Friday, 11 November 2016

तस्वीरों में : स्वीमिंग पूल पर छिटकी छठ पर्व की छठा



मन चंगा तो स्वीमिंग पूल में गंगा...। मेट्रो शहरों की आधुनिक सोसाइटियों  के आस-पास ना तो नदियां हैं, ना तालाब और ना ही पोखर... लेकिन अपने राज्य और गांव को छोड़कर यहां बस चुके पूरबनिवासी ज़रूर हैं। यह शायद उनका अपने राज्य, संस्कृति और त्यौहारों से प्यार ही हैं, कि सुविधाओं के अभाव में भी लोग छठ पर्व मनाने और सूर्य भगवान को अर्घ्य देने का साधन ढूंढ ही लेते हैं। कहते हैं ना, जहां चाह, वहां राह...। यह बिहार के रहवासियों का छठ पर्व के प्रति उत्साह ही है कि सोसाइटी के स्वीमिंग पूल को ही पवित्र पोखर का रूप दे दिया गया । छठ पर्व मनाते लोग यहां स्वीमिंग पूल में खड़े होकर अस्ताचलगामी और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते नज़र आए। आप भी इन रंगीन तस्वीरों के ज़रिए स्वीमिंग पूल में मनते छठ उत्सव का नज़ारा लीजिए...  


और स्वीमिंग पूल पर लग गया छठ का मेला

नहाय खाय और खरना के बाद अस्ताचलगामी सूर्य भगवान को अर्घ्य देने पहुंचे भक्त
ढोल-नगाड़े का इंतज़ाम, ताकि पूजा में कोई कमी ना रह जाए


घर के बढ़े-बूढ़ों की कुशल देखरेख में सम्पन्न होती छठ पूजा



मौसमी फलों, केले, दीपक, नारियल, ठेकुएं और अन्य पूजा के सामानों से सजे सूपा


कुछ लोग इस तरह भी सूप सजा कर लाए 

स्वीमिंग पूल के किनारे पूजा की तैयारी पूरी


पूरी श्रद्धा के साथ अर्ध्य देती व्रती महिला





और यहीं गाए गए छठ मैया के गीत 



 बच्चे भी खुश और बड़े भी

अर्ध्य सम्पन्न




 सूपा वापस ले जाते पुरुष सदस्य







Sunday, 24 April 2016

और महाराजा रीसाइकिल सिंह की आंखे खुल गईं...


यूं तो डस्टबिनाबाद और रीसाइक्लाबाद दोनों ही राज्य पास पास थे। एक दूसरे के पड़ौसी। लेकिन रीसाइक्लाबाद राज्य के महाराजा रीसाइकिल सिंह को डस्टबिनाबाद राज्य और वहां के नागरिक- जो डस्टबिन कहलाते थे, बिल्कुल नहीं भाते थे। रीसाइक्लाबाद के लोग हमेशा ही डस्टबिनाबाद राज्य को खुद से कमतर और बेकार माना करते थे और उन्हें यह हरगिज़ पसन्द नहीं था कि उनके यहां से कोई भी डस्टबिनाबाद के लोगों से दोस्ती करे।

दूसरी तरह डस्टबिनाबाद के नरेश कूड़ामल एक नम्र, भावुक एवं अच्छे दिल के इंसान थे जिन्हें अपने राज्य और प्रजा से बेहद प्यार था। उनका राज्य था भी अच्छा जिसके तीन तरफ कूड़े के ऊंचे पहाड़ थे और एक तरफ रीसाइक्लाबाद की सीमा। हालांकि खुद के राज्य को लेकर पड़ौसी राज्य रीसाइक्लाबाद का नज़रिया उन्हें कभी पसंद नहीं आया लेकिन फिर भी वो कुछ कहते नहीं थे। हमेशा खुश रहते थे। पृथ्वी के अन्य लोग जब भी डस्टबिनाबाद के पास से गुज़रते तो बड़ी हिकारत भरी नज़रों से उस राज्य को देखा करते थे। कोई उन्हें पसंद नहीं करता था। लेकिन इस सबके बावज़ूद नरेश कूड़ामल प्रसन्न रहते और अपने काम में लगे रहते। 



 पर एक दिन हद हो गर्ई। नरेश कूड़ामल को पता चला कि रीसाइक्लाबाद राज्य के राजा अपनी सीमा पर सौ मीटर ऊंची दीवार बनवा रहे हैं जिससे डस्टबिनाबाद राज्य से सम्पर्क पूरी तरह समाप्त हो जाए। नरेश कूड़ामल ने अपना जो दूत इस दीवार बनवाने का कारण जानने के लिए रीसाइक्लाबाद भेजा था, वो भी रोते-रोते वापस आया था और कुछ भी बताने से इनकार कर रहा था। तब नरेश कूड़ामल ने स्वयं जाकर महाराज रीसाइकिल सिंह से बात करने की ठानी। 

राज्य की सीमा पर पहुंचकर उन्होंने महाराज रीसाइकिल सिंह को पैगाम भिजवाया। इस पर महाराज रीसाइकिल सिंह खुद वहां आए और नाक-भौं सिकोड़कर नरेश कूड़ामल से बोले- हमें आपके साथ रहने का कोई शौक नहीं है नरेश कूड़ामल। अपने आपको देखिए, हमेशा आपसे बदबू आती रहती है। आपके पूरे राज्य से भी कूड़े की गंदी बदबू आती है, कभी सड़े फलों की, कभी फफूंद लगे खाद्य पदार्थों की, कभी कीचड़ की तो कभी सीलन की। आपके यहां पूरी पृथ्वी के लोग कूड़ा फेंकने आते हैं। जबकि हमारे यहां के नागरिक और राज्य साफ सुथरे है। यहां आपको केवल टूटी प्लास्टिक की बोतलें, कागज़, कपड़े और ऐसी चीज़े मिलेंगी जिनसे कम से कम बदबू नहीं आती। और आपके यहां पहुंची चीज़ों का तो कोई उपयोग भी नहीं होता जबकि हमारे नागरिकों को रीसाइकिल करके फिर से काम में लाया जाता है। हम आपसे बहुत बेहतर हैं इसलिए हमें आपका पड़ौसी बनना मंजूर नहीं और इसलिए हम दोनों राज्यों के बीच दीवार बनवा रहे हैं, कहते हुए महाराज रीसाइकिल सिंह तुनकते हुए वहां से चले गए।

उस दिन नरेश कूड़ामल को बहुत ज़्यादा दुख हुआ। आखों से आंसू बहने लगे। वो सोचने लगे कि मुझे प्रकृति ने ऐसा बनाया है तो इसमें मेरा क्या दोष। मैं और मेरे देश के नागरिक क्या इतने बुरे हैं कि कोई उनसे दोस्ती तक करना पसंद नहीं करता..? वो जाकर डस्टबिनाबाद के राजगुरु, तेज़वान ऋषि डस्टबिनानंद से मिले और बिलखते हुए सारी बात उन्हें बताई।


सारी बात सुनकर राजगुरु डस्टबिनानंद ने नरेश कूड़ामल को शांत किया और उन्हें महाराजा रीसाइकिल सिंह समेत सभी पृथ्वीवासियों को भी सबक सिखाने और अपने राज्य का महत्व समझाने के लिए एक तरकीब बताई। इसे सुनकर नरेश कूड़ामल की आंखे चमक उठीं।

दूसरे दिन से डस्टबिनाबाद के नागरिकों ने काम करना बंद कर दिया। उन्होंने जगह जगह जाकर कूड़ा जमा करना रोक
दिया और हड़ताल पर बैठ गए। डस्टबिनाबाद राज्य के गेट बंद कर दिए गए। अब वहां ना कोई आ सकता था और ना ही वहां से कोई बाहर जा सकता था। नतीजा, कुछ ही समय में पूरी पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर उठी।

लोगों को अपने घर का कूड़ा डालने के लिए डस्टबिन मिलने बंद हो गए। कुछ समय तक तो लोगों ने अपने घरों में कूड़ा इकट्ठा किया लेकिन जब उसकी मात्रा बढ़ने लगी, तो लोग सड़कों पर कूड़ा फेंकने लगे। और धीरे-धीरे घरों, सड़कों, पुलों, नालों, दुकानों, दालानों... सब जगह कूड़ा ही कूड़ा दिखने लगा। कूड़ा जमा करने के लिए डस्टबिन थे नहीं, डस्टबिनाबाद राज्य के गेट बंद थे तो लोग वहां कूड़ा फेंकने नहीं जा सकते थे, इसलिए हर जगह बस कूड़ा ही कूड़ा बिखरा दिखने लगा...।

 उधर अब रीसाइक्लाबाद की रौनक भी घटने लगी थी। जब कूड़ा डस्टबिनाबाद नहीं पहुंचता था, तो वहां के लोग रीसाइकिल करने लायक चीज़े रीसाइक्लाबाद भी नहीं पहुंचा पाते थे।

पृथ्वी के अन्य लोग भी चारों तरफ बिखरे कूड़े की बदबू से इतने परेशान थे कि अब चारों तरफ फैले कूड़े से रीसाइकिल हो सकने वाले कूड़े को छांटने की हिम्मत किसी में नहीं बची थी। रीसाइक्लाबाद वीरान हो गया। उसके यहां की फैक्ट्रियां बन्द हो गईं। 

पृथ्वी के लोगों को जब डस्टबिनाबाद द्वारा की जा रही इस हड़ताल का कारण पता चला तो उन्हें अपनी सोच पर तो पछतावा हुआ ही साथ ही उन्होंने पानी पी-पीकर रीसाइक्लाबाद के लोगों को कोसना शुरू कर दिया सो अलग। 

अब महाराज रीसाइकिल सिंह की आंखे खुली। उन्हें अपनी गलती समझ में आ चुकी थी। उस दिन उन्होंने जाना कि उनका राज्य तभी आबाद रहेगा जब डस्टबिनाबाद आबाद रहे। क्योंकि अगर कूड़ा होगा तभी रीसाइक्लिंग के लिए चीज़े होंगी। 

यहीं नहीं वो यह भी समझ गए कि केवल डस्टिनाबाद की वजह से ही पूरी पृथ्वी साफ सुथरी है, अगर डस्टबिनाबाद नहीं होगा तो हर तरफ गंदगी का साम्राज्य होगा। यह तो डस्टबिनाबाद और नरेश कूड़ामल की महानता थी कि पूरी पृथ्वी साफ सुथरी रहे इसलिए उन्होंने खुद के राज्य और नागरिकों द्वारा कूड़ा संभालने का काम खुशी-खुशी करना स्वीकारा था।

उसी समय महाराज रीसाइकिलसिंह, नरेश कूड़ामल से मिलने डस्टबिनाबाद पहुंचे। सीमा पर बन रही दीवार का काम तुरंत रुकवा दिया गया और बनी हुई दीवार को तुड़वाने का काम शुरू हो गया। महाराज रीसाइकिल सिंह ने नरेश कूड़ामल के सामने हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए कहा- महाराज मुझे क्षमा करें। अब मुझे समझ में आया है कि दुनिया में हर चीज़ का अपना महत्व है, डस्टबिन का भी। आप की वजह से ही मेरा राज्य रीसाइक्लाबद आबाद है। मुझे अपना मित्र स्वीकारें।




नरेश कूड़ामल ने महाराज रीसाइकिल सिंह को गले लगा लिया और दोनों मित्र बन गए। महाराज रीसाइकिल सिंह की आंखें खुल चुकी थी और पृथ्वी के अन्य लोगों को भी अपनी गलती का अहसास हो गया था। 

 डस्टबिनाबाद के नागरिकों ने फिर से अपना काम मुस्तैदी से संभाल लिया। कुछ ही दिनों में पूरी पृथ्वी साफ हो गई और रीसाइक्लाबाद की रौनक भी लौट आई। इस घटना के बाद कभी किसी ने फिर डस्टिनाबाद और उसके नागरिकों के बारें में कुछ गलत सोचने या कहने का दुस्साहस नहीं किया।    

Saturday, 30 January 2016

जानलेवा पढ़ाई

  • लगातार बढ़ रहे हैं छात्र-छात्राओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले
  • मां-बाप की अपेक्षाओं के चलते गहरे मानसिक दवाब में जी रहे हैं किशोर

  • 2014 में 2403 छात्र-छात्राओं ने फेल होने के डर से मौत को गले लगाया






गाज़ियाबाद के मशहूर कॉलेज से बीटेक कर रही रितुपर्णा की दिनचर्या देखें- सुबह 8 बजे वो सोकर उठती है और 9 बजे तक तैयार होकर, नाश्ता वगैरह करके कॉलेज चली जाती है। लौटते हुए लगभग साढ़े चार-पांच बज जाते हैं। आने के तुरंत बाद रितु खाना खाकर सो जाती है और इसके बाद रात को नौ बजे उठकर सुबह चार बजे तक ‘शांति में’ पढ़ाई करती है। सुबह चार बजे सोने के बाद वो सीधे आठ बजे स्कूल जाने के समय पर उठती है। इम्तहान के दिनों में यह रुटीन बदल जाता है, कॉलेज से 12-1 बजे तक आ जाने के बाद रितु 5 बजे तक दिन में भी पढ़ाई करती है। 

यहीं नहीं छुट्टी के दिन रितुपर्णा स्पेशल क्लासिस के लिए अपने सर के पास भी जाती है। जब हमने उससे पूछा कि इतनी ज्यादा पढ़ाई करने की क्या आवश्यकता है जबकि यह कोई आईआईटी या मेडिकल की तैयारी नहीं है, तो उसका कहना था कि कॉलेज की पढ़ाई और कोर्स बहुत ज्यादा है। पापा ने इतने पैसे खर्च करके मेरा एडमिशन कराया है। अगर मैं पढ़कर अच्छे नंबर नहीं लाई तो उन्हें खराब लगेगा। और फिर मैं आगे किसी कॉम्पटीटिव एक्ज़ाम में कैसे निकल पाऊंगी...? कैसे उनके सपनों को पूरा कर पाऊंगी? कैसे अपनी पहचान बना पाऊंगी...?  

ऐसा करने और सोचने वाली केवल रितु ही नहीं। यकीनन रितु की तरह आपके आस-पास भी ऐसे ही कितने बच्चे, किशोर होंगे जो अपने मम्मी-पापा की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। छोटी सी उम्र में उन्होंने अपने ऊपर आपके सपनों और आकांक्षाओं का बोझ लादकर जीना सीख लिया है। पर क्या हर बच्चा यह दवाब झेल पाता है? तब क्या होता है जब वो इस बोझ को ढो नहीं पाते, आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते...और मौत को गले लगा लेते हैं। 

याद है सुपरहिट फिल्म थ्री ईडियट्स फिल्म का वो सीन, जब एक छात्र केवल इसलिए फांसी के फंदे पर झूल जाता है क्योंकि डायरेक्टर उसे फेल कर देते हैं। पढ़ाई का प्रेशर और खासतौर पर एक अच्छे स्कूल में जाने, अच्छा करियर बनाने वाले कोर्स में चुने जाने का मानसिक दबाब इतना ज्यादा है कि बच्चे जो खुद बनना चाहते हैं, वो मां-बाप को बताने से पहले भी उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।

लगभग हर हफ्ते, पंद्रह दिन में हम अखबारों में किसी ना किसी छात्र या छात्रा द्वारा परीक्षाओं/पढ़ाई के दबाब में खुद की जान ले लिए जाने की खबरें पढ़ते हैं। दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इन आत्महत्याओं का सिलसिला और बढ़ जाता है। 

पिछले ही दिनों राजस्थान की कोचिंग नगरी, कोटा ने यहां बड़े पैमाने पर छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के चलते अखबारों के पन्नों पर जगह बनाई थी। साल 2015 में यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन की तैयारी करने में जुटे 31 बच्चों ने खुदकुशी कर ली। प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की उम्मीद में यहां की कोचिंग क्लासेज़ में दाखिला लेने वाले कई किशोर व युवा अत्यधिक प्रतियोगी माहौल और कड़े पढ़ाई के रुटीन के चलते गहरे मानसिक दबाब में जीते हैं।

 माता-पिता अक्सर अपने बच्चों से इस तरह की बातें कहते हुए सुने जा सकते हैं कि- पढ़ लो, मस्ती करने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है.., नेहा को देखा, कितनी होशियार है, एक बार में सीपीएमटी में निकल गई, मेहनत करती है वो, और तुमसे तो उम्मीद लगाना ही बेकार है..., पढ़ लोगे, मेहनत कर लोगे तो अच्छी जगह एडमिशन हो जाएगा, कहीं निकल जाओगे, वरना ज़िंदगी ऐसे ही गुज़र जाएगी...., तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई पर बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं हम, कुछ तो अच्छा रिजल्ट लाके दिखा दो... वगैरह, वगैरह..। 



बच्चों पर इस कदर आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है कि उन्हें पढ़ाई करना और अच्छे नंबर लाना ही ज़िदगी जीने की मकसद लगने लगता है।  


पीयूष वर्मा की कहानी

20 वर्षीय पीयूष (बदला हुआ नाम) ने केवल इसलिए अपनी कलाई काट कर जान देने की कोशिश की क्योंकि वो मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की परीक्षा में एक विषय में फेल हो गया था। तुरंत चिकित्सकीय सहायता ने उसकी जान तो बचा ली लेकिन उसकी मानसिक स्थिति को सामान्य करने के लिए अभी तक काउंसलिंग चल रही है। 

जब पीयूष से इस स्थिति में आने का कारण पूछा गया तो पता चला कि उसने तीन साल तक मेडिकल के एंट्रेस एक्ज़ाम के लिए कोचिंग की थी जिसके बाद उसका डेंटल में सलेक्शन हुआ। काफी डोनेशन देकर उसके डैडी ने उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाया। उसके परिवारवालों ने उसकी पढ़ाई पर काफी पैसा खर्च किया था और उनको पीयूष से काफी उम्मीदें थी, ऐसे में जब वो पहली ही साल फाइनल्स में फेल हो गया तो उसकी अपने मम्मी –पापा को फेस करने की हिम्मत नहीं हुई और उसने यह कदम उठाना उचित समझा।

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

गाज़ियाबाद के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉक्टर सारंग देसाई का मानना है कि बच्चों को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए आज का प्रतियोगी युग सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके चलते मां-बाप अपने बच्चों से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाते हैं।

 हांलाकि डॉक्टर देसाई यह भी कहते हैं कि आजकल खासकर महानगरों में एक पॉजिटिव ट्रेंड यह उभरा है कि मां-बाप बच्चों केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि उनकी पसंद के और क्षेत्रों में भी जाने का मौका देने लगे हैं। लेकिन यह प्रतिशत काफी कम है। बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है। पर अधिकतर छोटे नगरों के युवा, जिनके मां-बाप अपनी जीवन भर की पूंजी दांव पर लगाकर उन्हें महानगरों में पढ़ने के लिए भेजते हैं, के ऊपर अपेक्षाओं का दवाब बहुत ज्यादा होता है। 

आजकल की फिल्मों, सीरियल्स, इंटरनेट सभी पर बाज़ारवाद हावी है जिसने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया है। यह बाज़ारवाद हमें ज्यादा खर्चा करने, अच्छे से रहने, अच्छा खाने, अच्छा पहनने और अपनी हर ज़रूरत को पूरी करने के लिए प्रेरित करता है। यह ज़रूरतें पूरी करने के लिए ज़रूरी है अच्छी नौकरी या वाइट कॉलर जॉब और इसके लिए ज़रूरी है पढ़ाई, बहुत ज्यादा पढ़ाई। ज़ाहिर हैं मां-बाप भी आज के इस बाज़ारवाद और प्रतियोगिता के युग में अपने बच्चे को पिछड़ते हुए नहीं देखना चाहते और उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना। 

अपेक्षाओं का बोझ मां-बाप से होता हुआ कब बच्चों तक पहुंच जाता है, वो समझ भी नहीं पाते और बच्चे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाने के अपराध बोध में दबकर आत्महत्या जैसे कदम उठा 
बैठते हैं।

इस समस्या से निबटने का हल बताते हुए डॉक्टर देसाई कहते हैं कि आज के युग में ज़रूरी यह है कि अपने बच्चों के साथ मित्रवत रिश्ता कायम किया जाए। उन की परेशानियों को सुनकर, उनकी इच्छाओं को सम्मान देकर और उनके सोच पर ध्यान देकर काफी हद तक इस दवाब पर लगाम लगाई जा सकती है।   


आत्महत्या रोकने के लिए हैल्पलाइन चलाने वाली समाज सेवी संस्था ‘आसरा’ की साइट पर उपलब्ध आंकड़े देखें तो-

  • निमहंस की एक स्टडी के अनुसार भारत के 72 फीसदी छात्र इम्तहान के दवाब को झेलने में असमर्थ हैं।
  • यूनेस्को के अनुसार विश्व के 50 फीसदी बच्चें किसी ना किसी दवाब में बड़े हो रहे हैं।
  •  निमहंस की स्टडी के अनुसार हर 20 आईटी प्रॉफेशनल्स में से एक आत्महत्या करने का मन बनाता है।
  • पिछले पांच सालों में युवाओं के बीच डिप्रेशन 2 फीसदी से बढ़कर 12 फीसदी तक पहुंच चुका है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्टडी बताती है कि विश्व के हर दस छात्रों में से एक छात्र कड़े दवाब में जी रहा है।

डराते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरों की साइट पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि छात्रों में इम्तहान के दबाव चलते मौत को गले लगाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है।




  • साल 2014 में भारत में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की जिनमें से 2403 छात्र थे। इन सभी ने परीक्षाओं में फेल होने के कारण या पास होने के दवाब के चलते अपनी जान ली।
  • इम्तहानों के दवाब के चलते आत्महत्या करना, भारतीयों द्वारा आत्महत्या किए जाने के प्रमुख दस कारणों में छठे स्थान पर आ पहुंचा है। यह पिछले साल 1.8 फीसदी मामलों में आत्महत्या की वजह रहा।    
  • चौंकाने वाली बात यह है एक्ज़ाम्स का यह दवाब केवल किशोरों या युवाओं को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी निशाना बना रहा है। 14 साल से कम उम्र के बच्चों में भी परीक्षा में फेल होना, आत्महत्या करने की तीसरी प्रमुख वजह रही जिसके कारण पिछले वर्ष 163 बच्चों (91 लड़के, 72 लड़कियां) ने आत्महत्या की।
  • आंकड़े बताते हैं एक्ज़ाम के दवाब के चलते आत्महत्या के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी का ट्रेंड देखा जा रहा है और यह ट्रेंड देश की मेगा सिटीज़ में ज्यादा देखने को मिल रहा है। 

एक बात हमारी भी सुनें

इतनी सारी बातें लिखने, आंकड़े पेश करने और उदाहरण देने के पीछे हमारा मकसद केवल माता-पिताओं तक यह संदेश पहुंचाना हैं कि अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाब इतना भी मत डालिए कि वो कुम्हला जाएं। जिन बच्चों के बहाने आपने अपनी ज़िंदगी के सपने पूरे करने के सपने देखे हैं, अगर वहीं नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे आप? बाद में पछताने से बेहतर है अभी समझदारी का कदम उठाया जाए। पढ़ाई बच्चों के लिए ज़रूरी है, पर उनकी ज़िंदगी का एकमात्र मकसद नहीं। क्या होगा अगर वो फर्स्ट नहीं आ पाएंगे, प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं निकल पाएंगे, इंजीनियर नहीं बनेंगे, डॉक्टर नहीं बनेगें... शायद सबसे अलग, कुछ छोटा काम करें, लेकिन कम से कम खुश तो रहेंगे। हम नहीं कहते कि आप अपने बच्चों को पढ़ाई और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना छोड़ दें, बस इतनी गुज़ारिश है कि उन पर अपनी आकांक्षाओं और कड़े नियमों का इतना बोझ ना लादें कि उन्हें पर फैलाने की जगह ही ना मिलें।  

Monday, 23 November 2015

ग़र बर्रुअत जमीं अस्त, हमीअस्त हमीअस्त हमीअस्त...


कौन कहता है जीत-ए-जी जन्नत मयस्सर नहीं होती... बस एक बार नज़ारा-ए-कश्मीर हो जाए ..

धरती पर जन्नत है कश्मीर.. और इस जन्नत का सबसे खूबसूरत हिस्सा है गुलमर्ग

चिनारों के दरख्त, देवदारों के विटप... जिधर देखों उधर सब्ज़ रंग का नज़ारा... गुलमर्ग में पहुंचे तो आंखे गुलज़ार हो गईं थी... पहाड़ों पर बर्फ नहीं थी, मगर घाटी की खूबसूरती पर खुद कुदरत निसार हो गई थी...



धुंधले स्लेटी कोहरे से झांकते पहाड़, ज़मीन पर नज़र की सीमा तक बिछा हुआ हरा मखमली कालीन, बलखाती सड़क, नर्म ठंडी हवा और खुश होते हम...यह गुलमर्ग की सुबह थी। गुलमर्ग घाटी में बीचोबीच बने अपने होटल के कमरे की खिड़की से सुबह-सुबह जब पर्दा हटाया तो कुदरत की खूबसूरती का ऐसा खूबसूरत नज़ारा देखने को मिला जो अब से पहले कहीं नज़र नहीं आया था। 




 यूं तो पूरा कश्मीर ही खुद खुदा की बनाई खूबसूरत पेंटिंग लगता है लेकिन गुलमर्ग घाटी पर तो मानो भगवान ने बहुत जतन से ब्रश चलाए हैं।

अगस्त माह में सूरज सुबह सात बजे तक निकल आता है और फिर शुरु होता है बादल, पहाड़ों और सूरज के बीच छुपा-छिपी का खेल। कभी बादल छिप जाते हैं, कभी सूरज और कभी पहाड़। यहां पलक झपकते मौसम बदल जाता है...अभी धूप, अभी बूंदाबांदी, पल भर पहले गर्मी और पल भर बाद ठंड....
 बॉलीवुड और गुलमर्ग का भी बहुत गहरा याराना है। पूरे कश्मीर में और खासकर गुलमर्ग में जगह-जगह ऐसी जगहें हैं जहां बॉलीवुड फिल्म के लिए  शूटिंग हो चुकी है।


इन दोनों मंदिरों की तस्वीरें देखिए.. और पहचानने की कोशिश कीजिए। कुछ याद आया..
 पहाड़ों पर मस्ती में भांग घोटते लोग, ढोलक की थाप पर जय-जय शिव शंकर
 करती मुमताज और उनके साथ कदम से कदम मिलाते सुपरस्टार राजेश खन्ना। जी हां, सही पहचाना. यह दोनों वहीं मंदिर हैं जिनमें फिल्म 'आप की कसम' का सुपरहिट गाना 'जय-जय शिव शंकर' फिल्माया गया था। 

ऊपर वाला मंदिर गुलमर्ग की प्रवेश सीमा पर बने बस स्टेंड पर बना है। शांत और भीड़ से दूर इस मंदिर से पूरी गुलमर्ग घाटी का नज़ारा होता है। 

दूसरा मंदिर मशहूर शंकराचार्य मंदिर  है जो काफी प्रसिद्ध है। लोग दूर दूर से यहां के दर्शन करने आते हैं। 




यहां और भी ऐसे बहुत से प्वॉइंट्स हैं जहां फिल्मों की शूटिंग हुई है। यहां के लोगों से, घोड़ो वालों से आप बात करेंगे तो वो आपको बड़े जतन से बताते हैं कि वो कितने स्टार्स से मिल चुके हैं।


यहीं विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स भी हैं। गुलमर्ग की पूरी घाटी का नज़ारा एक बार में लेना चाहें तो गोंडोला यानि केबल कार से सबसे ऊंची पहाड़ी पर ज़रूर जाए जहां पूरे साल बर्फ रहती है और जहां से लगभग 15 किलोमीटर आगे पाकिस्तान की सीमा है। इस जन्नत की खूबसूरती के बारे में और क्या कहा जाए बस किसी मशहूर कवि की इन्हीं लाइनों से सबकुछ बयां हो जाता है कि..


पहाड़ों के जिस्मों पर बर्फों की चादर
चिनारों के पत्तों पर शबनम का बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के ज़ेवर
है कश्मीर दुनिया में जन्नत का मंज़र।


Monday, 28 September 2015

इस कहानी को पढ़ते समय दिमाग का इस्तमाल ना करें.. यह किस्सा तर्कों और अर्जित ज्ञान की सीमाओं से परे हैं :-)



सम्भापुर में एक 10 साल का लड़का रहता था- चंद्रभान। उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं था। उसका कोई भी दोस्त नहीं था, उसे प्यार था तो केवल किताबों से। उसकी प्रिय किताबें थी गणित, रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री), भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) और जीव विज्ञान (बायोलॉजी) की किताबें। दिन रात चंद्रभान केवल किताबों में डूबा रहता था। खाता था तो हाथ में किताबें, सोता था तो भी किताबों के साथ.. अपनी बातें भी वो किताबों के साथ ही करता था।

एक दिन दूसरे ग्रह दूरामी से आए एक एलियन मॉन्स्टर ने उसका अपहरण कर लिया जो कि उसकी स्टडी टेबल के नीचे छिपा हुआ था। दूरामी का एलियन 'भूलखा' धरती ग्रह पर रहने वाले लोगों के बारे में पता लगाने के लिए आया था। भूलखा काफी दिनों से चंद्रभान की गतिविधियां देख रहा था और एक दिन वो उसका अपरहण करके अपने साथ दूरामी ले गया।

जब चंद्रभान दो तीन घंटों तक किताबों के पास नहीं आया तो किताबें परेशान हो गईं। गणित की किताब से निकला अर्थमैटिको, फिजिक्स का फिजिक्सा, बायोलॉजी से बायोलाल जी और केमिस्ट्री से केमिकेलिया... यह चारों मिलकर मंत्रणा करने लगे कि आखिर चंद्रभान गया तो गया कहां।

बायोलाल जी ने टेबल के नीचे के माइक्रोऑर्गेनेज़ि्म्स से पूछा कि क्या उन्हें चंद्रभान के बारे में पता है, तो वहीं केमिकेलिया टेबल के ऊपर जग में रखे पानी के हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अणुओं से चंद्रभान के बारे में मालूमात हासिल करने लगे।
आखिरकार कमरे के वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन एटम ने केमिकेलिया को बताया कि उसने एक एलियन को चंद्रभान को ले जाते देखा है। बाहर निकले तो उपस्थित अन्य अणुओं, बैक्टीरिया और वायरस ने भी बायोलाल जी को सारी कहानी सुना दी।

अब चारों को अपने परम मित्र चंद्रभान की जान बचानी थी। चारों ने दूरामी प्लेनेट जाकर चंद्रभान को छुड़ाने की ठान ली। सबसे पहले बायोलाल जी ने वायुमंडल में उपस्थित बेक्टीरियल कोशिकाओं (cells) का प्रयोग करके चारों को अमीबॉइड शेप्स में बदल दिया, जिससे वो चारों किसी भी शेप में आ सकते थे।

अब फिजिक्सा ने ग्रेविटेशनल फोर्स को रिवर्स करके उसे लेविटेशनल (levitational) फोर्स में तब्दील कर दिया। गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होते ही चारों उड़ते हुए, हवा में तैरते हुए प्लेनेट अर्थ से बाहर निकल गए। सब स्पेस में पहुंच चुके थे।

अागे का काम केमिकेलिया ने संभाला, उसने स्पेस में सफर कर सकने वाली लाइट के फोटॉन पार्टिकल्स से एक स्पेस रॉकेट बनाया, चारो उसमें बैठे और अब फिजिक्सा ने उसे रॉकेट में लाइट ईयर्स की स्पीड दे दी। अब अर्थमैटिको ने लाइटईयर स्पीड को 100 से गुणा करके उसे सौगुना तेज़ कर दिया। इस तरह चारों फोटॉन रॉकेट में बैठ कर 100 लाइट ईयर्स प्रति माइक्रोसैंकेंड की स्पीड से उड़े और 5 मिनट में 10 गैलेक्सीज़ पार करके दूरामी ग्रह पहुंच गए।
 
दूरामी ग्रह इनर्ट गैस हीलियम का बना था। वहां चारों तरफ अजीब सी बायोलॉजिकल सरंचना वाले करोड़ों एलियन मॉन्सटर्स थे। किसी को भी उनको मारने का तरीका नहीं सूझ रहा था। तब अर्थेमैटिको ने दिमाग चलाया और उसने सारे मॉन्सटर्स को ज़ीरो से मल्टिप्लाई कर दिया। सारे मॉन्सटर्स गायब हो गए। अब वहां केवल उनका चीफ भूलखा बचा था। जो कि हीलियम गैस के महल के अंदर था जो कि बहुत मज़बूत था।

महल की दीवारों को तोड़ने के लिए कैमिकेलिया ने हीलियम अणुओं के बीच न्यूक्लियर फिज़न की क्रिया कराई जिससे जबरदस्त एनर्जी निकली और हीलियम का महल ब्लास्ट हो गया। अब चारों भूलखा तक पहुंच चुके थे।

भूलखा ने चंद्रभान को अपनी ज़ेनॉन की लेबोरेट्री में कैद कर रखा था। फिज़िक्सा, केमिकेलिया और बायोलाल जी उससे लड़ते रहे, पर भूलखा पर कोई वार काम नहीं कर रहा था। बायोलॉजिया ने जब उसकी शारीरिक संरचना का अध्ययन किया तो पता चला कि भूलखा मर नहीं सकता और वो अपने शरीर के अणुओं को बिखरा (disintegrate) सकता था। इसी तरह से वो बार-बार उनका हर वार झेल रहा था।

सबने मिलकर एक योजना बनाई, अब की बार कैमिकेलिया ने सल्फ्यूरिक एसिड का वार किया, जैसे ही उससे बचने के लिए भूलखा ने अपने शरीर के अणुओं को डिसइन्टीग्रेट किया, बायोलाल जी ने फटाफट उसके थोड़े से अणु समेट कर अर्थमैटिको को पकड़ा दिए.. और अर्थमैटिको उन अणुओं से भूलखा के शरीर के बाकी अणुओं को डिवाइड करता चला गया। लगातार -लगातार डिवीजन (भाग) होने के कारण भूलखा संभल भी नहीं पाया और छोटा होता चला गया। इतनी देर में फिजिक्सा ने फोर्थ डाइमेंशन तैयार कर ली।
अर्थमैटिको ने लगातार डिवीज़न के बाद बिल्कुल छोटे हो चुके भूलखा को उस फोर्थ डाइमेंशन में फेंक दिया। फिजिक्सा ने तुंरत फोर्थ डाइमेंशन को बंद कर दिया और भूलखा वहीं कैद होकर रह गया।

चारों ने मिलकर चंद्रभान को मुक्त कराया और अपने दोस्त को लेकर सब सही सलामत धरती पर वापस लौट आए।

आज भी भूलखा कई गैलेक्सियों परे स्पेस में बनी फोर्थ डाइमेंशन में कैद है। वो इंतज़ार कर रहा है कि कब फोर्थ डाइमेंशन के बारे में लोग जाने, और कोई आकर उसे निकलने का रास्ता बताएं.....।


कारों और बाइक की दोस्ती की अनोखी कहानी पढ़िए.

जी हां डस्टबिन को भी बुरा लग सकता है, आखिर तो वो अपना काम कर रहा है... पढ़िए डस्टबिनाबाद और रीसाइक्लाबाद की कहानी

फलों और सब्ज़ियों के बीच दोस्ती की शुरूआत की कहानी


Saturday, 12 September 2015

रंग लाई फूयो, ऑल्टिया और मर्सिडीज़िया की दोस्ती



गाज़ियाबाद की एक आधुनिक सोसाइटी की बेसमेन्ट पार्किंग में एक ऑल्टो कार और एक हीरो हौन्डा बाइक रहा करते थे। दोनों में गहरी दोस्ती थी। कार का नाम था ऑल्टिया और बाइक थी फूयो। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि एक दिन भी अगर दोनों एक दूसरे से बात ना करें तो परेशान हो जाते थे। कभी ऑल्टिया गर्मी से परेशान फूयो को अपने ठंडे एसी की हवा दिया करती थी तो कभी फूयो, ऑल्टिया के थके हुए टायरों की अपने किक स्टार्टर से मालिश कर दिया करता था। सारे त्यौहार, छुट्टियां दोनों साथ मनाते थे। दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती किया करते थे।

फिर एक दिन अचानक ऑल्टिया गायब हो गई। फूयो ने उसका बहुत इंतज़ार किया। अन्य साथी कारों, स्कूटरों और बाइकों से भी पूछा पर किसी को मालूम नहीं था। हफ्ता गुज़र गया। फूयो बहुत उदास रहने लगा। उसकी दोस्त जाने कहां चली गई थी। .. और फिर एक दिन ऑल्टिया की जगह एक चमचमाती नई ग्रे रंग की बड़ी कार खड़ी होने लगी। 

फूयो को हैरानी हुई। उसने उस नई कार से बात करने की कोशिश की, उसका हाल-चाल पूछा, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। वो अपनी अकड़ में रहने वाली गुरूर से भरी हुई कार थी। जिसे फूयो से मामूली बाइक से दोस्ती करना पसंद नहीं था। जब फूयो ने  उससे एक बार और पूछा तो उस ग्रे कार ने अपनी हैडलाइट झटकते हुए गुस्से से कहा कि देखो- आय एम मर्सिडीज़ीया.., मैं अपने फ्रेंड्स बहुत सोच-समझ कर बनाती हूं, हर किसी से दोस्ती नहीं कर सकती। इसलिए आगे से मुझसे बात करने की कोशिश मत करना।

फूयो बेचारा दुखी हो गया। अब वो अकेला था। बात करने के लिए, खेलने के लिए कोई नहीं था। मर्सिडीज़िया तो उसकी तरफ देखती तक नहीं थी, खेलना तो दूर की बात रही। एक दिन वो ऐसे ही दुखी होकर ऑल्टिया को याद कर रहा था.. " ओ ऑल्टिया, मेरी दोस्त, तुम कहां चली गईं, तुम होती तो हम कितनी मस्ती करते।.. " वो बड़बड़ा ही रहा था कि मर्सिडीज़िया की हैरानी भरी आवाज़ आई- " तुम ऑल्टिया को कैसे जानते हो? " 

फूयो हैरान, उसने मर्सिडीज़िया को बोला कि तुमसे पहले यहां ऑल्टिया ही रहा करती थी। उससे मेरी गहरी दोस्ती थी, और फिर एक दिन वो गायब हो गई और तुम उसकी जगह आ गईं। मर्सिडीज़िया की आंखों में आंसू आ गए। वो बोली कि जानते हो मैं ऑल्टिया की बड़ी बहन हूं। वो एक कार कार्निवल में मुझसे बिछड़ गई थी। तब से उसे ढूंढ रही हूं। उसकी तलाश में दिल्ली, बम्बई, हैदराबाद.. और जाने कहां कहां गई पर वो मुझे नहीं मिली। आज पता चला कि वो यहां थी। क्या तुम उसे ढूंढने में मेरी मदद करोगे?

फूयो भी हैरान था। उसने प्रॉमिस किया कि वो ज़रूर मदद करेगा। उस दिन से मर्सिडीज़िया और फूयो दोस्त बन गए, दोनों साथ रहने लगे, घूमने लगे और एक साथ ऑल्टिया को ढूंढने की कोशिश करने लगे। 

एक दिन दोनों साथ पेट्रोल भरवाने पहुंचे थे कि अचानक फूयो को दूसरी तरफ बीमार, परेशान ऑल्टिया दिख गई। उसमें ड्राइविंग सीट पर एक गुंडा सवार था। फूयो चुपके से उसके पास पहुंचा और ऑल्टिया से पूछा कि वो वहां कैसे आई। 

ऑल्टिया, फूयो को देखकर खुश हो गई। उसने बताया कि यह आदमी उसे चुरा कर लाया है और अब वो उसे स्क्रैप यार्ड भेजने की तैयारी कर रहा है, जहां उसे मार दिया जाएगा। फूयो तुरंत मर्सिडीज़िया के पास पहुंचा और उसे सारी बात बताई। दोनों ने मिलकर ऑल्टिया को छुड़ाने की तरकीब सोच ली थी। 

जब ऑल्टिया को लेकर वो चोर पेट्रोल पंप से निकला, फूयो कार के सामने आकर लेट गया। उस चोर ने हड़बड़ी में ब्रेक लगाए और वो फूयो को रास्ते से हटाने के लिए कार से बाहर निकला। जैसे ही वो बाहर निकला, तैयार खड़ी मर्सिडीज़िया ने उसे टक्कर मार दी। चोर बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गया। 

फौरन फूयो उठा। वो, ऑल्टिया और मर्सिडीज़िया वहां से दौड़ पड़े। तीनों बहुत तेज़ भागे और एक नई जगह जाकर रुके। ऑल्टिया भी आज़ाद होकर और  बिछड़ी हुई बहन से मिलकर बहुत खुश थी। उस दिन से तीनों वहीं साथ-साथ रहेने लगे। वो हमेशा दोस्त रहे। उनकी दोस्ती के किस्से आज भी कार वर्ल्ड में किवदंती की तरह सुनाए और गुनगुनाए जाते हैं।




अब पढ़िए डस्टबिनाबाद और रीसाइक्लाबाद की अनोखी कहानी

पढ़ाकू हैं? तो पढ़ डालिए उस पढ़ाकू लड़के की कहानी जिसकी जान उसकी दोस्त किताबों ने बचाई

एक किस्सा उस दौर का जब फलों और सब्ज़ियों में दोस्ती नहीं थी


Tuesday, 8 September 2015

यह तब की बात है जब फलों और सब्ज़ियों के बीच दोस्ती नहीं थी...

एक समय था जब फल और सब्जियां अलग अलग रहते थे। दोनों में दोस्ती कायम करने में चेरी और शिमला मिर्च का बहुत बड़ा योगदान है। कैसे... जानने के लिए सुनते हैं यह कहानी..

 बहुत समय पहले धरती पर टमाटर के रस की नदी बहा करती थी। नदी के इस तरफ था फ्रूट किंगडम यानि फलों का साम्राज्य और दूसरी तरफ था वेजीटेबल किंगडम यानि सब्जि़यों का साम्राज्य।


फ्रूट किंगडम के राजा थे महामहिम आम और महारानी थी चेरी.. दोनों की जोड़ी एक और शून्य की जोड़ी थी, अलग किस्म की, अजीब जोड़ी लेकिन बेजोड़। फ्रूट किंगडम का शानदार क्यूकम्बर पैलेस, खीरे से बना था। उसमें केले के खम्बे थे और लाल बेर जड़ित खीरे की दीवारें।
महाराजा आम जब तरबूज़ की शानदार अंगूर जड़ी, लाल बग्घी में बैठकर प्रजा के बीच आते थे तो सेब, खुबानी, चीकू, केले और बाकी सारी फलों की प्रजा उनका शानदार स्वागत करती थीं।


नदी के दूसरी तरफ वेजीटेबल किंगडम के महाराजाधिराज थे बैंगन राजा और उनकी महारानी थीं, शिमला मिर्च। इनका महल भिंडी से निर्मित था जिसमें पत्ता गोभी के बड़े-बड़े पर्दे और फूलगोभी के झूमर लटका करते थे। महाराजा की शाही सवारी कद्दू में मटर की नक्काशी करके बनाई गई थी। महल के दोनों ओर गाजर सिपाही तैनात रहते थे।


दोनों अमीर राज्य थे, खुशहाल, खूबसूरत, सुखी और अपने में मगन। बस नदी की सीमा लांघकर कभी किसी ने दूसरे राज्य में जाने की कोशिश नहीं की।

पर नारी मन को क्या कहा जाए.. एक बार महारानी चेरी जब टमाटर नदी किनारे शहतूत के बागों में घुम रहीं थी अचानक उनकी नज़र नदी के पार सेम की बेलों पर पड़ गईं.. रानी का मन वेजीटेबल किंगडम की सैर को मचल गया। तुरंत खीरा महल पहुंची और महाराज आम से मन की बात बताई।

महाराजा आम ने उनसे कहा कि सदियां बीत गई, कभी भी हमारे पूर्वजों ने उस तरफ जाने की कोशिश नहीं की। हम अलग हैं और वो सब्जि़यां अलग, हम आपको वहां जाने की इजाज़त नहीं दे सकते। रानी चेरी नहीं मानी, रूठ कर बैठ गईं।
हारकर राजा आम ने उन्हें बुलाया और कहा कि अगर आप वहां जाना चाहती हैं तो जाएं, लेकिन हम कभी उस तरफ नहीं गए हैं और ना ही जानते हैं कि वहां के निवासी कैसे हैं। अगर आपको आते देख उन्होंने आप पर हमला कर दिया तो...

 इस पर रानी चेरी बोली कि हम वहां दोस्ती का पैगाम लेकर जाएंगे। उनको भी यहां आने के लिए आमंत्रित करेंगे और फलों और सब्जियों के बीच की यह दूरी हमेशा के लिए खत्म कर देंगे।

राजा आम को यह विचार पसंद आया, लेकिन फिर भी उन्होंने एहतियात बरतने को कहा। रानी से कहा कि हम आपको पूरी तैयारी के साथ वहां भेजेंगे, ताकि अगर वो आपसे मित्रवत् व्यवहार ना करें तो आप उन्हें जवाब दे सकें।

तैयारियां शुरू हुईं।

रानी के लिए अन्नानास का शानदार जहाज बनाया गया, जिसके चारों तरफ हरे कांटों का रक्षाकवच था। रानी को टमाटर नदी सुरक्षित पार कराकर वेजीटेबल किंगडम पहुंचाने की जिम्मेदारी सेनापति अमरूद को दी गईं।
सेनापति अमरूद ने अन्य सब्जियों के लिए खीरे की नावें बनवाईं। सबसे पहले इन नावों में नारियल सेना को उतारा गया। नारियल सेना के पीछे संतरों की सेना चली। इसके बाद बीच में रानी का अन्नानास जहाज और दोनों तरफ अखरोट और खुबानियों भरी नावें चली।

नारियल सेना सब्जि़यों की तरफ से किसी भी तरह के आक्रमण को झेलने में सक्षम थी। संतरे की सेना का हथियार था खट्टा रस और उसके बाद आ रहे आड़ू, खुबानी और अखरोट बम के गोलों की तरह दुश्मनों को मार गिराने में सक्षम थे।

 रानी का काफिला नदी पार करने चला। जैसे ही वेजीटेबल किंगडम की मिर्ची और नींबू सेना को गुप्तचर प्याज ने इसकी खबर दी कि दूसरी तरफ से दलबल के साथ महारानी चेरी इधर आ रही हैं, उन्होंने बैंगन राजा तक बात पहुंचाई। तुरंत बैंगन राजा ने आपात बैठक बुलाई। सारी सब्जियां चिंतिंत थी। जो आज तक नहीं हुआ, होने जा रहा था। फल राज्य से कोई उनके सब्जी राज्य आ रहा था। तब महारानी शिमला मिर्च ने सलाह दी कि महाराज चिंतित मत होईए। अपनी मिर्ची और नींबू सेना को तैयार रखिए। भुट्टे मिसाइल भी मंगवा लीजिए, लेकिन तुरंत हमला मत करिएगा। पहले उन्हें यहां आने दीजिए। क्या पता वो लड़ने के लिए नहीं बल्कि दोस्ती का पैगाम लेकर आईं हों।


बैंगन राजा को महारानी कैप्सिकम की बात जंच गई। तुरंत अपने सेनापति टिंडे को नदी किनारे भेजा। चेरी रानी का काफिला वहां पहुंच चुका था। सेनापति अमरूद आगे आए और उन्होंने वेजीटेबल किंगडम के सेनापति टिंडे से मुलाकात की। उन्हें बताया कि महारानी चेरी सब्जियों के राज्य में घूमना चाहती हैं।

सेनापति टिंडा यह पैगाम लेकर बैंगन राजा के पास गए।

बैंगन राजा ने रानी चेरी और उनके सारे लाव लश्कर को पहले दिन जिमीकंद के गैस्ट हाउस में रुकाया, जहां मटर के सीक्रेट कैमरे लगे थे।
एक दिन तक रानी चेरी और उनके सभी साथियों की सारी गतिविधियां देखने के बाद बैंगन राजा को यकीन हो गया कि महारानी चैरी वाकई दोस्ती का पैगाम लेकर आई हैं। उन्होंने तुरंत महारानी को कद्दू महल बुलाया और उनकी शानदार आवभगत की गई। महारानी कैप्सिकम भी महारानी चेरी से मिलकर बहुत खुश हुईं।

एक हफ्ते तक महारानी चेरी वहां रहीं और विदाई के समय उन्होंने महारानी केप्सिकम और महाराजा बैंगन को खूब सारे अखरोट, काजू, बादाम और अन्य फल उपहारस्वरूप दिए। बैंगन राजा ने भी महारानी चेरी को मटर, सेम, भिंडी आदि देकर विदा किया। चेरी महारानी ने उन्हें अपने फ्रूट किंगडम आने के न्यौता भी दिया।

खुशी-खुशी रानी विदा होकर वापस फ्रूट किंगडम पहुंची और राजा आम से सारी बात बताई। उस दिन से फलों और सब्जियों में दोस्ती हो गई। टमाटर की नदी पर अरबी का पुल बना दिया गया और दोनों राज्य के निवासी एक दूसरे से मिलने जुलने लगे, दोनों के बीच दोस्ती की गांठ जुड़ चुकी थी।


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दो कारों और एक बाइक की दोस्ती की दास्तान..
  

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...