Sunday, 1 September 2013

ईकोनॉमिक हिटमैन... विकासशील देशों को विकसित देशों का गुलाम बनाने वाले पेशेवर...



किसी भी देश की रीढ़ होती है उसकी अर्थव्यवस्था, और ईकोनॉमिक हिटमैन इसी रीढ़ को तोड़कर विकासशील देशों को विकसित देशों का गुलाम बनने पर मजबूर करते हैं। यह वो पेशेवर हैं जिनका काम थर्ड वर्ल्ड कन्ट्रीज़ को आर्थिक रूप से इतना कमज़ोर करना है कि यह राष्ट्र खुद अपने प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रण धनवान मुल्कों के हाथ में देने के लिए तैयार हो जाए जो मुफ्त में उनका भरपूर दोहन कर सकें। 

मद्रास कैफे में एक शब्द सुना- इकोनॉमिक हिटमैन। शब्द नया था। पहली बार सुना था। जानने की इच्छा हुई तो गूगल पर ढूंढा और जो चौंकाने वाली जानकारियां मिली उन्हें सबके साथ शेयर कर रही हूं।

गूगल पर 'ईकॉनोमिक हिटमैन' की कोई परिभाषा नहीं है। लेकिन विकीपीडिया पर जॉन पर्किन्स की आत्मकथा "कन्फैशन्स ऑफ एन ईकोनॉमिक हिटमैन" की विवेचना दी गई  है जिसमें पर्किन्स ने ईकोनॉमिक हिटमैन क्या होता है, यह समझाया है।

ईकोनॉमिक हिटमैन काफी अच्छी सेलरी पाने वाले वो लोग होते हैं जो पूरे विश्व के कई देशों के अरबों-खरबों रुपए धोखे से हड़पने का काम करते हैं। यह लोग विश्व बैंक, यूनाईटेज स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट (USAID) और अन्य विदेशी सहायता संगठनों से पैसे निकालकर उनसे विश्व की  बड़ी-बड़ी कॉरपोरेशन्स और कुछ अति धनवान परिवारों की तिजोरिया भरते हैं जो इन पैसों और रसूख से पूरे विश्व की प्राकृतिक सम्पदाओं को नियंत्रित करते हैं। इसके लिए यह लोग झूठी फाइनेंशियल रिपोर्टस, जबर्दस्ती थोपे गए चुनाव, रिश्वत, फिरौती, सेक्स और यहां तक कि हत्या जैसे कामों का भी सहारा लेते हैं।

इन पेशेवरों का काम विकासशील देशों के राजनीतिक और आर्थिक नेताओं को वर्ल्ड बैंक या यूएसएड सरीखी वैश्विक संस्थाओं से भारी-भरकम विकास कर्ज लेने के लिए राज़ी करना है। और जब यह देश इन भारी-भरकम कर्ज़ों को लौटा पाने की स्थिति में नहीं होते तब कर्ज़ माफ़ी के नाम पर अमेरिका जैसे बड़े देश उनसे अपनी शर्ते मनवाते हैं।




 कर्ज नहीं चुका पाने के कारण इन छोटे राष्ट्रों के नेता राजनीतिक, आर्थिक और अन्य आंतरिक मामलों पर विकसित देशों की दखलंदाजी सहने के लिए विवश हो जाते हैं। इस तरीके से यह ईकोनॉमिक हिटमैन विकासशील देशों और विकसित देशों के बीच की आर्थिक खाई को और गहरा करने और गरीब देशों की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने का काम करते हैं ताकि विकसित देश अपनी मनमानी कर सकें।

उदाहरण के तौर पर जी-आठ देश जब थर्ड वर्ल्ड कन्ट्रीज़ के कर्ज़ों को माफ करते हैं तो इन देशों से बहुत सी शर्तें भी मनवाते हैं जैसे-

  • देश की मुख्य जन सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी आदि का निजीकरण करना
  •  विभिन्न सेवाओं और वस्तुओं पर दी जा रही सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना
  • वो सभी व्यापार प्रतिबन्ध या सब्सिडी हटाना जो लोकल बिजनिस को बढ़ावा दें
  • जी 8 देशों और अमेरिका द्वारा इनके देश में किए जा रहे उद्योगों और व्यवसायों पर सब्सिडी और सहायता देना
  •  वो सभी व्यापार नीतियां बदलना जो जी-8 देशों से आयातित चीज़ों और सेवाओं को बढ़ावा नहीं देती

कॉरपोरेटोक्रेसी कहलाती है यह व्यवस्था 

 जॉन पर्किन्स ने इस व्यवस्था को 'कॉरपोरेटोक्रेसी' का नाम दिया है।  कॉरपोरेटोक्रेसी- यानि विकसित देशों की सरकारों,  बैंकों और अत्यन्त धनवान कॉरपोरेशन्स का संगठन जो विकासशील देशों का पैसा धोखे से हड़पकर उनसे अपनी मांगे मनवाने का काम करता है।

 यह होते हैं एक इकोनॉमिक हिटमैन के काम-


जॉन पर्किन्स ने अपनी आत्मकथा "कन्फेशन्स ऑफ एन ईकोनॉमिक हिटमैन" में बताया है कि उन्हें एक अतर्राष्ट्रीय कंसल्टिंग फर्म के अर्थशास्त्री के रूप में नियुक्त किया गया था लेकिन वास्तविक तौर पर वो अमेरिका के ईकोनॉमिक हिटमैन थे और उन्हें निम्न काम सौंपे गए थे-

 -उन सभी देशों जो कि अमेरिका के लिए कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण थे, को आधारभूत विकास के लिए अमेरिका या विश्व बैंक से भारी विकास कर्ज लेने के लिए तैयार करना।
-साथ ही यह भी सुनिश्चित करना कि विकासशील देशों में इस कर्ज़े से शुरू होने वाले सारे प्रोजेक्ट्स अमेरिकी कॉरपोरेशन्स को ही मिलें।
-इन देशों को दिवालिया होने के कगार तक पहुंचाना जिससे वो कभी भी कर्ज़  लौटाने की स्थिति में ना आ पाएं और हमेशा अमेरिका के एहसानों तले दबे रहें।

 (इसके बदले में अमेरिका इन देशों को अपनी गलत मांगे मानने के लिए मजबूर करता है जैसे अमेरिकन मिलिट्री के लिए अपने देश में बेस बनाने की अनुमति देना। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का समर्थन करना और अपने देश के प्राकृतिक संसाधनो जैसे तेल, गैस आदि का अमेरिका को इस्तमाल करने देना...) 

विकासशील राष्ट्रों को कर्जा लेने को तैयार करने के लिए पर्किन्स ऐसी फाइनेंशियल रिपोर्ट तैयार करते थे जो कि यह दिखाती थी कि कर्ज़ के इन पैसों से देश में जो इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा उससे देश की जीएनपी (ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट) बढ़ेगी। पर्किन्स के अनुसार जीएनपी के आंकड़े इन कामों के लिए काफी उपयुक्त होते हैं क्योंकि अगर सिर्फ एक व्यक्ति या कंपनी की आय में भी वृद्धि हो जाए तो जीएनपी में वृद्धि दिखने लगती है।

इन सभी प्रोजेक्ट्स के ज़रिए अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर्स, कंसट्रक्शन कंपनिया और कॉरपोरेशन्स खूब पैसा कमाती हैं। संबंधित देश के कुछ धनवान परिवारों, जो कि राजनीति में भी हस्तक्षेप रखते हैं, को भी इन डील्स से अच्छे पैसे मिलने का लालच रहता हैं और इसलिए वो भी विकसित देशों की इन गलत नीतियों का समर्थन कर देते हैं।

इन देशों के राजनेता भी यह सोचकर यह कर्ज लेने को तैयार हो जाते हैं कि इसके ज़रिए आधारभूत संरचना जैसे सड़को, हवाईअड्डों, यातायात साधनों आदि का जो विकास होगा उसका क्रेडिट उन्हें मिलेगा और राजनीति में उनकी जगह पक्की रहेगी जबकि असलियत यह है कि कर्ज़ मछली को फंसाने के लिए चारे की तरह इस्तमाल किए जाते हैं।

विकासशील राष्ट्र अक्सर यह कर्ज चुका पाने की स्थिति में नही ंहोते। धनवान देशों की मांगे मानी जाती हैं और देश के नागरिक सालों तक कर्ज में डूबे रहते हैं। सरकारी धन की कमी के चलते उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाओं के साथ महत्वपूर्ण वस्तुओं पर मिलने वाली सब्सिडी से भी हाथ धोना पड़ता है।

पर्किन्स ने यह भी बताया है अमेरिका इन्हीं ईकोनॉमिक हिटमैन की बदोलत इतना धनवान देश बना है और लगभग सभी विकसित देश इनका प्रयोग करते हैं। हांलाकि प्रत्यक्ष रूप से कोई देश स्वीकार नहीं करता कि वो इन पेशेवरों का इस्तमाल करता है लेकिन सच्चाई यहीं है कि ऐसे हिटमैन होते हैं। देश के नागरिकों को भनक तक नहीं लगती, कोई युद्ध नहीं होता, कोई खून-खराबा नहीं और छोटे देश धनवान देशों के अनकहे गुलाम बन जाते हैं।



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