Monday, 30 June 2014

किशोर वाणी


“एक ऐसा व्हीकल बनाना है जो ऑक्सीजन रिलीज़ करे”

“सबसे बोरिंग होते हैं न्यूज़ चैनल्स जो एक ही बात को बार-बार रिपीट करते हैं”

“मम्मी –पापा को चाहिए कि बच्चों को डांटते समय गुस्से में कुछ भी ना बोल दें’


इस बार हम किशोर वाणी में आपके लिए लेकर आए हैं 13 साल के अक्षत गुप्ता की वाणी। अक्षत गुप्ता दिल्ली के निवासी हैं और नोएडा के एपीजे स्कूल में आठवीं कक्षा के छात्र है। इन्हें गणित से बहुत प्यार हैं और बॉक्सिंग, क्रिकेट और फुटबॉल में यह खासी रुचि रखते हैं। बहुत सारे महत्वपूर्ण मुद्दों और बातों पर अक्षत की राय बिल्कुल साफ और बेबाक है। अभी से देश और दुनिया के प्रति जागरूकता और जानकारी रखने वाले अक्षत मानते हैं कि अगर देश में बदलाव लाना है तो शुरूआत अपने आप से करनी होगी। आप भी ज़रा पढ़िए कि और क्या महत्वपूर्ण मानते है अक्षत, विश्वास मानिए 13 साल के इस बच्चे की साफगोई और सोच आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगी।

सबसे महत्वपूर्ण हैं क्लीनिलिनेस यानि साफ सफाई



हमारे देश में सबसे ज्यादा परेशानी गंदगी की है। जहां देखो वहां गंदगी.. जिसका मन जहां आता है, वो वहीं कूड़ा फेंक देता है। यह बहुत गलत बात है। देश को अच्छा बनाने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी उसे साफ रखना है। पता नहीं क्यों बड़े लोग यह बात नहीं समझते। कई जगह तो डस्टबिन भी होते हैं लेकिन लोग डस्टबिन तक कूड़ा फेंकने नहीं जाना चाहते। जिस तरह हम अपने घर को साफ रखते हैं उसी तरह देश और सड़कों को भी साफ रखना बेहद ज़रूरी है, तभी हमारा देश सुन्दर बनेगा।


करप्शन हमारे देश को बरबाद कर रहा है-


हमारा देश इतना अच्छा है, यहां सबकुछ है। यहां के लोग इतने अच्छे हैं। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं। लेकिन फिर भी अगर हमारा देश तरक्की नहीं कर पा रहा है तो इसकी वजह है करप्शन। खासतौर से नेताओं का करप्शन। जिन पर हम लोग भरोसा करते हैं वहीं लोग इतने करप्ट होते हैं और हमारे पैसों का गलत तरीके से इस्तमाल करते हैं, जो गलत है। इन कुछ लोगों की वजह से पूरे देश का विकास प्रभावित होता है। इनको पकड़कर जेल में डालना चाहिए। यह लोग इतने ज्यादा लालची होते हैं कि अगर मान लो किसी विकास की योजना के लिए 10 करोड़ रुपए सैंक्शन होते हैं, तो दरअसल तो उस योजना में केवल 1 करोड़ रुपए ही खर्च किए जाते हैं। बाकी 9 करोड़ रुपए तो यह राजनेता ही खा जाते हैं। आप रोज़ाना के अखबार में ही देख लो, रिफॉर्म्स से ज्यादा उसमें नेताओं के घोटालों की खबरें होती है। ये लोग सुविधाएं तो सारी चाहते हैं लेकिन अपनी जेब से एक पैसा नहीं खर्च करना चाहते। जब तक नेता ईमानदार नहीं बनेंगे, मुझे नहीं लगता देश का कुछ भला हो सकता है।


लोगों को माइंडसेट बदलने की ज़रूरत-

भारत के लोगों का मांइडसेट बहुत स्ट्रॉंग बन चुका है जिसे बदलने की ज़रूरत है, उन्हें हर खबर को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह किसी और की खबर है, किसी और के साथ ऐसा हुआ है, हमारे साथ कभी नहीं होगा। और यहीं सोचकर वो परेशानी में पड़े किसी इंसान की हैल्प नहीं करते। जबकि और देशों में लोग बहुत हैल्पफुल होते हैं, अगर किसी के साथ कुछ बुरा या गलत हो रहा होता हैं तो लोग उनकी सहायता करने पहुंच जाते हैं। इसकी वजह यहीं है कि हमारे देश में लोगों ने अपने विचार ही ऐसे बना लिए हैं कि वो हर किसी को दूसरे की नज़र से देखते हैं। जब तक वो औरों को अपने से जोड़कर नहीं देखेंगे तब तक उसकी परेशानी कम करने की कोशिश नहीं करेंगे। हमारे बड़े बच्चों को तो सिखाते हैं कि दूसरों की सहायता करनी चाहिए लेकिन जब उनके ऊपर बात आती है तो वो सही- गलत और परिस्थितियों का हिसाब लगाने लगते हैं। और कई बार तो हमें कह देते हैं कि दूसरों के मामलों में हमें बोलने की ज़रूरत नहीं है। इस चीज को बदलने की ज़रूरत है। हम बच्चे भी वरना वहीं सीखेंगे जो देखेंगे। आप अपना मांइडसेट बदलिए और जो चीज़ बच्चों से करने को कहते हैं वो खुद भी करिए।

गर्ल चाइल्ड भी ज़रूरी होते हैं

मेरे कुछ रिश्तेदार गांव में रहते हैं जहां मैंने देखा है बहुत सारे लोग गर्ल चाइल्ड होने पर बहुत दुखी होते है। बिल्कुल खुशी नहीं मनाते। य़ह चीज़ गलत है। हम स्कूल में पढ़ते हैं कि आजकल गर्ल्स इतना आगे बढ़ रही है, हर काम में योगदान दे रही हैं, फिर आप उनसे नफरत क्यों करते हैं।

मेरा रोल मॉडल है एक रिक्शा चलाने वाले का बेटा

जब हमने अक्षत से उसके रोल मॉडल के बारे में पूछा तो उसने हमें एक रिक्शा चालक के बेटे के बारे में बताया- मैंने कुछ समय पहले न्यूज़ में सुना था कि एक रिक्शा चलाने वाले के बेटे ने आईआईटी किया है और उसे अपनी पहली नौकरी में ही बहुत बड़ा पैकेज मिला है। यह स्टोरी मेरे लिए बहुत इन्सपायरिंग थी। मुझे पहली बार लगा कि अमीरी-गरीबी कुछ नहीं होती। अगर एक रिक्शा चलाने वाले का बेटा इतना कुछ अचीव कर सकता है तो कोई भी कर सकता है। आप अमीर हो या गरीब, अगर आप पढ़ते हैं तो आपको उसका फल मिलता है।

एक ऐसा व्हीकल बनाना चाहता हूं जो ऑक्सीजन छोड़े-

एक बार हमें स्कूल की तरफ से साइंस प्रोजेक्ट मिला था जिसमें हमें कुछ क्रिएटिव बनाना था। तब मैंने बहुत सोचा और मेरे दिमाग में आया कि हमारे देश में सबसे ज्यादा प्रदूषण व्हीकल्स के धुंए के कारण होता है और हमें इसे कम करने के लिए कुछ करना चाहिए। तबसे मेरी इच्छा है कि मैं बड़े होकर एक ऐसा व्हीकल बनाऊं जो लोगों द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई ऑक्साइड गैस पर चलता हो और ऑक्सीजन रिलीज़ करता हो। अगर कार्बन डाई ऑक्साइड ना भी हो तो वो व्हीकल किसी भी फ्यूल पर चलने लगे लेकिन हमेशा ऑक्सीजन ही छोड़े। उसको बाइक या कार में भी बदला जा सकेगा। अगर रोड छोटी है तो उसको बाइक में बदल लो और रोड बड़ी और खाली है तो गाड़ी में। इससे सड़को का ट्रैफिक भी थोड़ा कम होगा और साथ ही यह ऐसा व्हीकल होगा जिससे बिल्कुल भी पॉल्यूशन नहीं होगा बल्कि ऑक्सीजन मिलेगी। 


अंग्रेज़ी फिल्में देखना है पसंद क्योंकि हिंदी फिल्मों में कोई कहानी नहीं होती-

मुझे हिन्दी फिल्में बिल्कुल अच्छी नहीं लगती क्योंकि उन सबमें एक ही तरह की कहानी होती है जबकि अंग्रेज़ी फिल्में बिल्कुल अलग और अच्छी कहानी वाली होती हैं। उनकी कहानी में इतने ट्विस्ट्स होते हैं कि उन्हें देखने में मज़ा आता है। आपका दिमाग भी खुलता है। कितनी सारी नई बातें जानने को मिलती हैं। इसलिए हिन्दी फिल्में मैं बहुत कम देखता हूं।


मुझे कोई हीरोइन पसंद नहीं क्योंकि उनके डायलॉग्स ही नहीं होते

मुझे अंग्रेज़ी फिल्मों के हीरो रॉबर्ट डाउनी जूनियर बहुत अच्छे लगते हैं। इंडियन हीरोज़ में आमिर खान और अमिताभ बच्चन अच्छे लगते हैं, लेकिन हीरोइन कोई पसंद नहीं क्योंकि किसी भी हीरोइन का कोई काम फिल्मों में होता ही नहीं। उनको ज्यादा डायलॉग्स तक बोलने को नहीं मिलते। वो केवल हीरो के आगे-पीछे घूमती रहती हैं। उनका सपोर्टिंग रोल होता है।

सबसे बोरिंग होते हैं न्यूज़ चैनल क्योंकि वो एक ही बात को बार-बार रिपीट करते हैं- 


इस दुनिया में सबसे बोरिंग कोई चीज़ अगर है तो वो है न्यूज चैनल्स। अगर आपको समाचार जानने हैं तो अखबार पढ़ लो लेकिन न्यूज़ चैनल्स बिल्कुल मत देखो। ये लोग एक ही चीज़ को इतनी बार, इतनी देर तक रिपीट करते हैं कि इंसान बोर होकर मर ही जाए। एक बार तो मैं एक न्यूज़ चैनल पर कोई खबर देख रहा था तो एंकर बार-बार बोल रहा था कि हम बताते है इसका राज..., हम बताते हैं इसका राज... , उसने इतनी बार यह बात बोली, लेकिन राज नहीं बताया। मैंने चैनल चेंज कर दिया और घड़ी देखकर 15 मिनट बाद जब वो चैनल दोबारा लगाया, तब भी एंकर वहीं बोल रहा था...। मतलब हद है, हम लोग पागल हैं क्या। यह न्यूज वाले सारे एक्सपेरिमेंट हमीं पर क्यों करते हैं। न्यूज़ चैनल्स तो देखने ही नहीं चाहिए। इतनी बार एक ही बात बोलते हैं ये लोग कि सिर भन्नाने लगता है।

मम्मी पापा सुधारे लैंग्वेज और टीचर्स को चाहिए होमवर्क कम दें-




मेरे मम्मी-पापा वैसे तो बहुत अच्छे हैं और मुझसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन फिर भी अगर मुझे उनमें कुछ बदलना हो तो मैं बोलूंगा कि आप अपनी लैंग्वेज सुधारो। बच्चों को डांटते समय, गुस्से में आप बहुत सारी गलत बातें बोल देते हैं जो हमें बहुत खराब लगती हैं लेकिन हम छोटे होने के कारण कुछ कह नहीं पाते। आप अगर हमें डांटते हैं तो प्यार से डांटिए, गुस्से में कुछ भी मत बोल दीजिए। जहां तक टीचर्स की बात है तो उनके लिए तो बस यहीं कहना है कि प्लीज़ हमें होमवर्क थोड़ा कम दिया कीजिए।

(हिन्द प्रहरी से)