Tuesday, 20 December 2016

“कम्पार्टमेन्ट के आखिरी छोर की दीवार के पास शव एक के ऊपर एक लदे पड़े थे। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे थे जो सुरक्षित स्थान समझकर वहां छिपे होंगे...” – ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ के अंश…



'ट्रेन टू पाकिस्तान' खुशवंत सिंह द्वारा लिखी गई सबसे ज्यादा प्रसिद्ध किताब मानी जाती है, जिसमें उन्होंने देश विभाजन के समय सीमावर्ती गांवो के लोगों में धीरे-धीरे पनप रहे ज़हर, लोगों की दशा और मनोस्थिति का बेहतरीन और सजीव चित्रण किया है। इस उपन्यास की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है-1987 की कहानी है जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन होने वाला है। ऐसे में सीमा पर स्थित एक शांत गांव मनो माजरा, जिसकी पूरी दिनचर्या गांव के स्टेशन से सुबह-शाम और रात में गुजरने वाली ट्रेनों पर आधारित हैं, में अचानक स्थिति बदल जाती है। गांव के निवासियों तक सीमा पार रहने वाले मुस्लिमों द्वारा अन्य धर्मों के लोगों को लूटने, बेइज्जत करने और मारने के किस्से पहुंचने लगते हैं और तनाव बढ़ने लगता है। मामला तब और गंभीर हो जाता है पाकिस्तान से एक मुर्दों की ट्रेन आती हैं जिसमें एक भी व्यक्ति जीवित नहीं होता। सारे हिन्दुओं को सीमापार के मुसलमान मौत के घाट उतार चुके थे। इस हादसे के बाद गांव में लगातार बढ़ते तनाव और बिखरती कानून व्यवस्था से गुस्साए लोग इस बात का बदला लेने के लिए भारत से मुस्लिमों को लेकर पाकिस्तान जा रही एक ट्रेन पर हमला करने की योजना बनाते हैं। यह ट्रेन खचाखच भरी है। छत पर भी लोग सवारी कर रहे हैं। ऐसे में उस पर हमला करने मनो माजरा से सिखों की एक टोली पहुंचती है। लोग हमले की तैयारी करते हैं... लेकिन अंत में मामला बदल जाता है। पढ़िए इस बेहतरीन उपन्यास के कुछ हिस्से..


डकैती

बहुत ज्यादा रेलगाड़ियां मनी माजरा में नहीं रुकती थीं। एक्सप्रेस गाड़ियां तो रुकती ही नहीं थीं। बहुत सी धीमी गति की यात्री रेलगाड़ियों में से केवल दो, एक सुबह में दिल्ली से लाहौर जाने वाली और दूसरी शाम को लाहौर से दिल्ली आने वाली, रेलगाड़ियां ही कुछ मिनटों के लिए रुकती थीं। अन्य गाड़ियां केवल तब रुकती थीं जब उन्हें रोका जाता था। नियमित रुकने वालों में केवला मालगाड़ियां थीं। हांलाकि मनो माजरा से बहुत कम बार सामान बाहर जाता या आता था लेकिन इसके स्टेशन पर वैगन गाड़ियों की लम्बी कतारें देखी जा सकती थीं। हर गुज़रने वाली मालगाड़ी में घंटों तक सामान चढ़ाया और उतारा जाता था। अंधेरा होने के बाद जब पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता था, तब भी पूरी रात इंजन की सीटी और धुंआ छोड़ने की आवाजें, सामान रखने की आवाजें और लोहे से लोहा टकराने का शोर पूरी रात सुनाई देता था

कलयुग

सितम्बर की शुरूआत में मनो माजरा की दिनचर्या गलत होनी शुरू हो गई। रेलगाड़ियां पहले से कहीं ज्यादा अव्यवस्थित समय पर आने-जाने लगीं और बहुतों ने तो रात में गुज़रना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो ऐसा लगा जैसे की अलार्म घड़ी गलत घंटे पर बजने लगी है। और बाद के दिनों में ऐसा महसूस होने लगा जैसे किसी को भी इसे बंद करना याद ना रहा हो। इमाम बख्श ने मीत सिंह की तरफ से सुबह की शुरुआत करने का इंतज़ार किया। और मीत सिंह उठने से पहले मुल्ला की प्रार्थना सुनने की प्रतीक्षा करता था। लोग देर में उठने लगे, उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि समय बदल चुका है और मेल ट्रेन अब शायद गुज़रेगी ही नहीं। बच्चे समझते नहीं थे कि उन्हें कब भूख लगनी है और पूरे समय खाने के लिए चिल्लाते रहते थे। शाम में हर कोई सूरज डूबने से पहले घर चला जाता था और एक्सप्रेस ट्रेन के आने से पहले सो जाता था- अगर ट्रेन आएं तो। मालगाड़ियों का आना बिल्कुल बंद हो गया था इसलिए उनको लोरी सुनाकर सुलाने के लिए लोरियां भी नहीं थी। इसकी बजाय, आधी रात और भोर से पहले भूतहा गाड़ियां गुज़रती थीं जो मनो माजरा के सपनो के तोड़ देती थीं। 

नहाने और कपड़े बदलने के बाद हुकुम चन्द को कुछ ताज़गी महसूस हुई। पंखे की हवा ताज़ी और अच्छी थी। वो अपनी आंखों पर हाथ रखकर लेट गया। आंखों के अंधेरे कमरे में पूरे दिन के दृश्य फिर से घूमने शुरू हो गए। उसने अपनी आंखें मलकर उन्हें झटकने की कोशिश की लेकिन दृश्य पहले और काले हुए, फिर और लाल और फिर वापस वैसे ही हो गए। एक आदमी अपने हाथों से अपना पेट पकड़े हुए उसे ऐसी निगाहों से देख रहा था जैसे कह रहा हो- देखो मुझे क्या मिला। वहां एक कोने में घुसे हुए बच्चे और औरतें थीं, उनकी आंखे डर से फैल गईं थीं, उनके मुंह खुले के खुले रह गए थे जैसे अभी उनकी चीख एकदम से गले में अटक कर रह गई हो। कुछ के शरीर पर तो एक खरोंच तक नहीं थी। ट्रेन के डिब्बे के आखिरी छोर की दीवार के पास शव लदे पड़े थे जिनकी आंखें खिड़कियों की तरफ देख रही थीं जहां से शायद गोलियां, भाले या तलवारें आईं होंगी। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे पड़े थे जिन्होंने शायद तुलनात्मक रूप से सुरक्षित स्थान ढूंढकर खुद को वहां छिपाया होगा। और वहां सड़ते मांस और मल-मूत्र की बदबू थी। 


मनो माजरा

जब यह पता चला कि पूरी रेलगाड़ी मुर्दों को लेकर आई है, पूरे गांव पर एक भारी सन्नाटा स्थापित हो गया। लोगों ने अपने दरवाजों पर रोक लगानी शुरू कर दी और बहुत से लोग पूरी रात जागकर कानाफूसी करते रहते थे। हर किसी को लगने लगा कि उसका पड़ौसी उसका दुश्मन है। लोगों ने दोस्तों और साथियों को तलाशना शुरू कर दिया। उन्होंने बादलों द्वारा तारों को ढके जाना देखना छोड़ दिया और ठंडी नम हवा की गन्ध का आनंद लेना भी भूल गए। जब वो सुबह उठते थे और देखते थे कि बारिश हो रही है, उनके दिमाग में सबसे पहले ट्रेन और जलते हुए मुर्दों का ख्याल आता था। स्टेशन को देखने के लिए पूरा गांव छत पर चढ़ जाता था

कर्म

तुम्हें मालूम है हिन्दुओं और सिखों के शवों से भरी कितनी गाडियां आ चुकी हैं ? तुम्हें रावलपिंडी, मुल्तान, गुजरेंवाला और शेखूपुरा में हुए नरसंहार के बारे में मालूम है ? तुम इस बारे में क्या कर रहे हो ? तुम बस खाते हो और सोते हो ओर अपने आप को सिख कहते हो, बहादुर सिख, शहीद होने वाले सिक्ख...- उसने अपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा ताकि उसका व्यंयग असरदार बन सके। उसने सभी सुन रहे लोगों की आंख में आंख डालकर देखते हुए, उनका परीक्षण किया। लोगों ने शर्म से सिर झुका लिए।
लम्बरदार ने पूछा- हम क्या कर सकते हैं सरदारजी? अगर हमारी सरकार पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध लड़ेगी तो हम लड़ेंगे, यहां मनो माजरा में बैठ कर हम क्या कर सकते हैं?”


ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह की बेहतरीन उपन्यासों में से एक है

सरकार... उसने घृणा से कहा,  तुम सरकार के कुछ करने की अपेक्षा रखते हो, वो सरकार जो कायर जमींदारों से भरी पड़ी है। क्या पाकिस्तान के मुसलमानों ने तुम्हारी बहनों को बेइज्जत करने से पहले सरकार की आज्ञा ली थीक्या उन्होंने ट्रेन रोकने और उसमें सवार बच्चे, बूढ़े जवानों और महिलाओं को मारने से पहले सरकार से पूछा थातुम चाहते हो सरकार कुछ करे। वाह, शाबाश.. बहुत बहादुरी की बात..
लेकिन सरदार साहब आप बताओ हम क्या कर सकते हैं?” लम्बरदार ने धीरे से पूछा।
यह बेहतर है, लड़के ने कहा..। अब हम बात कर सकते हैं, सुनो और बहुत ध्यान से सुनो, वो रुका, उसने चारों तरफ देखा और फिर शुरु हुआ। वो अपनी पहली ऊंगली हवा में उठाते हुए, हर एक शब्द पर जोर देते हुए बहुत धीरे-धीरे बोलने लगा… “उनके द्वारा मारे गए हर एक हिन्दु और सिख के लिए दो मुसलमानों को मारो। हर उस महिला के लिए जिसे उन्होंने उठा लिया या बेइज़्जत किया, दो महिलाओं को उठाओ। उन्होंने एक घर लूटा, तुम दो लूटो।  वो अगर एक मुर्दों की ट्रेन भेजते हैं तो हम दो भेजेंगे। वो अगर किसी काफिले पर हमला करते हैं, हम दो काफिलों पर हमला करेंगे। इसी तरह से दूसरी तरफ से हत्याएं रुकेंगी। इसी तरह से उन्हें सबक मिलेगा कि हम भी लूटमार और हत्या का खेल खेलना जानते हैं।



नेता ने अपनी राइफल उठाई और फायर कर दिया। उसका निशाना चूक गया और उस आदमी का पैर रस्सी से बाहर आ गया और हवा में झूलने लगा। दूसरा पैर अभी भी रस्सी में उलझा हुआ था। उसने जल्दी में दूर हटने की कोशिश की। इंजन केवल कुछ यार्ड दूर था और हर सीटी की आवाज़ के साथ हवा में चिंगारी उछल रही थी। किसी ने दूसरा फायर किया। आदमी का शरीर रस्सी से फिसल गया लेकिन वो अपनी थुड्डी और हाथों की सहायता से उस पर लटका रहा। उसने अपने आपको ऊपर खींचा, रस्सी अपनी बांयी बगल के नीचे दबाई और फिर से सीधे हाथ से काटना शुरू कर दिया। रस्सी कई जगह से कट चुकी थी। सिर्फ एक पतला पर मजबूत धागा रह गया था। उसने पहले उसे चाकू से काटने की कोशिश की, फिर दांत से। इंजन उसके पास पहुंच चुका था। एक के बाद एक फायर होने लगे। वो आदमी कांपा और ढेर हो गया। उसके नीचे गिरने के साथ ही रस्सी भी बीच में से टूट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकल गई और पाकिस्तान चली गई"।