Monday, 18 December 2017

भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए 'जीत' लेकर आए हैं गुजरात के चुनाव परिणाम



आज प्रधानमन्त्री ने जब गुजरात की जीत पर पार्टी कार्यकर्ताओं को सम्बोन्धित किया तो उनकी आवाज़ में वो स्वाभाविक खुशी, चहक और आत्मविश्वास गायब थे जो उनके भाषणों की पहचान है। उनकी आवाज़ में एक सोज था। लग रहा था जैसे मोदी जी किसी बड़ी लड़ाई को बमुश्किल जीत कर आए हैं और उन्हें खुद भी इस जीत का विश्वास नहीं हो पा रहा। बाद में उनका गुजरात के लोगों से माफी मांगना, 'विकास ही जीतेगा' जैसे नारे लगवाना और सारे गुजरातियों को जाति-समुदाय से ऊपर उठकर साथ आने को कहना, बयां करता हैं कि सच में यह उनके लिए भी बहुत बड़ी लड़ाई थी और कहीं ना कहीं उन्हें अपने होमटाउन में अपनी ज़मीन दरकने का अन्देशा भी था और शायद यहीं वजह रही कि उन्होंने इस कदर अपनी ताकत चुनाव प्रचार में झोंक दी, कि विकास की धार से भरे स्तरीय भाषणों में व्यक्तिगत मुद्दों और आरोप-प्रत्यारोपों के कारण स्तरहीनता सुनाई देने लगी।

नरेन्द्र मोदी जी आत्ममुग्ध नेता ज़रूर हैं लेकिन उन्हें खुद की काबिलियत और जनता की समझदारी को लेकर कोई गुमान नहीं है। दो दशक तक गुजरात में रह चुकने के बाद वो गुजराती दिमाग और अक्लमन्दी को खूब जानते हैं, और यह भी समझते हैं कि उनके गुजरात से निकल जाने के बाद वहां कोई भी नेता उनकी कमी को पूरा नहीं कर पाया है। इसलिए केवल 99 सीटों पर सिमट जाने के बाद उन्हें भी समझ आ गया है कि अब उन्हें गुजरात में वाकई ध्यान देना होगा और विकास पर लौटना होगा। जो खामियां रह गई हैं, उन्हें भरना होगा, वरना आगे की राह आसान नहीं होगी।

और यह जीत है ना, वो छोटे मार्जिन से ही सही, बहुत-बहुत महत्वपूर्ण है बीजेपी और खुद नरेन्द्र मोदी के लिए। क्योंकि एक तो यह खुद प्रधानमन्त्री का गढ़ है और दूसरे पहली बार उन्हें राहुल गांधी- जिन्हें कि वो हमेशा नकारते आए हैं, से कड़ी चुनौती मिली है। जीएसटी, डीमॉनेटाइजेशन के मुद्दे पर भी जनता का जवाब अपेक्षित था। अगर यह चुनाव बीजेपी हार जाती तो यह ऐसी हार होती जिससे ना केवल बीजेपी पार्टी और अमित शाह की इमेज प्रभावित होती बल्कि खुद मोदी जी की एक नेता के तौर पर विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता। शिवसेना जैसे दलों को मज़बूती से सिर उठाने का मौका मिल जाता और प्रधानमन्त्री की नीतियां सवालों के घेरे में आ जाती।

जीत छोटी ही सही, विश्वास देती है। उम्मीद की किरण जगाए रखती है कि अभी सब कुछ टूटा नहीं है। गुजरात के हर उस कार्यकर्ता में, जो पिछले सालों से गुजरात में बीजेपी का तिलिस्म टूटते देख रहा था और इस जीत को शायद असंभव मानकर चल रहा था, इस जीत ने नई आशा जगाई है। इतनी कम मार्जिन से जीत के बाद अब शायद वो और मेहनत से अपने काम को अन्जाम दें।

दूसरी तरफ, राहुल गांधी के लिए यह हार, दरअसल उनकी बहुत बड़ी जीत है। इन चुनावों में राहुल गांधी किसी बिल्कुल खांटी राजनीतिज्ञ की तरह आक्रामक, किन्तु स्तरीय रैलियां करते नज़र आए। उनमें राजनीतिक परिपक्वता भी आई है। मणिशंकर अय्यर के बयान पर तुरन्त संज्ञान लेना और परिणामों के बाद ट्विटर पर अपनी हार स्वीकार करते हुए इसे जनता की इच्छा मानना, इसी परिपक्वता का परिणाम है। एक बात और, आम कांग्रेसी कार्यकर्ता, नेता, चाहें कुछ भी कहते रहें, राहुल गांधी ने अपनी हार के बाद मोदी जी या भाजपा के विरोध में कोई बयान नहीं दिया है, जो उनकी एक नेता के तौर पर अक्लमन्दी का परिचायक है।

 कांग्रेसियों के पास हर वजह है खुश होने की। गुजरात जैसे पीएम के गढ़ में भाजपा को कांटे की टक्कर देना, अगर सफलता नहीं तो सफलता से कम भी नहीं। कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद, पहली बार राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने भाजपा को इतनी ज़बरदस्त टक्कर दी है। इस परिणाम ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच राहुल की विश्वसनीयता निश्चित तौर पर बढ़ाई है।


बाकी यह तय है, कि आगे आने वाले चुनाव और ज़्यादा रोचक होने वाले हैं। 

Monday, 13 November 2017

बहुत हैरान-परेशान करने वाले सवाल पीछे छोड़ता है प्रद्युम्न मर्डर केस


8 सितम्बर 2017 को हुए रयान मर्डर केस की गुत्थी अब सुलझ चुकी है, कातिल मिल गया है और मोटिव भी मिल गया है। लेकिन पूरे देश को हैरान करने वाले इस हत्याकांड के सुलझने के साथ ही बहुत सारे ऐसे सवाल सामने आ खड़े हुए हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करते हैं और एजूकेशन सिस्टम, स्टूडेन्ट्स साइकी और जांच एजेन्सी की ऐसी तस्वीरें सामने लाते हैं जो बेचैन करने वाली हैं।
कातिल छात्र का व्यावहार : इस हत्याकान्ड का सबसे चौंकाने वाला पहलू। एक ग्यारहवीं के छात्र ने केवल इसलिए प्रद्युम्न का गला रेत दिया क्योंकि वो एक्ज़ाम फोबिया से ग्रसित था। उसे टालना चाहता था। वजह तो हैरान करने वाली है ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा आश्चर्यचकित करने वाला है, हत्या को करने का तरीका और इसे अन्जाम देने के बाद छात्र का व्यावहार। उसने प्रद्युम्न को यह कहकर टॉयलेट में बुलाया कि उसे कुछ हैल्प चाहिए, और वहां पीछे से उसका गला चाकू से रेत दिया। वो चाकू जो उसने कुछ दिनों पहले ही खरीद कर रख लिया था। जिसे लेकर वो स्कूल आ रहा था। हत्या के बाद पहले उसने वो चाकू कमोड में फेंका और फ़िर वो पूरी तरह से कूल, नॉर्मल रहकर गार्डनर के पास गया और उसे बताया कि टॉयलेट में ज़ख्मी बच्चा पड़ा है। फ़िर बड़े आराम से उसने एक्ज़ाम दिया और छुट्टी में घर चला गया। पूरी पूछताछ प्रक्रिया के दौरान वो नॉर्मल रहा। कोई रिग्रेट, कोई डर नहीं।और यह छात्र केवल साढ़े सोलह साल का है।
जिन लोगों को यह शक है कि छात्र ऐसा नहीं कर सकता वो ज़रा गुड़गांव स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों (SCRB) के पिछले साल के आंकड़े देख लें, जो यह बताते हैं कि 2016 में हरियाणा में हुए कुल मर्डर्स में से 5 फीसदी, किशोरों द्वारा किए गए (16-18 एज ग्रुप, कुल 55 किशोर)। रेप करने वाले किशोरों का फीसद इससे ज़्यादा है (64 किशोर)। इसके अलावा भी गैंगरेप, किडनैपिंग, डकैती, लूट वगैरह के मामलों में भी बड़ी संख्या में किशोरों को अरेस्ट किया गया है।
मोटिव: हालांकि बहुत से लोग मोटिव को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन साइकॉलिजिस्ट का कहना है (टाइम्स ऑफ इन्डिया रिपोर्ट) कि चूंकि बच्चे के घर में मां-बाप के बीच लड़ाई-झगड़े का माहौल था, वो हिंसा को लेकर न्यूट्रल हो गया था। और जहां तक एक्ज़ाम के प्रेशर का सवाल है, वो तो वाकई बहुत बड़ी चीज़ है, जिस घर में भी बोर्ड परीक्षा देने वाले बच्चे हैं वो इसे आसानी से समझ सकते हैं। पिछले कुछ सालों में खासकर कोचिंग नगरी कोटा समेत देश के कई हिस्सों में एक्ज़ाम/ एन्ट्रेन्स एक्ज़ाम प्रेशर के चलते छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।
छात्र एक्स्ट्रीम स्टेप्स उठा रहे हैं, बस इस मामले में एक छात्र ने खुद को नुकसान पहुंचाने की बजाय किसी दूसरे की जान ले ली। बाकी देखते हैं, मामले की जांच जारी है, सच जो भी होगा सामने आएगा।
गुड़गांव पुलिस का रोल: रोचक बात हैं, गुड़गांव पुलिस ने तुरत-फुरत केस सॉल्व करके बस कन्डक्टर अशोक को पकड़ लिया, मर्डर वैपन भी बरामद हो गया और गुनाहगार ने कत्ल किया जाना कुबूल भी कर लिया। और फ़िर सीबीआई की जांच में बात पूरी तरह बदल जाती है। पुलिस द्वारा किसी बेगुनाह को गुनाहगार बनाने का इतना बड़ा और परोक्ष सुबूत दहलाने वाला है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि केवल एक अशोक के अपराधी साबित होने से पूरी ड्राइवर, मेड, सर्वेन्ट्स, कामगारों पर शक का माहौल बन गया। उनके प्रति हम अपने बच्चों में डर बैठाने लगे, हमारे मन में डर बैठ गया।
यह बड़ी जांच का विषय है कि क्यों अशोक ने गुनाह कुबूला और वो चाकू कहां से आया जिससे खून तो नहीं हुआ पर गुड़गांव पुलिस ने उसे बतौर मर्डर वैपन ज़ब्त कर लिया। गुड़गांव पुलिस का यह कहना कि उनकी जांच शुरूआती दौर में थी, इसलिए उनसे गलती हुई, काफी नहीं है। इतनी बड़ी बात को गलती कहकर नहीं टाला जा सकता। पुलिस बहुत सशक्त होती है, औऱ उनमें अपराध और अपराधी को सूंघने की शक्ति होती है, ऐसी गलती पुलिस से होनी सम्भव ही नहीं। इस मामले में गुड़गांव पुलिस पर बड़ा मामला बनना चाहिए, क्योंकि अगर सीबीआई बीच में नहीं आती तो उन्होंने तो अशोक को ही फांसी के तख्ते तक पहुंचा दिया था.. जबकि हमारी माननीय अदालत का आदर्श वाक्य यह है कि भले ही 100 अपराधी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए। यह गम्भीर मामला है, गुड़गांव पुलिस और उन अधिकारियों की पूरी जांच होनी चाहिए जिनके दबाब में यह काम किया गया। ताज़ा खबर यह भी है कि सीबीआई मामले से जुड़े चार पुलिस अधिकारियों की जांच कर रही है।
स्कूल प्रबंधन का रोल: और अब सबसे महत्वपूर्ण बात- स्कूल प्रबंधन का इसमें क्या रोल रहा। इस पर सीबीआई की भी जांच जारी है कि कत्ल के बाद किस किस को फोन किया गया, क्यों सुबूतों को मिटाने, उनसे छेड़छाड़ करने की कोशिश की गई और इसमें और कौन कौन शामिल है। एक बार जांच पूरी होने दीजिए, सीबीआई पर कोई दबाब नहीं रहा, तो इससे जुड़े भी बड़े बड़े नाम सामने आएंगे।

Saturday, 23 September 2017

'दिनकर' का हास्य बोध


हठ कर बैठा चांद एक दिन,
माता से यह बोला
सिलवां दो मां मुझे ऊन का,
मोटा एक झिंगोला।
सन-सन चलती हवा रात भर,
जाड़े से मरता हूं।
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह,
यात्रा पूरी करता हूं।
आसमान का सफर,
और यह मौसम है जाड़े का।
अगर ना हो इंतज़ाम,
दिलवा दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।
बेटे की सुन बात कहा माता ने,
अरे सलोने!
कुशल करे भगवान,
लगे ना तुझको जादू टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है,
पर मैं तो डरती हूं।
कभी एक रूप में ना तुझको,
देखा करती हूं।
कभी एक अंगुल भर चौड़ा,
और कभी कुछ मोटा।
बड़ा किसी दिन हो जाता है,
और किसी दिन छोटा।
घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन,
ऐसा भी करता है।
नहीं किसी की आंखों को तू,
दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही बता,
नाप तेरी किस रोज़ लिवाएं।
सी दें एक झिंगोला,
जो हर रोज़ बदन में आए।

चांद का कुर्ता’, रामधारी सिंह दिनकर की विद्रोही और राष्ट्रवादी कवि की छवि से यह कविता बिल्कुल मेल नहीं खाती। कहां “ जो तटस्थ है समय लिखेगा उनके भी अपराध “ और सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जैसी उनकी रचनाएं और कहां यह सुखद बाल कविता।

वीर रस के कवि के रूप पहचान और ख्याति पाने वाले दिनकर का मन बाल कविताएं लिखने में भी रमता था। उनके शिशु गीत, बाल कविताएं बहुत रोचक हैं,  मनोरंजक हैं और तीक्ष्ण हास्य समेटे हैं। इन कविताओं में चांद है, सूरज है, चूहा है, पढ़ाकू मियां हैं और मिर्च का मज़ा भी है।

सूरज का ब्याह’ में वो लिखते हैं-
अगर सूर्य ने ब्याह किया, दस पांच पुत्र जन्माएगा।
सोचो तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा।
अच्छा है सूरज क्वारा है, वंश विहीन, अकेला है।
इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है



अब ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’ के अंश देखिए-
चूहे ने यह कहा, चुहिया छाता और घड़ी दो।
लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वो पगड़ी दो।
दिल्ली मैं देखूंगा, आज़ादी का नया ज़माना,
लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना


एक और प्रसिद्ध कविता है उनकी ‘पढ़क्कू की सूझ
जिसमें वो लिखते हैं-
एक पढ़क्कू बड़े तेज़ थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे।
जहां ना कोई बात, वहां भी नई बात गढ़ते थे।
एक रोज़ वे पड़े फिक्र में, समझ नहीं कुछ पाए।
बैल घूमता है, कोल्हू में कैसे बिना चलाए?”
  
उनकी प्रेम, श्रृंगार और वीर रस से भरी कविताएं पढ़ते समय, उनके व्यक्तित्व का यह खण्ड बिसरा मत देना। अपनी शब्दकृतियों के बल पर यह छायावादी कवि, “दिनकरबनकर हिन्दी कविता के आकाश में तब तक दमकता रहेगा जब तक हिन्दी जीवित है, काव्य जीवित है और भावनाएं जीवित हैं। बाकी एक प्रशंसक के रूप में मुझे तो उनके हास्य बोध का ज्ञान उनकी इस प्रसिद्ध कृति से भी होता है जो हमेशा मुश्किलें ढूंढने वाली मनुष्य प्रवृत्ति पर कटाक्ष करती है-  

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चांद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है,
उलझने अपनी बना कर आप ही फंसता,

और फ़िर हंसता ना, रोता है   

Monday, 3 July 2017

सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं, छिपा था क्या, कहां किसने ढका था....: ऋगवेद के सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है यह अमर गीत



वर्ष 1988 में दूरदर्शन पर हर रविवार की दोपहर श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक सीरियल प्रसारित हुआ करता था -'भारत एक खोज', जो कि पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा 1946 में लिखित किताब 'डिस्कवरी ऑव इंडिया' पर आधारित था। इसके 53 एपिसोड्स में भारत के 5000 सालों के इतिहास का फिल्मांकन किया गया था। लेकिन यहां हम सीरियल की बात नहीं करेंगे। बल्कि इस लेख का उद्देश्य इस सीरियल के शीर्षक गीत- "सृष्टि से पहले सत् नहीं था..." का महत्व सामने लाना है।

सनातन धर्म के सबसे आरम्भिक स्त्रोत, ऋगवेद के संस्कृतनिष्ठ सूक्तों से शुरू होने वाले, इस शीर्षक गीत में गूंजने वाली संस्कृत, बेहद क्लिष्ट होने के बावजूद कानों में रस घोलती है और सुनने वाले को एक अलग श्रव्य रस से परिचित कराती है।

लेखक व अनुवादक वसंत देव के बोल, संगीतकार वनराज भाटिया का संगीत और सुरीला समूह गायन वो विशेषताएं हैं जो इस गीत को समय और काल के परे लोकप्रिय बनाती हैं। पर ऐसा क्या खास है इसके बोलों में कि जब यह गीत कानों में गूंजता है तो सुनने वाले को एक अलग अनुभूति देता है?




क्या आप जानते हैं कि यह पूरा गीत दरअसल ऋगवेद के नासदीय और हिरण्यगर्भ सूक्तों का हिन्दी अनुवाद है। जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति की शुरुआत का वर्णन है। जी हां, वो प्रश्न जिसका उत्तर विज्ञान आज तक ढूंढ रहा है।

हिन्दु धर्म में पूज्यनीय ऋगवेद को विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है। 5000 वर्ष पूर्व लिखे गए ऋगवेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की रचना से पहले का जो वर्णन है वो आज भी प्रासंगिक है। इसके रचयिता ऋषि प्रजापति परमेष्ठी माने जाते हैं। इस सूक्त के अनुसार सृष्टि की शुरूआत से पहले किसी तरह का कोई तत्व नहीं था, कोई अणु, परमाणु या पार्टिकल कुछ भी नहीं। आकाश, हवा, दिन, रात वगैरह भी नहीं थे। केवल अंधकार था, गहन अंधकार और शून्य, निर्वात, खालीपन। और तब, ब्रह्मतत्व या जिसे ईश्वर भी कहा जा सकता है, के मन में सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न हुई और 'कुछ नहीं' से 'कुछ' का निर्माण होने की नींव पड़ी।

जहां एक तरफ यह सूक्त ईश्वर के होने को स्थापित करता है और कहता है कि सृष्टि की शुरूआत को दरअसल ईश्वर के अलावा कोई नहीं जानता जो कि प्रकाशकणों के रूप में सब जगह उपस्थित हैं, वहीं उसके होने पर सवाल भी खड़ा करता है। यह भी पूछता है कि वाकई में ऐसा कोई करने वाला है भी या नहीं जिसके बल पर सूर्य, पृथ्वी या यह पूरा बृह्मांड स्थिर गति से चल रहे हैं।



इस गीत का दूसरा खंड जो कि सीरियल के अंत में गूंजता है, ऋगवेद के हिरण्यगर्भ सूक्त का हि्न्दी अनुवाद है। सूक्त का प्रथम श्लोक ज्यों का त्यों गीत में लिया गया है। हिरण्यगर्भ (golden womb) का अर्थ है उजला गर्भ या अंडा या उत्पत्ति स्थान। सनातन धर्म में इसे सृष्टि की शुरुआत का स्त्रोत माना जाता है। इसी के ज़रिए सूर्य, चन्द्रमा, देवताओं और जीवात्मा का जन्म हुआ है। हिरण्यगर्भ को सर्वाधिक पूज्यनीय बताया गया है। उगते सूर्य को भी हिरण्यगर्भ का रूप माना गया है जिसकी लालिमा उसकी पूर्ण शुद्धता से भरी उत्पत्ति का प्रतीक है , इसलिए यहां उसकी उपासना की भी बात कहीं गई है।

धारावाहिक की केवल अंतिम कड़ी में पूरा गीत लिया गया है। बाकि कड़ियों में शीर्षक गीत के कुछ ही अंतरे सुनाई पड़ते हैं ('अगम, अतल जल भी कहां था' के बाद सीधे 'सृष्टि का कौन है कर्ता' से लिया गया है।)

गीत के बोल इस तरह से हैं:

(शीर्षक गीत)

नासदासीनन्नोसदासीत्तानीम नासीद्रोजो नो व्योमा परो यत।
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गगहनं गभीरम्।।
(नासदीय सूक्त, ऋगवेद, दशम् मंडल, सूक्त- 129)

सृष्टि से पहले सत् नहीं था,
असत् भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं,
आकाश भी नहीं था।

छिपा था क्या, कहां,
किसने ढका था।
उस पल तो अगम, अतल
जल भी कहां था।

नहीं थी मृत्यु,
थी अमरता भी नहीं।
नहीं था दिन, रात भी नहीं
हवा भी नहीं।
सांस थी स्वयमेव फिर भी,
नहीं था कोई, कुछ भी।
परमतत्व से अलग, या परे भी।

अंधेरे में अंधेरा, मुंदा अंधेरा था,
जल भी केवल निराकार जल था।
परमतत्व था, सृजन कामना से भरा
ओछे जल से घिरा।
वही अपनी तपस्या की महिमा से उभरा।

परम मन में बीज पहला जो उगा,
काम बनकर वह जगा।
कवियों, ज्ञानियों ने जाना
असत् और सत् का, निकट सम्बन्ध पहचाना।

पहले सम्बन्ध के किरण धागे तिरछे।
परमतत्व उस पल ऊपर या नीचे।
वह था बटा हुआ,
पुरुष और स्त्री बना हुआ।

ऊपर दाता वही भोक्ता
नीचे वसुधा स्वधा
हो गया।।

सृष्टि ये बनी कैसे,
किससे
आई है कहां से।
कोई क्या जानता है,
बता सकता है?

देवताओं को नहीं ज्ञात
वे आए सृजन के बाद।

सृष्टि को रचा है जिसने,
उसको, जाना किसने।


सृष्टि का कौन है कर्ता,
कर्ता है व अकर्ता?
ऊंचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता।
वहीं सचमुच में जानता
या नहीं भी जानता।
है किसी को नहीं पता,
नहीं पता,
नहीं हैं पता,
नहीं हैं पता।


(उपसंहार अंतरा)
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेकासीत्।
स दाधारं पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्।।
(प्रथम श्लोक, हिरण्यगर्भ सूक्तम, ऋगवेद, दशम मण्डल, सूक्त -121)

वो था हिरण्यगर्भ, सृष्टि से पहले विद्यमान
वहीं तो सारे भूत जात का स्वामी महान

जो हैं अस्तित्वमान, धरती- आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

जिसके बल पर तेजोमय है अम्बर
पृथ्वी हरी-भरी, स्थापित, स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर।
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

गर्भ में अपने अग्रि धारण कर, पैदा कर,
व्यापा था जल इधर-उधर, नीचे ऊपर
जगा जोे देवों का एकमेव प्राण बनकर,
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर।

ऊं!!

सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता, पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक, अतुल जल नियामक रक्षा कर।
फैली है दिशाएं बाहु जैसी उसकी सब में, सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर।
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर..।

( सत्- सत्य/तत्व, अगम- अथाह,  हवि -हवन)

















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Saturday, 17 June 2017

लद्दाख.. यानि ठण्डे मरुस्थल का सफर...

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इस आठ जून की सुबह को जब हमारे कदम लद्दाख के रिनपोछे हवाई अड्डे पर पड़े तो हम दिल्ली के साथ-साथ उसकी गर्मी को भी पीछे छोड़ ही चुके थे। यहीं नहीं, राजधानी की चौड़ी सपाट सड़को को, दोनों तरफ दिखती सीमेंट की इमारतों को और सड़को पर दौड़ते वाहनों से उठते धुंए को भी बहुत पीछे छोड़ आए थ। सामने थे कत्थई पहाड़ और उन पर अठखेलियां करते बादल, बलखाती पगडंडीनुमा सड़कें और शांत, सुरम्य वातावरण।  


जैसा कि निर्देशित था, पहले दिन होटल में आराम करने और स्थानीय बाज़ार की सैर करने के बाद दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो हमारा पहला पड़ाव था लामायुरू मॉनेस्ट्री। जो लेह से लगभग 120 किमी दूरी पर, लेह-श्रीनगर हाइवे पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग एक (NH-1) है। बलखाती सड़क के एक तरफ सुनहरे, पीले और भूरे पहाड़ों के दर्शन हो रहे थे तो दूसरी तरफ थी बलखाती सिन्धु (Indus) नदी। जहां सूरज की रौशनी पड़ रही थी वहां से उजले, जहां छाया थी वहां से धुंधले और चोटियों पर धवल छटा.. पहाड़ों के इतने रंग थे मानों किसी चित्रकार की बनाई तस्वीर हो।

सिन्धु और झंस्कार नदी का संगम
हम दोनों तरफ के सुंदर नज़ारों का आनंद लेते हुए सफर कर रहे थे कि ड्राइवर ने लेह से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर गाड़ी रोककर हमें उतरने को कहा। गाड़ी से उतरकर नीचे घाटी की तरफ झांका तो नज़ारा दर्शनीय था। दो अलग-अलग नदियों का संगम। नीचे सिन्धु नदी और झंस्कार (Zanskar) नदी मिलते हुए साफ दिख रहीं थीं।  इन दोनों नदियों के जल का रंग भी बिल्कुल अलग था और फ़ितरत भी। एक नदीं बिल्कुल शांत थी तो दूसरी अविकल बहती.. वाचाल, चंचल...। 

मूनलैंड पहाडियां
लेह से लगभग 100 किमी पहले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर एक छोटा सा गांव पड़ता है लामायुरू। यहीं पर स्थित हैं मूनलैंड पहाड़ियां। इन पहाड़ियों की विशेषता यह हैं कि इनकी संरचना बिल्कुल चांद पर पाई जाने वाली पहाड़ियों जैसी हैं। यहां का तापमान भी काफी कम रहता है। 



यहीं मूनलैंड पहाड़ियों से कुछ किलोमीटर आगे लेह की सबसे पुरानी मॉनेस्ट्री है- लामायुरू मॉनेस्ट्री। पहाड़ी पर बसी यह गोम्पा मॉनेस्ट्री बेहद शांत, सादगीपूर्ण और खूबसूरत हैं जहां से पूरे गांव का नज़ारा लिया जा सकता है। लामायुरू में हर साल दो बार लेह के प्रसिद्ध मास्क फेस्टिवल्स आयोजित किए जाते हैं। कहते हैं कि यह मॉनेस्ट्री लगभग 400  बुद्ध सन्यासियों का घर रही है। 


इस मॉनेस्ट्री में शाक्यमुनि बुद्ध की वृहद् मूर्ति हैं। दोनों तरफ की दीवारों में छत तक ऊंची लकड़ी और शीशे की अल्मारियों में लाल और सुनहरे कपड़ों में लिपटे धार्मिक ग्रंथ रखे हुए हैं। 


यहां आने के लिए 15 साल से ऊपर के लोगों का 50 रुपए का टिकिट तो लगता है लेकिन परेशानी यह हैं कि  यहां आपको इस मॉनेस्ट्री, यहां की संस्कृति और तमाम धार्मिक दस्तावेज़ो वगैरह के बारे में विस्तार से बताने वाला कोई गाइड उपलब्ध नहीं है। जानकारी के नाम पर केवल एक साइन बोर्ड इस मॉनेस्ट्री के दरवाज़े पर लगा हुआ है। अगर आप बुद्ध धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते तो आपको इस प्राचीन मॉनेस्ट्री की विशेषता या धार्मिक महत्व का अंदाज़ा शायद ना हो पाए लेकिन फ़िर भी एक पर्यटक के तौर पर आप यहां की दीवारों पर की गई रंग-बिरंगी खूबसरत चित्रकारी और चटकीली साज सज्जा का आनंद उठा सकते हैं। यहां के माहौल में बसी शांति और पवित्रता को महसूस कर सकते हैं जो आपको किसी दूसरी ही दुनिया में आने का अहसास कराती है। यहां की अलीची मॉनेस्ट्री भी काफी प्रसिद्ध है। 

खरदूंगला के रास्ते पर
 लद्दाख शब्द में ला (La) का मतलब होता है पास यानि रास्ता और दाख (Dakh) का मतलब होता है भूमि। लद्दाख, ऊंचे पासेज यानि ऊंचे रास्तों की भूमि को कहा जाता है। तो 10 जून को हमारा पड़ाव था, लेह से चालीस किलोमीटर सड़क दूरी पर स्थित विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल पास- 'खरदूंगला'। समुद्र तल से 18,380 किमी ऊंचाई पर स्थित इस पास पर पहुंचना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। लगभग 15,000 फीट तक बंजर पहाड़ मिलते हैं और फ़िर शुरू होती हैं कहीं-कहीं सफेद बर्फ से ढकी पहाड़ियां। 17.00 फीट की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते आपको हर तरफ हिमआच्छादित, शुभ्र वर्ण के पर्वत दिखने लगते हैं। हिमपात यहां आम है। बर्फीला तूफान या भूस्खलन कभी भी हो सकता है। सड़के संकरी तो हैं ही साथ ही फिसलन भरी हुई भी। यहां पर ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम है। लेकिन अगर आप अपने साथ एक ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर चले हैं और जोखिम उठाने को तैयार होकर आए हैं तो इस रास्ते और मंज़िल का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। 




खरदूंगला शिखर पर पहुंचना एक अलग आनंद का अहसास कराता है। हर तरफ बर्फ की सफेद चादर, अगर रंग हैं तो बस, आपके कपड़ों, गाडियों, साइन बोर्ड्स और यहां जगह-जगह पर लगे पवित्र रंगीन बंदनवारों का रंग। किसी की तबीयत खराब होने की स्थिति में आप यहां स्थित आर्मी की डिस्पेन्सरी में जा कर चिकित्सकीय सहायता ले सकते हैं। यहां विश्व का सबसे ऊंचा कैफेटेरिया भी है जहां हमने चाय, मैगी और मोमोज़ का स्वाद लिया। खरदूंगला के माइनस 10 डिग्री तापमान में चौबीसों घंटे यहां रहने वाले फौजियों के आराध्य हैं भगवान शिव, जिनका यहां एक छोटा सा मंदिर भी है। 


पैंगगॉन्ग झील
लद्दाख का सबसे मनोरम स्थल है समुद्र तल से 14,270 फीट की ऊंचाई पर स्थित पैन्गॉन्ग सो (Pangong Tso) झील। तिब्बती भाषा के इस नाम का मतलब होता है "हाई ग्रासलैंड झील"। लेह से डेढ़ सौ किमी दूर स्थित इस सुंदर झील तक पहुंचने के लिए लगभग 5 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। रास्ते में पड़ता है लद्दाख का तीसरा सबसे ऊंचा पास 'चांगला'। चांगला तक ऊपर बर्फीले पहाड़ चढ़ने के बाद जब हम नीचे उतरते हैं तो रास्ता बंजर पहाड़ों और पथरीली भूमि से भरा हुआ है। यहां आर्मी का बेस कैम्प भी है। जगह-जगह आर्मी के बकंर्स नज़र आते हैं। चूंकि यह झील भारत-चीन की एक्चुअल लाइन ऑफ कंट्रोल पर है, यहां तक पहुंचने के लिए आपको इनर लाइन परमिट (ILP) लेने की ज़रूरत होती है। 140 किमी लम्बी इस झील का 40 किमी हिस्सा भारत में पड़ता है और बाकी 100 किमी चीन में। रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। शे और ग्या जैसे गांवो से गुज़रकर और पागल नाला पार करके जब हम इस झील तक पहुंचते हैं, तो यकीन मानिए सारी थकान इसकी एक झलक से ही मिट जाती है। इस झील पर प्रकृति ने जमकर खूबसूरती लुटाई है। पानी का रंग नीला है, बिल्कुल फिल्मों में दिखने वाली झीलों की तरह; वातावरण नि:शब्द है और सुंदरता, बेदाग।  



मैंने अभी कहा था ना कि पैन्गॉन्ग लेक का रास्ता लम्बा ज़रूर है लेकिन बोरिंग बिल्कुल नहीं। लम्बे सफर की उदासीनता को मिटाने का काम प्राकृतिक सुन्दरता ही नहीं करती बल्कि रास्ते पर जगह-जगह लगे बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन के रोड साइन्स की भी इसमें अहम् भूमिका है। लद्दाख, मिलिट्री के हिसाब से काफी संवेदनशीन इलाका है क्योंकि यह सियाचिन, कारगिल और द्रास इलाकों को जोड़ता हैं। यहां ठंडे, सख्त, फौलादी पहाड़ों को काटकर उसमें से सड़के निकालने का काम करती है बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ)। बर्फीली, बलखाती सड़कों पर यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनज़र बीआरओ के चेतावनी बोर्ड लगे हैं जिनको पढ़ने का अपना अलग मज़ा हैं। इनमें फनी वनलाइनर्स लिखे गए हैं जो आपको सुरक्षित चलने का अहसास दिलाने के साथ-साथ आपके होंठों पर मुस्कुराट भी लाते हैं।


शांति स्तूप
प्राकृतिक दर्शनीय स्थानों और प्राचीन मॉनेस्ट्रीज़ के अलावा लद्दाख में कुछ कदरन आधुनिक मानव निर्मित स्थल भी हैं, जिनमें प्रमुख हैं पूरे विश्व को शांति का संदेश देता शांति स्तूप और मिलिट्री द्वारा बनाया गया सेना प्रदर्शनी स्थल, हॉल ऑफ फेम। 

हॉल ऑफ फेम
  यहां सेना के उपकरणों, परिधानों और विभिन्न सैन्य अभियानों की ऐतिहासिक तस्वीरों को लोगों के लिए प्रदर्शित किया गया है। यहां आकर आपको अपनी सेना के कठिन परिश्रम और अदम्य साहस के बारे में पता चलता है, गर्व का अहसास होता हैं। 


यहां की सबसे अमूल्य धरोहर है राजपूताना राइफल्स के युवा कैप्टन विजयंत थापर द्वारा कारगिल युद्ध में शहीद होने से पूर्व अपने पिता को लिखा गया पत्र। कैप्टन विजयंत केवल 22 साल की छोटी सी उम्र में शहीद हो गए थे। उनके इस पत्र के साथ ही उनके पिता का जवाब भी संलग्न है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसे पढ़कर ही आप इसके भावों के महसूस कर सकते हैं। यहां कुछ पाकिस्तानी सैनिकों से मिले पत्र भी हैं जो उन्होंने अपने परिवारजनों को लिखे थे। अगर यहां जाएं तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें।



बाकी अगर आप लद्दाख जा रहे हैं तो लेह पैलेस देखें, मैग्नेटिक हिल देखें, ड्रुक पद्मा स्कूल या रैंचो स्कूल देखें जहां थ्री इडियट्स फिल्म की शूटिंग हुई थी। यहां का वुड अवन पिट्ज़ा और स्थानीय पकवान थुप्का ज़रूर खाएं। ढेर सारे गर्म कपड़े, खूब सारा समय और बहुत सारा साहस लेकर जाईए। मिलिट्री के लोगों से मिलिए, हिमआच्छादित शैलमालाओं को निहारिए...। 

लद्दाख के ठंडे मरुस्थल का सफर आपको प्रकृति की ताकत का भी अहसास दिलाएगा, विविधता का भी और प्रकृति द्वारा निर्मित मानवों की इच्छा शक्ति का भी जो इन बंजर पहाड़ों को छूने और महसूस करने की तमन्ना में यहां तक आते हैं और बहुत सी अच्छी यादें साथ ले जाते हैं। 
'जुले'

Saturday, 13 May 2017

भारत के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले असली अपराधी कौन हैं?



भारत देश के बच्चों की पढ़ाई, उन्हें योग्य बनाने से लेकर उनसे कई महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाएं दिलवाने का काम सीबीएसई करती है। पूरे देश में स्कूलों को मान्यता देना, विभिन्न कक्षाओं के लिए कोर्स निर्धारित करना, स्कूलों के ऑडिट करना, किताबें और स्टडी मैटीरियल तैयार करवाना.. जैसे बहुत से महत्वपूर्ण काम इस एकमात्र संस्था के जिम्मे हैं । साथ ही सीबीएसई दुनिया की सबसे बड़ी एक्ज़ाम्स आयोजित कराने वालीं एकमात्र संस्था है जो पूरे देश के सीबीएसई स्कूलों में दसवीं और बारहवीं की परीक्षाएं आयोजित कराने के अलावा नेट (NET), नीट (NEET), आईआईटी जी (JEE) और सीटेट (CTET) जैसी प्रतियोगी/प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन भी कराती है।

 यानि कम शब्दों में कहें तो भारत के बच्चों का भविष्य, पढ़ाई, करियर सबकुछ इस सीबीएसई संस्था के हाथों में हैं जोकि एचआरडी मिनिस्ट्री के अन्तर्गत आती है। यहां सीबीएसई की महिमा का गुणगान यूंही नहीं किया गया है। इसके पीछे कई कारण है। पर पहले आज के दो सबसे ज्वलंत सवालों को देखते हैं:

पहला सवाल- प्राइवेट स्कूलों द्वारा लगातार मनमाने ढंग से बढ़ाई जा रही फीस, एनसीईआरटी की किताबें ना लागू करके प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें लागू करना और उन्हें स्कूल में ही खोली गई दुकानों में  दस-बीस गुने दामों पर बेचा जाना वो भी बिना रसीद दिए.. इन सब के लिए असल में कौन ज़िम्मेदार है?

दूसरा सवाल- बोर्ड परीक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के समय पेपर लीक होने और नकल करवाने के लिए सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी किस की बनती है?

पिछले साल बिहार के सीबीएसई स्कूल टॉपरों का मामला सामने आया था जिन्हें नकल करवाकर टॉपर बनाया गया था। और अब हाल में नीट परीक्षा में नकल करवाने का मामला सामने आया है, जिसमें नकल करवाने वाले गैंग ने उस बक्से का ताला तोड़कर प्रश्नपत्रों की फोटो खींची जो कि सीबीएसई द्वारा बख्तरबंद गाड़ी में विभिन्न सेंटरों पर भेजे जा रहे थे। गैंग चलाने वालों को यह तक पता होता था कि किस रोल नंबर पर कौन से सेट का पेपर आएगा। उस पेपर के हिसाब से उत्तर लिखकर प्रवेश पत्र के ज़रिए अभ्यर्थियों तक पहुंचाए जाते थे और इस तरह नकल का खेल चलता था जिसके लिए एक-एक छात्र से लाखों रुपए वसूले जाते थे।

कभी सीटेट का पेपर लीक होता है, कभी सीबीएसई बोर्ड का। नीट परीक्षाओं में भी जमकर धांधली हो ही रही है।  बहुत ही सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से पेपर लीक करके छात्रों को पास कराने वाला यह गिरोह काम करता है। और उतने ही सुनियोजित तरीके से काम करता है पब्लिक स्कूल माफिया, जो पैरेन्ट्स द्वारा लगातार आवाज़ उठाए जाने के बावजूद और मीडिया तक में इस मामले की चर्चा के बावजूद आजतक अनछुआ है। अभी तक स्कूलों पर कोई कार्यवाई नहीं हुई है।

फीस बढ़ाया जाना बदस्तूर जारी है, पैरेन्ट्स को लूटना बदस्तूर जारी है। एनसीईआरटी की किताबें आजतक सारे सीबीएसई स्कूलों में लागू नहीं हो पाई हैं। क्योंकि अगर लागू हो भी जाती हैं तो वो उपलब्ध नहीं होती। सवाल यह भी हैं कि ऐसा क्यों होता हैं, क्यों एनसीईआरटी की किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं कराई जाती या उन्हें जानबूझ कर कम संख्या में छापा जाता है ताकि स्कूल इनकी अनुपलब्धता का तर्क देकर अपने हिसाब से नए पब्लिशर्स की किताबें लागू कर सकें। और सबसे बड़ी बात क्यों सीबीएसई के सुयोग्य ऑडिटर्स स्कूलों में चल रही वो गड़बड़ियां नहीं देख पाते जो साधारण इंसानों को भी दिखाई दे जाती हैं?

अब आते है असली मुद्दे पर। यहां सीबीएसई की बात क्यों की गई? जब स्कूल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते हैं तो हम उसकी ज़िम्मेदारी स्कूल माफिया पर डाल देते हैं, स्कूल की मैनेजमेंट कमेटियों पर डाल देते हैं जिनके हाथ बहुत लम्बे कहे जाते हैं। वहीं परीक्षाओं में पेपर लीक होने के मामले में, नकल कराए जाने के मामले में हम दोष संबंधित स्कूलों के लोगों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, टीचरों और गैंग के लोगों पर मढ़ देते हैं। लेकिन कभी सोचा हैं कि इसके असली दोषी कौन हैं। कौन हैं वो लोग जिनकी वजह से स्कूलों की मनमानी बंद नहीं हो पाती, परीक्षाओं में नकल होती हैं और एनसीईआरटी की किताबें सीबीएसई स्कूलों में लागू नहीं हो पाती। क्यों  सीबीएसई द्वारा कराए जाने वाले रिक्रूटमेन्ट में खुले तौर पर रिश्वतखोरी चलती है?

जब सबसे बड़ी अथॉरिटी सीबीएसई है तो पहला दोष किसका हुआ? पर्चा अगर सीबीएसई से निकलने वाली गाड़ी से लीक हो रहा है तो दोष किसका है ? ज़ाहिर है सीबीएसई का, फ़िर हम कैसे सीबीएसई को इस मामले से पाक साफ छोड़ सकते हैं। अगर धांधली हुई है तो इसमें पूरी तरह से ना सही, कहीं ना कहीं सीबीएसई शामिल है। अगर सीबीएसई से मान्यता पाने वाले पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी कर रहे हैं तो इसमें सीबीएसई कैसे बच सकती है। कार्यवाई अगर होनी चाहिए तो सबसे पहले सीबीएसई पर होनी चाहिए। जांच अगर होनी चाहिए तो सबसे पहले शुरूआत सीबीएसई से होनी चाहिए। तभी मामले को सुधारा जा सकता है।

ना तो फीस बढ़ोत्तरी के विरोध में भीड़ जुटाकर डीएम, सीएम के चक्कर काटने से कुछ होगा और ना ही पर्चा लीक गैंग की धड़पकड़ से कुछ हासिल होने वाला है। पुलिस चाहे तो इन मामलों को कुछ समय में निपटा सकती है। बस जांच की शुरूआत सही होनी चाहिए। हाथ सही कल्प्रिट पर जाना चाहिए। जो सीबीएसई है और उसकी सरमाएदार एचआरडी मिनिस्ट्री है, जो प्रकाश जावड़ेकर जी के हाथ में हैं, जो कि मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

और अंत में मुझे पता नहीं क्यों बार-बार मोदी जी द्वारा संसद में दिया गया वो बयान भूलता ही नहीं है कि रेनकोट पहन कर बाथरूम में नहाने की कला कोई डॉक्टर साहब से सीखे....।

Monday, 24 April 2017

बिन दु:ख सब सून



आप मानें या ना मानें, एक समय ऐसा था जब इस धरती पर हर खास-ओ-आम को भगवान बनने का मौका मिलता था। यह वो समय था जब भगवान दूर स्वर्ग में नहीं रहते थे बल्कि यहीं ज़मीन पर विचरण करते थे। तब दरअसल देवलोक, धरतीलोक या पाताललोक जैसी अलग अलग जगहें थी ही नहीं। इसी धरती पर पाताल भी था और आकाश के बादल भी। सब एकसार था, एक साथ था। प्रभु हर इंसान से मिलते थे, उसके दुख-दर्द सुनते थे, तकलीफें दूर करते थे और खुशियों में शरीक होते थे, और साथ ही सबको भगवान बनने का अवसर भी देते थे।

आम लोगों में से ही कईं अपनी किसी खूबी के चलते भगवान बनना चुन लेते थे। जैसे अगर किसी के पास धन-दौलत बहुत ज़्यादा थी, तो वो मनी गॉड बन जाता था। किसी की दुआओं में असर रहा हो तो ब्लैसिंग गॉड, कोई लकी है तो वो गॉड ऑव लक। इसी तरह क्लोथ गॉड, फूड गॉड, वॉटर गॉड, एम्यूज़मेन्ट गॉड जैसे हर तरह के गॉड्स हुआ करते थे।

गॉड बनने का तरीका भी अलग था। साफ-सुथरा, नफासत भरा और पूरी तरह एपॉलिटिकल। दक्षिण दिशा में एक खूबसूरत बादलों का पहाड़ था। स्लेटी और नीले रंग का, जिस पर सूरज की शुभ्र और पावन छाया पड़ा करती थी। इस पहाड़ की चोटी पर था पैराडाइज़ टैम्पल, जिसमें सूरज खुद निवास करता था। जो कोई भी अपनी किसी खूबी के कारण गॉड बनना चाहता था उसे यहां तक पहुंच कर, सूरज की गर्म किरणों को हाथ में लेकर कसम उठानी पड़ती थी कि आज के बाद वो केवल लोगों की खुशी के लिए काम करेगा और जो उसके पास बहुतायत में हैं, उसे ज़रूरतमंदों के साथ बांटेगा।

जिन लोगों के मन सच्चे होते थे, वो बिना किसी बोझ के हवा से भी हल्के हो जाते थे और बहुत आसानी से बादलों का पहाड़ चढ़कर पैराडाइज़ टैम्पल पर पहुंच जाते थे। और क्योंकि उनमें ख्वाहिशों की गर्मी नहीं रह जाती थी बल्कि नेकियों की शीतलता रहती थी, सूरज की ऊष्ण किरणें उन्हें जला नहीं पाती थीं। और वो कसम उठाकर, भगवान बनकर वापस लौट आते थे। लोगों के साथ रहते थे, घूमते थे और उनकी सहायता किया करते थे। वहीं जो लोग गॉड बनना तो चाहते थे लेकिन सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते थे वो भारी होने के कारण या तो पहाड़ नहीं चढ़ पाते थे या फ़िर उनमें इतनी शीतलता नहीं रहती थी कि सूरज की किरणों का सामना कर सकें।

गॉड हो या सामान्य लोग सबकी औसत उम्र 400 बरस हुआ करती थी। तब लोग जन्म और मृत्यु के बंधनों से भी मुक्त थे। कोई मरता नहीं था और ना ही कोई जन्म लेता था। बस लोग अपनी उम्र पूरी करने पर स्वर्ग में भेज दिए जाते थे जो वहीं पैराडाइज़ टैम्पल वाले पहाड़ के पश्चिम में उसकी तलहटी में बसा था। यह खूबसूरत लाल, पीले,नीले, सफेद रंगों वाले फूलों की घाटी थी, जिसमें शीतल झरने बहते थे। मंद पवन बहा करती थी। यहां लोगों की सुख सुविधाओं का हर सामान मौजूद था। उम्र पूरी कर लेने पर लोगों को यहां लाया जाता था। यह काम हैवन गॉड के जिम्मे था। स्वर्ग में रहने का औसत समय 100 वर्ष था। हर इंसान स्वर्ग में ही आता था क्योंकि तब पनिशमेंट की अवधारणा नहीं थी। और इसलिए नर्क भी नहीं था। लोगों को जस की तस स्वर्ग में ले आया जाता था। और सौ बरस का स्वर्ग निवास पूरा होने के बाद उन्हें एक नए रूप में वापस धरती पर भेज दिया जाता था, फ़िर से 400 वर्ष का जीवन जीने के लिए। 

शायद आपको विश्वास ना हो लेकिन उस समय लोगों के लिए स्वर्ग का प्रवास ही सबसे दुखद अनुभव होता था। क्योंकि वो सशरीर और यादों के साथ स्वर्ग लाए जाते थे। ऐसे में चूंकि उनकी यादें मिटाई नहीं जाती थी, वो अपने परिवारजनों को बहुत मिस किया करते थे। अच्छी यादें उन्हें स्वर्ग में सभी सुख सुविधाओं के बीच भी चैन से नहीं रहने देती थीं और उन्हें हर समय अपनों की यादें और उनके साथ होने की इच्छाएं सताती थी। लेकिन फ़िर भी कई हज़ार वर्षों तक यहीं प्रबंध आराम से चला। लोग ना मरे, ना पैदा हुए, गॉड्स बनते रहे, स्वर्ग आते रहे, स्वर्ग से जाते रहे और यूहीं समय बीतता रहा।

धीरे-धीरे सारे निवासी खुश हो गए। क्योंकि यहां कहीं कोई  भेदभाव नहीं था। सबकी उम्र लगभग समान थी और सबके दुख दूर करने के लिए बहुत सारे गॉड्स थे और एक समय तो ऐसा आया जब कोई निवासी दुखी नहीं रहा। उस दिन किसी के पास करने को कोई काम नहीं बचा। बहुत सारे लोग गॉड बन चुके थे तो उनके पास केवल लोगों की विशेज पूरा करने का काम था लेकिन मज़ेदार बात यह कि विश मांगने के लिए कोई इंसान दुखी नहीं बचा था। मतलब अब गॉड्स भी बेगार हो गए थे। धरती के गॉड्स दुखों की डिमांड करने लगे थे जिन्हें  वो दूर कर सकें और उधर स्वर्ग में रहने वाले लोगों ने मांग उठाई थी कि उनकी यादों को मिटाया जाए जिससे वो स्वर्ग में खुश रह सके।

यहीं वो क्षण था, यहीं वो समय था जब सूरज की आंखे खुली और उसने जाना कि सबको गॉड बनने का समान अवसर देने से और सबका दुख दूर करने का इंतज़ाम करने से दुनिया नहीं चलने वाली। ऐसे तो ज़िंदगी मोनोटॉनस हो जाती है। हमेशा खुशियां मिलने से किसी को खुशी का अहसास नहीं होता। सूरज ने अहसास किया कि इंसान की मैमोरी सलामत रहे तो वो कभी अपने खुशी के क्षण भूल नहीं पाता और स्वर्ग में भी दुखी रहता है।

उसी दिन से एक कम्पलीट इन्फ्रास्ट्रक्टरल चेंज का फैसला लिया गया। दुखों को इन्ट्रोड्यूस किया गया। सबको गॉड बनने का अवसर देने की प्रक्रिया बंद कर दी गई। भूलने की क्वालिटी लोगों में डाली गई। यहीं नहीं देवलोक, पृथ्वीलोक और पाताललोक को भी अलग कर दिया गया। उस दिन सूरज ने जाना था कि दुनिया अगर चलानी है, और अच्छे से चलानी है तो हर फीलिंग का होना ज़रूरी है। केवल सुख, किसी को सुखी नहीं रख सकता। थोड़ी पार्शियेलिटी, थोड़ा करप्शन, थोड़ा दुख, थोड़ा अत्याचार लोगों में जीने की, लड़ने की और जीतने की ललक जगाएगा और लोगों के जीने को यादगार और फोकस्ड बनाएगा।

बस उस दिन का दिन है कि ब्रह्मांड बदल गया और उस रूप का बन गया जिसमें हम आज जी रहे हैं। हांलाकि लोग इस स्थिति से भी खुश नहीं हैं और फिर से भगवान से वैसी ही व्यवस्था करने की गुज़ारिश करते हैं लेकिन अब सूरज महाराज अनुभवी हो चुके हैं और शायद अब वो फ़िर से हमें वैसे जीने का मौका ना दें।





Saturday, 11 March 2017

जनता को कमअक्ल समझने वाले ध्यान दें...



चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। शायद अब विपक्षी नेताओं और खासकर खुद को तुर्रम खां समझने वाले पत्रकारों को समझ आए कि आज की जनता निर्णय लेना जानती है, बेआवाज़ लाठी से जवाब देना जानती है।
मुझे उम्मीद है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भाजपा की ज़बरदस्त जीत और पंजाब में अकाली दल और भाजपा गठबंधन की करारी हार के बाद पत्रकार और नेता यह कहना छोड़ देंगे कि ऐसा पोलेराइजेशन के कारण हुआ या गधे के बयानों के कारण हुआ या मार्केटिंग के कारण हुुआ, या भाजपा की बेहतर रणनीति के कारण हुआ या फिर कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण हुआ... या फिर इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा ने सवर्णों के साथ दलितों औऱ जाटवों का भी दिल जीता, मायावती के लोगों को तोड़ लिया..... यह कारण और इस तरह के बहाने ज़िम्मेदार पत्रकारों और नेताओं के लिए वो 'सिल्क रूट' बन चुके हैं जिन पर चलकर उन्हें लगता है कि वो हर हाल में नतीज़ों तक पहुंच ही जाएंगे।
आंखे खोलिए महोदय और कम से कम अब तो जनता की समीक्षात्मक प्रवृत्ति और निर्णय क्षमता पर विश्वास करना सीखिए। जनता ना तो गूंगी है, ना बहरी है और बेवकूफ तो बिल्कुल नहीं.... जो आपकी स्पूनफीडिंग को बड़े आराम से निगल लेगी। यह सोशल मीडिया का दौर है। कोगनीटिव डिसोनेन्स थ्योरी के लागू हो चुके होने का दौर है।
अभी भी अगर आप यह कहेंगे कि जनता जातिवाद के नाम पर वोट देती है, खुद को लुभाने के लिए की जा रही लोकलुभावन योजनाओं पर वोट देती हैं या लहर पर वोट देती है तो एक बार फिर इन चुनावों के नतीजों को देख लीजिए। अगर ऐसा होता तो केवल यूपी और उत्तराखंड में ही नहीं पंजाब में भी बीजेपी-अकाली दल को जीत मिलती। गोवा और मणिपुर में भी क्लीन स्वीप होता। लेकिन ऐसा नहीं है।
आप लोग कुछ भी कह लें, लेकिन सारे लोग जान चुके हैं कि एक के बाद नेताओं ने हमेशा जात-पात के नाम पर उन्हें उल्लू ही बनाया है। कभी दलितों, कभी जाटवों तो कभी हिन्दु-मुसलमानों के नाम पर हमेशा उन्हें बांटते ही आए हैं...।आज की तारीख में जनता काम को वोट देती है, विकास को वोट देती है, ईमानदारी, साफ छवि और काम करने की क्षमता और इच्छा रखने वालों को वोट देती है। लीडर का निर्णय टफ भी हो तो उनके हित के लिए होना चाहिए,यह जनता जान गई है। सबके विकास के साथ ही उनका विकास संभव है यह जनता समझ चुकी है।
अब समझने की बारी उन लोगों की है जो अपनी दिमागी थ्योरियों को जनता का मिजाज समझने की भूल करते हैं और अपने पक्षपाती निर्णयों को जनता का निर्णय मानने की गलती..।

Wednesday, 1 March 2017

मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी का शिकार बन रहे हैं हम... और हमें मालूम तक नहीं


हांलाकि देश में इस समय इतने ज़्यादा ज़रूरी मुद्दे हैं कि ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर बहस की गुंजाइश नहीं होती लेकिन क्या किया जाए यह मीडिया का दौर है जहां उसी बात की बात होती है जिसे मीडिया हवा देता है, उन महत्वपूर्ण मुद्दों की नहीं जिन्हें मीडिया दबा देता है।

मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर चुके साथियों को इसकी जानकारी होगी। साल 1972 में मैक्सवेल मैककॉम्ब्स और डोनाल्ड शॉ  ने एक थ्योरी दी थी - एजेंडा सेटिंग थ्योरी। जिसके अनुसार मीडिया केवल खबरें ही नहीं दिखाता बल्कि चुनिंदा खबरों के ज़रिए यह एजेंडा भी सेट करता है कि जनता किस चीज़ को महत्वपूर्ण मानकर उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचे और बात करें।

और ऐसा किया जाता है उस चुनिंदा खबर को सबसे ज्यादा समय और कवरेज देकर। एजेंडा सेटिंग थ्योरी के द्वारा मीडिया और न्यूज़रूम स्टाफ ना केवल यह तय करते हैं कि कौन सी खबर को महत्व मिलना चाहिए बल्कि जनता के बीच और मुद्दों को गौण भी बना देते हैं। यह भी तय कर देते हैं कि जनता को क्या सोचना चाहिए।


तो हुज़ूर आंखे खोलिए। आज की तारीख में इस एजेंडा सेटिंग थ्योरी का जमकर इस्तमाल हो रहा है। किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, पानी की कमी, महिलाओं की सुरक्षा, आतंकवाद जैसे असल मुद्दे गौण हो गए हैं। आज हम सब चर्चा करते हैं तो इन बातों पर कि किस नेता ने किस दूसरे नेता के बारे में क्या बुरा कह दिया। कहां देशविरोधी नारेबाज़ी हुई। कहां गुरमेहर को ट्रोल किया गया, किसने ट्रोल किया, किसने किसके बारे में क्या बयान दिया.... ।

चाहें चैनल हों या अखबार सब एक से हैं। और अगर आप सोचते हैं कि आप मीडिया के इस खेल का हिस्सा बनने से खुद को बचा पाए हैं तो आप गलत सोचते हैं। एक बार सोशल मीडिया की दीवारें देख लीजिए जहां हम और आप खरी-खोटी पोस्ट करते हैं। यह साइटें भी ऐसी ही खबरों से रंग रही हैं जिनका एजेंडा मीडिया ने सेट करके दिया है।

आज आलम यह हैं कि महत्वपूर्ण खबरें केवल चैनलों द्वारा दिखाए गए न्यूज़ शतक या सौ खबरों के कैप्सूल में सुनाई देती हैं। इन्हें एयरटाइम या प्रिंटस्पेस ही नहीं मिलता और अगर मिलता भी है तो बहुत कम।

अब देख लीजिए जबसे चुनाव शुरू हुए हैं तब से देश में केवल चुनावी रैलियों और मतदान की बातें हो रही हैं क्योंकि देश का मीडिया केवल इसी पर केंद्रित हो गया है। पिछले दो दिनों से केवल गुरमेहर कौर की ट्रोलिंग का मुद्दा देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है, मानों इस मुद्दे का हल निकल गया तो देश की सारी समस्याओं का हल निकल जाएगा।

जागो देश के लोगों जागो। आज के सोशल मीडिया के दौर में, एजेंडा सेट करने वाले चैनलों के दौर में हम थिंक टैंक तो बन रहे हैं लेकिन ज़मीनी स्तर के मुद्दों पर काम करने के लिए प्रेरित नहीं होते। देश में कई ज़रूरी मुद्दे हैं, बिना बात की बात पर  एक दूसरे को गरियाना, धकियाना छोड़कर बेहतर होगा अगर हम कुछ ज़रूरी बदलावों पर बात करें। मीडिया के निर्दयी खेल का खिलौना मत बनिए। खासकर मास कम्यूनिकेशन वाले साथियों से तो ज़रूर यह अनुरोध है कि हम इन बातों से ऊपर उठें और वाकई में ज़रूरी मुद्दो को मुद्दा बनाएं। क्योंकि व्यर्थ की बहस का कोई अंत नहीं होता जिनमें कि मीडिया की चालों के चलते हम सब अटके हुए हैं।

सोशल मीडिया बहुत प्रभावी और महत्वपूर्ण प्लेटफार्म है, इसका प्रयोग नफरत फैलाने या एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसके लिए न्यूज़ चैनल्स ही काफी हैं।



Tuesday, 10 January 2017

'मन की बात'... लेकिन मोदी जी की नहीं, फुटबॉल की :-)



बहुत दिनों से यह सवाल जीतू-मीतू के मन में था। जीतू-मीतू...अरे वो जुड़वा स्पोट्स जूते, जिन्हें पहनकर रोज़ अभिषेक अपने पांच दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलने जाता है। दोनों ही बहुत प्यारे हैं। भाई हैं, बिल्कुल एक जैसे, आईडेंटिकल ट्विन्स। एक दूसरे की मिरर इमेज। एक दायां और बायां...।

खैर यह कहानी जीतू-मीतू की नहीं हैं, यह कहानी है उस गोल, प्यारी सी बड़ी फुटबॉल की, जिसे लेकर इन जुड़वां जूतों के मन में सवाल उठा है। हां तो आज जीतू ने इस फुटबॉल से पूछ ही डाला- एक बात बताओ डीयर, रोज़ हम दोनों को अपने पैरों में डालकर अभिषेक तुम्हें किक मारता हुआ मैदान तक ले जाता है, वहां उसके सारे दोस्त भी तुमको इतना मारते हैं, ज़मीन पर पटकते हैं, लेकिन फिर भी तुम हमेशा खुश कैसे रहती हो, हमेशा उछलती कूदती रहती हो... कैसे?

फुटबॉल हंस पड़ी..। अरे भई खुश क्यों ना होऊं। मेरा तो काम ही पैरों में रहना है, मेरा नाम ही फुटबॉल है यानि पैर से खेले जाने वाली बॉल। तो अगर मुझे बच्चे पैरों से मारकर खेलते हैं तो इसमें खराब लगने जैसा क्या है...? बल्कि मैं तो अभिषेक की शुक्रगुज़ार हूं कि उसने स्पोर्ट्स शॉप में रखी इतनी सारी फुटबॉल्स के बीच मुझे चुना। अगर वो मुझे यहां नहीं लाता तो मैं वहीं, एक ही जगह, एक ही शैल्फ में अपने जैसी ही अन्य फुटबॉल्स के साथ रहती-रहती बोर हो जाती। मुझे तो कभी पता ही नहीं चलता कि इस बैट, बॉल, रैकेट, शटलकॉक जैसे खेल के सामानों के अलावा भी इस दुनिया में बहुत सारी चीज़े हैं। प्यारे- प्यारे बच्चे हैं। इसलिए जब-जब अभिषेक मुझे खेलने ले जाता है मुझे बड़ा मज़ा आता है, इस बहाने मैं थोड़ी बहार की ताज़ा हवा भी खा लेती हूं और बहुत से नए-नए लोगों से मिल भी लेती हूं, वरना घर में, टेबल के नीचे एक कोने में पड़े-पड़े तो मेरा मन भी नहीं लगता।

जीतू-और मीतू को तो ऐसे जवाब की आशा ही नहीं थी। वो तो उसे बेचारी फुटबॉल समझकर सहानुभूति जताने की सोच रहे थे। पर यहां तो मामला ही अलग निकला।

 "अच्छा यह बताओ तुम्हें अभिषेक के सारे दोस्तों में से सबसे ज़्यादा कौन पसंद है? " जीतू ने पूछा।

"हां इस बात का जवाब मैं दे सकती हूं.." फिर से एक बार हंसते हुए फुटबॉल बोली। फ़िर कुछ सोचते हुए फुटबॉल ने बताना शुरु किया। देखो, वो गगन है ना, अभिषेक का मोटू दोस्त, वो मुझे ज़्यादा पसंद नहीं, क्योंकि एक तो वो रोज़ रोज़ स्टड्स पहनकर आता है और उससे मुझे किक मारता है तो मुझे चोट लग जाती है। यहीं नहीं वो जानबूझ कर मुझे मैदान से बाहर भेजता है, हालांकि उसकी वजह से मेरी बाहर की सैर भी हो जाती है लेकिन परेशानी यह है कि वो अक्सर मुझे कूड़े की तरफ उछाल देता है, वहां बहुत बदबू आती है।



और वो जो अमन हैं ना, जो रोज़ पीली स्पोर्ट्स टीशर्ट पहनकर आता है और गोलकीपर बनता है, वो भी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। क्योंकि वो बड़ा गंदा रहता है। अक्सर अपनी नाक में हाथ डालता रहता है, और फ़िर उन्हीं गन्दे हाथों से मुझे पकड़ता है। उसके नाखून भी बहुत लम्बे हैं जो मुझे चुभ जाते हैं और दर्द होता है। उसके पास जाना भी मुझे अच्छा नहीं लगता। 

लेकिन इनमें सबसे ज़्यादा नापसंद मुझे यश है। यश खुद को अभिषेक का बड़ा अच्छा दोस्त कहता है लेकिन दरअसल वो अभिषेक से जलता है। जब भी मेरे मैदान से बाहर जाने पर यश मुझे लेने जाता है, वो जानबूझ कर मुझे किक मारकर नाली में गिराता है या फिर कूड़े के बीच और फि़र पैरों से घसीटते हुए, फिर से किक मारकर वापस ले जाता है। वो जानबूझ कर मुझे गंदा करता है, एक बार तो उसने काटा घुसाकर मेरी हवा निकालने की भी कोशिश की थी। वो अच्छा बच्चा नहीं है। उसे इस बात की जलन है कि यहां सब उससे अच्छा खेलते हैं।

"तो तुम्हें कोई भी पसंद नहीं.." इस बार मीतू ने पूछ लिया।

"नहीं आदित्य और रोहित तो बहुत अच्छे हैं। दोनों बहुत अच्छे से मेरे साथ खेलते हैं। और आदित्य को तो खासकर मुझसे बहुत लगाव है। वो जब भी गोलकीपर बनता है और मैं उसके पास जाती हूं तो वो बहुत ज्यादा खुश होता है। वो मेरा ख़याल भी बहुत रखता है क्योंकि उसे बड़े होकर फुटबॉलर बनना है ना। वो अक्सर अभिषेक से मुझे मांगकर मुझे अपने साथ घर ले जाता है और देर तक मेरे साथ खेलता है। किक मारने की प्रैक्टिस करता है। वो अपने घर पर मुझे पलंग पर अपने तकिए के पास ही रखकर सोता है और सुबह उठते ही मुझसे खेलना शुरू कर देता है। इसलिए वो मेरा फेवरेट है।"

हालांकि जीतू और मीतू के दिमाग में अभी सवाल बाकी थे पर तभी फुटबॉल ने उन्हें चुप करा दिया.." वो देखो शाम हो चुकी है और अभिषेक भी आ रहा है। अब यह बातें छोड़ो, अब हम सबके बाहर घूमने जाने का वक्त है".. कहते हुए एक बार फिर फुटबॉल खिलखिलाने लगी, इस बार जीतू और मीतू भी मुस्कुरा दिए, उन्हें ना केवल अपने सवालों के जवाब मिल गए थे बल्कि कुछ गलतफहमियां भी दूर हो गईं थीं।