मेघालय में महिलाओं की सत्ताः पुरुषों को ब्याहकर लाती हैं महिलाएं, घर की संपत्ति पर है बेटियों का हक


इस समाज में घर की बागडोर महिलाओं के हाथ में होती है। शादी के बाद लड़की को नहीं, बल्कि लड़के को पत्नी के घर यानि अपने ससुराल जाना होता है। वंश महिलाओं के नाम से चलता है और लड़कियों के पैदा होने पर खुशी मनाई जाती है....

हम किसी और ग्रह की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि यह मातृसत्तात्मक व्यवस्था यहीं अपने ही देश के मेघालय राज्य में देखने को मिलती है। हमने भी इसके बारे में अपने मेघालय भ्रमण के दौरान ही जाना। इसी वर्ष उत्तर दक्षिण भारत की सैर के दौरान जब हम अपनी गाड़ी से शिलॉंग जा रहे थे तो पूरी दुनिया से अलग ऐसा नज़ारा देखने को मिला जो अब तक कहीं भी और कभी भी नहीं देखा था।

सड़क के दोनों ओर बनी हर दुकान में दुकानदार के रुप में महिला विराजमान थी। चाहे वो कपड़ों की दुकान हो, मसालों की, फलों की, पान-बीड़ी-सिग्रेट की या फिर जगह जगह बने ढाबे हों, हर कहीं हमें दुकानदार के रूप में एक औरत के ही दर्शन हुए। अगर पुरुष कहीं थे भी तो वो या तो दुकानों के बाहर एक कोने में उपेक्षित से बैठे हुए मसाला खा रहे थे या फिर कहीं-कहीं ढाबों में खाना परोस रहे थे लेकिन हर जगह की मालकिन महिला ही थी। 

ज़िंदग़ी में पहली बार ऐसा दृश्य देखा था। अचंभित होना लाज़िमी था। जब हमने अपनी गाड़ी के ड्राइवर गणेश, जो कि था तो बिहार से पर लगभग दस सालों से यहीं रह रहा था, से इस बारे में पूछा तो उसने बताया कि मेघालय में ऐसा ही होता हैं।

यहां निवास करने वाली गारो, जयन्तिया और खासी जनजातियों में महिलाओं को सर्वोपरि माना जाता है। पूरे देश से अलग इस समाज में महिला ही घर की मुखिया होती है और किसी भी निर्णय को लेने का अधिकार उसी के पास होता है। शादी के बाद महिला ही पुरुष को ब्याहकर अपने घर में लेकर आती है और बच्चे के नाम के आगे भी पिता का नहीं बल्कि मां का वंश नाम लगाया जाता है। यहां संपत्ति भी घर के बेटों के नहीं बल्कि घर की बेटियों के नाम की जाती है। किसी भी तरह की चल या अचल संपत्ति पर मालिकाना हक घर की महिला का ही होता है जो आगे जाकर अपनी बेटी को यह हक सौंपती हैं। यहां ज़मीनों, घरों और दुकानों की मालकिन महिला ही होती है।

चूंकि पुरुष सास के घर अपने ससुराल में रहते हैं और उनके जिम्मे कोई महत्वपूर्ण काम भी नहीं होता सिवाय इसके कि वो बच्चो को पालने में या घर की साफ सफाई या अन्य निचले दर्जे के कामों में अपनी पत्नि की मदद कर दें, इसलिए वो काफी उपेक्षित जीवन जीते हैं। यहां तक कि उनके खर्चे के लिए पैसे भी उनकी पत्नि ही उन्हें देती हैं।

यह भारत का शायद पहला ऐसा समाज है जहां लड़कियों के पैदा होने पर खूब खुशियां मनाईं जाती हैं और लड़को के पैदा होने पर ऐसा माहौल होता है जैसा हमारे यहां कई घरों में बेटियां पैदा होने पर होता है। अगर घर में कोई लड़की नहीं है तो किसी लड़की को गोद लिया जाता ताकि उसे घर और संपत्ति का मालिकाना हक हस्तातंरित किया जा सके।

मेघालय में महिलाओं को बेहद इज़्जत की नज़र से देखा जाता है। उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी आज़ादी है और वो अगर चाहे तो अपने समुदाय के बाहर भी जीवनसाथी चुन सकती हैं। यहीं नहीं यहां विधवाओं को भी पूरी इज़्जत दी जाती है बल्कि अगर किसी आदमी की पत्नी की मृत्यू हो जाए तो उसके लिए जीवन मुश्किल हो जाता है क्योंकि कई जगह तो ऐसा होने पर उसे ससुराल से ही निकाल दिया जाता है और कई जगह उसे अपनी साली या फिर पत्नी की किसी और करीबी रिश्तेदार की बहन से शादी करने को मजबूर किया जाता है। 

यहां कोई भी बच्चा नाजायज़ नहीं होता। अगर शादी से पहले भी किसी लड़की ने बच्चे को जन्म दिया है तो उसकी ज़िम्मेदारी पूरा समाज उठाने को तैयार हो जाता है। पुरुषों का मुकाम यहां दोयम दर्जे का है जिन्हें सिर्फ परिवार बढ़ाने के लिए ही पूछा जाता है। हांलाकि हमें गणेश ने यह भी बताया कि कई पुरुषों में इस व्यवस्था को लेकर असंतोष भी है और वो इसे बदलने की मांग उठाते हैं लेकिन यहां के समाज में महिलाओं का प्रभाव इस कदर है कि इसके खिलाफ पुरुषों को लामबंद करना और विद्रोह का बिगुल बजाना आसान नहीं है।

 यह परम्परा सदियों से चली आ रही है और यहां के लोगों में इसके प्रति काफी विश्वास और सम्मान है। हम नहीं जानते यह ठीक है या नहीं लेकिन इतना ज़रूर है कि पहली बार ऐसी किसी व्यवस्था के बारे में मेघालय जाकर जानने और समझने को मिला और जानकर अच्छा लगा कि ऐसा भी समाज है, और वो भी अपने भारत देश में ही जहां औरतों को सर्वोच्च दर्जा हासिल है।
 

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