Tuesday, 8 October 2013

नज़रिया

सीन-1- त्रिपाठी जी का घर
-चलो जल्दी तैयार हो जाओ। डॉक्टर साहब को वेट कराना अच्छा नहीं लगता। 
-उनके लिए क्या ले चलें? केले ठीक रहेंगे...?
-अरे क्या बात करती हो। केले जैसे सस्ते फल ले जाना अच्छा लगता है क्या इतने बड़े आदमी के घर। सेब और अंगूर लेलो और एक किलो मिठाई भी ले लेना। दोस्त अब बड़ा आदमी हो गया है, उसके घर ढंग से जाएंगे। 
(दो महीने बाद)
सीन-2 डॉक्टर साहब का घर
-इतनी जल्दी क्यों तैयार हो गए? आराम से चलेंगे। और उनके लिए केले ले लेना वो हमेशा कुछ ना कुछ लेकर आते हैं। हम खाली हाथ जाएंगे तो अच्छा नहीं लगेगा।
-लेकिन केले, अच्छे लगेंगे क्या। कोई ढंग के फल या मिठाई ले लेते हैं। फिर आपके इतने पुराने दोस्त से होली मिलने जा रहे हैं।
-ठीक है यार। इतना मत सोचो। ऐसी कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं है वो। उसके घर जा रहे हैं यहीं कम हैं क्या।

No comments:

Post a Comment

तकनीकी विकास से जुड़ा है हमारा क्रमिक विकास

भास्कर में छपा यह छोटा सा समाचार दरअसल विकास और संचार दोनों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। तकनीक हमारी भाषा ही नहीं, आदतें, योग्यताएं,...