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Are Left liberals losing their core base..?

  In the wake of the tweet that PTI shared yesterday regarding some of the famous intellectuals named in Delhi riots, many supporters of these ppl have come to surface with accusations of faulty investigation. Stale practice. Later, also came the clarification that their names are not in Delhi riots. Below is the Times of India website link of one such news. Remember, TOI is India's highest circulated 'English' news-paper & its website is equally popular. Pls go through the comments posted below the article and read them all. I also tried to check comment section of many other famous websites like National Herald, Indian Express, Hindu.. They have all published the news, but surprisingly comment sections are either disabled or one cannot access them easily. So, wherever you find readers' comments, read them all. Now, the interesting findings.. - The core followers of liberal intellectuals who eat, drink, speak, wear and vomit English and write big articles in the bi

भुवाल रियासत के सन्यासी राजा की कहानी, जो मौत के 12 साल बाद फिर लौट आयाः भारत के इतिहास में जड़ा अद्भुत, अनोखा और रहस्यमयी सच

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यह सच है, कि सच, कहानी से कहीं ज़्यादा अजीब होता है। ऐसा ही एक सच है भुवाल रियासत के राजकुमार रमेन्द्र कुमार रॉय चौधरी का, जो अपनी मौत के 12 साल बाद लौट आए। 37 साल तक अपनी पहचान पाने के लिए उन्होंने कानूनी केस लड़ा। भुवाल सन्यासी के इस मुकद्मे को भारत में ही नहीं बल्कि विश्व कानून के इतिहास के सबसे आश्चर्यजनक मुकद्मों में से एक माना जाता है। चलिए पढ़ते हैं  यह अजीब-अद्भुत, कहानी जैसा लगने वाला ऐतिहासिक सच। राजकुमार रमेन्द्र (बायीं तरफ) और भुवाल सन्यासी  भुवाल रियासत और राजकुमार रमेन्द्र की कहानी यह इतिहास कभी पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी रियासत रही भुवाल रियासत से जुड़ा है जिसके अन्तर्गत 2000 गांव आते थे औऱ जिसकी जनसंख्या लगभग पांच लाख थी। देश के विभाजन के बाद यह रियासत पहले पाकिस्तान का हिस्सा बनी और बांग्लादेश बनने के बाद अब यह बांग्लादेश के गाज़ीपुर क्षेत्र में पड़ती है। हालांकि भुवाल रियासत का नाम बदल दिया गया है लेकिन जयदेबपुर स्टेशन अभी भी बांग्लादेश में मौजूद है जहां यह रियासत पड़ती थी।  लौटते हैं कहानी पर। तो सन् 1700 से भुवाल रियासत हिन्दू ज़मीन्दारों के अधीन थी। 1901 में रियासत

इनकी ज़िन्दगी का एक ही मकसद है स्वदेशी किस्मों और बीज़ों को बचाना और किसानों को जैविक खेती की तरफ लौटाना- मिलिए भारत की बीजमाता से

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‘ बीयाने बैंक , कोंभाकणे ’ .., लाल स्याही से लिखी इस इबारत वाले काठ के दरवाज़े को ठेलते हुए जब आप अन्दर पहुंचते हैं तो कहीं कच्ची मिट्टी के घड़ों में रखी धान की किस्में दिखती हैं , कहीं टांड से लटकी हुए मटर और तोरी की स्थानीय फसलें तो कहीं लकड़ी की अल्मारियों में करीने से सजे कांच के जारों में रखे दालों , सब्ज़ियों , दलहनों , तिलहन और सेम के बीज। जी हां , आप देश के पहले स्वदेशी किस्मों की फसलों के बीज बैंक में हैं। इस बैंक में 53 तरह की फसलों की 114 स्वदेशी किस्मों के बीजों को पारम्परिक आदिवासी तरीकों से संग्रहित किया गया है। देश के अपनी तरह के इस पहले बैंक के पीछे जो व्यक्तित्व है वो हैं श्रीमती राहिबाई सोमा पोपेरे। सादी महाराष्ट्रियन साड़ी में दिखने वाली इस महिला किसान ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर जैव विविधता को कायम रखने , स्वदेशी किस्मों को बचाने और स्थानीय लोगों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दि