जब मैं टीवी देख रही होती हूं या अपना कोई काम कर रही होती हूं और अचानक से घंटी बजती है और मुझे उठकर जाना पड़ता है तो बड़ा गुस्सा आता है मुझे... खैर इन दोनों से बात करके मेरी भी आंखे खुली है और शायद मैं और मेरे जैसे इन दोनों की कहानी पढ़ने वाले लोगों की भी आंखे खुले और हम भविष्य में डिलीवरी बॉयज़ से इज़्जत से बात करें...

Wednesday, 21 August 2013

आसाराम बापू की एक भक्त की अंधश्रद्धा की कहानी

आज टीवी पर आसाराम बापू से जुड़ी खबर देखी तो हाल ही में आसाराम बापू की भक्त से हुई एक मुलाकात याद आ गई। सोचा आप सब से साझा करूं।
बात एक महीने पहले की है, मेरे एक जानने वाले हैं। आसाराम बापू के भक्त हैं। हर साल नए वर्ष पर उनके द्वारा छपवाए गए आसाराम बापू के उपदेशों के कैलेंडर हमारे यहां  उपहार स्वरूप आते हैं। लगभग दो महीने पहले उनके नए घर में जाने का मौका मिला। आधुनिक गैजेट्स और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण घर।

सुघड़ पत्नी जो घर का हर काम खुद करती हैं और दो बेहद प्यारे बच्चे। घर के ड्रॉइंग रूप में आसाराम बापू की एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी। चूंकि हमारे साथ भी दो बच्चे गए थे तो वो वहां पहुंचते ही परिचित के बच्चों के साथ दूसरे कमरे में चले गए। नाश्ते और चाय से फुरसत के बाद बच्चों के कक्ष में जाकर देखा तो, हैरान रह गई... उनके बच्चों के साथ मेरा बेटा और भतीजी दोनों लैपटॉप पर आसाराम बापू के प्रवचन देख रहे थे...

 कोई ढाई घंटे हम वहां रहे। उस दौरान परिचित की पत्नी की सुघड़ता और परिचित के घर की साज सज्जा की तारीफ करते रहे। घर था ही इतना साफ और सजा संवरा। पत्नी जी थी हीं इतनी सुलझी और सुघड़ कि मन प्रसन्न हो गया। उस दौरान उन्होंने अपने आसाराम बापू के अनन्य भक्त होने की बात भी बताईं। बताया कि वो बापू के हर उपदेश को मानते हैं और उनका जो कुछ भी है आसाराम बापू का ही दिया हुआ है.....। जब हम घर से विदा हो रहे थे तो पत्नी जी ने बच्चों को पहली बार घर आने के उपलक्ष्य में उपहार भी दिए।

उनके घर से निकलकर गाड़ी में वापस आने लगे तब मेरी भतीजी-  छठी कक्षा की छात्रा, बोली- चाची कैसे लोग थे, कैसे बच्चे थे, आपको पता है वो लोग लैपटॉप पर कोई गेम नहीं खेलते, सिर्फ आसाराम बापू के उपदेश सुनते हैं। टीवी पर कोई सीरियल भी नहीं देखते और जब हम लोगों ने उनसे लूडो खेलने को कहा तो उन्होंने लूडो खेलने से भी मना कर दिया। उन्होंने बताया कि उनकी मम्मी ने लूडो की गोटियां फेंक दी हैं और वो उन्हें लूडो नहीं खेलने देती...। आपको पता है चाची वो दोनों बच्चे किसी बर्थडे पार्टी में भी नहीं जाते, फिल्म भी नहीं देखते बस घर पर बापू के उपदेश सुनते हैं।

मैं हैरान... भतीजी को डांटा ऐसा नहीं कहते। अपने बेटे को भी चुप करा दिया.... लेकिन मन में सवाल उठने लगे... क्या आसाराम बापू को मानने वाले लूडो नहीं खेलते.....क्या लूडो वाकई इतना बुरा खेल है कि उसे उठाकर फेंक दिया जाए....क्या बच्चों का इस उम्र में सिर्फ उपदेश सुनना ज़रूरी है..... पत्रकार हूं, जिज्ञासु हूं और मन में सवाल उठते हैं तो एक बार पूछ कर समाधान ज़रूर ढूंढने की आदत है सो मन बना लिया कि अगली बार यहां आना हुआ तो पत्नी जी से इस बारे में पूछूंगी ज़रूर।

अगली बार लगभग एक महीने बाद जाना हुआ। इस बार साथ मेरी भाभी भी थी। रसोई में हम तीनों मिले तो सबसे पहले पत्नी जी से यही कहा कि आप आसाराम बापू की भक्त हो। इतनी अनुशासन प्रिय हो, आपके बारे में जानने और लिखने की इच्छा है। तुरंत पत्नी जी हंसते हुए बोली कि मुझे पता है पिछली बार आपके बच्चों को यहां अच्छा नहीं लगा था। आपकी भतीजी मेरे बेटे से बोल कर गई थी कि टीवी पर क्या बकवास देखते रहते हो...
उनको हंसते हुए बच्चों की बात करते देख मन प्रसन्न हो गया। सोचा यह तो बड़ी अच्छी है खुल कर बात करेंगी। खैर अपना मंतव्य उन्हें बताया। अपने बच्चो द्वारा बताई सारी बातों के साथ यह भी पूछा कि क्या लूडो खेलना आप बुरा मानती हैं...पत्नी जी मुस्कुराते हुए बोली कि नहीं बुरा नहीं मानती लेकिन अगर यह बच्चे लूडो खेलेंगे तो उन्हें लत लग जाएगी और यह मैं नहीं चाहती...। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे टीवी देखते हैं लेकिन केवल डिस्कवरी चैनल। वो भी टीवी पर सिर्फ चुनिंदा कार्यक्रम देखती हैं जैसे दिया और बाती सीरियल जिससे कुछ सीखने को मिलता है..।यह भी बताया कि उनके धार्मिक स्वभाव के कारण कॉलोनी के बाकी महिलाएं उन्हें पसंद नहीं करती लेकिन वो चूंकि आसाराम बापू की भक्त बनकर बाकी महिलाओं से ऊपर उठ चुकी हैं, उन्हें फर्क भी नहीं पड़ता ....

रहा नहीं गया मैंने पूछ डाला कि बच्चों को आप अगर घर में रोक भी लेंगी तो स्कूल में भी तो गेम खेल सकते हैं, इतने छोटे बच्चो पर अंकुश लगाने का क्या फायदा..इस पर पत्नी जी बोली कि यह स्कूल में क्या सीखेंगे, मेरे बच्चों ने तो अपने स्कूल के बच्चों को बदल दिया है। और फिर हम घर पर तो इन्हें संस्कार देते हैं, इनका ख्याल रखते हैं कैसे बिगड़ेंगे। मैंने पूछा कि क्या आसाराम बापू ऐसा कहते हैं... तो उन्होंने बताया कि नहीं बापू सिर्फ मंत्र देते हैं। वो हमारे गुरू हैं जब उनकी शरण में गए हैं तो उनके उपदेशों को तो मानना ही चाहिए।

फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप गुरू में नहीं मानती। आसाराम जी गुरू हैं हमारे, और गुरू के बिना भगवान नहीं मिलते.... मैंने जवाब दिया कि मैं भगवान में मानती हूं। लेकिन मुझे अब तक कोई गुरू नहीं मिला है और आसाराम बापू जैसे गुरूओं में मैं नहीं मानती जो इतनी लक्ज़ूरियस लाइफ जीते हैं....

बस मेरा इतना कहना था कि पत्नी जी के तेवर बदल गए। कहने लगी कि आपको कैसे पता कि वो ऐसी लाइफ जीते हैं। मैंने कहा कि उनकी काफी कंट्रोवर्शियल लाइफ है काफी इल्ज़ाम लगे हैं बस इसलिए पूछ रही हूं तो पत्नी जी गुस्से में बोली...सारी दुनिया आकर अगर य़ह भी कहे कि आसाराम बापू ने खून किया है हम तब भी नहीं मानेंगे। आपको शायद पता नहीं कि बिना गुरू के भगवान नहीं मिलते। आप कितनी भी कोशिश कर लो, आपको भगवान मिलेंगे ही नहीं जब तक आपके पास गुरू ना हो। और आसाराम बापू ऐसे ही गुरू हैं......

 मुझे भी अपनी गलती समझ में आ गई थी तुरन्त संशोधन किया कि मैं आपके गुरू के लिए कुछ नहीं कह रही बस अपना जिज्ञासा शांत कर रही हूं। मैंने उन्हें यह यह भी समझाया कि भगवान में मैं भी मानती हूं, बल्कि मैं गणेश जी की भक्त हूं लेकिन बस इस में नहीं मानती कि मुझे भगवान तक पहुंचने के लिए गुरू के सहारे की ज़रूरत है, और है भी तो आजकल पहले जैसे गुरू कहां मिलते हैं...। इस पर पत्नी जी और भड़क उठी... बोली कि आप खुद भगवान तक नहीं पहुंच सकते, गुरू ही आपकी पूजा भगवान तक पहुंचाता है, आपकी इच्छाएं भगवान तक पहुंचाता है और वो ही इतना ऊपर उठा हुआ होता है कि उसके ज़रिए ही भगवान आपकी बाते सुनते हैं और आपकी इच्छाएं पूरी करते हैं, वरना नहीं।

अब तक जो पत्नी जी मुझे समझदार लग रही थीं, पर उनकी इस अव्यावहारिकता पर मैं तिलमिला उठी.. वो अपने गुरू ज्ञान को सबसे बढ़कर मानती हैं यह अच्छी बात है लेकिन इसके कारण वो मेरी पूजा पर सवाल उठाएंगी इस बात की मुझे पत्नी जी से उम्मीद नहीं थी।

खैर अपने आपको भरसक शांत रखने की कोशिश करते हुए उनसे यहीं कहती रही कि मैं भगवान में मानती हूं और मैंने कई बार भगवान की उपस्थिति भी महसूस की है... और पत्नी जी यहीं जि़द करती रहीं कि चूंकि उनके आसाराम जैसे गुरू हैं उन्हें भगवान मिलेगा और इतना देगा कि उनकी झोली छोटी पड़ जाएगी लोकिन मैं कितनी भी पूजा-पाठ क्यों ना कर लूं मेरा कोई भला नहीं होने वाला.... अब तक तीखी बहस के कारण पत्नी जी का मूड काफी खराब हो चुका था।
खैर बुरा मुझे भी लगा था और फिर अप्रिय बहस होते देख हम लोग जल्दी ही विदा लेकर चले आए।

....... अब इस घटना के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि जो लोग आसाराम बापू में यकीन करते हैं वो वाकई उनके अंधभक्त हैं... या शायद हो सकता है उन्हें ऐसा कुछ आनंद मिला हो जो  वो बापू के बारे में कोई बात नहीं सुनना चाहते और उन्हीं के रास्ते पर चलना चाहते हैं। यह भी सच हैं कि पत्नी जी ने बहुत सी अच्छी बातें भी बताईं जो कि अमल में लाने लायक थी लेकिन जो मुझे चुभा वो  थी उनकी अव्यावहारिकता और तर्कहीन विश्वास...
इस घटना के बाद मुझे यकीन हो गया कि आसाराम बापू जैसे लोग यूंही हवा में बाते नहीं करते, उन्होंने वाकई अपने अंध समर्थक बनाए हैं...और उनके ऊपर कोई आरोप सिद्ध हो भी गया तो उनके अनुयायी बापू का कुछ नहीं होने देंगे।

मैं नहीं जानती कि मीडिया में उठने वाली कंट्रोवर्सीज का कोई आधार है, या नहीं या फिर आसाराम बापू कितने अच्छे गुरू या इंसान हैं लेकिन मैं इतना ज़रूर जानती हूं कि बड़े से बड़ा अनुयायी और गुरू अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को भी उसी गरिमा से हैंडल करता है जितना कि वो अपनी प्रशंसा को करता है...और अगर गुरू की भक्ति आपकी सोच को सिर्फ ऐसा ही बना दे कि आपको लगे कि आप जो कह रहे हैं वहीं सच है, दुनिया में कोई और सच हो ही नहीं सकता या फिर आप अपने गुरू को ही भगवान का दर्जा देने लगें और दूसरो की बातों और विश्वास को गलत बताने लगे, तर्कहीन बातें करने लगे तो यह उत्थान का इशारा है या फिर पतन का..... ...?

बिहार की नदियां और चचरी का साथ...

पूर्वोत्तर भारत में जब-जब सावन-भादों में नदियों का बेकाबू बहाव गांव के दो हिस्से कर डालता है तब-तब गांवों को जोड़ता है चचरी.... बिहार के सुदूर ग्रामीण इलाकों में जबसे ग्रामों के बीच में नदियां बह रही हैं तब से गामीणों की नैया पार लगा रहा है चचरी....., 2008 में कोसी मैया के विकराल रूप और प्रलय के बाद जब राज्य के जिले पानी में डूब गए और सड़के बह गई तब भी यहां के निवासियों का सहारा बना चचरी....
लोगों को सड़क से, बच्चों को स्कूल से, पनिहारिनों को कूंए से, गांव को मुखिया से, बहुओं को मायके से और बीमार को दवाखाने से जोड़ने का काम बरसों से कर रहा है 'चचरी'....

बिहार के एक गांव में नदी पार करने के लिए बना बांस का चचरी पुल
 इतना वर्णन पढ़ने के बाद आप में से बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि आज तो माथा घुमा दिया लेखिका ने... चचरी...चचरी..चचरी की कचर-कचर लगा रखी है पर आखिर यह चचरी है क्या यह भी तो पता चले। तो जानिए चचरी क्या है....
 हममें से कुछ एक लोग तो इस नाम से वाकिफ होंगे, लेकिन बहुत सारे लोग जो चचरी को नहीं जानते उनकी जानकारी के लिए बता दें कि चचरी बांस को आपस में बांध कर बनाए गए अस्थाई पुल को कहते हैं।

भारत के अन्य हिस्सों में तो चचरी के दर्शन शायद दुर्लभ हों लेकिन पूर्वोत्तर भारत, खासकर बिहार में यह चचरी पुल लोगों के जीवन का हिस्सा हैं। यहां जितने गांव नहीं है उससे ज्यादा नदियां हैं, तिस पर भी हाल यह कि गांव का आधा हिस्सा नदी के इस पार है तो आधा उस पार। घर इस पार है तो खेत उस पार, स्कूल इस पार है तो छात्र उस पार, गांव इस पार है तो पंचायत उस पार.... हांलाकि बहुत जगहों पर ग्राम प्रधानों ने सालों से नदियों पर पुल बनाने के लिए स्थानीय अधिकारियों या सरकार को अर्जी दे रखी है लेकिन लोहे-कंक्रीट के पुल आसानी से कहां बनते हैं, उस पर भी मांग करने वाला ग्रामीण... तो पुल बनवाने की कोशिश करना तो गंगा को ज़मीन पर उतारने का प्रयास करने जैसा है जो कि यहां के ग्रामीण अच्छी तरह से जानते और समझते हैं।
               और शायद इसलिए जबसे यहां नदी के आर-पार चलने वाला जीवन अस्तित्व में आया है शायद तभी से  जीवनरेखा के रूप में चचरी पुल बनाने और उस पर चढ़कर नदी पार करने की परम्परा भी चली आ रही है।

कैसे बनता है चचरी...

चचरी को बनाना बहुत आसान है। बांस के सहारे बनने वाले इस कामचलाऊ चचरी पुल के लिए ना किसी दुष्कर अभियांत्रिकी की ज़रूरत है, ना योजना और टेंडर पास कराने की और ना ही बड़े सरकारी अनुदान की। इसे गांव के स्थानीय ग्रामीणों, श्रमिकों या मल्लाहों द्वारा जगह-जगह से बांस का जुगाड़ करके चंद घंटों में ही तैयार कर लिया जाता है। 
 चचरी के निर्माण के लिए पहले बांस को चीरकर बत्तियां बनाई जाती हैं और फिर उन बत्तियों को आपस में गूंथकर जालीदार और मज़बूत चचरी तैयार की जाती है। यह पुल के ऊपरी हिस्से का काम करती है। उसके बाद नदी के पानी में बांस डालकर खंबे बनाए जाते हैं जिनके ऊपर इस चचरी को टिका दिया जाता है। पुल की मज़बूती खंबो की मज़बूती और चचरी में बांस की बत्तियों की गुंथाई पर निर्भर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज़रूरत ना होने पर इस पुल को उखाड़कर भविष्य के लिए संभाल कर भी रखा जा सकता है।
चचरी बनाने की तकनीक कब और कैसे विकसित हुई, इसका तो कोई ठोस जवाब हमें नहीं मिला, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि चचरी पुल का ब्लू प्रिंट भी उतना ही पुराना है जितना नदियों के आर-पार गांवों में रह रहे ग्रामीणों का इतिहास। यहां कोई किसी को चचरी बनाना नहीं सिखाता बल्कि यहां के निवासियों को यह तकनीक डीएनए के ज़रिए अपने आप मिल जाती है।
 यहां का लगभग हर आदमी चचरी पुल तैयार कर लेता है। आज भी कोसी क्षेत्र में सुदूर ग्रामीण इलाकों में कई जगहों पुल-पुलिया के अभाव में लोग चचरी पुल के सहारे ही जीवन गुजार रहे हैं। 

चचरी पुल, लोहे-लंगड़ के बड़े और हिफाज़ती पुलों जैसे तो नहीं होते लेकिन इतने मज़बूत होते हैं कि इन पर से मोटरसाइकिल भी निकल सकती है। हांलाकि पुल के दोनों ओर बाड़ ना होने और पुल के लचीले होने के कारण इन पर से सावधानी से गुज़रना पड़ता है लेकिन मुख्यधारा से कटे हुए ग्रामीणों के लिए तो यहीं बड़ी बात है कि उन्हें अपने काम के लिए रास्ता मुहैया हो जाए फिर सुरक्षा की सुध किसे है।

यह भी सच है कि जिस गति से यह चचरी पुल बनते हैं उसी गति से कई बार बाढ़ का पानी इन्हें बहाकर भी ले जाता है और बहुत बार यह झूलते पुल निर्दोष ग्रामवासियों को नदी का ग्रास भी बना देते हैं, लेकिन फिर भी यह चचरी की बदौलत ही है कि यहां की ज़िदंगी पटरी पर चल रही है।

(साभार- पुष्यमित्र जी और कोसी के पत्रकार संजय कुमार जिनकी दी गई जानकारी के बाद ही चचरी की यह दास्तान आप तक पहुंच पाई है) 


Tuesday, 20 August 2013

अद्भुद वास्तुकला और रहस्यों से भरा इमामबाड़ा- भूल-भुलैया की सुरंगे दूसरे राज्यों तक फैली हैं और बावली में दफ्न है खज़ाने का राज़

लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा सत्रहवीं शताब्दी की वास्तुकला और नवाबी ज़माने की इमारतों के सुरक्षा इंतज़ामात संबंधी निर्माण का बेहद शानदार नमूना है.... गोमती नदी के किनारे बने बड़े इमामबाड़े में कई फीट चौड़ी दीवारे हैं, दीवारों में गलियारे हैं, गलियारों में दसियों दरवाज़े हैं, सैकड़ों झरोखे हैं जो जानने वालों से कुछ छिपाते नहीं और देखने वालों को कुछ दिखाते भी नहीं। इमामबाड़ा की मोटी दीवारों के कान भी हैं जो कहीं भी होने वाली हल्की सी आहट दूर तक सुन लेते हैं। कहते हैं कि यहां की भूलभुलैया और शाही बावली से बहुत सी सुरंगे निकलती हैं जो लखनऊ से बाहर अन्य राज्यों तक जाती हैं... और इन्हीं में कहीं दफ़्न है नबाब आसफ उद्दौला का अकूत खज़ाना... जिसका राज़ आजतक कभी किसी को नहीं मिला है।

इमामबाड़े का बाहरी भाग या दरवाज़ा

आज हम आपको लखनऊ की शान कहलाए जाने वाले इसी बड़े इमामबाड़े की सैर करवा रहे हैं। लखनऊ जाएं तो यहां ज़रूर जाएं और एक गाइड को साथ लेकर जाएं तभी आप इस इमामबाड़े की खूबियों से वाकिफ हो सकते हैं, और यहां की अनगिनत वास्तु विशेषताओं को जान और समझ सकते हैं।
इमामबाड़े का निर्माण 1784 में तत्कालीन अवध नवाब आसफ-उद्-दौला ने करवाया था। इसके वास्तुकार किफायत उल्ला खां साहब थे जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्होंने ताजमहल के वास्तु निर्माण की रूपरेखा तैयार करने में भी सलाह दी थी।
गोमती नदी के किनारे बने बड़े इमामबाड़े में जाने की टिकिट 50 रुपए की है। यह टिकिट लेकर आप सबसे पहले इस दरवाज़े से अन्दर घुसते हैं जो अनगिनत झरोखों से भरी हुई एक दीवार के मध्य बना है।

सीढ़ियों के ऊपर इमामबाड़े के केंद्रीय कक्ष का बाहरी भाग

मुख्य दरवाज़े से आगे बागीचे के समकक्ष रास्ते को पार करके जब आप अन्दर पहुंचते हैं तो सीढ़ियों के ऊपर बड़े इमामबाड़े का केन्द्रीय कक्ष नज़र आता है जो अत्यन्त विशाल है। इस कक्ष के एक तरफ मस्जिद है जहां सिर्फ मुस्लिमों को जाने की इजाज़त है। कक्ष के दूसरी ओर सीढ़ियों से नीचे की तरफ शाही बावली स्थित है।
सीढ़िया चढ़ कर ऊपर आने के बाद केंद्रीय कक्ष का द्वार देखा जा सकता है जिसमें जालीदार दरवाज़े हैं और मेहराबनुमा अनेकों झरोखे। इस कक्ष के दोनों ओर दो कक्ष और हैं। इन तीनों कक्षों की दीवारें 20 फीट मोटी हैं जिनमें गलियारों का जाल बिछा हुआ है। यहीं से अन्दर जाने के लिए आपको गाइड मिलते हैं। आप दो सौ रुपए में इमामबाड़ा समेत भूलभुलैया और बावली को देखने और समझने के लिए गाइड ले सकते हैं।

इमामबाड़े का केंद्रीय कक्ष
                                                               यह इमामबाड़े का केंद्रीय कक्ष है जो एक अद्भुत संरचना है। 50 मीटर लम्बा और 16 मीटर चौड़ा यह कक्ष बिना किसी लोहे, लकड़ी या स्तंभ की सहायता के सिर्फ ईंटो का जाल बनाकर निर्मित किया गया है। कमरे की 15 मीटर ऊंची और गाइड के अनुसार लगभग 20,000 टन भारी छत बिना किसी बीम या गार्डर के सहारे मज़बूती से टिकी हुई है जिसे देखकर आज के बड़े-बड़े इंजीनियर भी भौचक्के रह जाते हैं। गार्ड ने हमें बताया कि इन दीवारों के निर्माण में सीमेंट की जगह उड़द की दाल, चूने आदि का मिश्रण प्रयुक्त किया गया है जिसने इन्हें इतना मज़बूत बनाया है।
ताजियों और झूमरों से सुसज्जित इस कक्ष के बीचों-बीच नबाव आसफ-उद्-दौला और किफायत-उल्ला दोनों की सादी सी कब्रे भी हैं। यहीं एक शीशे के अल्मारी में नवाब की पगड़ी भी देखी जा सकती है। और पगड़ी की परिधि देखकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि नवाब का सिर कितना बड़ा रहा होगा।

इस कक्ष को दिखाने और इसकी विशेषताएं बताने के बाद गाइड हमें कक्ष की दीवारों में बनी भूल-भूलैया में ले गया। कक्ष के बाहर दांयी तरफ भूल-भुलैया में जाने के लिए सीढ़िया बनी हैं जिन्हें पार करके हम इमामबाड़ा के सबसे अनोखे स्थान भूल भुलैया में पहुंचे।

भूल-भुलैया के अंधेरे गलियारे
भूल-भुलैया 1000 से अधिक छोटे-बड़े, संकरे और एक जैसे दिखने वाले गलियारों, सीढ़ियों, रास्तों और झरोखों का घना जाल है। भूल-भुलैया के यह गलियारे केंद्रीय कक्ष की दीवार में बने हुए हैं। एक तरफ से यह रास्ते केंद्रीय कक्ष की तरफ ले जाते हैं और दूसरी तरफ से इमामबाड़े की बाहरी दीवार और दरवाज़े की तरफ
भूल-भुलैया की दीवारों से दूर हुई हल्की सी फुसफुसाहट भी सुनी जा सकती है
 इन गलियारों में बिना गाइड के घुसना शायद आपको माफिक ना आए। आप खुद को कितना भी अक्लमंद क्यों ना मानते हों, पहली बार गाइड के साथ ही भूल-भुलैया में जाएं। इन संकरे रास्तों, और गहरी दीवारों के राज़ आपको एक गाइड ही बेहतर बता सकता है।
                                                                            यहां आकर वो मसल साबित हो जाती है कि दीवारों के भी कान होते हैं। गाइड हमें यहीं बता रहा है। दूर कहीं से दीवारों पर हल्की सी थपथपाहट भी यहां कहीं भी सुनी जा सकती है। अगर आप यहां फुसफुसा कर भी कोई बात कहें तो काफी दूर खड़ा इंसान उसे लफ्ज़-ब-लफ्ज़, बिल्कुल साफ सुन सकता है। एक बात और.. इन गलियारों में काफी ठंडक थी और जिसकी वजह भी हमें गाइड ने इसकी संरचना ही बताई।

भूल-भुलैया के झरोखे से बाहर का नज़ारा
दीवार में बने झरोखों से बाहर सड़क तक नज़र रखी जा सकती है

गलियारों में रौशनी की कमी नहीं
                      इन दोनों तस्वीरों को ध्यान से देखिए। भूल-भुलैया के झरोखों से इमामबाड़े के दरवाज़े पर आने-जाने वाले लोगों से लेकर इमारत के बाहर सड़क पर चलते हुए लोगों और वाहनों तक को देखा जा सकता है और मज़े की बात यह है कि बाहर से देखने वाले आदमी को अंदर वाला इंसान नहीं दिखता। इन झरोखों के ज़रिए इमामबाड़े के आस-पास हो रही हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सकती है। गाइड ने हमें बताया कि इन झरोखों का इस्तेमाल पहरेदारी के लिए किया जाता था।

      भूल -भूलैया के बाहर की तरफ खुलने वाले गलियारों में प्रकाश की कोई कमी नहीं है। दीवार में समान दूरी के बने झरोखों से रोशनी अन्दर आती है और पूरे रास्ते को रौशन करती है। आप यहां दीवार के अन्दर बनी संकरी गली में रौशनी के साये देख सकते हैं।

भूल-भुलैया के गलियारे दूसरी तरफ से मुख्य कक्ष में खुलते हैं

अंदर खुलने वाले गलियारे हमें मुख्य कक्ष के रौशनदानों में ले जाते हैं। देखिये यहां आप रौशनदानों से छनकर आती रौशनी देख सकते हैं। इन रौशनदानों के कारण और जिस प्रकार ये बाहर के झरोखों से जुड़े हैं, यहां हमेशा रौशनी और हवा रहती है। ऊपर अगर एक तरफ माचिस की तीली जलाई जाए तो उसकी आवाज़ 16 मीटर दूर दूसरे सिरे तक सुनाई देती है।
एक और रोचक बात - अगर भूल-भुलैया में आप ऊपर चढ़ते जाएंगे तो यहां से निकलकर छत पर पहुंच पाएंगे लेकिन अगर नीचे चलते रहे तो भटक जाएंगे। भूल-भुलैया से निकलने की यहीं तरकीब है कि ऊपर की तरफ चला जाए।

शाही बावली की सैर

बावली की ओर जाने वाली सीढ़ियां

भूल-भुलैया घुमाने के बाद गाइड हमें शाही बावली या जिसे कूंआ कहते हैं, को दिखाने ले गया। शाही बावली भी अपने आप में एक बेहद अद्भुद संरचना है। यह इमामबाड़े के मुख्य कक्ष से सीढ़िया उतरने के बाद दायीं तरफ नीचे जाकर बनी है। यह बावली पांच मंजिला है लेकिन इसकी नीचे की तीन मंज़िले पानी में डूबी रहती हैं।
इस बावली की सीढ़ियों पर खड़े होकर देखने पर नीचे कूंआ नहीं दिखता। लेकिन मज़े की बात यह है कि नीचे के तल पर जाने पर बावली के पानी में ऊपर सीढ़ियों या दरवाज़े पर बैठे व्यक्ति का प्रतिबिम्ब देखा जा है।
इस बावली की एक और विशेषता यह है कि इसकी सीढ़ियों पर खड़े होकर बाहर देखने से इमामबाड़े का मुख्य कक्ष इसके समानांतर नज़र आता है जबकि बाहर जाकर देखने पर वह दरअसल ऊपर बना है और बावली नीचे।

बावली के पानी में दिखता दरवाज़े पर खड़े व्यक्ति का प्रतिबिम्ब

भूल-भुलैया तो इमामबाड़े में एक ही है लेकिन हम आपको बता दें कि यह बावड़ी भी भूल-भुलैया से कुछ कम नहीं हैं। यहां अच्छा खासा अंधेरा और ठंडक थी। इसमें भी गाइड को लेकर जाना ही अच्छा है। अंदर के तलों के झरोखों से बाहर का नज़ारा यहां से भी देखा जा सकता है। बावली इस कोण पर बनी है कि शाम को सूरज छिपने के वक्त और यहां तक की चन्द्रमा की रौशनी में भी दरवाज़े से गुजरने  वाले व्यक्ति का प्रतिबिम्ब इस बावली के पानी में देखा जा सकता है। यह इतंज़ाम सुरक्षा की दृष्टि से किया गया था। यहां से पहरेदार इमामबाड़े में जाने वाले हर शख्स पर नज़र रखता था और अगर वो शख्स खतरनाक होता था तो ऊपर के तल पर तीरंदाज को सूचित कर दिया जाता था जो कि उसे तीर से मार गिराता था।

बावली की सबसे ऊपरी मंज़िल के अंदर का दृश्य

बावली में पानी देखा जा सकता है
इस शाही बावली में हमेशा पानी भरा रहता है।कहते है कि यह गोमती नदी से जुड़ी है इसलिए इसमें पानी कभी खत्म नहीं होता।
गाइड ने हमें बताया कि शाही बावली से भी काफी सारी सुरंगे निकलती है जो अलग अलग राज्यों में जाती हैं। खज़ाने की कहानी सुनाते हुए गाइड ने हमें यह भी बताया कि जब अंग्रेज़ नवाब आसफ-उद्-दौला का खज़ाना लूटने आए तो उनके वफादार मुनीम खजाने की चाबी और नक्शा लेकर इसी बावली में कूद गए थे। इसके बाद अंग्रेज़ों ने अपने बहुत से सिपाही इस बावली में मुनीम या उनके शव को ढुंढने के लिए उतारे लेकिन कोई भी सिपाही वापस नही ंलौटा। वो खज़ाना इस इमामबाड़े या सुरंगों के जाल के बीच कहीं भी हो सकता है। उसका नक्शा और चाबी आज भी इसी बावली में दफ्न है।

Monday, 19 August 2013

'भद्रा' है रक्षाबंधन की तारीख संबंधी भ्रम का कारण

भाई-बहनों के स्नेह के प्रतीक रक्षाबंधन त्यौहार को लेकर इस वर्ष काफी भ्रम की स्थिति है। जहां बहुत सी जगह रक्षाबंधन की छुट्टी 20 अगस्त को घोषित की गई है वहीं अन्य जगहों या राज्यों में 21 अगस्त को राखी के त्यौहार मनाने की बात चल रही है।

रक्षाबंधन को लेकर यह भ्रम की स्थिति क्यों है इस बारे में जब हमने पास ही के मंदिर के पंडित जी रघुराम शास्त्री जी से बात की तो उन्होंने बताया कि इस त्यौहार को लेकर भ्रम की यह स्थिति भद्रा योग के कारण हैं।

दरअसल रक्षाबंधन का त्यौहार श्रावण मास यानि सावन महीने की पूर्णिमा (फुल मून डे) को मनाया जाता है जो कि इस साल 20 अगस्त को होगी। इस दिन सुबह 10.23 पर पूर्णिमा लगेगी  जो 21 अगस्त को सुबह 7.25 बजे तक रहेगी। तो कायदे से रक्षाबंधन 20 तारीख को ही मनाया जाना चाहिए।

लेकिन परेशानी यह है कि 20 अगस्त को पूर्णिमा के साथ ही भद्रा योग भी शुरू हो रहा है जो रात्रि 8.48 बजे तक रहेगा। और भद्रा योग में राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता।

यहीं वजह है कि रक्षाबंधन इस बार 20 तारीख की रात को 8.48 के बाद या फिर 21 तारीख को सुबह साढ़े सात बजे से पहले मनाया जाएगा।

क्या है भद्रा

पुराणों के अनुसार भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनि की बहन है। जब चन्द्रमा- कर्क, सिंह, कुंभ, व मीन राशि में विचरण करता है तब भद्रा विष्टीकरण का योग होता है। सरल भाषा में हम यह कह सकते हैं कि ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार भद्रा योग आता है जिसका हिन्दु पंचांग में विशेष महत्व है। भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य आरम्भ या समाप्त नहीं किया जाता। यहीं कारण है कि 20 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा होने के बावजूद भद्रा योग होने के कारण बहनों द्वारा भाईयों को राखी बांधना शुभ नहीं है।

क्या है विकल्प

अब दो ही विकल्प हैं या तो 20 तारीख को रात 8.48 पर भद्रा के खत्म होने पर राखी बांधी जाए या फिर दूसरे दिन सुबह 7.25 से पहले।  पंडितों के अनुसार 20 अगस्त को रक्षाबंधन का श्रेष्ठ मुहूर्त रात 8.48 बजे से रात 9.10 ंबजे तक रहेगा।

पर चूंकि शास्त्रानुसार रात्रि काल में भी रक्षाबंधन मनाना निषेध होता है इसलिए बहुत से पंडितों का मानना है कि इसे अगले दिन यानि 21 अगस्त को ही मनाया जाना चाहिए।

दुनिया के सबसे तेज़ इंसान का क्रिकेट प्रेम... टीम पाकिस्तान और वकार यूनिस के फैन थे बोल्ट

विश्व के सबसे तेज़ और खेल इतिहास के सफलतम धावक बन चुके उसैन सेंट लियो बोल्ट की दौड़ की पूरी दुनिया फैन बन चुकी है। लेकिन शायद आप नहीं जानते, पूरी दुनिया के करोड़ो खेल प्रेमियों के दिलों पर राज़ करने वाले उसैन बोल्ट दरअसल क्रिकेट और वकार यूनिस के फैन हैं।

21 अगस्त 1986 को जमैका के ट्रिलॉनी में जन्मे बोल्ट को बचपन से क्रिकेट खेलने का बेहद शौक था। बचपन में बोल्ट अपना सारा खाली समय अपने भाई के साथ सड़क पर क्रिकेट और फुटबॉल खेलने में गुज़ारते थे। बड़े होकर वो धावक नहीं बल्कि तेज़ गेंदबाज़ बनना चाहते थे। 

बचपन से ही पाकिस्तानी क्रिकेट टीम बोल्ट की प्रिय टीम रही है। खेल चाहे किन्हीं भी दो देशों के बीच हो रहा हो, बोल्ट हमेशा ही पाकिस्तानी टीम का समर्थन करते थे। 

पाकिस्तान क्रिकेट टीम में उनके आदर्श तेज़ गेंदबाज़ वकार यूनिस हुआ करते थे। बोल्ट, वकार यूनिस की तरह ही एक सफल तेज़ गेंदबाज़ बनने का सपना देखा करते थे। एक इंटरव्यू में बोल्ट ने कहा था कि अगर वो एथलीट नहीं होते तो निश्चित तौर पर एक वकार यूनिस की तरह एक तेज़ गेंदबाज़ होते। 

बल्लेबाज़ों में बोल्ट, भारत के सचिन तेंदुलकर, वैस्टइंडीज़ के क्रिस गेल और और ऑस्ट्रेलिया के मैथ्यू हेडेन के प्रशंसक रहे। क्रिकेट के अलावा फुटबॉल को भी बोल्ट बहुत पसंद करते हैं और मैनचेस्टर यूनाइटेड उनकी पसंदीदा टीम है। 


Sunday, 18 August 2013

करोड़ो खर्च होने के बावजूद रोजी-रोटी के लिए भटक रहे हैं कोसी बाढ़ पीड़ित लाखों बेघर

कभी कहीं पढ़ा था कि जब कोई आपदा आती है तो वह पुरानी जड़ों को उखाड़कर नए निर्माण के रास्ते साथ लेकर आती है। प्राकृतिक आपदा, युद्ध या किसी त्रासदी में लाखो लोग जान से हाथ धोते है, घर उजड़ते हैं तो यह भी सच है कि इसमें बहुत से लोगों के महल भी खड़े हो जाते हैं। आप सोच रहे होंगे मैं यह क्यों कह रही हूं... दरअसल आज मैं ऐसी ही एक आपदा और उससे हुई तबाही और निर्माण की कहानी आपको सुनाने जा रही हूं।

2008 में बिहार की कोसी नदी का तटबंध टूटने से आई बाढ़ की तस्वीर

कोसी नदी का नाम सुना है। उत्तर भारत में रहने वाले लोग शायद इस नदी से अनजान हों लेकिन पूर्वी भारत के बाशिंदे, खासकर बिहार के लोग इससे अच्छी तरह परिचित होंगे। और आपको अगर याद हो तो आज से ठीक पांच साल पहले, आज ही के दिन (18 अगस्त 2008 को) कोसी नदी पर बना बांध टूट गया था जिससे बिहार के पांच जिलों सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया और पूर्णिया के साढ़े नौ सौ से अधिक गांव पूरी तरह से पानी में डूब गए थे। लाखों लोग बेघर हो गए थे। सैकड़ो लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और कई हज़ारों की संख्या में मवेशी बह गए या मर गए थे। इतनी भयंकर तबाही हुई थी कि यहां के लोग आज भी वह दिन याद करके सिहर उठते हैं।

लेकिन हमारा उद्देश्य उस तबाही के मंजर को याद करना नहीं है। बल्कि उस तबाही के बाद की तबाही की कहानी आप तक पहुंचाना है।

कोसी नदी के बांध के टूटने के बाद बिहार के इन जिलों में जो नुकसान हुआ था उसकी अनुमानित कीमत  14,800 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इसके अतिरिक्त जो किसान और खेत पूरी तरह बर्बाद हो गए उनका कोई निश्चित लेखा जोखा नहीं है सिर्फ अनुमान है और यह सरकारी अनुमान कैसे होते हैं यह चूंकि हम सभी जानते हैं इसलिए उस अनुमान को यहां देकर हम बाढ़ की भेंट चढ़े बिहारवासियों का अपमान नहीं करना चाहते।

सरकार ने क्या किया-

कोसी नदी द्वारा मचाई गई इस तबाही के बाद हमारी सरकार चुप नहीं बैठी। तुरंत बिहार के बाढ़ प्रभावित जिलों के लिए राहत पैकेज की घोषणा की गई। विश्व बैंक से भी मदद ली गई और सेना के साथ साथ बहुत सी समाज सेवी संस्थाए भी बाढ़ के कारण विस्थापित हुए किसानों और ग्रामवासियों के पुनर्वास और राहत के लिए आगे आईं। सरकार ने 2900 करोड़ की राशि दी और विश्व बैंक से मिली हुई राशि लगभग 6,100 करोड़ रुपए की थी जिसका उपयोग बाढ़ से प्रभावित हुए सवा तैंतीस लाख (33.29 लाख) लोगों की ज़िंदगी वापस पटरी पर लाने के लिए किया जाना था।

हुआ क्या

369 राहत शिविर लगाए गए, कई सौ करोड़ की राशि दी गई और हज़ारो टन गेंहूं भूखे और बेघर लोगों की क्षुधा शान्ति के लिए दिया गया। इतने इंतज़ाम के बाद आज पांच साल बाद कोसी नदी की बाढ़ से प्रभावित हुए सभी नहीं तो कम से कम आधे से ज्यादा लोगों का तो जीवन सुधर ही जाना चाहिए था। ज़िंदगी वापस पटरी पर लौट आनी चाहिए थी। लेकिन हुआ बिल्कुल उलट...

  • -आज तक बाढ़ के दौरान क्षतिग्रस्त हुए या पूरी तरह से टूट चुके 2,36,632 लाख घरों में से सिर्फ 12,000 घरों का ही पुनःनिर्माण हो सका है। 
  • -लगभग पांच लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में कोसी नदी द्वारा बाढ़ के समय लाया गय़ा रेता भरा पड़ा है जिसे अभी तक साफ नहीं किय़ा गया और किसान खेती नहीं कर पा रहे हैं।
  • -जो सड़के बाढ़ से टूटी थी वो अभी तक नहीं बनाई गईं हैं।
  • -प्रभावित इलाकों में सरकार की किसी भी योजना को पूरी तरह लागू नहीं किये जाने के कारण खेतिहर मजदूर और किसान अपना घर और गांव छोड़ कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं। रोज़ाना बिहार के सहरसा जिले से निकलने वाली जनसेवा एक्सप्रेस इन्हीं बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोगों से भरी हुई होती है जो रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाकर दिहाड़ी मजदूर बन रहे हैं। 
  • - बहुत से गांवों में सिर्फ बुज़ुर्ग दंपत्ति ही रह गए हैं क्योंकि उनके बेटे-बहू, हर तरफ से निराश होकर दूसरे क्षेत्रों या राज्यों में रोज़ी-रोटी कमाने की फिराक में निकल गए हैं।
  • -और सबसे महत्वपूर्ण बात 2008 में कोसी के तटबंध टूटने के कारणों को जानने के लिए जो कमेटी बनाई गई थी उसकी रिपोर्ट आज तक नहीं आई है।

किनका हुआ निर्माण-

कोसी नदी जो बाढ़ लेकर आई थी उससे बिहार के 6 जिलों के लाखो ग्रामवासियों का जीवन भले ही नष्ट
हो गया लेकिन हज़ारो समाज सेवी संस्थाओ, बालू उठाने और घर बनाने वाले ठेकेदारों, सरकारी बाबूओं, अभियंताओ, लोक निर्माण विभाग के कर्मचारियों, मंत्रियों, जमाखोरों और भ्रष्टाचारियों के जीवन का निर्माण हुआ है। जो राहत राशि किसानों के लिए थी उससे इन लोगों ने जमकर राहत उठाई है और कईयो ने तो अपने लिए महल तक खड़े कर लिए हैं।

इन आपदा पीड़ितो के लिए पैसों की कमी नहीं है लेकिन ईमानदारी से उन पैसों को सही जगह और ज़रूरतमंदों के लिए इस्तमाल करने के प्रयास की ज़रूर कमी है। और यहीं वजह है कि विस्थापितों की मदद के लिए आए पैसे ठेकेदारों और भ्रष्टाचारियों का बैंक बैलेंस तो मज़बूत कर गए जबकि कोसी आज भी वहीं है और उससे प्रभावित लोग रोज़ी रोटी और ठिकाने की तलाश में अपना घर छोड़कर जाने को मजबूर हैं।

आंकड़ों में कोसी की तबाही और पुर्नवास

  • 18 अगस्त 2008- कोसी का तटबंध टूटने से बिहार के 6 जिलों में बाढ़
  • 530 लोग और 19,323 मवेशी मरे (सरकारी आंकड़ा)
  • 33.29 लाख लोग और 9,97,344 मवेशी बाढ़ से प्रभावित हुए
  • कुल नुकसान- 14,800 करोड़  
  •  केंद्र सरकार से मिली सहायता- 2900 करोड़
  •  विश्व बैंक से मिला कुल राहत फंड- 6,100 करोड़
  • अभी तक बने घर- सिर्फ 12,000
  • 14,129.70 एकड़ ज़मीन पर अभी भी बालू जमा है
  • गांवों में लगभग 66 फीसदी आबादी बुज़ुर्ग दंपत्तियों की। युवा ग्राम वासी पत्नी-बच्चों के साथ काम की तलाश में अन्य राज्यों में निकल गए हैं
  • 2008 में कोसी के तटबंध टूटने के कारणों को जानने के लिए गठित कमेटी की रिपोर्ट अब तक नहीं आई
  • मिली राशि का कोई अता-पता नहीं

(यह रिपोर्ट मूलतः प्रभात खबर, रांची के संवाददाता पुष्य मित्र जी की है जिसे मैंने सिर्फ अपने शब्दों में लिखा है)

Saturday, 17 August 2013

एक विवाह ऐसा भी...

आज की यह कहानी दुनिया के सबसे खूबसूरत जज़्बे "प्यार" के नाम...। हममें से बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका प्यार पर से यकीं उठ चुका है जो यथार्थवादिता की बातें करते हैं, स्वार्थ की बातें करते हैं और इसमें विश्वास रखते हैं कि प्यार नाम की चीज़ इस दुनिया में रही ही नहीं हैं... लेकिन सच तो यह है कि प्यार की भावना इस दुनिया में ज़िंदा है और वो भी पूरी शिद्दत के साथ....
दीपक और शिखा 

दीपक और शिखा की यह जोड़ी प्यार की जीती जागती मिसाल है। फैज़ाबाद में रहने वाले 28 साल के दीपक पाठक सिपला में बतौर एरिया मैनेजर काम करते हैं और इन्होंने अपनी पत्नी शिखा से प्रेमविवाह किया है। दीपक एक ब्राह्मण हैं और उनकी पत्नी शिखा 'यादव'... और साथ ही कैंसर की मरीज़। जी हां, आपने ठीक पढ़ा।  शिखा को शादी के पहले से ब्रेस्ट कैंसर है। हर 20 दिन बाद उनकी कीमोथैरेपी होती है जिसमें 35,000 रूपए का खर्चा आता है और 25,000 रूपए महीना कमाने वाले दीपक पाठक अपनी पत्नी के लिए किसी भी तरह पैसों का इंतज़ाम करके यह खर्च वहन करते हैं और शिखा का इलाज नाबाद चल रहा है।

यह दोनों आठ साल पहले बैंगलोर के कॉलेज में मिले थे जहां दोनों ही फार्मेसी के विद्यार्थी थे। दीपक, शिखा के सीनियर थे। धीरे-धीरे जान पहचान दोस्ती में और फिर दोस्ती प्यार में तब्दील हुई। तीन साल बाद दीपक ने शिखा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। चूंकि दोनों की जातियां अलग थी, दोनों ही जानते थे कि शादी में मुश्किले आनी हैं। शिखा तो बहुत डर गईं थी, दीपक ने हिम्मत दी और दोनों 'जो होगा देखा जाएगा' की तर्ज पर अपना रिश्ता आगे बढ़ाते रहे।

इन दोनों के रिश्ते पर असली मुसीबत तब आई जब 2009 में शिखा को यह पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। खुद से ज्यादा शिखा को दीपक की चिंता थी। वो कहती हैं "जब मैंने दीपक को इस बारे में बताया तो यह बहुत रोए। दीपक भगवान में नहीं मानते थे लेकिन मेरी बीमारी का पता चलने के बाद इन्होंने शुक्रवार के व्रत रखे। देवी मां से बस यहीं दुआ मांगते थे कि वो मुझे ठीक कर दे। तब मुझे पहली बार पता चला कि दीपक मुझे कितना चाहते हैं।"

पर अब शिखा के लिए दीपक से शादी का फैसला और भी मुश्किल था, उन्होंने शादी के लिए मना कर दिया। लेकिन दीपक अब भी शिखा से ही शादी की बात पर अड़े रहे। उन्होंने आखिरकार शिखा को खुद से शादी करने के लिए मना ही लिया। दीपक का शिखा के प्रति इतना प्यार देखकर शिखा के माता-पिता भी दोनों की शादी के लिए तैयार हो गए।

लेकिन दीपक के मां-बाप नहीं माने। उन्हें यह किसी भी कीमत पर मंज़ूर नहीं था कि उनका बेटा अपनी जाति से बाहर शादी करें और वो भी एक कैंसर से ग्रस्त लड़की से, जिसके इलाज पर मोटा खर्चा होना तय है। उन्हें इस बात का भी डर था कि बीमारी के कारण शिखा ना तो परिवार संभाल पाएगी और ना ही शायद उन्हें पोते-पोतियों का सुख दे पाएगी। लेकिन दीपक ने जो ठान लिया वो ठान लिया। सारी हकीकत जानने और खूब सोच विचार करने और समझाने के बावजूद दीपक ने शिखा से ही शादी करने का फैसला किया और आखिरकार दिसम्बर 2012 में, सिर्फ दस लोगों की मौजूदगी में इन दोनों की शादी हो गई।

आज दीपक के परिवार वाले उनसे रिश्ता तोड़ चुके हैं। दीपक शिखा के साथ फैज़ाबाद में एक छोटे से किराए के मकान में रहते हैं और एक दूसरे के साथ बेहद खुश हैं। शिखा को हर 20 दिन बाद कीमोथेरेपी के लिए जाना पड़ता है। उनका यह इलाज लगभग एक साल चलेगा। दीपक अपना काम निपटा कर सीधा घर आते हैं और शिखा के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुज़ारते हैं। शिखा खुशी-खुशी बताती हैं  "कई बार तो यह मेरे लिए खाना भी बनाते हैं। मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं करते। मुझसे ज़्यादा खुशनसीब कौन होगा। कितनी ही बार मेरी सहेलियां तक मुझसे कहती हैं कि काश हमें भी कोई दीपक जैसा चाहने वाला मिलता..."

और जब हमने दीपक से पूछा कि शादी को आठ महीने हो चुके हैं, आपका परिवार आपसे रिश्ता तोड़ चुका है, हर महीने आपको अपनी पत्नी के इलाज पर अच्छा-खासा खर्चा करना पड़ता है.., क्या आपको कभी अपने निर्णय पर अफसोस नहीं होता..? तो मृदुभाषी दीपक जवाब देते हैं " मुझे शादी से पहले सब कुछ मालूम था। किसी ने मुझ पर दबाब नहीं डाला। मैंने अपनी इच्छा से शादी की है और मैं बेहद खुश हूं। मुझे मालूम है शिखा कुछ समय में पूरी तरह ठीक हो जाएगी और तब शायद ज़िंदगी और ज्यादा अच्छी हो जाए।"

हम नही जानते कल क्या होगा... दीपशिखा के इस रिश्ते की क्या सूरत होगी... लेकिन वर्तमान में यह रिश्ता बहुत खूबसूरत है और उन सब लोगों के लिए एक उदाहरण है जो प्यार करना तो जानते हैं, पर निभाना नहीं....

(साभार- विकास अग्रवाल)

'शहीद' नहीं हैं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू

आज के टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर पढ़ी और पढ़ कर काफी हैरानी हुई कि देश की आज़ादी के लिए हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाने वाले भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की गिनती शहीदों में नहीं होती। जी हां यहीं सच है। गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड्स में आजतक इन तीनों में से एक को भी शहीद घोषित नहीं किया गया है।
तुम शहीद नहीं हुए... 
इसी साल अप्रैल माह में गृह मंत्रालय में डाली गई एक आरटीआई में यह पूछा गया था कि भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को कब शहीद घोषित किया गया और अगर नहीं किया गया तो इसके लिए मंत्रालय क्या कर रहा है जिसके जवाब में मंत्रालय ने कहा कि उनके पास एक भी ऐसा रिकॉर्ड नहीं है जिससे यह पता चलता हो कि इन तीनों को कभी भी शहीद घोषित किया गया था। इस जवाब में यह भी कहा गया था कि मंत्रालय के पास यह जानकारी भी नहीं है कि इस मामले में सरकार कोई कदम उठा रही है या नहीं। 
अब भगत सिंह के रिश्तेदार (grandnephew) यादवेन्द्र सिंह इस मामले पर गृह मंत्रालय के अधिकारियों और यहां तक कि राष्ट्रपति से भी मिलने की तैयारी कर रहे हैं। अगर कोई भी इस मामले पर कुछ करने को तैयार नहीं होता तो यादवेन्द्र इन तीनों को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए देशव्यापी मुहिम चलाएंगे। कितनी हैरानी की बात है कि देश के लिए शहीद हुए शहीदों को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए भी हमारे देशवासियों को संघर्ष करना पड़ेगा.....

केवल सशस्त्र सेना के जवानों को मिलता है शहीदों का दर्जा

आपको यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि गृह मंत्रालय के अनुसार कभी भी किसी भी देशभक्त को शहीद का दर्जा नहीं दिया गया। ऐसी कोई नीति ही नहीं है। केवल रक्षा मंत्रालय ही देश की रक्षा में जान बचाने वाले "सशस्त्र सेना के जवानों" को शहीद का दर्जा दे सकता है। गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले किसी भी सैन्य बल जैसे परासैनिक बल (पैरामिलिट्री फोर्सेज) आदि के जवानों के लिए भी शहीद का दर्जा दिए जाने की नीति नहीं हैं जबकि इन बलों के जवान भी अक्सर कभी नक्सलियों, तो कभी उग्रवादियों से लड़ते हुए अपनी जान गंवाते हैं। लेकिन वे मृतक ही रहते हैं कभी भी शहीद का दर्जा नहीं पाते। 

केदारनाथ में हुई हैलीकॉप्टर दुर्घटना में भारतीय वायु सेना के जवान शहीद हुए और आईटीबीपी के जवान मरे 

जी हां, चूंकि रक्षा मंत्रालय के जवानों के अलावा और किसी को शहीद नहीं कहा जाता इसलिए जून माह में में केदारनाथ में जो हैलीकॉप्टर दुर्घटना हुई थी, जिसमें कि 20 जवान शहीद हुए थे, उनमें से सिर्फ 5 को ही शहीद कहा गया। वो पांच जवान भारतीय वायु सेना के थे जबकि बाकी 15 जवान आईटीबीपी (इन्डो तिबेतियन बॉर्डर पुलिस) के थे। यहीं वजह है कि वायुसेना के जवानों को तो शहीद का सम्मान हासिल हुआ लेकिन बाकी जवानों को साधारण लोगों की तरह मृतक कहा जाता है। 


Tuesday, 13 August 2013

मेघालय में महिलाओं की सत्ताः पुरुषों को ब्याहकर लाती हैं महिलाएं, घर की संपत्ति पर है बेटियों का हक

इस समाज में घर की बागडोर महिलाओं के हाथ में होती है। शादी के बाद लड़की को नहीं, बल्कि लड़के को पत्नी के घर यानि अपने ससुराल जाना होता है। वंश महिलाओं के नाम से चलता है और लड़कियों के पैदा होने पर खुशी मनाई जाती है....

हम किसी और ग्रह की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि यह मातृसत्तात्मक व्यवस्था यहीं अपने ही देश के मेघालय राज्य में देखने को मिलती है। हमने भी इसके बारे में अपने मेघालय भ्रमण के दौरान ही जाना। इसी वर्ष उत्तर दक्षिण भारत की सैर के दौरान जब हम अपनी गाड़ी से शिलॉंग जा रहे थे तो पूरी दुनिया से अलग ऐसा नज़ारा देखने को मिला जो अब तक कहीं भी और कभी भी नहीं देखा था।

सड़क के दोनों ओर बनी हर दुकान में दुकानदार के रुप में महिला विराजमान थी। चाहे वो कपड़ों की दुकान हो, मसालों की, फलों की, पान-बीड़ी-सिग्रेट की या फिर जगह जगह बने ढाबे हों, हर कहीं हमें दुकानदार के रूप में एक औरत के ही दर्शन हुए। अगर पुरुष कहीं थे भी तो वो या तो दुकानों के बाहर एक कोने में उपेक्षित से बैठे हुए मसाला खा रहे थे या फिर कहीं-कहीं ढाबों में खाना परोस रहे थे लेकिन हर जगह की मालकिन महिला ही थी। 

ज़िंदग़ी में पहली बार ऐसा दृश्य देखा था। अचंभित होना लाज़िमी था। जब हमने अपनी गाड़ी के ड्राइवर गणेश, जो कि था तो बिहार से पर लगभग दस सालों से यहीं रह रहा था, से इस बारे में पूछा तो उसने बताया कि मेघालय में ऐसा ही होता हैं।

यहां निवास करने वाली गारो, जयन्तिया और खासी जनजातियों में महिलाओं को सर्वोपरि माना जाता है। पूरे देश से अलग इस समाज में महिला ही घर की मुखिया होती है और किसी भी निर्णय को लेने का अधिकार उसी के पास होता है। शादी के बाद महिला ही पुरुष को ब्याहकर अपने घर में लेकर आती है और बच्चे के नाम के आगे भी पिता का नहीं बल्कि मां का वंश नाम लगाया जाता है। यहां संपत्ति भी घर के बेटों के नहीं बल्कि घर की बेटियों के नाम की जाती है। किसी भी तरह की चल या अचल संपत्ति पर मालिकाना हक घर की महिला का ही होता है जो आगे जाकर अपनी बेटी को यह हक सौंपती हैं। यहां ज़मीनों, घरों और दुकानों की मालकिन महिला ही होती है।

चूंकि पुरुष सास के घर अपने ससुराल में रहते हैं और उनके जिम्मे कोई महत्वपूर्ण काम भी नहीं होता सिवाय इसके कि वो बच्चो को पालने में या घर की साफ सफाई या अन्य निचले दर्जे के कामों में अपनी पत्नि की मदद कर दें, इसलिए वो काफी उपेक्षित जीवन जीते हैं। यहां तक कि उनके खर्चे के लिए पैसे भी उनकी पत्नि ही उन्हें देती हैं।

यह भारत का शायद पहला ऐसा समाज है जहां लड़कियों के पैदा होने पर खूब खुशियां मनाईं जाती हैं और लड़को के पैदा होने पर ऐसा माहौल होता है जैसा हमारे यहां कई घरों में बेटियां पैदा होने पर होता है। अगर घर में कोई लड़की नहीं है तो किसी लड़की को गोद लिया जाता ताकि उसे घर और संपत्ति का मालिकाना हक हस्तातंरित किया जा सके।

मेघालय में महिलाओं को बेहद इज़्जत की नज़र से देखा जाता है। उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी आज़ादी है और वो अगर चाहे तो अपने समुदाय के बाहर भी जीवनसाथी चुन सकती हैं। यहीं नहीं यहां विधवाओं को भी पूरी इज़्जत दी जाती है बल्कि अगर किसी आदमी की पत्नी की मृत्यू हो जाए तो उसके लिए जीवन मुश्किल हो जाता है क्योंकि कई जगह तो ऐसा होने पर उसे ससुराल से ही निकाल दिया जाता है और कई जगह उसे अपनी साली या फिर पत्नी की किसी और करीबी रिश्तेदार की बहन से शादी करने को मजबूर किया जाता है। 

यहां कोई भी बच्चा नाजायज़ नहीं होता। अगर शादी से पहले भी किसी लड़की ने बच्चे को जन्म दिया है तो उसकी ज़िम्मेदारी पूरा समाज उठाने को तैयार हो जाता है। पुरुषों का मुकाम यहां दोयम दर्जे का है जिन्हें सिर्फ परिवार बढ़ाने के लिए ही पूछा जाता है। हांलाकि हमें गणेश ने यह भी बताया कि कई पुरुषों में इस व्यवस्था को लेकर असंतोष भी है और वो इसे बदलने की मांग उठाते हैं लेकिन यहां के समाज में महिलाओं का प्रभाव इस कदर है कि इसके खिलाफ पुरुषों को लामबंद करना और विद्रोह का बिगुल बजाना आसान नहीं है।

 यह परम्परा सदियों से चली आ रही है और यहां के लोगों में इसके प्रति काफी विश्वास और सम्मान है। हम नहीं जानते यह ठीक है या नहीं लेकिन इतना ज़रूर है कि पहली बार ऐसी किसी व्यवस्था के बारे में मेघालय जाकर जानने और समझने को मिला और जानकर अच्छा लगा कि ऐसा भी समाज है, और वो भी अपने भारत देश में ही जहां औरतों को सर्वोच्च दर्जा हासिल है।